हाथों की लकीर

 

हाथों में लिए
शहंशाहों वाली लकीर,
मांग रहा है सड़कों पे भीख
वो बेचारा गरीब फ़कीर।

कभी देखता अपने
हाथों की लकीरों को,
सोचता क्या है ये तकदीर,
जिसे बनाना था
धनवान, पराक्रमी, शूरवीर,
बन बैठा है वह
एक फ़कीर।

कर्म और
भाग्य की
गुत्थी सुलझाता,
सोचता वह
क्या है ये उसका भाग्य
या फिर कर्मों का फल ?
अंत में कुछ निश्चय
न कर पाता,
कहता है वो -
हे ईश्वर! जो कुछ भी हो
अब तू ही कर
इस विकट पहेली
को हल।

अंततः देवयोग से
हुआ ज्ञान का प्रकाश,
कर्म के महत्व को
समझकर,
सँवारा उसने अपने
रूठे भाग्य को,
और जीवन पथ पर
दौड़ पडा
लेकर नई उमंग,
कर्म और भाग्य रुपी
अपनी गाड़ी के
“अमित”, “किरन” पहियों
के संग।

 

- अमित कुमार सिंह

बनारस की मिट्टी में जन्मे अमित जी की बचपन से कविता और चित्रकारी में रूचि रही है|

कालेज के दिनों में इन्होने विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका का सम्पादन भी किया|

अमित कुमार सिंह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में सॉफ्टवेर इंजिनियर हैं|

इनकी कवितायेँ और लेख अनुभूति, हिंदी चेतना, दैनिक जागरण, सुमन सौरभ, कल्पना, हिंदी नेस्ट , वेब दुनिया, भोज पत्र, भोजपुरी संसार , रचनाकार एवं अनेकों पत्रिकाओं में छप चुकी है|

पिछले कई वर्षों से ये कनाडा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका हिंदी चेतना से जुड़े हुए हैं|

इनकी पेंटिंग्स टाटा कंपनी की मैगज़ीन में कई बार प्रकाशित हो चुकी है और देश विदेश की कई वर्चुअल आर्ट गैलरी में प्रकाशित हैं |

दो बार ये अपने तैल्य चित्रों की प्रदर्शनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के ऑफिस प्रांगड में लगा चुके हैं |

वर्तमान में ये हॉलैंड में कार्यरत है और हॉलैंड से प्रकाशित होने वाली हिंदी की प्रथम पत्रिका अम्स्टेल गंगा के प्रधान सम्पादक और संरक्षक हैं |

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