हिंदी सिनेमा में स्त्री की बदलती छवि

          आधुनिक युग संचार युग है, संचार के सबसे सशक्त माध्यम के तौर पर फिल्म का प्रभाव जनता पर सर्वाधिक पड़ा है, क्योंकि अनपढ़ हो या पढ़ा लिखा, अमीर हो या गरीब सबको एक तरह समान रूप से प्रभावित करता है| सिनेमाविश्व के लिए मनोरंजन का श्रेष्ठ साधन बनकर उभर रहा है| क्योंकि ये हर जाति, धर्म और समुदाय के लिए एक समान है| सिनेमा तेजी से परिवर्तित होते समाज को दर्शाता है | सिनेमा और समाज एक दूसरे के पूरक भी है| व्यक्ति थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने दुखपूर्ण संसार से बाहर आ जाता है| जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण है, उसी प्रकार सिनेमा भी समाज का दर्पण बनता दिखाई दे रहा है|

           सिनेमा की पहुँच समाज के बहुत बड़े वर्ग तक है, इसीलिए मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दायित्व निभाने का सवाल भी यहाँ जुड़ जाता है, जब कोई फिल्म रोचक अंदाज में सामाजिक विसंगतियों के चित्र और कुछ सकारात्मक सन्देश सही संप्रेषित करने में समर्थ होती है तो उसे व्यापक स्तर पर सराहना भी मिलती है| हिंदी सिनेमा में नायिका एक ऐसा मिथक है, जिसकी अनुपस्थिति में कोई फिल्म बन ही नहीं सकती लेकिन अब तक जिसकी उपस्थिति नायक समेत पेड़ों और फव्वारों के चारों ओर चक्कर लगाने के लिए ही होती रही है| नायक की नायिका और कहानी का मूलाधार होने के बावजूद सिनेमा की नायिका को बार-बार कंडीशन किया जाता रहा है, खुद नायिका ही मिथक को बार-बार तोड़ती रही है| अगर कभी कहानी ने उसे घेरे में जकड़ने की कोशिश की तो उसने एक विद्रोह भी हुआ| यह अलग बात है कि बोक्स ऑफ़िस के भूत के डर से फिल्मकारों ने स्त्री को परंपराओं से बाहर निकलने ही नहीं दिया क्योंकि दर्शक वैसी ही सहनशील नारी की छवि देखना और उस पर सहानुभूति जताना चाहते हैं| जो उसके मानदंडो पर सही ठहरती हो, दर्शक सब कुछ पचा सकता है-एक अकेला नायक सौ–पचास गुंडों  को धराशायी कर दे, अकेले के दम पर स्त्री की रक्षा करता हुआ, कोठे पर लगातार बुरी नज़रों की शिकार पवित्र तवायफ बड़े- बड़े डायलोग बोलती नायिका हो, सब कुछ धड़ल्ले से चल जाएगा | हिंदी फिल्मों की नायिकाओं ने एक लंबे अरसे तक अपनी महिमा मंडित छवि को पुष्ट करने के लिए त्याग, ममता और आंसूओं से सराबोर अपनी तस्वीर दिखाई और बोक्स ऑफ़िस पर खूब वाह वाही भी बटोरी है|

          भारतीय सिनेमा में लंबे समय तक पुरुष का वर्चस्व रहा है| नायिका केवल नाम मात्र की होती थी, भारत के दर्शक परंपरा को ही देखना पसंद करता है| जैसे कि समाज भी नायिका को पतिव्रता और संस्कारी देखना चाहता है| सिंदूर लगाए, करवाचौथ या मंगलसूत्र लगाना आवश्यक है| ‘एक चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू’ बोलते हुए स्त्री को हम देख सकते हैं| परम्परा के नाम पर वह घूंट-घूंट कर जी रही स्त्री की छवि सब देखना पसंद करते हैं| शराबी पति तक को छोड़ना नहीं चाहती वह गाती रहती है – “न जाओ सैया छुडाके बैयां कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी”……गाती हुई स्थिति दयाजनक लगती है, तो कभी “तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा तुम्हीं देवता” ………….आदि|

          यही परोसा गया है अब लेकिन आज भारतीय सिनेमा के तेवर भी बदलते नजर आये हैं| स्त्री का एक वजूद भी द्रष्टिगत होने लगा है| हिंदी सिनेमा में निरंतर स्त्री की छवि बदलती हुई देखाई देती है| बेशक सिनेमा मनोरंजन जनमानस में पैठी हुई प्रवृतियों में यह भी देखा गया कि हंटरवाली नाडिया का रूप सबसे पहले सिनेमा के परदे पर आया जो स्त्री के लिए वर्जित क्षेत्र में जाती है| भारतीय सिनेमा में नरगिस का अपना दौर था, उसके बाद दामिनी, लज्जा, मृत्यु दंड, प्रतिघात, जख्मी औरत, अंजाम, खून भरी मांग, अस्तित्व आदि फिल्मों की नायिकाओं ने एक नयी राह बनाई| 

सिनेमा में नारी –

           हिंदी सिनेमा का प्रारंभ वैसे तो सन-१९३१ से आर्देशर ईरानी निर्देशित ‘आलम आरा’ से ही होता है| उसके बाद नारी जीवन की विडंबनाओं को अछूत कन्या, दुनिया ना माने, आदमी, देवदास, इंदिरा एम. ए, बाल योगिनी आदि फिल्मों में नारी जीवन से संबधित बाल विवाह, अनमेल विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा आदि समस्याओं को उभारा है| इन फिल्मों में समस्या दिखा भी दिया तो भी कुत्रिमता ही नजर आई है| ससुरालवालों का अत्याचार सहते-सहते भी पति को परमेश्वर मानती हुई दिखाई गई है| हिंदी सिनेमा में स्त्री लगभग तीसरे दशक के बाद से ही सिनेमा के निर्देशन, संगीत, लेखन के क्षेत्र में नजर आने लगी| स्त्री की सिनेमा में भागीदारी में कल्पना लाजमी, मीरा नायर, दीपा मेहता, तनूजा चंदा, फराह खान, पूजा भट्ट, जोया अखतर आदि नायिकाओं ने अपनी अलग पहचान बनाई है|

           ५० से ६० के दशक में विमल राय, गुरु दत्त, महबूब खान और राज कपूर जैसे फिल्म बनाने हस्तियों ने नारी के कई रूप माँ, पत्नी, प्रेमिका का सही रूप दिखाया है| सिनेमा में ७० से ९० दशक में नारी का अलग रूप उभर कर आया है| परदे पर बदलाव केवल परदे तक सिमित न रहकर वह  समाज में भी बदलाव लेकर आया है|

              आर्देशर ईरानी की ‘किसान कन्या’ महबूब खान की ‘औरत’ और ‘मधर इण्डिया’ और जे.पी.दता की गुलामी में रीना रॉय को भी इसे बेहतर ढंग से देखा जा सकता है| विभाजन के तौर पर हम ग्रामीण नायिकाओं को श्रम संस्कृति और शहरी नायिकाओं को मांसलता और यौनिकता के प्रतिनिधि के तौर पर रख सकते हैं| ऐसा इसलिए भी है कि एक उत्पादन के आदिम चरण पर खड़ी है तो दूसरी बाजार और वितरण के आधुनिक और प्रचलित चरण पर शोषण से दोनों को निजात नहीं है पर अधिकांश फिल्म निर्माताओं का मकसद सामाजिक नहीं पूरी तरह से व्यावसायिक है|

सिनेमा में नारी का बदलता चरित्र-

फिल्मों ने स्त्री जीवन के कुछ ऐसे पहलू को उठाया जो शायद अब तक किसी कोने में दब गया था| इन फिल्मों ने  स्त्री जीवन के परिवारिक और सामाजिक सवालों को ही नहीं उठाया है, बल्कि राजनीतिक सवालों को उठाया सूरज का सातवा घोडा (१९९२), दामिनी –(१९९३), बेंडीट क्वीन –(१९९४), मम्मो-(१९९४), फायर-(१९९८), सरदारी बेगम –(१९९८), मृत्यु दंड –(१९९८), गॉड मधर(१९९९) ,हरी भरी-(१९९९), गजगामिनी, अस्तित्व, जुबैदा, क्या कहना, लज्जा, चांदनी बार आदि अनेक फिल्मों में  नारी का चित्रण हुआ है|

         स्त्री की जद्दोजहद अपने अस्तित्व को तलाशने की एक अनवरत प्रकिया परदे पर भी देखी जा सकती है| इसे गोड मधर, फायर, मृत्यु दंड और इशकिया से लेकर डर्टी पिक्चर तक एक अलग ही दौर है, उसके आगे लिव इन रिलेशन शीप को लेकर बनी फिल्म में हम देख सकते हैं, लव आज कल, शुद्ध देशी रोमांस जैसी फिल्मों ने मुक्ति के अपने रास्ते और खुद की पहचान का नया रास्ता ढूंढ ही लिया है| धीरे-धीरे स्थितियां बदल रही है ‘गोड मधर’ में अपने आत्मसम्मान और प्रखर मेघा और कुटनीति के साथ दिखती हैं, तो धूल का फूल में कुंवारी मां अपने बच्चे को स्वीकार करती हुई ‘क्या कहना’ में भी वही स्वीकृति को देखा जा सकता है| ‘भूमिका’ में अपनी अस्मिता तलाशती स्मिता पाटिल, ‘अर्थ’ में शबाना का पति प्रेम से उबरती हुई, ‘अस्तित्व’ में तब्बू के माध्यम से स्त्री की महज महत्वाकांक्षाओं को देखा जा सकता है| नायिकाओं का स्टीरियोटाइप इमेज से बाहर स्त्री की अस्मिता को पहचानने की कोशिश करना, क्वीन की नायिका का अपना संसार देखा जा सकता है| इंगलिश विंग्लिश की आधेड उम्र की नायिका की चाहत आज के दौर के साथ चलने की कोशिश में सफलता प्राप्त करती है| क्वीन की नायिका मध्यमवर्ग के परिवार के घर की स्थितियों तथा एक परिवार द्वारा शादी के लिए रिजेक्ट करने के बाद भी वह खुद अकेले हनीमून पर विदेश चले जाने का फैसला लेती है| आज इसने सारे भ्रम मिटा दिए जैसे कि हनीमून पर दो लोग जाते है लेकिन यहाँ पर भी दूसरे पात्र का होना, नहीं होना उसे कोई फर्क नहीं पड़ता ये एक पुरुष को चेलेन्ज है तू क्या नकारता है तेरे बगैर भी स्त्री की यात्रा रुकनेवाली नहीं है|

क्वीन

 ‘क्वीन’ में महिलाओं के जीवन का एक मात्र उद्देश्य पति परमेश्वर नहीं है, उसके अलावा अपनी पहचान की अपेक्षा रखती है| क्वीन की नायिका साधारण सी लड़की जिसकी शादी होनेवाली है, वह हर एक लड़की की तरह सपने संजोती है, लेकिन विदेश में पला बड़ा लड़का उसे देशी मानता है और उसके साथ शादी तोड़ देता है| उस लड़की का सपना कोई चाँद छूने का नहीं था, बल्कि शादी में खुश रहने का था| उसमें कौन-सा उसने गुनाह कर लिया मासूम लड़की शादी तो नहीं, लेकिन अपने हनीमून के लिए अकेले ही यूरोप चली जाती है| स्त्री चाहे घर में रहे या बाहर सुरक्षित नहीं है, उसे वहां पर भी एक नए संघर्ष के साथ रहना पड़ता है| सिनेमा के माध्यम से केवल वर्त्तमान ही नहीं भविष्य के द्वार भी खोलता हुआ नज़र आता है| अनेक समस्याओं में भी वह अपना एक नया रास्ता बनाती हुई आगे बढती है| अपने अनुभवों से सब को अपना बना लेती है, सभी जगह लोग निष्ठुर ही नहीं होते अच्छे लोग भी होते हैं| यह कहानी बहुत कुछ कह जाती है|

डेढ़ इश्किया -

इस फिल्म में तीन स्त्रियों की कहानी है| कोई साधारण स्त्री की कहानी नहीं है लेकिन कुछ नई बात है, जो हमें सोचने पर मजबूर करती है| माधुरी दीक्षित एक ऐसी स्त्री की भूमिका में है जो अपने जीवन के अकेलेपन को तोड़ने के लिए किसी मर्द के कंधों का सहारा आसानी से नहीं लेती है बल्कि बाकायदा स्वयंवर रचती हैं, एक स्त्री के लिए एक दूसरे से बेहतर दिखने की प्रवृति को देख एक सुख का अनुभव करती हुई देखती है| स्त्री अस्तित्व की एक अलग कहानी है|

                ‘हाईवे’ इम्तियाज अली की एक ऐसी कहानी है जिसमें नायिका आलिया भट्ट ने अपना किरदार बखूबी निभाया है| आये दिन घर के बाहर की समस्याएं हम लोग देखते हैं, लेकिन घर के भीतर भी जो समस्याओं का सामना कर रही हमारी बहु- बेटियों की पीड़ाओं से हम अनजान है यह फिल्म एक ऐसी ही कहानी को लेकर चलती है| समाज में स्त्री घर में अपनों के बीच भी सुरक्षित नहीं है तो बाहर की तो बात ही क्या करें ? जो स्त्रियाँ घर में पीड़ित है लेकिन उसे किसी भी तरह चुप किया जाता है, घर के लोग भी समाज के डर से उसे बोलने से रोकते हैं| अपने घर में आनेवाले रिश्तेदारों, संगी, साथी और पड़ोसियों जो हमारे घर का हिस्सा बन कर रहते हैं आज उन लोगों पर भी हमें नजर रखनी होगी, घर का ही कोई सदस्य दुश्मन न बने उसका ध्यान आकर्षित करनेवाली फिल्म है| आलिया भट्ट बचपन में यौन शोषण का शिकार लड़की के चरित्र को निभाती है | शायद ऐसी आलिया हजारों हैं अपने आसपास जिन्होंने चाचा- मामा के नाम पर अपने साथ हो रहे अन्याय को सहा होगा| चांदनी बार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है| समाज में हम हिदायत देते हैं लड़कियों को अनजान लोगों से बचने की लेकिन घर के ऐसे लोगों से कैसे बचेगी हमारी लड़कियां? और कहाँ जाएगी और किसे सुनाएगी?

गुलाब गेंग –

हिंदी सिनेमा जगत में ‘हाईवे’ फिल्म के बाद प्रदर्शित हुई गुलाब गेंग स्त्री के पक्ष को अलग तरीके से रखती है| सच्ची घटना के बारे में यह फिल्म है| फिल्म की घटना को छोड़, याद नहीं आता की एक साथ कब इतनी सारी स्त्रियाँ झुण्ड बनाकर गुंडों को पिटती होगी ऐसा, माधुरी प्रमुख नायिका है, जिन्होंने उनकी बेटा, लज्जा, मृत्यु, अंजाम और आजा नच ले इस तरह की भूमिकाओं में पारंगत है| स्त्री सह ले तो घर में भी शोषण होता है और ठान ले तो पूरे गाँव के साथ पंगा ले सकती है| समाज को चुनौती देती हुई औरत सच में अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ खड़ी हो जाई तो किसी की हिम्मत नहीं की स्त्री के जीवन के साथ कोई खेल सके |

          ‘रिवोल्वर रानी’ स्त्री के स्वर को उभारने वाली फिल्म है| सिनेमा में परिवर्तन हो रहा है नायक के स्थान नायिका का वर्चस्व मजबूरी में रिवोल्वर उठाना भी जानती है, और प्यार में पिघल भी सकती है|

             ‘मेरी कोम’ एक स्त्री की जिजीविषा और प्रगतिशील चेतना की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है| उन तमाम लड़कियों औरतों के लिए एक प्रेरणा की तरह है जिनके जीवन में सिर्फ अभाव है| शून्य से शिखर तक पहुँचने की कहानी है| स्त्री की अस्मिता और स्त्री चेतना का एक नया रूप हमें दिखाई देता है| भारतीय समाज का कोई भी हिस्सा हो, क्षेत्र हो स्त्री का संघर्ष बराबर चलता रहता है|

           स्त्री विमर्श चाहे साहित्य में हो या फिल्मों में एक नया अवतार एक नयी वाणी में स्त्री ने अपना द्वार खोल दिया है| परंपरा में बांधकर अभी तक पुरुष प्रधान समाज ने उसे कहीं रोक के रखा है, आज वह सपनों की उड़ान भर रही है और समाज, परिवार को भी नई रोशनी दे रही है| २१वी सदी के सूचना युग में समाज में परिवर्तन हुआ उसके साथ नारी के जीवन में भी परिवर्तन आया है और वही एक तस्वीर फिल्मों में भी आने लगी है| स्त्री की उड़ान अब आसमान से पार तक की हो गई है|    

 

  

- डॉ कल्पना गवली

एसोसियेट प्रोफेसर,

हिंदी विभाग,
कला संकाय, महाराजा सयाजी राव विश्वविधालय, बडौदा.

 

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