हॊली-देश से परदेश तक

होली हमारी सांस्कृतिक- भावनात्मक एकता का प्रतीक है. ऋतुराज वसन्त के आगमन से, जब समग्र प्रकृति आनन्द से सराबोर होकर, राग-रंग में मगन हो उठती है और जब वनस्पति नए-नए पल्लव-परिधानों के पुष्पों से अपना शृंगार करती है तथा मंद-मंद मलय समीर के मृदु स्पर्ष से रोमांचित होकर मस्ती मे झूमने लगती है, तब राग-रंजित सृष्टि के समस्त प्राणी, उस नई भंगिमा में प्रकट होने वाली सौंदर्य प्रकृति-नटी के प्रफ़ुल्ल यौवन के आकर्षण में बंधकर गुनगुनाने लगता है, तब मनुष्य कैसे अछुता  रह सकता है.? एक अव्यक्त संगीत झंकृत होने लगता है. मुक्ति के इस उत्सव में, उसकी सारी सीमाएं टूट जाती है. वर्ग भेद,-जातिभेद से परे, मानवीय एकता और प्रेम की अभिव्यक्ति का यह पर्व, सबको रंग-गुलाल में डूबॊ जाता है.                                                                                                                                                               सुगंध से बौराया पवन, मंद-मंद बहने लगता है और सारी सृष्टि पुलकित होकर उल्लास, नई उमंग और उत्साह में झूम उठती है. नगर में, गाँव-गाँव में, डगर-डगर पर मस्ती की धूम मचाता हुआ, रंगों की पिचकारी लिए अलबेला फ़ागुन निकल पडा है होली खेलने. कहीं उषा, दिन के माथे पर रॊली लगा रही है, तो कहीं आकाश में संध्या, निशा के ऊपर गुलाल और सितारे बरसा रही है. बडी मधुर और प्रेम-सौहार्द्र की भावनाओं की प्रतीक है होली. रंगों की सतरंगी दुनिया के बीच मानवता की अनूठी झलक दिखाई देती है इस दिन. भारत की इस सम्मोहक परंपरा को, अन्य देशों में भी, अपने-अपने ढंग से सहजने की कोशिश की है. इसके नाम भी अलग-अलग देशों में अलग-अलग हो गए हैं, परंतु उल्लास की मूल भावना एक समान है.                                                                                                                                                                                                           प्राचीन रोम में “साटर ने लिया” के नाम से होली की ही भाँति एक उत्सव मनाया जाता है. इसे अप्रैल माह में पूरे सात दिनों तक मनाया जाता है. रोम में “रेडिका” नाम से एक त्योहार माह मई में मनाया जाता है. इसमें किसी ऊँचे स्थान पर काफ़ी लकडियाँ इकठ्ठी कर ली जाती है और उन्हें जलाया जाता है. इसके बाद लोग झूम-झूमकर नाचते-गाते हैं एवं खुशियां मनाते हैं. इटलीवासियों की मान्यता के अनुसार, यह समस्त कार्य, अन्न की देवी ”फ़्लोरा” को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है.                          पश्चिमी दर्शन के पितामह कहे जाने वाले सुकरात की जन्मभूमि यूनान में भी लगभग इसी प्रकार का समारोह “पोल” नाम के उत्सव में होता है. यहाँ पर भी लकडियाँ इकठ्ठीकर जलाई जाती है. इसके बाद लोग झूम-झूमकर नाचते-गाते हैं. यहाँ पर यह उत्सव यूनानी देवता “टायनोसियस” की पूजा के अवसर पर आयोजित होता है. कुछ इस तरह का उत्सव मनाने की परंपरा जर्मनी में भी है. यहाँ के रैन्लैंड नाम के स्थान पर होली जैसा त्योहार, एक नहीं, पूरे सात दिनों तक मनाया जाता है. इस समय लोग अटपटी पोशाक पहनते हैं और अटपटा व्यवहार कराते हैं. कोई भी, किसी तरह के बिना किसी लिहाज के मजाक कर लेता है. बच्चे-बूढे सभी एक दूसरे से मजाक करते हैं. इन दिनों, किसी तरह के भेदभाव की गुंजाइश नहीं रह जाती. और इस तरह की गई मजाक का कोई बुरा नहीं मानता.                                                                                                                                                                   बेलजियम मे भी कुछ स्थानों पर होली जैसा ही उत्सव मनाने का रिवाज है. इस हँसी-खुशी से भरे त्योहार में,पुराने जूते जलाए जाते हैं और सब लोग आपस में मिलकर हँसी –मजाक करते हैं. जो व्यक्ति इस उत्सव में शामिल नहीं होते, उनका मुँह रँगकर, उन्हें गधा बनाया जाता है और जुलूस निकाला जाता है. कोई किसी की कही बातों का बुरा नहीं मानता. अमेरिका में होली जैसा ही एक मस्ती से भरे त्योहार का नाम है “होबो”, इस अवसर पर एक बडी सभा का आयोजन होता है, जिसमें लोग तरह-तरह की वेशभूषा पहनकर आते हैं. इस समय किसी भी औपचारिकता पर ध्यान नहीं दिया जाता. मस्ती में झूमते हुए लोग पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हैं. वेस्टइंडिज में तो लोग होली को, होली की ही भाँति मनाते हैं. इस अवसर पर यहाँ तीन दिन की छुट्टी होती हैं. इस अवधि में लोग धूम-धाम से त्योहार मनाते हैं.                                                                                                                                                                                              पोलैंड में होली के ही समान “अर्सीना” नाम का त्योहार मनाया जाता है. इस अवसर पर लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और एक-दूसरे के गले मिलते हैं. पुरानी शत्रुता भूलकर, नए सिरे से मैत्री संबंध स्थापित करने के लिए यह श्रेष्ठ उत्सव माना जाता है. चेकोस्लोवाकिया में “बलिया कनौसे” नाम से एक त्योहार, बिल्कुल ही अपनी होली के ढंग से मनाया जाता है. आपस में एक दूसरे पर रंग डालते हैं और नाचते-गाते हैं.                                                                                                                                                                                          अफ़्रीका महाद्वीप में कुछ देशों में “ओमेना बोंगा” नाम से जो उत्सव मनाया जाता है, उसमें हमारे देश की होली के ही समान ही जंगली देवता को जलाया जाता है. इस देवता को “प्रिन बोंगा” कहते हैं इसे जलाकर नाच-गा कर नई फ़सल के स्वागत में खुशियाँ मनाते हैं. मिश्र में भी कुछ होली की ही तरह नई फ़सल के स्वागत में आनंद मनाते हैं. इस आनंद से भरे त्योहार का नाम “ फ़ालिका” है. इस अवसर पर पारस्परिक हँसी-मजाक के अतिरिक्त एक अत्यंत आकर्षक नृत्य एवं नाटक भी प्रस्तुत किया जाता है.                             सूर्योदय के देश जापान में भी होली के रंग की छटा निखरती है, वहाँ यह त्योहार नई फ़सल के स्वागत के रूप में मनता है. मार्च के महिने मे मनाए जाने वाले इस त्योहार में, जापान निवासी उत्साह से भाग लेते हैं और अपने नाच-गाने एवं आमोद-प्रमोद से वातावरण को बडा ही आकर्षक और मादक बना देते हैं. इस अवसर पर खूब हँसी-मजाक भी होते हैं.                                                                                                                       श्रीलंका में तो होली का त्योहार बिल्कुल अपने देश की तरह ही मनाया जाता है. वहाँ बिल्कुल ठीक अपनी होली की ही भाँति रंग-गुलाल और पिचकारियाँ सजती हैं. हवा में अबीर उडता है. लोग सब गम और गिले-शिकवे भूलकर, परस्पर गले मिलते हैं. अपनी मित्रता एवं हँसी-खुशी का  यह त्योहार श्रीलंका में अपनी गरिमा बनाए हुए है. थाईलैंड में इस त्योहार को “सांग्क्रान” कहते हैं. इस अवसर पर थाईनिवासी, मठों में जाकर वहाँ के भिक्षुओं को दान देते हैं और आपस में एक-दूसरे पर सुगंधित जल छिडकते हैं. इस पर्व पर वृद्ध व्यक्तियों को सुगंधित जल से नहलाकर, नए वस्त्र देने की परंपरा है. परस्पर हँसी-मजाक, चुहल-चुटकुले इस त्योहार को एकदम होली की भांति सँवार देते हैं.                                                                             अपने पडोसी देश बर्मा में होली के त्योहार को “तिजान” नाम से जाना जाता है. यहाँ पर भारत देश के समान ही पानी के बडॆ-बडॆ ड्रम भर लिए जाते हैं और उसमें रंग तथा सुगंध घोलकर एक-दूसरे पर डालते हैं. मारीशस में तो होली का त्योहार भारत के समान ही मनाया जाता है. वहाँ पर इसकी तैयारी पन्द्रह दिन पहले से ही शुरु हो जाती है.           इन पन्द्रह दोनों चारों ओर हँसी-ठहाकों की मधुर गूँज खनकती रहती है. फ़ांस में “गाचो” नाम का त्योहार मनाते है तथा रंग-गुलाल मलते हैं. साइबेरिया-नार्वे-स्वीडन एवं डेनमार्क में लकडियों के ढेर में आग लगाकर उसकी परिक्रमा करते हैं और नाचते-गाते हैं. तिब्बत में तो ’आग” को देवता मानकर पूजा जाता है. जावा-फ़िजी-कोरिया-सुमात्रा-मलेशिया में भी भारत की तरह ही होली का पर्व मनाया जाता है.                                                                                                                                                          हँसी की यह खनक अपने देश में हो या फ़िर देश की सीमाओं के पार, एक-सी है, एकदम एक है. विश्व में बिखरी हँसी की इस छटा  को देखकर, यही कहा जा सकता है कि होली एक है, पर उसके रंग अनेक है. ये रंग चमकते-दमकते रहें, इसके लिए हमें और हम सबको इसका ध्यान रखना होगा कि कहीं हम अपने किसी व्यवहार से इन्हें बदरंग न कर दें. इस सांस्कृतिक त्योहार की गरिमा, जीवन की गरिमा में है.

होली के इस रंग-बिरंगे पावन पर्व पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ..

 

- गोवर्धन यादव        

शिक्षा: स्नातक

*तीन दशक पूर्व कविताऒं के माध्यम से साहित्य-जगत में प्रवेश
*देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का अनवरत प्रकाशन
*आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन
*करीब पच्चीस कृतियों पर समीक्षाएं

प्रकाशित कृतियाँ:
* महुआ के वृक्ष ( कहानी संग्रह ) सतलुज प्रकाशन पंचकुला(हरियाणा)
*तीस बरस घाटी (कहानी संग्रह,) वैभव प्रकाशन रायपुर(छ,ग.)
* अपना-अपना आसमान (कहानी संग्रह) शीघ्र प्रकाश्य.
*एक लघुकथा संग्रह शीघ्र प्रकाश्य.

सम्मान:
*म.प्र.हिन्दी साहित्य सम्मेलन छिंन्दवाडा द्वारा”सारस्वत सम्मान”
*राष्ट्रीय राजभाषापीठ इलाहाबाद द्वारा “भारती रत्न “
*साहित्य समिति मुलताई द्वारा” सारस्वत सम्मान”
*सृजन सम्मान रायपुर(छ.ग.)द्वारा” लघुकथा गौरव सम्मान”
*सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी खण्डवा द्वारा कमल सरोवर दुष्यंतकुमार साहित्य स.
*अखिल भारतीय बालसाहित्य संगोष्टी भीलवाडा(राज.) द्वारा”सृजन सम्मान”
*बालप्रहरी अलमोडा(उत्तरांचल)द्वारा सृजन श्री सम्मान
*साहित्यिक-सांस्कृतिक कला संगम अकादमी परियावां(प्रतापगघ्ह)द्वारा “विद्धावचस्पति स.
*साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा(राज.)द्वारा “हिन्दी भाषा भूषण”सम्मान
*राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा(महाराष्ट्र)द्वारा”विशिष्ठ हिन्दी सेवी सम्मान
*शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम होशंगाबाद द्वारा”कथा श्री”सम्मान
*तृतीय अंतराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन बैंकाक(थाईलैण्ड) में “सृजन सम्मान.
*पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग(मेघाअलय) द्वारा”डा.महाराज जैन कृष्ण स्मृति सम्मान.

विशेष उपलब्धियाँ:-
औद्धोगिक नीति और संवर्धन विभाग के सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रगामी प्रयोग से संबंधित विषयों तथा गृह मंत्रालय,राजभाषा विभाग द्वारा निर्धारित नीति में सलाह देने के लिए वाणिज्य और उद्धोग मंत्रालय,उद्धोग भवन नयी दिल्ली में “सदस्य” नामांकित

(2)केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय( मानव संसाधन विकास मंत्रालय) नयी दिल्ली द्वारा_कहानी संग्रह”महुआ के वृक्ष” तथा “तीस बरस घाटी” की खरीद की गई.

संप्रति: सेवानिवृत पोस्टमास्टर(एच.एस.जी.1* संयोजक राष्ट्र भाषा प्रचार समिति जिला इकाई ,छिन्दवाडा,म.प्र.

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