ग़ज़ल – सौरभ पाण्डेय

 
एक दीये का अकेले रात भर का जागना..

सोचिये तो धर्म क्या है ?.. बाख़बर का जागना !

 

सत्य है, दायित्व पालन और मज़बूरी के बीच

फ़र्क़ करता है सदा, अंतिम प्रहर का जागना !

 

फ़िक्रमन्दों से सुना, ये उल्लुओं का दौर है

क्यों न फिर हम देख ही लें ’रात्रिचर’ का जागना ।

 

राष्ट्र की अवधारणा को शक्ति देता कौन है ?

सरहदों पर क्लिष्ट पल में इक निडर का जागना !

 

क्या कहें, बाज़ार तय करने लगा है ग़िफ़्ट भी

दिख रहा है बेड-रुम तक में असर का जागना ।

 

हर गली की खिड़कियों में था कभी मैं बादशाह

वो मेरी ताज़ीम में दीवारो-दर का जागना ! [ताज़ीम – इज़्ज़त, आदर

 

आज के हालात पर कल वक़्त जाने क्या कहे ?

किन्तु ’सौरभ’ दिख रहा है मान्यवर का जागना !

 

 

- सौरभ पाण्डेय

जन्मतिथि : 3 दिसम्बर 

शिक्षा : बी.एस.सी (गणित), डिप. इन सॉफ़्टवेयर, डिप. इन एक्स्पोर्ट मैनेजमेण्ट, एमबीए.

पुस्तकें : परों को खोलते हुए शृंखला (सम्पादन), इकड़याँ जेबी से (काव्य-संग्रह), छन्द-मञ्जरी (छन्द-विधान)

प्रकाशन : राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में, अनेक सम्पादकों के संकलन में रचनाएँ सम्मिलित.

सम्बद्ध मंच : प्रबन्धन सदस्य, ई-पत्रिका ओपनबुक्सऑनलाइन; सदस्य, प्रमर्शदात्री समूह, विश्वगाथा (त्रैमासिक)

पता :  नैनी, इलाहाबाद  (उप्र)

 

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