हे शिव, हे गंगा, हे वाराणसी

कुंभ में एक हफ्ता बिताने के बाद मैं वाराणसी पहुंचा। घाटों पर गंगा आरती मुझे आकर्षित करती रही है। देश भर से आए लोगों को यहां तब देखिए जब वे घाट पर पहुंचते हैं। भीड़ भरी ट्रेनों में बिना रिजर्वेशन के सस्ते सामान्य डिब्बों में तकलीफदेह लंबे सफर के बाद दूर-दूर से गंगा किनारे पहुंचे भारतीय यहां भावुक हुए बगैर नहीं रहते। अधेड़ उम्र के युगल। बूढ़े लोग। उनकी उंगली थामकर आए बच्चे। सब सूनी आंखों से गंगा को अपलक निहारते हैं। यहां आकर जिंदगी की सबसे बड़ी साध पूरी होने की तसल्ली उनके झुलसे हुए चेहरों को खिला देती है।

 

गंगा के दर्शन और एक डुबकी के साथ थोड़ा सा जल अपने साथ ले जाना पीढिय़ों से चला आ रहा अनिवार्य कृत्य है। संस्कृति का एक ऐसा अलिखित आदेश, जिसे जीते-जी पूरा करना है। इसे लोग बाकायदा मुहूर्त देखकर पूरा करने आते हैं। वह भी सौ काम छोड़कर। करोड़ों लोगों के लिए गंगा, दूसरी नदियों की तरह सिर्फ एक नदी ही नहीं है। वह पापों से ही मुक्त नहीं करती, वह मुक्तिदायिनी भी है। यानी वह जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा दिलाने के लिए शिव की जटाओं से बह रही है। यह आस्था एक हजार साल की गुलामी में नर्क जैसी जिंदगी जीते रहे हतभाग्य भारतीयों के लिए जिंदगी की सबसे बड़ी राहत रही है। जुल्मों और तकलीफों से भरी कहानी के सुखद अंत का सात्विक संबल।
मैं घाट पर उतरा तो शंभु लपककर सामने आया। अठारह साल का एक दुबला-पतला नाविक, जो अपनी उम्र से छोटा ही दिखाई दे रहा था। ये स्थानीय लोग बाहर से आने वालों को नावों में गंगा की गोद में ले जाकर दिन में घाटों की सैर कराते हैं। शाम को आरती के दर्शन। शाम का वक्त कमाई का है। शंभु ने मुझे दो विकल्प दिए-बड़ी नौकाओं में एक साथ बीस-तीस लोग बैठ सकते हैं या आप चाहें तो एक छोटी नाव अपने लिए ले सकते हैं। मैंने दूसरा विकल्प चुना। शंभु ने सौदा तय होते ही फुर्ती दिखाते हुए नौैकाओं के बीच से अपनी नौका गंगा में खींच ली। चप्पू चलाते हुए वह सामने लगी अनगिनत नावों के पीछे से तैराते हुए प्रयाग और दशाश्वमेध घाट के बीच की एक बेहतरीन जगह पर ले आया। आरती की सारी तैयारियां थीं और कुछ ही देर में वह शुरू भी हो गई।

घाटों पर कोई कोना खाली नहीं था। हर कहीं लोगों का मजमा था। मैंने मुड़कर देखा। दूसरी नौकाओं में समूह में बैठे लोगों की भरी हुई आंखें। रुंधे हुए गले। मंत्रों के जाप। दीपदान। मनोकामनाओं को व्यक्त करने का जीवन का सबसे अहम अवसर। गांवों के सीधे-साधे लोग हाथों को जोड़े अपलक उन युवाओं को देख रहे थे, जो धूप और दीप से गंगा की आरती में मगन थे।

 

कई नावों पर सिर्फ विदेशी मूल के लोग थे। सैकड़ों की तादाद में। मैं नहीं जानता कि वे इस नजारे को किस अर्थ में ले रहे थे। वे कभी अपनी पैनी नजर से भारतीयों के चेहरे टटोलते और कभी कैमरे में आरती को कैद करते दिखते। उनमें एक किस्म की जिज्ञासा साफ नजर आ रही थी। यहां वे रहस्य से भरी पौराणिक मान्यताओं वाली देश की सबसे महान् नदी से ही रूबरू नहीं होते। यहां वे सवा सौ करोड़ आबादी वाले भारत की उस भयावह भीड़ का भी हिस्सा बनते हैं, जो जाने कहां-कहां से आकर यहां जुटती है। तरह-तरह की जातीय जटिलताओं में संघर्षरत् लोग यहां आकर वैसे ही गंगा में आ मिलते हैं, जैसे तमाम नदियां अपनी सारी पहचान खोकर समुद्र में जा गिरती है।

 

आरती पूरी होने के पहले ही अचानक हलचल होती है। सैकड़ों नावें पानी पर सरकने लगती हैं। शंभु जैसे अनगिनत नाविक अपने दर्शकों को दूसरे किनारे की तरफ ले जाने लगे हैं। आरती की जगमगाहट दूर होती जाती है।। शंभु मणिकर्णिका घाट की तरफ बढ़ा। उसकी तरह यहां हर नाविक छोटा-मोटा पंडित है। सुनी-सुनाई कहानियों के जरिए वह एक गाइड की भूमिका में आ ही जाता है। शंभु भी मुझे घाटों के इतिहास के बारे में बताते हुए मणिकर्णिका पर जल रही चिताओं की तरफ ले आया। फरवरी के शुरुआत में सर्दी आखिरी जोर पर थी। मैं उस चिता की तरफ देख रहा था, जिसकी आग तेजी से भभक रही थी। दूसरी कई चिताएं ठंडी भी नहीं हुई थीं और घाट पर शवों की कतार लगी थी। गंगा किनारे देह के भस्म होने का अर्थ बार-बार जन्म लेने और मरने के इस बेमतलब आवागमन से हमेशा के लिए छुटकारा था।
विदेशी सैलानियों की नावों पर गाइड उन्हें उनकी भाषाओं में इस पुरातन प्रथा के अर्थ समझाते हैं।

कुतुबमीनार, ताजमहल, लाल किले, गोवा के समुद्री तट और कश्मीर की वादियों को देखते हुए आए गोरे लोगों को गंगा के इस कोने से भारत दूर अतीत में ले जाकर अपना एक अलग परिचय देता है। इलाहाबाद से वाराणसी के रास्ते में जर्मनी की सामाजिक कार्यकर्ता यासमीन ने मुझे बताया था कि मणिकर्णिका पर मृत शरीरों की आग के धुएं में उन्हें किसी किस्म की दुर्गंध नहीं मिली थी। यह उसके लिए हैरत में डालने वाली बात थी। उसने मुझसे पूछा था कि क्या मैं भी मरने के बाद इस घाट पर आग के हवाले होना चाहूंगा? क्या मेरा भरोसा इसमें है? उसे टालने के लिए मेरा जवाब था, मैं ऐसा करना नहीं चाहूंगा। और जहां तक यकीन का सवाल है तो यह ऐसी बात है, जो हमारे खून में है और जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

चिता की आग भभकती रही। दूसरी चिताएं सजकर तैयार थीं। पीछे और शव मणिकर्णिका का रुख करते रहे। पवित्र गंगा के किनारे अंतिम संस्कार एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला था। शंभु नाव लेकर लौटने लगा। तेज रोशनी से जगमगाते घाटों से दूर यकायक गंगा मेरी आंखों में खटकी। मैं एक साल पहले ही यहां आया था। मुझे इस बार गंगा और भी ज्यादा मैली दिखी। दशाश्मेध से मणिकॢणका के बीच सबसे ज्यादा खतरनाक हालत थी। सतह पर तैरता कूड़ा-कचरा और पानी में घुली काली गहरी गंदगी अंधेरे में भी समझ में आ रही थी।

दिन में मेरी मुलाकात वाराणसी के सबसे सम्मानित बुजुर्ग वीरभद्र मिश्र से हुई थी। गंगा के शुद्धिकरण के लिए 35 सालों से संघर्षरत् मिश्र के संकट मोचन फाउंडेशन के तहत जल परीक्षण प्रयोगशाला में लैब असिस्टैंट ने बताया था कि पीने के पानी के तय मानकों से हजारों गुना ज्यादा प्रदूषण यहां गंगा में है। वाराणसी की गंदगी को बहाकर लाने वाले 30 से ज्यादा नाले सात किलोमीटर की लंबाई में सीधे गंगा में गिरते हैं। आंखों में धूल झोंकना भारत में बड़ी कारीगरी है, जिसे तब इस्तेमाल किया जाता है जब ठीकठाक कुछ कर पाने में आप नाकाम हों। प्रशासनिक अफसरों के लिए भी यही नुस्खा उतना ही कारगर है। काशी में वह मर्णिकर्णिका के पास सबसे बड़ा नाले की गंदगी दिन की बजाए रात के अंधेरे में बहाकर चैन की नींद सोता है।
इन घाटों की असलियत उनकी निगाहों में कभी नहीं आती, जो गंगा को आदरपूर्वक मां कहते हुए डुबकी लगाकर धन्य होते हैं। वे धन्य होकर ही लौटते हैं। मध्यकाल में वाराणसी के उजड्डों ने तुलसी और कबीर को कष्ट दिए थे। तुलसी और कबीर अब पैदा नहीं होते। कष्ट देने के लिए बची गंगा। दशाश्वमेध घाट पर लौटते हुए मुझे उन कीड़ों का राज समझ में आया, जिन्होंने आरती के समय नौकाओं के ऊपर उड़ते हुए मेरा ध्यान भटकाया था। मैदानी इलाकों में आमतौर पर बारिश के दिनों में पैदा होने वाले कीड़ों को तेज रोशनी अपनी तरफ खींचती है। वे लाखों की तादाद में हाईमास्ट की लाइट पर मंडराते हैं। लेकिन यहां न बारिश का मौसम था और न ही ये वैसे कीड़े थे। यहां गंगा इतनी ज्यादा गंदी हो चुकी है कि पानी के कीड़ों का शिकार हवा के हल्के शिकारियों के लिए बेहद मुफीद खुराक है। दूषित जल इन कीड़ों के लिए बेहतरीन आहार देने लगा है। यह नदी का नहीं, गंदे नाले का लक्षण है।
नौकाएं जब वापस घाट पर छोड़ती हैं तो आप एक अलग भारत को अपने सामने बिलखता हुआ पाते हैं। घाट की सीढिय़ों पर हर तरफ हर उम्र के कुपोषित, बीमार और लाचार भिखारियों की भीड़। एक ऐसे राज्य में यह दृश्य लाजिमी होने ही चाहिए, जो अभी-अभी दस हजार करोड़ रुपए के मेडिकल घोटाले से फारिग हुआ है। दलितों की उस देवी का सूबा, जिसने अभी-अभी आम आदमी के 20 हजार करोड़ रुपए अपनी मूर्तियों और मंदिरों पर स्वाहा किए और अपने दूसरे सरकारी बंगले के रखरखाव पर 80 करोड़ की रकम लगाई।
गंगा को सबसे दर्दनाक हालात उस प्रदेश में भोगने पड़ रहे हैं, जिसने एक साल पहले ही एक युवा एनवायरमेंटल इंजीनियर अखिलेश यादव को सत्ता की कमान सौंपी है। भले ही देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश की सबसे बड़ी कुर्सी उन्हें पारिवारिक विरासत के तहत मिली हो मगर उनकी शैक्षणिक योग्यता का कोई फायदा गंगा को होता हुआ अब तक दिखा नहीं है। उनके सत्ता संभालने के सौ दिन बाद जो खबर उत्तरप्रदेश से बाहर आई थी, वह थी सौ दिन में 11 सौ मर्डर की! कुंभ के समय उनकी ओर से आई सबसे बड़ी खबर है कुछ नए मंत्रियों की शपथ। एक साल पुराने मंत्रिमंडल का विस्तार अखिलेश यादव ने कर लिया था। मीडिया में वाहवाही के सुर में लिखा गया कि सारी जातियों के नुमाइंदे लेकर सबको खुश करने में वे कामयाब रहे। ठीक इसी समय इलाहाबाद में कुंभ की बदइंतजामी एक भगदड़ में 40 लोगों की मौत के सबूत के साथ आई। भारत हर कहीं ऐसे विचित्र विरोधाभासों से भरा हुआ है। हमेशा से।
जब आप भिखारियों से बचकर विश्वनाथ मंदिर के पास वाराणसी की गलियों और मुख्य मार्ग तक आते हैं तो एक दूसरा ही भारत आपके ही इंतजार में खड़ा मिलता है। रिक्शों की कतार में। उत्तरप्रदेश और बिहार के दूरदराज इलाकों से आए बेरोजगारों की मरियल फौज इन रिक्शों पर अपनी बेमकसद जिंदगी को ढोती है। पचास रुपए रोज किराए के रिक्शों पर आठ-दस घंटे की जी-तोड़ मेहनत के बाद ये लोग दो-ढाई सौ रुपए रोज कमाने की कामयाबी हासिल करते हैं। इन रुपयों से इन्हें यहां अपना गुजारा भी करना है और हजार किलोमीटर दूर गांव में बैठे अपने बूढ़े मां-बाप और बच्चों का भरणपोषण भी। इनके लिए जिंदगी एक अंतहीन यातना है।
आप रिक्शे में बैठिए और फिर देखिए कि यह काम कितना कठिन है। हर चौराहे पर इन्हें जलील करने के लिए खाकी वर्दी में पुलिस के बिगड़ैल जवान डंडे फटकारते मिलेेंगे। कारों और दूसरे रिक्शों के अलावा भीड़ भरी सड़कों से आपको आपकी मंजिल तक सुरक्षित ले जाना किसी कारीगरी से कम नहीं है। यह मेहनत और कारीगरी का बाधाओं से भरा हुआ शानदार प्रदर्शन है। धूल-धक्कड़ से भरी सड़कों पर वजन ढोने में सर्दी का मौसम तो राहत देता है। मगर गर्मी जुल्म ढाती है। तब वे इतनी मेहनत भी नहीं कर पाते और इसका सीधा असर कमाई पर पड़ता है।
घटाटेराम मंदिर के पास एक जवान यातायात को दिशा देेने के भ्रम में खड़ा था। बीच सड़क पर वह सिर्फ डंडा फटकार रहा था। यह थे मुरादपुर मूल के कांस्टेबल जितेंद्र तिवारी। उन्होंने यह जानकारी जरा दम से दी कि उन्हें वाराणसी में 25 साल हो गए। दो दिन से उनकी दाढ़ी नहीं बनी थी मगर पान अभी ही चबाया हुआ था। उनके आसपास सड़क पर बिखरी लाली इसकी गवाही भी दे रही थी। मैंने गंगा की हालत पर बात की तो उन्होंने बताया कि अभी एकाध साल से ज्यादा खराबी है। अपनी धार्मिक और अनुशासित दिनचर्या पर थोड़ा फख्र से बोले कि किस तरह वे अब भी रोज गंगा में आचमन करते हैं। गंगा के मैली होने के प्रश्न पर वे आध्यात्मिक बेफिक्री में पड़ गए। बोले कि गंगा को कौनऊ मैली न कर सकत। मनुष्य जाति की क्या औकात जो गंगा मैया को गंदा कर देए। यह तो मैया की अपनी लीला है। वह जो चाहत सो करत। जब शुद्ध होना चाह लेगी तो देखत रहियो। किसमें हिम्मत जो मैया को शुद्ध करने चले! यह एक मूलमंत्र है, जो सरकारों ने ज्यादा बेहतर समझा है। इसीलिए शुद्धिकरण के नाम पर खर्च करीब 35 सौ करोड़ रुपए कहां गए, कोई नहीं जानता। किसमें हिम्मत जो मैया को शुद्ध करने चले!
सड़कें मौनी अमावस पर जुटी भीड़ से लबालब भरी थीं। वाराणसी की दूध, मलाई, रबड़ी और इससे पहले भांग की दुकानों पर रौनक हमेशा की तरह गजब की थी। मंदिर में बाबा विश्वनाथ देश भर से आए श्रद्धालुओं में फंसे थे। उनके बाहर इतनी लंबी कतार थी कि पहली बार बिना दर्शन किए दूर से नमस्कार करके लौटा। ज्ञानवापी मस्जिद की पहरेदारी भी चुस्त थी। प्राचीन मंदिर का वह हिस्सा लोहे के शिकंजे में छिपा है, जिस पर औरंगजेब की मस्जिद शान से खड़ी है। सेकुलर स्टेट की आंखों में धूल झोंकने वाली एक कार्रवाई। हिंदुओं के पवित्र तीर्थ वाराणसी की सड़कों पर चिकन और मीट की दुकानें मांसाहार के शौकीनों के लिए सजी थीं। दूसरे कई शहरों की तरह यहां भी सड़कों पर कार चलाना या पैदल निकलना किसी सजा की तरह है।
वाराणसी की यात्रा का किस्सा मैं लौटती ट्रेन से ही खत्म करता हूं।
इंडियन नेवी में 29 वर्षीय लेफ्निेंट कमांडर रवि रंजन बलिया से शादी करके लौटे हैं। मुंबई पहुंचने की जल्दी में परेशान हैं, जहां वे रहते हैं। शादी को एक हफ्ता भी नहीं हुआ और एक दिलचस्प हादसा अभी-अभी घटित हुआ है। रेलवे स्टेशन पर कुंभ की भारी भीड़ में पिता के साथ पत्नी ही ट्रेन में चढ़ पाईं और ट्रेन छूट गई। मां के साथ ये पीछे रह गए। कमांडर अब दूसरी ट्रेन यानी बुंदेलखंड एक्सप्रेस में मेरे सामने हैं जो 20 घंटे लेट है। गवालियर से मुंबई की उनकी एक फ्लाइट कैंसिल हो चुकी और कोई ठिकाना नहीं कि कल तक यह ट्रेन पहुंचा ही देगी। बदइंतजामी से भरपूर व्यवस्था के सबसे ताजे शिकार इस अफसर को यह मलाल है कि अगर पत्नी उनके साथ छूट गई होती तो इस बिलावजह की लेटलतीफी में सेकंड एसी के एकांत का लुत्फ सफर को कुछ यादगार भी बनाता। फिलहाल भारतीय रेल ने उन्हें अपनी मां की सेवा का पुण्य अवसर प्रदान किया है। नई दुल्हन ससुर की सेवा में दूसरी ट्रेन में तैनात है।

 

- विजय मनोहर तिवारी

 

विजय जी पेशे से पत्रकार हैं ।  विजय जी बीते करीब बीस वर्षों से मीडिया की दुनिया में हैं। ये प्रिंट, टीवी दोनों को देख समझ चुके हैं।
इनकी पांच किताबें हरसूद- 30 जून , एक साध्वी की सत्ता कथा , आधी रात का सच और राहुल बारपुते प्रकाशित हो चुकी हैं। ये पुस्तकें काफी चर्चित रही और सराही गई। इनकी छठी पुस्तक ‘भारत की खोज में मेरे पांच साल ‘ अभी हाल में ही प्रकाशित हुई है और काफी सुर्खियां बटोर रही है।

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