हिन्दी के सवाल पर बवाल क्यों?

26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ तब हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया. पहले 15 साल तक हिन्दी के साथ साथ अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दिया गया, यह तय किया गया कि 26 जनवरी 1965 से सिर्फ हिन्दी ही भारतीय संघ की एकमात्र राजभाषा होगी. 15 साल बीत जाने के बाद जब इसे लागू करने का समय आया तो तमिलों के विरोध के चलते प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि जब तक सभी राज्य हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप मे स्वीकार नहीं करेंगे अंग्रेजी भी हिन्दी के साथ साथ राजभाषा बनी रहेगी. इसका अर्थ यह था कि अब अनंतकाल तक अंग्रेजी ही इस संघ की असली राजभाषा बनी रहेगी जबकि इसकी अनुवाद की भाषा हिन्दी उसी पिछली कुर्सी पर बैठी रहेगी.

पहले भी जब हिन्दी को एकमात्र राजभाषा बनाने की बात हो रही थी तब भी तमिलों ने इसका यह कर विरोध किया था कि हिन्दी को किसी पर जबर्जस्ती थोपना गलत है. अभी हाल फिलहाल में सोशल साइट्स में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने से संबंधित जारी राजभाषा की चिट्ठी को लेकर एक बार फिर से बवाल हो रहा है. एक बार फिर तमिलनाडू ने इसका भारी विरोध किया. इस पत्र के जारी होते ही तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता ने तुरंत प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर अपना विरोध जताया. जयललिता जी का कहना है “हिन्दी को प्राथमिकता देना राष्ट्रीय भाषा क़ानून के ख़िलाफ़ है. यह एक बेहद संवेदनशील मसला है, इससे तमिलनाडू के लोग अशांत हैं. यहां के लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है. हमें अंग्रेजी को ही माध्यम के तौर पर प्रयोग करना चाहिए. वहीं डीएमके के नेता वाइको ने कहा कि हिन्दी पर विरोध होते रहे हैं, सोए हुए शेर को न ही जगाएं तो अच्छा होगा. पीएमके के नेता रामदॉस ने पहले ही इसका विरोध किया था. वहीं सिद्धारमैया कन्नड़ में शिक्षा के हक़ में है.

कुछ राजनीतिज्ञ ऐसे भी हैं जो जाने-अनजाने में हिन्दी के हक़ में बयान दे रहे हैं. संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू का कहना है हिन्दी हमारी राजभाषा है, इसे सीखने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई होनी चाहिए. अंग्रेजी को लिंक भाषा यानी संपर्क भाषा के रूप में जारी रहना चाहिए. वहीं मुख्तार अब्बास नक़वी ने कहा कि हिन्दी को प्रोत्साहन या प्राथमिकता देना राष्ट्रभाषा का सम्मान है, अंग्रेजी भाषा का अपमान नहीं है. इसलिए इसे अंग्रेजी भाषा का अपमान समझा जाए और राजभाषा हिन्दी के प्रोत्साहन को रोका जाए, यह ठीक नहीं है. कुछ राजनीतिज्ञों को राजभाषा की वर्तमान स्थिति का समर्थन करते हुए देखा गया.

जब भी हिन्दी को बढ़ावा देने की बात होती है दूसरे भारतीय भाषाओं के साथ इसकी तूलना की जाती है. बाकी की भाषाओं की उपेक्षा करने की बात होने लगती है. जबकि हिन्दी और बाकी भारतीय भाषाओं में काफी समानताएं हैं. इन दोनों की आपसी विवाद में हमेशा अंग्रेजी को फायदा होता है.

2001 के सेशंस के मुताबिक 25% लोगों की मातृभाषा हिन्दी है. 25 करोड़ लोगों ने कहा वे हिन्दी बोलते और समझते हैं. 45% लोग हिन्दी और उससे मिलती जुलती भाषा बोलते हैं. हिन्दी के विरोधियों का कहना है कि बाकी के 55% लोग न हिन्दी बोलते हैं न समझते हैं.

जब भी हिन्दी की बात आती है पता नहीं तमिलनाडू को क्या हो जाता है. तमिलनाडू के नेताओं का कहना है कि हिन्दी को उन पर थोपा जा रहा है. मेरा एक सवाल तमिलनाडू के उन सभी विरोधियों से है. 1918 में जब गांधी जी के आह्वान में मद्रास में हिन्दी प्रचार सभा का पहला केन्द्र खुला था और बाद में दक्षिण के सभी प्रांतों में इसके केन्द्र खोले गए. तब वहां के लोगों ने हिन्दी का विरोध क्यों नहीं किया. यदि हिन्दी से इतना ही विरोध है तो सैकड़ों पत्रिकाओं का प्रकाशन क्यों किया गया. और सबसे चौंका देने वाली बात यह है कि सभी पत्रिकाओं में जो कविताएं या लेख होते थें उनका विषय हिन्दी के प्रचार-प्रसार से ही संबंधित होते थे. 1920 से लेकर 1950 तक पूरे दक्षिण भारत में करोड़ो लोगों ने हिन्दी सीखा. उस समय विरोध का स्वर कहीं से दिखाई नहीं दिया. आखिर क्यों? क्योंकि उस समय हमें आजादी चाहिए थी. और आजादी प्राप्त करने के लिए एक भाषा का होना आवश्यक था. स्वयं माहात्मा गांधी गुजराती थे लेकिन उन्होंने ने भी माना था यदि हमें आजादी प्राप्त करनी है तो हमारी भाषा भी एक होनी चाहिए. उस समय सभी दिग्गजों ने यह माना था कि हिन्दी ही वह भाषा है जो सारे भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरो सकती है. कहने का तात्पर्य है कि तब आजादी चाहिए थी इसीलिए किसी ने हिन्दी का विरोध नहीं किया और जैसे ही आजादी मिल गई लोगों में अपना-पराया की भावना जागृत हो गई. डीएमके नेता एमके स्टालिन का कहना है की हिंदी को 55% अहिन्दी भाषी लोगों पर थोपा जा रहा है. क्या उन्हें पता है कि कितने प्रतिशत लोगों पर अंग्रेजी थोपी जा रही है?

हिन्दी को लेकर चाहे कितने ही विवाद होते रहे हों लेकिन यदि विश्व की दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा अपना नामो-निशान मिट जाने की चिंता जाहिर करे तब थोड़ा अजीब लगता है? लेकिन यह सच है कि हिंदी का नाम आते ही उसके वजूद का संकट कितना वास्तविक लगने लगता है! लेकिन क्यों? आखिर क्यों हर साल हिंदी दिवस पर अपनी भाषा के लुप्तप्राय हो जाने का रुदन इतना स्वाभाविक और अनिवार्य प्रतीत होता है, यह जानते हुए भी कि हिंदी का भविष्य 75 करोड़ लोगों के बीच सुरक्षित है। दो-चार नेताओं के हिन्दी के प्रति विरोध जताने से हिन्दी का अस्तित्व कभी खत्म नहीं हो सकता है. जब इतनी बड़ी जनसंख्या से उसकी संस्कृति, उसकी भाषायी पहचान न तो मुगल छीन सके और न ही अंग्रेज। क्या एक अरब लोगों को अंग्रेजी सिखा देना इतना आसान है?
यूं विश्व की कोई भी भाषा चुनौतियों और खतरों से मुक्त नहीं है, हिंदी और खुद अंग्रेजी भी नहीं। कई छोटी भाषाएं और लिपियां विलुप्त हुई हैं। इंग्लैंड और अमेरिका में अंग्रेजी को भी संकटग्रस्त माना जाता है। अंग्रेजों की भाषा ज्ञान और दक्षता सीमित है, फिर भाषायी प्रदूषण अधिक है। दुनिया का नौवां हिस्सा जिस भाषा को बोलता हो और सातवां हिस्सा जिस लिपि का इस्तेमाल करता हो, उसके मिट जाने का डर अवास्तविक है। फारसी, अरबी और अंग्रेजी को इतिहास के इतने लंबे कालखंड तक अधिकतम शासकीय समर्थन मिला लेकिन क्या वे हमारी जन-भाषाएं बन पाईं? वस्तुत: हिंदी की चुनौतियां, खतरे और संकट उसके अस्तित्व को लेकर नहीं हैं। वे विकास और प्रसार से संबंधित हैं। कैसे उसकी शब्द-संपदा निरंतर समृद्ध हो, देसी-विदेशी भाषाओं के सहचर्य से लाभान्वित हो, बाहरी शब्दों को स्वाभाविक ढंग से कैसे अपनाएं, मानकीकरण और सरलीकरण जैसी प्रक्रियाएं कैसे चलें। भाषा अपने युग के साथ कैसे सामंजस्य बिठाए, रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलन कैसे बढ़े, कैसे आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, वैधानिक, चिकित्सा, प्रशासनिक क्षेत्रों में भी इस्तेमाल की जाए, आदि-आदि। अस्तित्व के संकट की बजाय हमें हिंदी के व्यावहारिक पहलुओं और विकास की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
इस संदर्भ में पहली जरूरत है अपनी भाषा की क्षमताओं और उसके सपोर्ट-सिस्टम के प्रति आश्वस्त होने की। हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति है वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषियों का संख्या बल। संख्या के आर्थिक, सामाजिक निहितार्थ होते हैं। कोई राष्ट्र, कंपनी, तकनीक या भाषा उसे अनदेखा नहीं कर सकती। जिस यूनिकोड के चलते हिंदी कंप्यूटर, गैजेट्स और इंटरनेट पर धूम मचा रही है, उसका संबंध खासतौर पर दो बातों से है। पहला, भारत में उभरता विशाल बाजार, जिस तक पहुंचने के लिए कंपनियां बेताब हैं। दूसरे, भारतीयों की बेहतर होती क्रय शक्ति। तकनीक को आम आदमी तक पहुंचना है। भूमंडलीकरण का संदर्भ सिर्फ आर्थिक ही नहीं है।  हिंदी से नाइंसाफी पर विलाप-प्रलाप, आरोप-प्रत्यारोप या याचना से उसका कल्याण नहीं होगा। यदि कोई उसके लिए कुछ करेगा तो तभी जब उसे इसमें निहित संभावनाएं दिखेंगी। जब हम उसे अपनी भाषा और संख्याबल की सामर्थ्य दिखाएंगे। सिर्फ दूसरों को ही नहीं, बल्कि खुद भारतीयों को भी। हमारे भाग्य-विधाता बनने वाले नेताओं से लेकर उन्हें पृष्ठभूमि से संचालित करने वाले अफसरशाहों को भी।
हिंदी की आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति लाजवाब है। स्टार प्लस की मिसाल लीजिए जो 90 के दशक में एक अंग्रेजी टेलीविजन चैनल हुआ करता था। जब उसने प्रयोग के तौर पर इक्का-दुक्का हिंदी कार्यक्रम शुरू किए तो वही हिट हो गए। टीआरपी और विज्ञापनों में अंग्रेजी के कार्यक्रम पिछड़ गए। चैनल को हिंदी की ताकत समझ में आ गई और थोड़ा-थोड़ा करते-करते उसने अपना रंगरूप पूरी तरह बदलकर हिंदुस्तानी कर लिया और भाषा सौ फीसदी हिंदी। आज वह सबसे कमाऊ टीवी चैनल है।
विज्ञापनों की भाषा क्या अनायास ही बदली है? वह कैसे अंग्रेजी से क्रमिक ढंग से बदलते हुए हिंदी तक आ पहुंची है, वह शोधार्थियों की दिलचस्पी का विषय है—’ठंडा मतलब कोका कोला’, ‘यही है राइट चॉइस बेबी’ (पेप्सी), ‘दाग अच्छे हैं’ (सर्फ), टेस्ट भी, हेल्थ भी (मैगी) और थोड़ी सी पेट पूजा (पर्क चॉकलेट)…। मैकडोनाल्ड्स और केएफसी को अपने भोजन का भारतीयकरण करना पड़ा है क्योंकि वे हमारे अनुरूप बदलने पर मजबूर हैं। यही बात भाषा पर लागू होती है। बाजार में खरीददार की चलती है। मांग कर तो देखिए। एक और मिसाल। लोग हाल तक टैबलेट्स और मोबाइल फोनों में हिंदी के लिए पर्याप्त समर्थन मौजूद न होने पर व्यथित थे। अब हाल ही में जारी एंड्रोइड 4.3 जेली बीन, एप्पल आईओएस 7, विंडोज 8.1 और ब्लैकबेरी 10.2, जो 99 फीसदी बाजार नियंत्रित करते हैं, हिंदी का पूर्ण समर्थन कर रहे हैं। आखिर 75 करोड़ उपभोक्ताओं वाला भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल बाजार है! माना कि कुछ लोग अंग्रेजी की ओर झुक रहे हैं। नई दक्षताएं प्राप्त करना सबका हक है। ऐसे एकाध प्रतिशत नागरिकों से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जिस तरह हिंदी से अंग्रेजी की तरफ संक्रमण की एक धारा बह रही है, उसी तरह भारतीय भाषाओं तथा बोलियों से एक धारा हिंदी की तरफ भी आ रही है। वह यूं ही थोड़े संपर्क भाषा बन गई है। पब्लिक लैंग्वेज सर्वे ऑफ इंडिया के ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि वृद्धि की मौजूदा रफ्तार से हिंदी 50 साल में अंग्रेजी को पीछे छोड़ देगी। यहां पीछे छोडऩा अप्रासंगिक है। अहम यह है कि हिंदी आगे बढ़ रही है।
हिंदी की भाषायी सामर्थ्य, समृद्धि, विविधता, विस्तार, जीवंतता, वैज्ञानिकता आदि में आस्था रखिए। अगर अवधी, बृज भाषा, मगधी, भोजपुरी, राजस्थानी, खड़ी बोली आदि उसके अवयव हैं और अगर वह संस्कृत से उद्भूत है, तो वह सदियों की यात्रा के बाद न जाने कितनी धाराओं को समेटते हुए अपने वर्तमान तक पहुंची है। हिंदी किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा से कम नहीं है? श्रेष्ठतम लिपि, सुपरिभाषित व्याकरण, समृद्ध साहित्यिक परंपरा… सब कुछ तो है। यदि शब्दावली में कहीं कोई कमी है तो वह हमारी वजह से है, भाषा की सीमा के कारण नहीं। यदि तकनीक, विधि, चिकित्सा, विज्ञान, वाणिज्य आदि में अग्रिम श्रेणी की पढ़ाई हिंदी के जरिए नहीं हो रही तो वह हमारी कमजोरी है। इसमें भाषा का क्या गुनाह है?
विदेशी खतरे को भूल जाइए। वहां फिर भी हिंदी का सम्मान है। दर्जनों विदेशी विश्वविद्यालय हिंदी पढ़ाते हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे अनेक देशों में प्राथमिक कक्षाओं में भी हिंदी की उपस्थिति है। अमेरिका हिंदी को उन पांच भाषाओं में गिनता है, जिनमें उसके नागरिकों की दक्षता जरूरी समझी जाती है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून हिंदी में बोलते हैं तो गूगल के सीईओ को यह कहने में संकोच नहीं होता कि इंटरनेट की दुनिया में भविष्य हिंदी और मंदारिन का है। समस्या बाहरी कम, भीतरी अधिक है। विदेशी हिंदी प्रेमी तो इस बात से परेशान रहते हैं कि जब वे भारत में हिंदी बोलते हैं तो जवाब अंग्रेजी में क्यों दिए जाते हैं? शायद हमें अपनी भाषा की शक्ति का अंदाजा नहीं। उसके प्रति आत्मविश्वास नहीं है। हिंदी को रोमन लिपि में लिखने जैसी मांगें हम उठाते हैं, विदेशी तो नहीं।
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने प्राथमिक कक्षाओं से अंग्रेजी पढ़ाने की सिफारिश की है। गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि संविधान के तहत हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है। यह नई बात नहीं है। बड़ी बात हाईकोर्ट की यह स्वीकारोक्ति है कि अधिकांश भारतीयों ने उसे राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया है। इधर सुप्रीमकोर्ट में हिंदी के हक में फैसले हुए हैं। दिल्ली की अदालतों में हिंदी का प्रयोग होने लगा है। एमबीए की पढ़ाई हिंदी में होने लगी है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पाठ्यक्रमों में प्रवेश का तांता लगा है। गूगल ने हिंदी हस्तलिपि पहचान सॉफ्टेवयर जारी किया है और मीडिया-ग्राफिक्स सॉफ्टवेयरों में दशकों से गुम यूनिकोड हिंदी समर्थन अब आ गया है। दक्षिण अफ्रीका और मॉरिशस में हिंदी कम्प्यूटिंग कार्यशालाएं आयोजित हुई हैं।
आइए, इस सकारात्मकता का अभिनंदन करें, इसे ऊर्जा दें। प्रलाप तो अर्थहीन है। बेहतर हो, हम हिंदी के महत्व, उसके सामर्थ्य को समझें। उसके विकास की नैसर्गिक चुनौतियों के समाधान खोजें। देखें कि क्या हम भी किसी तरह उसके विकास में हाथ बंटा सकते हैं? नए शब्द गढ़कर, विविध क्षेत्रों की शब्दावली का हिंदीकरण करके, ग्रंथों, पाठ्यपुस्तकों के अनुवाद करके, हिंदी पढ़ाकर, साहित्य रचकर, सॉफ्टवेयर-वेबसाइट बनाकर, दफ्तर में हिंदी का इस्तेमाल करके, हिंदी बोलकर, ब्लॉग बनाकर, फेसबुक पर हिंदी में लिखकर, किताबें रचकर, जानकारियां बांटकर, हिंदी उत्पाद खरीदकर और जरूरत पडऩे पर अपनी भाषा के लिए आवाज उठाकर भी। सकारात्मकता ही हिंदी को हमारी ताकत बनाएगी । हिन्दी को लेकर देश में जहां कहीं भी राजनीतिक स्वर उभर रहे हैं उससे न तो कभी हिन्दी के विकास में कोई समस्या आयी है न कभी आयेगी.

 

- डॉ. दिनेश कुमार प्रसाद

हिन्दी अधिकारी
राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान
अहमदाबाद , भारत 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>