ग़ज़ल – अनिता मंडा

 

लुटी कलियाँ हवस के हाथ फिर से राजधानी में..
कसर क्या रह गई हमसे चमन की बागबानी में..

बचे हैं सिर्फ फाके, पेट खाली आग सा धधके
हुई महँगी, पड़े कैसे बताओ दाल पानी में…

मिटाकर देह अपनी जन्म देती एक जो औरत
बदल देती वही औलाद माँ को नौकरानी में…

दिया इक ने जनम तो दूसरी ने लाड़ से पाला,
किसे तू माँ कहेगा देवकी औ’ नंदरानी में….

मिले हों आज तो ब्रेकअप दिखे कल, पैचअप परसों
हजारों मोड़ आते हैं मुहब्बत की कहानी में…

शहर का कायदा है फासले रखकर मिला जाये
न देखो दावतों के ख़्वाब जाओ चाय पानी में….

हुए बच्चे भी सारे चालू-पुर्जे आजकल के तो,
मोबाइल टैब चाहें सब, न खुश हों गुड़ व धानी में।

 

– अनिता मंडा

जन्म-जुलाई , नई दिल्ली
एम ए-हिन्दी व इतिहास, बीएड।
लेखन -स्वतंत्र लेखन।
अंतरजाल पर विभिन्न पत्रिकाओं में लेखन।
स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ,हाइकु, दोहे, मुक्तक व क्षणिकाएँ लेखन।

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