ग़ज़ल – आलोक यादव

एक मुस्कान से वो रिश्ते बना लेता है,

ये मेरा दिल भी कई किस्से बना लेता है I

 

पास रहकर भी कोई अपना नही हो पाता,

दूर रहकर भी कोई सबसे बना लेता है I

 

बात करने का सलीका कोई सीखे उससे,

बातों बातों में कई लहजे बना लेता है I

 

डाल कर आँखों में आँखों को मेरा हमसाया,

दिल में जाने के कई नक़्शे बना लेता है I

 

नज़रे जितनी भी चुराओ बचो जितना ‘आलोक’,

वो तो खुशबू की तरह रस्ते बना लेता है I

 

– आलोक यादव

जन्म : ३० जुलाई कायमगंज, फ़र्रूख़ाबाद (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा : बी0 एससी0 (लखनऊ विश्वविद्यालय) एम0बी0ए0 (इलाहबाद विश्विद्यालय)

सम्प्रति :वर्ष १९९८  में संघ लोक सेवा आयोग से सहायक भविष्य निधि आयुक्त पद पर चयन

वर्तमान में क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त पद पर बरेली में तैनात

उपलब्धियां :१. इंटरनैशनल इंटल इंटेलेक्चुअल पीस एकेडमी द्वारा डॉ इकबाल उर्दू अवार्ड २०१४

२. डॉ आसिफ बरेलवी अवार्ड २०१४ से सम्मानित

प्रकाशन:       

 १. ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘धर्मयुग’, ‘मनोरमा’, ‘फेमिना’, ‘गृह शोभा’, ‘आधार शिला’, ‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’ आदि पत्र पत्रिकाओं में लेख, कवितायेँ, ग़ज़ल आदि प्रकाशित I

२. आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारण I

३. उर्दू दैनिक “इंक़िलाब”, “पैग़ाम-ए-मादरे वतन” एवं उत्तर प्रदेश सरकार के उर्दू मासिक “नया दौर” में गज़लें प्रकाशित I

४. अयन प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित प्रशासनिक अधिकारियों के ग़ज़ल संग्रह ‘इज़्तिराब’ का संपादन

५. सदा आर्ट सोसाइटी, नई दिल्ली के नाटक “ए सोल सागा” में गीत लेखन

वर्तमान पता :     पीलीभीत बाईपास रोड, बरेली

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