ग़ज़ल -महबूब सोनालिया

१.
अजब नहीं है जो बाहिर कहीं अदू न मिले।
जो घर में बैठा हो छुपके, वो कु ब कु न मिले।
है मेरी पीठ पे नश्तर तो जाने पहचाने।
मैं चाहता हूँ तेरे हाथ पर लहू न मिले।
बड़े बड़ो को ये अकसर बगाड़ देती है।
खुदा करे के ख़िरद से कभी भी तू  न मिले।
मेरी नज़र में वो इंसान मर चूका है अज़ीज़।
के ज़िंदगी में जिसे कोई आरजू न मिले।
के इस तरह से मिले तुझको एक अरसा हुआ।
अदा ए नाज़ ही बस बोले गुफ्तगू न मिले।
अजीब धार है लफ़्ज़ों के तेग़ ओ खंजर की।
सरापा ज़ख्म दे लेकिन कहीं लहू न मिले।
मुझे तो शाहों की किस्मत पे भी तरस आए
जहाँ पे राज़ करे फिर भी उनको ‘तू’ न मिले।
मेरी नज़र में ये नायाब है हुनर ‘महबूब’
के तार तार बदन में कहीं रफू न मिले।
२.
जो बरतरी को न समजे, न बेहतरी जाने।
वो शख्स खाक भला सिन्फे शायरी जाने।
भरी हो जिनकी नज़र में हवस सभी के लिए।
वो अपनी बेटी को क्यों नाज़ से परी जाने।
तभी तो दाद ज़माने की रास आती नहीं
ये हाले दिल है मगर लोग शायरी जाने।
हज़ार होती कमी है सभी के जीवन में।
किसी भी ज़िंदगी को मत हरी भरी जाने।
उभर सके जो कभी दायरा ए रंज ओ ख़ुशी।
फिर उसके बाद में इश्क़े कलंदरी जाने।
सुखनवरी से तो चलता नहीं है घर कोई।
ये बिन पगार की “महबूब” नोकरी जाने।
३.
ये करिश्मा भी है इन नज़र के लिए।
बिक गए खुद ही बस एक घर के लिए।
ज़िंदगी की डगर पे है ये बोझ सा।
बुग्ज़ का इतना सामाँ सफर के लिए।
तेरे जलवे हर एक शय में मौजूद थे।
मैं तरसता रहा इक नज़र के लिए।
ज़िंदगी भर रहा मैं अंधेरो में बस
कोई मुझ में जला उम्रभर के लिए।
अर्श से लौट आती है हर इक दुआ।
माँ के आमीन वाले असर के लिए।
मेरे महबूब दुनिया बड़ी थी मगर
हम भटकते रहे एक घर के लिए
४.
हमें बच्चों से भी चाहत बहुत है।
खिलोनोकी मगर कीमत बहुत है।
किये फांके भी दुनिया से छुपाके।
मेरे माँ बाप की इज़्ज़त बहुत है।
बहाना खून आसाँ है यहाँ पर
रगो में बह रही नफरत बहुत है।
सुकूँ मिलता नहीं उस घर में यारो
भले ही ऐश है दौलत बहुत है
ग़म ए फुरकत सताये क्यूँ मुझे अब
मेरे दिल में तेरी क़ुरबत बहुत है।
मेरी खुद्दारी बिकती कैसे महबूब
यहाँ अच्छाई की कीमत बहुत है।
५.
पूछो की मेरी सच्ची खबर किस के पास है।
मेरी ज़मीं पे आज ये घर किस के पास है।
मकतब उधर है और इधर सु ए मैक़दा।
देखो की अब वो जाता किधर, किस के पास है।
बस्ती है ये गरीब की, बस प्यार है यहाँ।
मत पूछ के सब लालो गोहर किस के पास है।
ये हौसला है मेरा की बिन पैर दौड़ दूँ।
जज़्बा ये भला जिन्नो बशर किस के पास है।
दस बाय दस का मिलता है मुश्किल से जोपड़ा।
सपनो का हसीं रंग नगर किस के पास है।
रोते हुए जो आदमी को पल में हँसा दे।
‘महबूब’ आज ऐसा हुनर किस के पास है।
- महबूब सोनालिया

एल आई सी 
सीहोर , भावनगर , गुजरात

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