क़ब्रिस्तान

खराब मौसम के आसार शाम से ही दिखने लगे थे…पर बावजूद इसके अनिश्चय की स्थिति बनी हुई थी। पल भर में आकाश एकदम साफ़…झक्क सफ़ेद…कुछ इस तरह जैसे अभी-अभी किसी कुशल गृहणी ने पिटने से खूब कूट-कूट कर सफ़ेद चादर की सारी गन्दगी को निकाल कर साफ़ पानी से धोकर फैला दिया हो सूखने के लिए, पर दूसरे ही क्षण कुछ शरारती बच्चों ने अपने मैले…मिट्टी-सने पाँवों की छाप देकर उसे फिर गन्दा कर दिया।

आकाश की झक्क सफ़ेदी पर काले बादलों के धब्बे कान्तीलाल के मन में ऐसा ही अहसास जगा रहे थे। यद्यपि तेज़ हवा धूल-मिट्टी को बार-बार उड़ा देती थी, पर फिर भी उसके कुछ निशान तो रह ही जाते थे।

हवा, धूल, मिट्टी की इस शरारत से वे काफ़ी अनिश्चय की स्थिति में थे। आकाशीय कैनवास पर जब काले बादलों का टुकड़ा सूरज को पूरी तरह घेर कर बैठ जाता तो ठण्डी हवा और भी बर्फ़ीली हो जाती, पर पल भर बाद ही गुस्से में आकर सूरज उन्हें परे धकेलता तो ठण्ड जैसे थम-सी जाती।

वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऑफ़िस क्या पहन कर जाएँ…सूट-बूट या स्वेटर…? सिर्फ़ स्वेटर पहनते हैं तो सर्दी लगती है और सूट पहनते हैं तो गर्मी सी लगती है…। सर्दी-गर्मी के बीच वे तो पिस जाते हैं। शाम को छींकते हुए आते हैं तो पत्नी गुस्सा हो जाती है,”जब देखो तब छींकते रहते हो…ज़रा मुँह ढाँक कर छींका करो…इधर-उधर छींटे उड़ते हैं। घर में किसी और को छूत लग गई तो और मुसीबत…फिर डॉक्टर के चक्कर काटते रहो…पर तुम्हें क्या…?”

“अरे तो क्या मैं जानबूझ कर छींकता हूँ…? तुम तो ऐसे परहेज करने लगती हो जैसे मैं कोई टी.बी या किसी घातक बीमारी का मरीज़ हूँ…।” गुस्से में आकर वे छींकना भी भूल जाते।

“तो मुझे भी शौक नहीं है तुम्हें छींकते देखने का…। कितनी बार कहा है कि ढंग से कपदए पहन कर जाया करो, पर मेरी सुनते ही कहाँ हो? ब्लडप्रेशर के मरीज़ हो फिर भी डर नहीं…।”

बात को बढ़ती देख कर वे ही ठण्डे पड़ जाते,”अच्छा भई, ठीक है…चलो, ज़रा अदरक, लौंग और इलाइची की बढ़िया-सी चाय बना दो और हाँ…थोड़ी तुलसी की पत्ती भी डाल देना। देखना…सारी सर्दी छूमंतर…” और फिर वे खुद ही हँसने लगते।

आज भी वे काफ़ी असमंजस में थे। आलमारी पूरी खुली हुई थी। वे कभी सूट की ओर देखते, तो कभी पैण्ट, कमीज़, स्वेटर की ओर…। उनकी इस स्थिति का फ़ायदा उठाने की ताक में एक मरियल-सा चूहा इधर-उधर बड़ी देर से डोल रहा था। वे हटे तो वह बड़ी तेज़ी से आलमारी के अन्दर घुसे…। उसकी मनोकामना पूरी होती कि तभी उन्होंने सूट वाला हैंगर उतारा औत फ़ट्ट से अलमारी बन्द कर दी,”भाड़ में जाए मौसम…गर्मी लगेगी तो इतना ही होगा कि कोट उतार कर कुर्सी पर टाँग देंगे…कम-से-कम छींकने से तो बचे रहेंगे…।”

वे सूट-बूट पहन कर कंघी कर ही रहे थे कि शीशे में पत्नी का चेहरा दिखा। वह कुछ परेशान-सी थी,”कुछ सुना तुमने…?”

“क्या?”

उनका ध्यान तेज़ी से सफ़ेद होते जा रहे अपने बालों की ओर त्घा,”कितनी बार तुमसे कहा है कि कम-से-कम इतवार के दिन ज़रा मेरे बालों में डाई लगा दिया करो…। बाल कितने खराब लगने लगे हैं, पर तुम्हेम फ़िक्र हो तब न…।”

पत्नी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। वह अपनी ही रौ में थी,”अरे, अब तो घर भी सुरक्षित नहीं रह गया है।”

“क्यों, क्या हुआ घर को…? क्या फिर किसी घर में घुस कर आतंकवादियों ने घरवालों को बन्धक बना लिया…?”

“तुम्हें तो बस्स हर समय मज़ाक ही सूझता रहता है…।”

पूरी तरह तैयार होने के बाद ही उन्होंने मुड़ कर देखा तो हँसी फूट पड़ी। पत्नी गुस्से में मुँह फुलाए बैठी थी। पत्नी का कद वैसे ही काफ़ी छोटा था, तिस पर शरीर पर चढ़ी गज़ब की चर्बी के कारण शारीर की तरह मुँह भी काफ़ी थुलथुला और गोलमटोल-सा हो गया है…। ऐसे में जब वह गुस्सा होती है तो और भी अजीब लगती है, पर वे इसी में खुश हैं…। कम-से-कम घर के सारे काम तो सलीके से करती ही है, साथ ही बच्चों का और उनका भी बहुत ख्याल रखती है…उन्हें और क्या चाहिए…? खूबसूरती से ज्यादा उन्हें घर का सुख चाहिए…।

“अरे भई, तुम तो ज़रा-ज़रा सी बात पर मुँह फुला कर बैठ जाती हो। जल्दी से कहो, मुझे ऑफ़िस के लिए देर हो रही है…।”

पत्नी जितनी जल्दी गुस्सा हो जाती है, उतनी ही जल्दी खुश भी हो जाती है। तुरन्त चहक कर बोली,”वह अपने पुराने मकान के पड़ोसी रामनारायन मिश्रा याद हैं न आपको…?”

“हाँ…याद है…क्या हुआ उन्हें…?”

“अरे, उन्हें नहीं…उनकी बड़ी लड़की बिब्बो को हुआ। परसो शाम चार-पाँच बदमाश कट्टा-चाकू लेकर घर में घुस आए और जब तक कोई कुछ समझता, बिब्बो को उठा कर ले गए…।”

“अरे पुरानी आशनाई रही होगी…तुम इस पचड़े में क्यों पदअती हो? पर हाँ, एक बात बताओ…तुम्हें कैसे पता चला…?”

“अरे, फोन आया था रमा का…वही बता रही थी। बेचरे रामनारायण थाने के चक्कर लगा रहे हैं, पर बिब्बो का कुछ पता ही नहीं चल रहा…। तुम ज़रा कुछ करो न…।”

“तो तुम क्या चाहती हो…सारा कामकाज छोड़ कर मैं पता करूँ…? अरे भई, रामनारायण से कहो कि चुप बैठे…बिब्बो खुद ही लौट आएगी…।”

“तुम्हें शरम नहीं आती…? अपने आगे भी जवान लड़की है। अगर उसके साथ ऐसा-वैसा कुछ होता तो भी तुम ऐसे ही आशनाई की बात करते…?”

“खबरदाऽऽऽर…जो अपनी बेटी के बारे में कुछ ऐसा कहा…। अरे, मैं अपने घर को संभालूँ या उनके…? बिब्बो के साथ दुर्घटना घटी तो रामनारायण समझें…इसमें मैं क्या कर सकता हूँ…?”

उनके चेहरे पर गुस्सा साफ़ झलक आया था, पर उसे सफ़ेद होते बालों की तरह ही काले बालों के बीच दबाते हुए बोले,”अपनी बेटी पर मुझे पूरा भरोसा है…।”

“पर…”

“पर-वर कुछ नहीं…इस लफ़ड़े से दूर ही रहो और अपने घर को देखो…बस्स…।”

जूते का फ़ीता बाँधते हुए उन्होंने पत्नी की ओर देखा तो सहसा ही ठठा कर हँस पड़े,”तुम भी न…।”

उनकी हँसी से पत्नी चिढ़ गई,”अरे, तुम्हें मेरी और बच्चों की फ़िक्र होती तो इस तरह अपने सफ़ेद बाल देख कर परेशान नहीं होते…। मैं क्या कुछ समझती नहीं…।”

“अरे बाप रे…बात यहाँ तक पहुँच गई…।” अब ऑफ़िस भागने में ही उन्होंने अपनी भलाई समझी। अभी इस पचड़े में पड़ेतो पौने नौ वाली बस छूट जाएगी। पन्द्रह दिन पहले स्कूटर बनने दिया है, तब से यही परेशानी झेल रहे हैं। मैकेनिक बस कल…कल कहता है, पर उसका यह कल आता ही नहीं। आज लंच टाइम में जाकर हड़काएँगे उसे, तब जाकर देगा स्कूटर…।

वे बस स्टॉप तक रिक्शे से पहुँचे ही थे कि तभी बस चल दी। रिक्शे वाले को पैसे देकर वे दौड़ कर बस में चढ़ तो गए, पर चढ़ने के बाद ही अहसास हुआ कि उन्होंने बड़ी ग़लती की। बस में तो तिल रखने भर की जगह नहीं थी तो वे अपना पैर कहाँ समाते? एक दूसरे के पैरों पर चढ़े पैरों को पहले ही धक्का देकर हटाया जा रहा था, पर एक पैर से लोग हटते तो दूसरा पैर उस पर चढ़ जाता, तिस पर उनके दो पैर तो और बढ़ गए थे…उसे कहाँ समाएँ…?

ऑफ़िस और कॉलेज जाने वाले लड़कियों की स्थिति तो और भी बुरी थी। वे जितना ही बचने की कोशिश करती, उतना ही शोहदे उन पर और चढ़े जाते। खड़े लोगों के साथ ही बैठे हुए लोगों की भी कोई खास अच्छी स्थिति नहीं थी। उनके मुँह के पास अच्छे-गन्दे सभी अपना नितम्ब इस तरह सटाए खड़े थेजैसे यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। बेचारे सीट पर बैठे लोग मजबूर थे…उन्हें धकेल भी नहीं सकते थे। उन्हें पता था कि बस की यह विकटता सुबह ऑफ़िस टाइम और शाम को छुट्टी के वक़्त ही थी। पर बाद की खाली बस का कोई क्या करता…? ऑफ़िस और कॉलेज तो टाइम से ही पहुँचना होता था।

बस के भीतर वे बहुत थक गए थे। ऑफ़िस घर से पन्द्रह किलोमीटर दूर था पर बस से जाते समय उन्हें सदियों का अहसास होता था। वहाँ पहुँचते-पहुँचते वे इतना थक जाते कि आधा घण्टा सुस्ताने के बाद ही काम शुरू कर पाते। सहकर्मी चुटकी लेते तो वे खुद पर हँसने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। स्कूटर बन जाए तो इस परेशानी से मुक्त हों।

बस झटके से रुकी तो समझ गए कि स्टॉप आ गया। रॉड पकड़े-पकड़े सीधा हाथ इतना तन गया थाकि नीचे कर के उन्हें हल्का-सा झटका देना पड़ा और इस झटका देने में ही हाथ पास खड़ी एक लड़की की छाती से टकरा गया। लड़की ने गुस्से में उनकी ओर देखा। वे सहम कर जल्दी से आगे बढ़ गए। उतरते हुए सुना,”कुत्ता कहीं का…।”

स्टॉप से ऑफ़िस चार कदम की ही दूरी पर था, पर उस गाली को सुनने के बाद पैर जैसे मन-मन के भारी हो गए। उनकी बेटी बराबर लड़की ने आज उन्हें ‘कुत्ता’ कहा। इतनी भीड़ में रुक कर सफ़ाई देने में शायद पिट ही जाते…। पिटाई से भले ही बचे पर ‘कुत्ता’ शब्द उनके पीछे ही पड़ गया। इत्तफ़ाकन उनके बगल में एक भारी-भरकम कुत्ता भी चल रहा था और वह एक सड़ियल-मरियल सी कुतिया के पीछे बहुत देर से लगा था। झुँझला कर उन्होंने एक ढेला उठाया और कुत्ते को निशाना साध कर मारा,”हरामज़ादा कहीं काऽऽऽ…।”

कुत्ता उनकी ओर देख कर गुर्राया और फिर रास्ता बदल कर कुतिया के पीछे चला गया। कुत्ते के इस तरह कुतिया क पीछा करने से बहुत से लोगों को बड़ा मज़ा आ रहा था, पर पता नहीं क्यों वे अपने को बेहद शर्मिन्दा महसूस कर रहे थे। उन्हें लगा जैसे वे सूट-बूट में नहीं, बल्कि पूरी तरह से नंगे हैं और कुतिया के पीछे लगने वाले कुत्ते भी वही हैं…।

वे और असहज होते कि तभी बगल में एक स्कूटर आकर रुकी। चौंक कर देखा तो उनका सहकर्मी आनन्द था,”अमाँ यार, कहाँ पैदल भगे जा रहे हो? आओ, पीछे बैठ जाओ…।”

उन्होंने ना-नुकुर नहीं की। चुपचाप बैठ तो गए पर गुस्सा फूट ही पड़ा,”आज साले मैकेनिक को जाकर लतिआऊँगा जरूर…। साला, पन्द्रह दिन से स्कूटर रखे है…बना कर दे ही नहीं रहा…।”

“अरे यार…लतियाना-वतियाना नहीं…नहीं तो तुम्हारा स्कूटर ऐसा खराब कर देगा कि बेचना ही पड़ेगा। मैं भुगत चुका हूँ…इन टैक्निकल लोगों के मुँह ही नहीं लगना चाहिए…।”

“तो क्या करूँ…? पन्द्रह दिन से बस के धक्के खा रहा हूँ…। पता नहीं कैसे लोग कीड़े-मकौड़ों की तरह चलते हैं…मुझसे तो नहीं होता…।”

ऑफ़िस आ गया था, अतः बात वहीं खत्म हो गई। स्कूटर से उतर कर उन्होंने आदतन घड़ी पर निगाह डाली तो झुंझला गए। घड़ी बन्द थी और उसमें अभी तक नौ ही बजे थे। रोज सुबह पत्नी ही उसमें चाभी भरती थी, पर जब से उसने बिब्बो वाली घटना सुनी है, तब से इतना परेशान है कि कई काम भूल रही है। उसके होंठो पर बस एक ही प्रार्थना है,”हे भगवान…किसी तरह बिब्बो घर लौट आए…।”

वैसे भी उसे इस तरह के समाचारों में गहरी रुचि है। कामकाज खत्म कर के या तो टी.वी देखेगी या पड़ोसिन से गपशप…। और फिर…कहाँ कोई आतंकवादी पकड़ा गया, कहाँ मारा गया…। कौन सी लड़की भाग गई…कहाँ बम-विस्फ़ोट हुआ…कौन सा नेता भ्रष्टता के आरोप में लपेटा गया…सभी कुछ…जो भी मसालेदार हो…। अभी भी उन्हें याद है जब चैनल वालों ने एक अधेड़ आदमी को अपनी बीवी से पिटते दिखाया था…और यही नहीं, भीड़ द्वारा मुँह काला किए जाने के बावजूद वह अपनी प्रेमिका के साथ डटा रहा था…। उफ़्फ़…इतनी जिल्लत…इतनी बदनामी सह कर भी ऐसा कर्म…?

पत्नी कई दिनों तक उस घटना को लेकर उनके पीछे पदई रही थी और वे समझाते-समझाते हार गए थे,”देखो, दुनिया में हर तरह के लोग हैं…कहाँ तक परेशान हुआ जाए…?”

पर वह तो मानती ही नहीं…। टी.वी में जब भी इस तरह की कोई घटना देखती है तो उनका जीना हराम कर देती है। सोते-जागते न जाने कितने सवाल…। कितनी बार समझा चुके हैं कि ये चैनल वाले बड़े चतुर व्यापारी हैं। अपनी टी.आर.पी बढ़ाने के लिए ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाते हैं कि पूछो मत। कभी यमलोक की यात्रा कराते हैं तो कभी प्रलय की बात कर के डराते हैं। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ इन्हीं का देखा-भाला है…।

“अरे यार, अब तो जीना हराम हो गया है…। कहीं ज़िन्दा बम मिलने की ख़बर…तो कहीं भयानक बम विस्फ़ोट…कहाँ तक डरा

जाए भई…? कभी दिल्ली तो कभी मुम्बई तो कभी निशाने पर कोई और शहर…। यार, जब अपने देश के नेता ही भ्रष्ट हैं तो क्या कहा जाए…? अरे, इन धमाकों में सब आम आदमी ही क्यों मरते हैं…कोई बड़ा आदमी क्यों नहीं मरता…?”

“अरे, मरे न भई…। राजीव गाँधी मरे, इन्दिरा गाँधी मरी…और पड़ोस में बेनज़ीर भुट्टो…।” पूरे कक्ष में एक जोरदार ठहाका लगा कुछ इस तरह जैसे बहुत ही मजाकिया बात कही गई हो।

उनका भी मन हँसने का हुआ पर पता नहीं क्यों, हँस नहीं पाए। सुबह की पत्नी वाली बात तो याद आ ही गई साथ ही बस में उनके साथ जो हुआ, उसने उन्हें एक विचित्र प्रकार के तनाव से भर दिया। उनका हाथ तो भूल से उस लड़की की छाती से छू गया था, तब वह किस कदर तिलमिला गई थी कि उसने उनकी विवशता और उम्र का भी लिहाज नहीं किया था, पर इसमें शायद उस लड़की का कोई दोष नहीं था…। वे तो विवश थे पर हर आदमी तो नहीं होता न…? पता नहीं कितने कम-उम्र या उम्रदराज़ शोहदे ऐसी लड़कियों को भरी बस में तंग करते हैं और वे बेचारी गाली देने के सिवा कुछ नहीं कर पाती…।

कुत्ता कहीं काऽऽऽ…और पीछे एक जोरदार ठहाका…। वह ठहाका जैसे अब भी उनकी पीठ पर चिपका हुआ था। कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि इस ठहाके से पीछा कैसे छुड़ाएँ। ऑफ़िस में किसी से कहते हैं तो मज़ाक बनेगा…पत्नी से कहते हैं तो शक की एक तेज़ सुई और चुभेगी…। चुपचाप इसको भीतर ठेल लेने में ही भलाई है…।

पर रेखा…? उनकी जवान बेटी…? उसे आज ही मना कर देंगे कि बस से कॉलेज जाने की कोई जरूरत नहीं…। ज्यादा होगा तो उसे स्कूटी लेकर दे देंगे…।

मन में जाने कितने विचार थे जो आज ‘कुत्ता’ शब्द से जन्मे थे…आगे फिसलते थे और फिर उसी बिन्दु पर जाकर ठहर जाते थे, जहाँ से वे चले थे।

क्या करें…? अगर बस सुरक्षित नहीं तो स्कूटी ही कौन सी सुरक्षित है? अभी पिछले ही महीने पड़ोस की बीना किस तरह बस की चपेट में आकर ज़ख़्मी हो गई थी। सड़क पर काफ़ी देर तक खून से लथपथ पड़ी रही थी, पर किसी ने उठाया तक नहीं था। पुलिस आई तो उसने भी खानापूर्ति करने के बाद ही अस्पताल तक पहुँचाया। इतनी देर तक उसकी क्या गत हुई, यह उसके सिवा कौन जान सकता है? आज भी वेन्टीलेटर पर पड़ी ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है। काश! वक़्त पर कोई उसे अस्पताल पहुँचा देता…पर…?

लंच टाइम हो गया था, पर उन्हें भूख नहीं थी। स्कूटर ठीक कराने जाना ज्यादा ज़रूरी था, पर ठीक भी हो जाए तो क्या? वे ऑफ़िस के लिए नौ बजे निकलते हैं और रेखा ग्यारह बजे…फिर कॉलेज के बाद कोचिंग…क्या करें…? एक दुविधा आज की घटना से उनके ऊपर इस कदर हावी हो गई कि दो बार सड़क पर ठोकर खाकर गिरते-गिरते बचे।

सारा गुस्सा वे मैकेनिक पर उतारने ही वाले थे पर मौका ही नहीं मिला। उसने पहले ही चकाचक की गई स्कूटर उनके आगे लाकर खड़ी कर दी,”लीजिए बाबूजी, तैयार है आपकी स्कूटर…। समय ज़रुर लग गया पर देखिए, कैसी नई-सी कर दी है…।”

स्कूटर वाकई नई-सी दिखने लगी थी। उसे देख कर उनके भीतर का गुबार जैसे धुल गया। दो-तीन बार उसे स्टार्ट कर के आसपास राउण्ड मारा और फिर उसे पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त पाकर मैकेनिक को उसका मेहनताना दिया और फिर वापिस ऑफ़िस आ गए।

लंच टाइम ख़त्म हो गया था, साथ ही उनकी भूख भी…। पल भर पहले जो गुबार छँटा था, वह फिर उनके जेहन को घेरने लगा था। रेखा कॉलेज जाती है। विकास पहले ही बँगलौर में है। रोज सुबह-शाम जब तक उसका फोन नहीं आ जाता, उन्हें चैन नहीं मिलता…और समता…?

वह तो अभी बच्ची ही है। आठवीं में है, पर अच्छे-बुरे की कोई समझ नहीं आई है। स्कूल भले ही बस से जाती है, पर मुहल्ले में अच्छे-खराब सब लोगों से इस तरह बिन्दास घुलमिल जाती है कि कभी-कभी उन्हें डर-सा लगने लगता है। कैसे समझाएँ उसे…? पत्नी बहुत ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है। उसे तो रसोई और टी.वी से ज्यादा कुछ समझ नहीं आता, पर दिन भर बाहर की दुनिया देखने के कारण वे सब समझते हैं। रोज़ अपहरण…बलात्कार की घटनाएँ पढ़ते-सुनते रहते हैं, पर बाप होने के कारण बेटी को कैसे समझाएँ…?

उनका मन सहसा ही बेचैन होने लगा, पता नहीं क्यों…? उन्हें लगा कि इस शहर से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से संवेदना ख़त्म होती जा रही है। कल टी.वी पर चार साल की बच्ची के साथ हुए दुराचार की ख़बर को भी लोग कितनी सहजता से ले रहे थे और वह पापी अपराधी…?

उसकी बड़ी-बड़ी बैल जैसी आँखों में पश्चाताप का कोई नामोनिशान तक नहीं था। सींखचों के पीछे खड़ा इतने आराम से अपने पाप का बखान कर रहा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम किया हो। उनका खून खौल उठा था…सामने होता तो पता नहीं क्या कर डालते…।

“अमाँ यारऽऽऽ…आज इतना उदास-उदास क्यों हो…? भाभी से झगड़ा हुआ है क्या…?”

गोयल ने पूछा तो भी वे सच नहीं उगल सके। कोई फ़ायदा भी नहीं था। यह सुन कर सब लिहाड़ी ही लेंगे। ज्यादातर की जवान बहू-बेटियाँ हैं, पर इस तरह की गन्दी ख़बर सुन कर इस तरह सीत्कार भरेंगे कि उनका मन घृणा से भर जाता है। क्या इस दुनिया में इतने कठोर हृदय भी हो सकता है कोई…?

‘कठोर हृदय…?’ शायद…। बिब्बो की घटना को सुन कर उन्होंने क्या किया…?

सहसा उनके माथे पर पसीना चुहचुहा आया। पूरा बदन सनसनाहट से भर गया और दिल की धड़कन इस कदर तेज़ हो गई कि लगा जैसे दिल अभी उछल कर बाहर आ जाएगा।

पास बैठे अब्दुल ने उनकी ये हालत देखी तो उठ कर तेज़ी से उनके पास आ गया,”क्या हुआ कान्ती बाबू…? ब्लदप्रेशर फिर हाई हो गया क्या? सॉल्वीट्रेट की गोली रखी है न…?”

“हाँ…” उन्होंने जेब की ओर इशारा किया तो जल्दी से उसने गोली निकाल कर उनके मुँह में डाली, मुँह धुलाया और फिर पानी पिला कर पूछा,”डॉक्टर बुलवाऊँ क्या…?”

उन्होंने ‘न’ में सिर हिलाया, पर तब तक आसपास काफ़ी लोग आ गए थे। कोई ऑफ़िस के डॉक्टर को भी बुला लाया था। डॉक्टर ने उन्हें चेक करके कुछ दवाएँ लिख दी और फिर आराम करनेकी सलाह देकर चले गए।

थोड़ी देर आराम करने के बाद जब उनकी तबियत कुछ सुधरी तो आसपास जैसे प्रश्नों की झड़ी लग गई,”क्या बात हो गई भई…? सुबह तो अच्छे-खासे आए थे…।”

“भाभी से कुछ झगड़ा हुआ है क्या…? अरे, बी नॉर्मल…यह सब लाइफ़ में चलता रहता है…। नितिन को देखो…दो साल से बीवी गुस्सा होकर मायके जाकर पड़ी है, पर फिर भी कितना मस्त है…।”

“कुछ सीखो यारऽऽऽ, जीना किसे कहते हैं…। यह क्या ब्लदप्रेशर और शुगर की बीमारी पाल ली…।”

एक जोरदार ठहाका उनके आसपास गूँज उठा, पर वे चुपचाप कुर्सी के बैक से सिर टिकाए बैठे रहे।

थोड़ी देर सब टाइमपास करते रहे फिर अपनी-अपनी सीट पर चले गए। किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि उनकी तबियत खराब है, क्या वे उन्हें घर पहुँचा दें…?

आखिर अचानक उनकी तबियत खराब क्यों हो गई? टी.वी पर बलात्कार की घटना दिखाना कोई नई बात तो थी नहीं…। रोज़ सुबह अखबार में न जाने ऐसी कितनी घटनाएँ चाय की चुस्कियों के बीच पधअते हैं और फिर बाकियों की तरह जेहन से झटक कर बाथरूम में घुस जाते हैं, फ़्रेश होने के लिए, फिर आज…?

फिर आज ही ऐसा क्या था? शायद उस लड़की का उन्हें ‘कुत्ता’ कहा जाना उन्हें भीतर तक खल गया था, पर नहीं…उन्होंने तो उसे भी अपने जेहन से लगभग झटक ही दिया है, फिर…?

मन काफ़ी खराब हो गया था। डॉक्टर ने आराम करने को कहा था, सो उन्होंने ऑफ़िस की छुट्टी होने का इन्तज़ार भी नहीं किया और सब काम समेट के ड्रॉअर में रख कर नीचे स्कूटर स्टैण्ड पर आ गए।

अभी स्कूटर निकाला ही था कि निशा सामने आ गई,”कान्ती जी, आज आप मुझे घर तक छोड़ देंगे…?”

“क्यों क्या हुआ…? तुम तो टैम्पो से जाती हो न…?”

“हाँ, जाती तो हूँ…पर कोई कह रहा था कि नई सड़क पर दो गुट आपस में भिड़ गए हैं…कुछ दंगे जैसे आसार हैं…।”

“तो थोड़ा रुक कर जाओ न…।”

“पर मेरे घर का रास्ता तो उधर से ही है न…कितनी देर रुकूँगी…?”

“सॉरी निशा…आज मेरी तबियत ठीक नहीं है…। ऐसा करो, किसी को घर से बुला लो…।”

निशा अवाक खड़ी रह गई और वे स्कूटर स्टार्ट कर के आगे बढ़ गए। वे हमेशा बड़े चौराहे से होकर जाते थे। चाहते तो थोड़ा रास्ता बदल कर निशा को घर छोड़ सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनकी ज़िन्दगी में खुद ऐसे कई झमेले हैं, किस-किस की सहायता करें…?

“ऐ भाई साहबऽऽऽ…उधर कहाँ जा रहे? वहाँ बड़े चौराहे और परेड तक दंगा भड़क गया है।”

दो-चार लोग रास्ता बदल रहे थे। वे भी उस आवाज़ पर पल भर थिठके, फिर उन्होंने भी रास्ता बदल लिया।

सहसा उन्हें याद आया कि स्कूटर में तो बस नाममात्र का ही पेट्रोल था, उसमें कितनी दूर जा पाएँगे…? और अगर कहीं पूरे शहर में दंगा भड़क गया तो न तो पेट्रोल मिलेगा और न ही राशन-पानी…।

पल भर रुक कर उन्होंने माहौल का जायजालिया, फिर स्कूटर वी.आई.पी रोड पर मोड़ दी। उधर एक पेट्रोल पम्प भी है। टंकी फ़ुल करवा लेंगे और जी.टी रोड से कुछ खाने-पीने का सामान भी ले लेंगे।

स्कूटर हवा से बातें कर रही थी। घर की ज़रुरतें उनके भीतर करवट बदल रही थी पर साथ ही जेहन में एक कचोट सी चस्पा थी…। निशा को बेकार ही मना किया। उन्हें बुजुर्ग समझ कर उसने एक अनुरोध किया और उन्होंने एक झटके से मना कर दिया। इतने पत्थर दिल कैसे हो गए वे? एक पत्नी जो कम पढ़ी-लिखी होने के बावजूद दूसरों के दुःख से जुड़ी रहती है और एक वे हैं…।

निशा की जगह अगर उनकी अपनी बेटी होती तो…?

पुलिस की टुकड़ियाँ जीप से उतर करिधर-उधर फैलने लगी थी। लाउडस्पीकर पर एनाउन्समेण्ट किया जाने लगा था। लोगों को बिना घबराए, धैर्यपूर्वक अपने अपने घरों में जाने की सलाह दी जा रही थी, यानि कि दंगा सच में एक कोने से शुरू होकर पूरे शहर में फैल गया था। छुटकी तो दोपहर में ही घर आ जाती है पर रेखा…?

वह तो कॉलेज से सीधा कोचिंग जाती है, फिर रात में आठ बजे ही घर आ पाती है। साथ में भले ही एक सहेली रहती है, पर अगर उधर भी खतरा हुआ तो…?

अचानक उनके माथे पर इस कड़ाके की ठण्ड में भी पसीना चुहचुहा आया…साथ ही बहुत तेज़ गर्मी भी लगी। एक झटके से उन्होंने स्कूटर रोका और फिर अपना कोट उतार कर उसे डिक्की में डाल दिया। पास ही एक हैण्डपम्प था। वहाँ जाकर ढेर सारा पानी पिया, मुँह धोया, आँखों में खूब छींटे मारे…। उससे थोड़ी राहत तो मिली पर पसीना अब भी चुहचुहा रहा था…।

क्या करें…? रेखा तो आजकल अपना मोबाइल भी नहीं ले जा रही है…। कुछ दिनों से उसमें गन्दे-गन्दे मैसेज आ रहे थे, उन्होंने ही उसे स्विच-ऑफ़ करवा कर रखवा दिया था…। उफ़्फ़…अब क्या करें…?

वापस मुड़ कर उन्हें परेड की ओर ही जाना होगा…उधर ही वह कोचिंग होती है…। परेड के रास्ते में ही एक क़ब्रिस्तान पड़ता है…। उधर से गुज़रते हुए पता नहीं क्यों हमेशा उन्हें अहसास होता है कि एक दिन यह पूरा शहर क़ब्रिस्तान में तब्दील हो जाएगा…। इस क़ब्रिस्तान के आसपास कुछ भी घटित हो…कितने भी लोग गुज़रें…या एक्सीडेण्ट में गुज़र जाएँ…वाहनों का कितना भी शोर हो…दंगे भड़क जाएँ…पर यह क़ब्रिस्तान ऐसे ही शान्त रहेगा…। मुर्दों को दूसरों से क्या लेना-देना…? वे तो अपनी-अपनी क़ब्रों में चैन की नींद सो रहे हैं…। एक ऐसी नींद जो ज़िन्दगी की सारी मुसीबतों से मुक्त करके सकून देती है…।

सहसा मोबाइल की घण्टी घनघनाई तो वे जैसे नींद से जागे,”हैलोऽऽऽ…”

उधर से पत्नी की घबराई हुई आवाज़ आई,”सुनिए, रेखा अभी तक घर नहीं आई। मैंने कोचिंग फोन किया तो पता लगा कि दो घण्टे पहले ही सब निकल गए…।”

“उसकी सहेली के मोबाइल पर मिला कर देखो…।”

“उसका नम्बर नहीं है मेरे पास…” पत्नी लगभग रोने-रोने को थी।

“मत परेशान हो…देखता हूँ…।”

हड़बड़ा कर उन्होंने स्कूटर स्टार्ट की, फिर परेड के रास्ते पर आ गए। माथे का पसीना अब धार छोड़ने लगा था…।

“यारऽऽऽ…ऐसे दंगों में सबसे ज्यादा ख़तरा लड़कियों के लिए होता है…।”

“तब नहीं क्या…दंगाइयों में ज्यादातर शोहदे ही तो होते है…। याद है पिछले दंगे की बात…? एक बेचारी के साथ कितनों ने मुँह काला किया था…। बेचारी को अधमरी करके छोड़ दिया था। बाद में एक पुलिसवाला आया, उस हरामज़ादे ने भी दया नहीं की। उसने भी मुँह काला किया…। अन्त में बेचारी कैसे दुःख भोग कर मर गई…।”

उनकी आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगा था…। पूरी कमीज़ पसीने से भीग गई थी…वे क़ब्रिस्तान के सामने से गुज़र रहे थे…।

“रेखाऽऽऽ…” वे होंठो में बुदबुदाए और अपने को ही एक भद्दी-सी गाली दी। क्यों उसका मोबाइल रखवा लिया…? आज अगर उसका मोबाइल उसके पास होता तो कम-से-कम हाल तो पता चल जाता।

पी.सी.ओ…? पर ऐसे दंगों में तो वो भी बन्द हो जाता है…।

पर उसकी सहेली के पास तो मोबाइल रहा होगा न…? उसे तो रेखा के घर का नम्बर पता ही है, फिर…? कहीं वे दोनो किसी मुसीबत में तो नहीं…?

पता नहीं उनकी आँखों के आगे रात का अन्धेरा गहरा रहा था या उनके डर का…पर उन्हें कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। वे कुछ संभलते कि उनकी स्कूटर लड़खड़ाई और वे औंधे मुँह जा गिरे…।

अगल-बगल से हर कोई पूरी बदहवासी से भागा जा रहा था…। किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया…। पूरी तरह अन्धेरे में घिरने से पहले उन्हें लगा कि उनकी सोच ग़लत नहीं थी…। यह शहर सच में एक क़ब्रिस्तान की तरह है और वे…?

 

- प्रेम गुप्ता ‘मानी’

शिक्षा-        एम.ए (समाजशास्त्र), (अर्थशास्त्र)

जन्म-         इलाहाबाद

लेखन-        १९८० से लेखन, लगभग सभी विधाओं में रचनाएं प्रकाशित

              मुख्य विधा कहानी और कविता, छोटी- बड़ी सभी पत्र-पत्रिकाओं में

              ढेरों कहानियाँ प्रकाशित ।

प्रकाशित कॄतियाँ-   अनुभूत, दस्तावेज़, मुझे आकाश दो, काथम (संपादित कथा संग्रह)

                    लाल सूरज ( १७ कहानियों का एकल कथा संग्रह)

                    शब्द भर नहीं है ज़िन्दगी (कविता संग्रह)

                    अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो (कविता संग्रह)

                   सवाल-दर-सवाल (लघुकथा संग्रह)

                   यह सच डराता है (संस्मरणात्मक संग्रह)

शीघ्र प्रकाश्य-   चिड़िया होती माँ( कहानी संग्रह)

                   कुत्ते से सावधान (हास्य-व्यंग्य संग्रह)

                   हाशिए पर औरत, (लेख-संग्रह)

                   आधी दुनिया पर वार (लेख संग्रह)

विशेष-       १९८४ में कथा-संस्था “यथार्थ” का गठन व १४ वर्षों तक लगातार

              हर माह कहानी-गोष्ठी का सफ़ल आयोजन।

              इस संस्था से देश के उभरते व प्रतिष्ठित लेखक पूरी शिद्दत से जुडे रहे।

सम्पर्क-              “प्रेमांगन”

                          कल्याणपुर, कानपुर (उ.प्र)

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