ग़ज़लें – सुशील ठाकुर ‘साहिल’

१ .

ख़त्म जिस दिन ज़िन्दगी के कारवां हो जायेंगे
हम ख़लाओं में बिखरकर बस धुआँ हो जायेंगे

चाह्चहाते पंछियों को शाम में मत टोकना
सुबह तक वरना ये पंछी बेज़ुबां हो जायेंगे

फिर नहीं गुज़रेगी बस्ती से अदावत की हवा
हम अगर इक दूसरे के कद्रदां हो जायेंगे

ऐ ख़ुदा हमको ज़रूरत से न ज़्यादा चाहिये
वरना औरों की तरह हम बेईमां हो जायेंगे

जिस्म के आज़ा पे मत करना कभी ज़्यादा गुरूर
ख़ाक में कुछ जा मिलेंगे कुछ धुँआ हो जायेंगे

शरपसंदों को हमेशा कीजिये झुककर सलाम
क्या पता कब ये हमारे हुक्मरां हो जायेंगे

अम्न और शांति इन पौधों को तुम बढ़ने तो दो
देखना आँगन वतन के गुलसितां हो जायेंगे

उम्र को माना छुपा देता है ये रंगे- ख़िज़ाब
इस अमल से क्या ऐ ‘साहिल’ हम जवां हो जायेंगे

हम फ़िक्र में हैं ख़ुशबूए- गुफ़्तार के लिए
सरगर्दां सर है आपका दस्तार के लिए

जो भी हमारे पास है, सच का है आईना
कुछ भी नहीं है आपके अख़बार के लिए

वो ले गया दुवाएँ भी अबके दवा के साथ
आसान मौत हो गई बीमार के लिए

थोड़ी सी भी ख़ुल्द में मिल जाए ऐ ख़ुदा
इस दौरे – नौ में कुछ नहीं ख़ुद्दार के लिए

सच को ही पीना पड़ता है ज़हराब दोस्तों
काफ़ी है ये इशारा समझदार के लिए

उर्यानियत से इनदिनों उनको है एहतिराज़
अच्छी ख़बर नहीं है ये बाज़ार के लिए

अल्फ़ाज़ के बग़ैर भी मुमकिन है गुफ़्तगू
बस आँखें चार कीजिए इज़हार के लिए

‘साहिल’ तुझे सताए है दुनिया का ग़म तो क्या
दरवेश तो जीता ही है संसार के लिए

हो चाहे आज या फिर कल ज़रूर निकलेगा
तुम्हारे जेह्न से रंगे – फ़ुतूर निकलेगा

कहीं पहन के वो बैठा है पाँव में घुंघरू
जो अब्र छाएगा ख़ुद ही मयूर निकलेगा

इसे लगाया है कुछ रोज़ेदार बच्चों ने
ज़रूर पेड़ से मीठा खुजूर निकलेगा

ऐ प्यारे मेमने सुन ! शेर की अदालत में
सफ़ाई लाख दे , तेरा क़ुसूर निकलेगा

ये बच्चे पूछते हैं म्युजियम से गोरों के
हमारे पुरुखों का कब कोहेनूर निकलेगा

नशा ये इश्क़ का है साग़रो – सुबू का नहीं
किसे पता है कि कब तक सुरूर निकलेगा

मैं रखना चाहा था साबित तुम्हारे क़दमों पे
कहाँ पता था कि दिल चूर चूर निकलेगा

तुझे तो लौट के आना है एक दिन ‘साहिल’
वतन से चाहे तू जितना भी दूर निकलेगा

सवाले-इश्क़ पर हमसे ये दिल तक़रार करता है
कभी इक़रार करता है कभी इनकार करता है

कभी तामीर करता है कभी मिस्मार करता है
यही शेवा है उसका जो हज़ारों बार करता है

किसी के वास्ते अपने को जो बीमार करता है
मेरी नज़रों में वो इंसान सच्चा प्यार करता है

हर इक तक़रीर में करके वो मज़हब ज़ात की बातें
हमारे जेह्नो-दिल के साथ अत्याचार करता है

मसाइल दोनों जानिब के, कोई फुटबॉल हो जैसे
जो तू उस पार करता है तो वो इस पार करता है

यहाँ के बादशाहों की करो हो जिक्र क्या यारों
यहाँ प्यादा भी पीछे से न कोई वार करता है

मकां की शक्ल देकर ताश के पत्तों को वो ‘साहिल’
कभी तरतीब देता है कभी मिस्मार करता है

ख़त्म फूलों की निशानी हो रही है
ख़ूब अच्छी बाग़बानी हो रही है

क्यों नहीं मातम हो बकरे के घरों में
खाल ढोलक की पुरानी हो रही है

फिर गले मिलाने को है मक्खन से चाक़ू
देखिये, क्या मेहरबानी हो रही है

तुमने क्यों मांगी तरक्क़ी की दुआएँ
लो! कली अब रातरानी हो रही है

जिस तरफ़ भी देखिये सत्ता के सर पे
सेट पगड़ी ख़ानदानी हो रही है

पहले आ जाती थी आसानी से ख़ुशियाँ
कुछ दिनों से आनाकानी हो रही है

तू नया उन्वान चुनकर इब्तिदा कर
ख़त्म ‘साहिल’ की कहानी हो रही है

वफ़ादारी की मेरी इससे बढ़कर हाल क्या होगा
सलाखों में रखा जाऊंगा और तत्काल क्या होगा

हवा को दे रहे हो मशवरा आराम करने का
हवा आराम करने लग गई तो हाल क्या होगा

परिंदों में यकीं भरदो कि हम हमदर्द हैं उनके
फँसाने के लिए इससे बड़ा अब ज़ाल क्या होगा

गुजस्ता साल तो लंगर शिकस्ता, नाख़ुदा गूंगा
ख़ुदा जाने मेरी कश्ती का अबके साल क्या होगा

ये कोशिश है बचाने की हमें या मार देने की
जहां हो छेद कश्ती में वहाँ तिरपाल क्या होगा

जमापूंजी भी बरसों की ज़रुरत ने हज़म कर ली
अभी से सोच में बैठा हूँ अगला साल क्या होगा

मिला पहचान का मुंसिफ तो उसकी टल ग़ई फांसी
कभी सोचा है ऐ ‘साहिल’ कि तेरा हाल क्या होगा

 

- सुशील ‘साहिल’

जन्म : सुपौल ज़िला (बिहार )

शिक्षा : १. इंजीनियरिंग की डिग्री ( यांत्रिक), एम. आई. टी. मुज़फ्फ़रपुर

२. संगीत प्रभाकर , प्रयाग संगीत समीति इलाहबाद

३. संगीत विशारद , प्राचीन कला केंद्र चंडीगढ़

पेशा : नौकरी, भारत सरकार के उपक्रम “कोल इंडिया लिमिटेड में”. सम्प्रति वरिष्ठ प्रबन्धक’ के पद पर  ई. सी. एल. केन्दा एरिया, रानीगंज (प.बंगाल) में कार्यरत

पता : जिला : गोड्डा , झारखण्ड 

साहित्यिक/सांस्कृतिक गतिविधियाँ/उपलब्धियाँ:

- कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों से ग़ज़ल/कविता की प्रस्तुति
– सुगम संगीत एवं लोकगीत में आकाशवाणी-भागलपुर का अनुबंधित कलाकार
– आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं अन्य टी वी चैनलों से कविताओं / ग़ज़लों की प्रस्तुति
-हिंदी एवं उर्दू के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ( जैसे वागर्थ, साक्षात्कार, नया ज्ञानोदय, प्रेरणा, लोक
गंगा, अलाव, वर्तमान साहित्य, व्यंग यात्रा, हरिगंधा, अक्षर पर्व , छपते-छपते , आधुनिक साहित्य, मंज़र, हिन्दी चेतना (कनाडा) आर्म्सटेल-गंगा(हालेंड) ग़ज़ल के बहाने, पिन्दार, कृति ओर, अभिनव प्रयास इत्यादि )

सम्मान : 

१. राजभाषा प्रेरक सम्मान (वर्ष 2011), गुरुकुलकांगड़ी
विश्वविद्यालय हरिद्वार
२. कवि मथुरा प्रसाद ‘गुंजन’ सम्मान (मुंगेर, बिहार वर्ष 2012 )
3. शमशेर बहादुर सिंह रजत सम्मान वर्ष 2015 खगड़िया बिहार
4. विद्या वाचश्पति की मानद उपाधि ( वर्ष 2013), विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ भागलपुर (बिहार)
5. ‘पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय’ सम्मान ( वर्ष 2014), कैंडी श्रीलंका में प्राप्त
6. सृजन सम्मान ( वर्ष 2014), कैंडी श्रीलंका में प्राप्त

7. काव्य भारती सम्मान, 16.07.2014 को ताशकंद में प्राप्त

8. ताशकंद (उज़्बेकिस्तान) में विश्व हिंदी परिषद द्वारा प्रसस्ति पत्र 16.07.2014 को प्राप्त

9. साहित्य भारती सम्मान, विवेकानंद सभागार क्रॉयडन लन्दन में 15.07.2015 को प्राप्त

पुस्तक : ‘गुलेल’ ( ग़ज़ल संग्रह ) जिसका विमोचन श्रीलंका के कैंडी शहर
में 19.01.2014 को तथा विश्वपुस्तक मेला प्रगति मैदान दिल्ली में 23.
03.2014 को सम्पन्न हुआ , दूसरी ग़ज़ल संग्रह *‘**तीर-ओ-तरकश**’* प्रकाशनाधीन . *गुलेल* ग़ज़ल संग्रह उर्दू रस्मुलख़त में भी प्रकाशनाधीन.

 

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