हुए लेखक बनके हम जो रुसवा

 

गालिब ने कहा था कि हुए हम जो मर के रुसवा, यहां मैं हिंदी का लेखक होकर रुसवा हुआ जाता हूं। मॉल में हर तरह की वस्तु, कभी एम आर पी पर कभी बाई वन एंड गेट वन फ्री या फिर फिफ्टी परसेंट की सेल पर बिक रहा है। नहीं बिक रहा है तो बेचारा हिंदी साहित्य का लेखक। वो तरह तरह की मुद्राओं के साथ बाजार में उपस्थित है कि उसे भी खरीददार मिले, पर बाजार है कि उसे घास तक नहीं डाल रहा है। लोग कहते हैं कि बाजार हावी है और मैं कहता हूं कि हिंदी का लेखक हल्का है क्योंकि उसे हल्के में लिया जा रहा है। हे बाजार के मालिकों, हम वो हैं जो मशाल बनकर समाज के आगे चलते हैं, हम वो हैं जो मुराड़ा लिए अपना घर तक जला डालते हैं, कुछ इधर भी अपनी कृपा दृष्टि डालो। तुम बाई वन की जगह गेट वन देते हो, हम बाई वन की जगह फाईव तक देने को तैयार हैं।

उस दिन जिस समय खेल की राजधानी मुम्बई में क्रिकेट खिलाड़ियों की नीलामी लग रही थी उसी समय साहित्य की राजधानी दिल्ली में साहित्यकार, साहित्य अकादमी के तत्वावधन में, साहित्य- साहित्य खेल रहे थे । बहुत ही बौद्धिक वातावरण था। ये बुद्धि का ही प्रभाव था कुछ लोग शतरंज खेल चुके थे, अपनी- अपनी बाजी जीत चुके थे और कुछ अपने- अपने खेल खेल रहे थे, बिछी हुई बिसात पर अपने मोहरे जमा रहे थे । साहित्य के विभिन्न पहलू चर्चायमान थे। अनेक साहित्यिक संत सीकरी के कीचड़ में कमल सम विद्यमान् होने का सुख उठा रहे थे। पर वहां न तो किसी शीतल पेय का कोई स्पांसरर था और न ही किसी विदेशी शराब का। बहुत ही नीरस वातावरण था।

पेय के नाम पर केवल ठंडा और चाय देखकर एक युवा साहित्यकार ने माथे को अपने ही हाथ से पीटते हुए कहा कि हम कब आधुनिक होंगें और कब रंस-रंजन को संगोष्ठियों का अनिवार्य बनाएंगें । तुमने अंग्रेजी के ‘महान’ लेखक की किताब का लोकार्पण एटेंड किया है। फाईव स्टार में होता है और जैसे इस देश में दूध घी की नदियां बहती थीं, वैसे ही वहां सुरा बहती है। यहां चाय भी मिलती है तो ठंडी। अब चाय पीकर तो केवल मैथिलीशरण गुप्त की चर्चा हो सकती है किसी आधुनिक साहित्यिक कृति पर नहीं।

दूसरे युवा ने अपने दिल के आसपास हाथ रखते हुए कहा- ठीक कह रहा है यार ऐसी ‘जलपान’ गोष्ठियों में अप्सरा भी बहन लगती है। हमारा साहित्य कितना पिछड़ गया है।’

तीसरे ने कहा – हम बाजारवाद बाजारवाद चिल्ला रहे हैं, उससे पाठको को डरा रहे हैं, पर बाजार हमसे कोसो दूर है, हमें घास तो क्या गोबर भी नहीं डाल रहा है। बाजार तो क्या, मॉल भी लगता है हिंदी साहित्य की ओर ऐसे पीठ किए हुए बैठा है जैसे बिना गॉड फादर वाले लेखक से सम्मान/ पुरस्कार पीठ किए बैठे होते हैं।’

और मित्रों उधर, मुम्बई में, ‘खेल-भावना’ बुद्धि को हीन कर रही थी । आई पी एल के लिए खिलाड़ियों की नीलामी हो रही थी। एक -एक क्रिकेट के खिलाड़ी पर करोड़ों की बोली लग रही थी और यहां ‘करोड़ों’ आम लोगों के बारे में अपना खून जलाने वाले और उनका दुखदर्द समाज के सामने लाने वाले लेखक पर कोई बोली नहीं लगाता है। सच बहुत नाइंसाफी है। जब तक आसपास कीचड़ न हो तो कमल होने का सुख कैसे मिल सकता है ? कोई खरीदने को तैयार नही है और हम लेखक नारा लगा रहे हैं कि हम बिकने को तैयार नहीं हैं । मत बिक प्यारे पर ये समझ ले कि आज की व्यवस्था तो अच्छे- से- अच्छे को बिकने के लिए विवश कर देती है, आप किस खेत के बुद्धिजीवी हैं!

हे बाजारवाद के कर्त्ता-धर्त्ताओं, कुछ अपने समाज के ‘ऋषि-मुनियों’ पर भी अपनी खरीददारी- दृष्टि डालने की कृपा करो । मैं छोटी-मोटी खरीदारी की बात नहीं कर रहा हूं जो किसी समिति का सदस्य, संस्था का अध््यक्ष, पुरस्कार-दान, विदेशों में साहित्य-सेवा आदि के माध्यम् से सरकार करती है, मैं तो बड़ी खरीददारी की बात कर रहा हूं । मैं जानता हूं कि तुम सोच रहे हो कि खरीदा तो उसे जाता है जिसके बिकने में लाभ की संभावना होती है। तुम्हारे लिए ये तो तुच्छ गोबर भी नहीं है जो कहीं लेपा जा सके…। पर तुम तो गजब के जादूगर हो, एक ऐसा जादूगर जो दूसरे के सौंदर्य को कबाड़ के भाव खरीदने और अपने कबाड़ को सौंदर्य की तरह बेचने का जादू जानता है । तुमने तो ऐसा फंदा कस दिया है कि जिसे जरा भी कसते हो तो शेयर बाजार का सैंसक्स लुढ़क जाता है, सोने का भाव चढ़ जाता है, जी डी पी लड़खड़ाने लगती है, किसी भी उद्योग पर संकट छा जाता है और बेरोजगारी बढ़ने का भय सताने लगता है । तुम चाहो तो मंदी छा जाए और चाहो तो तेजी आ जाए। तुम चाहों तो शेयर बाजार में शेर दहाड़ने लगे और चाहो तो बेचारा चूहा बन बिल तलाशने लगे।

साहित्यकार भी सामाजिक प्राणी है, उसका भी परिवार है, उसे भी भोग- विलासमय जीवन जीने का अधिकार है । मेरा बहुत मन है कि साहित्य का भी नीलामघर हो जिससे लेखकों का चोरी-छिपे खिरीदने- बेंचने का ध्ंाधा बंद हो, पाईरेसी समाप्त हो । बड़े-बड़े घराने सामने आएं और प्रकाशकों, लेखकों , आलोचकों आदि को बड़ी-बड़ी बोली लगाकर खरीदें । इससे बुद्धिजीवियों की भटकन समाप्त होगी और वे अपनी-अपनी वातानुकूलित ‘कुटिया’ में बैठ कर बड़े-बड़े घरानों के निर्देशानुसार ‘अपनी’ साहित्य- साधना कर सकेंगें तथा कुटिया और मुटिया की तुक बैठेगी एवं आज का लेखक भी चमचमाते मॉल का हिस्सा बन सकेगा ।

मैं त्रिजटा की तरह स्वप्न देख रहा हूं आप को स्वतंत्रता है कि आप किसी की भी तरह स्वप्न देखें, पर देखें जरूर ।

आप जरा अंदाजा तो लगाएं कि यदि साहित्य का नीलामघर यदि चालू हुआ तो किसकी बोली महंेंद्र सिंह धोनी की तरह सब को धो देगी । मुझे लगता है कि पुरुषों में उत्तम ,साहित्य को खूबसूरती से मैनेज करने वाले, सुधी नामवर आलोचकों की बोली सबसे उंची जाएगी । जैसे कबाड़ को सौंदर्य और सौंदर्य को कबाड़ सिद्ध करने की प्रतिभा बाजारवाद में है वैसी ही प्रतिभा आलोचकों में होती है । जिसमें बाजारवाद के उत्तम गुण विद्यमान् हों बाजार में उसी की बोली भी तो उंची होगी।

न न न आप उदास न हो यदि आप किताबी कवि हैं । मंचित कवियों से किताबों का सृजन कहां हो पाता है और वे साहित्य का भी हिस्सा कहां बन पाते हैं ? निश्चित ही ऐसे घराने भी होंगे जो साहित्य और कला के बाजार में अपना घाटा दिखाकर टैक्स बचाएंगें । ऐसे घरानों से किताबी कवियों को अभूतपूर्व लाभ होगा । जैसे महंगी पेंटिंगस श्रेष्ठियों के ड्राईंगरूम की शोभा बढ़ाती हैं वैसी ही शोभा ये भी बढ़ा सकेंगें । बड़ा आदमी तो वो ही होता है जो ऐसी बड़ी-बड़ी बातें करे जो बड़े बड़ों को समझ न आए फिर भी बड़े-बड़े उसे श्रेष्ठ मान अपने ड्राईंग रूम की शोभा बढ़ाएं ।

अलग- अलग विधाओं की अलग- अलग टोलियां होंगी तो अलग- अलग बोलियां भी होंगी । वैसे ये बेहतर होगा व्यंग्य, कहानी,उपन्यास,संस्मरण आदि की अलग- अलग टीमें हों और फिर इनमें स्वस्थ प्रतियोगिता हो । इससे जीतने वाली टीम के एकमुश्त राशि तो मिलेगी ही साथ ही यह भी सिद्ध हो जाएगा कि उस वर्ष किस विधा की टी आर पी अधिक रही और वह श्रेष्ठ रही । इसके लिए एस0एम0एस ई- मेल जैसे अति आध्ुनिक एवं कमाउ साधनों का लाभदायक प्रयोग किया जा सकता है । जैसे क्रिकेट में रेटिंग होती है, वैसी ही रेंटिंग साहित्यिक-टीमों और लेखकों की भी घोषित की जा सकती है। प्रकाशक बंधु चाहें तो इस रेटिंग के आधार पर न केवल लेखकों की रॉयल्टी तय कर सकते हैं अपितु यह भी तय कर सकते हैं कि किस नए लेखक से उसकी पहली/दूसरी पुस्तक छापने का कितना सेवा शुल्क वसूलना है। इस कदम से निश्चित ही एकरूपता आएगी और विभिन्न रूपों में बिखरे साहित्य को दिशा मिलेगी।

इससे वैसे तो अनेक लोगों को अनेक प्रकार के लाभ होंगंे, समाज और उसकी चिंता करने वाले लेखकों को भी लाभ होगा । साहित्य में बाजारवाद के पैर जमेंगें । जिन आम लोगों के लिए ‘बेचारा’ साहित्यकार लिखता है उस आदमी को पता चलेगा कि लेखक भी बिक सकता है, उसका मूल्य समझ आएगा और समझ आएगा कि उनका लेखक ‘बे चारा’ नहीं है । साहित्य में प्राईवेटाईजेशन होने से संतों को सीकरी से बिल्कुल भी काम नहीं रह जाएगा और उनकी पहियां नहीं घिसेगी। आप तो देख ही रहें हैं जबसे गैरसराकारी संस्थान सबल हुए है हमारे युवाओं ने सरकारी नौकरी की ओर ताकना ही छोड़ दिया है। हां जी हां साहित्य को प्राईवेटेज करके देखिए साहित्य कितनी तरक्की करता है। और हो सकता है, जिस युग में सात आठ धार्मिक चेनल चल रहे हों तो साहित्यिक चैनल में सूखा चल रहा हो उस युग में कोई व्यावसायी साहित्य को समर्पित चैनल ही खोल दे।

भारत भर के साहित्यकारों एक हो जाओ, अपने छोटे-छोटे सपनों और सुखों का त्याग करो और एक बड़े सपने के लिए अपना सबकुछ इन्वेस्ट कर दो। बाजार आपको पुकार रहा है। लघु पत्रिकाएं में लघु सोच और सपनों के लेखकों के लिए है, तुम दो तीन सौ छपने वाली पुस्तकों के लेखक नहीं हो। आज सबकुछ बिकाउ हो रहा है। तुम नैतिकता की सूई पकड़े मत रहो, तुम तो मनोरंजन के हिंडोले में स्वयं झूलो और अपने पाठको को भी झुलाओ।

 

 - प्रेम जनमेजय

 

प्रेम जनमेजय व्यंग्य- लेखन के परंपरागत विषयों में स्वयं को सीमित करने में विश्वास नहीं करते हैं । व्यंग्य को एक गंभीर कर्म तथा सुशिक्षित मस्तिष्क के प्रयोजन की विध मानने वाले प्रेम जनमेजय आधुनिक हिंदी व्यंग्य की तीसरी पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं ।

जन्म : इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

विधाएँ : व्यंग्य, बाल साहित्य, आलोचना, नाटक

व्यंग्य संकलन : राजधानी में गँवार, बेर्शममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहिं माखन खायो, आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, ज्यों ज्यों बूड़ें श्याम रंग

आलोचना : प्रसाद के नाटकों में हास्य-व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, श्रीलाल शुक्ल : विचार, विश्लेषण और जीवन

नाटक : सीता अपहरण केस

बाल साहित्य : शहद की चोरी, अगर ऐसा होता, नल्लुराम

अन्य : हुड़क, मोबाइल देवता

संपादन : व्यंग्य यात्रा (व्यंग्य पत्रिका), बींसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य : व्यंग्य रचनाएँ, हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन (श्रीलाल शुक्ल के साथ सहयोगी संपादक)

सम्मान: आचार्य निरंजननाथ सम्मान, व्यंग्यश्री सम्मान, कमला गोइन्का व्यंग्यभूषण सम्मान, संपादक रत्न सम्मान, हिंदी अकादमी साहित्यकार सम्मान, इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब सम्मान, अवंतिका सहस्त्राब्दी सम्मान, हरिशंकर परसाई स्मृति पुरस्कार, प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, अट्टहास सम्मान

सम्प्रति: एसोसिएट प्रोफेसर , दिल्ली विश्वविद्यालय ,नई दिल्ली , भारत

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