हाइकु – डाँ सरस्वती माथुर


चढ़ा -उतरा
साँप सीढ़ी सा लगा
तुम्हारा प्रेम ।


साँझ होते ही
आकाश से उतरी
धूप गौरै़या ।


मोर हैं बोलें
मेघ के पट जब
गगन खोलें ।


सावन मन
सुंदर चितवन
घोर सघन।


मन फूलों पे
तितलियों सी घूमीं
अल्हड़ यादें।


मन पतंग
प्रेम की डोर बाँध
कटता गया।


मीठे पानी का
कलकल झरणा
बहता मन ।


मन है बाँटे
भावों के सुमन तो
हवा महके।


मन बुहार
यादों की हवाएँ भी
शांत हो गयी।

१०.
रात -जुगनू
दिन के उजास में
कहाँ जा छिपा।

- डाँ सरस्वती माथुर

मेरे बारे मे
विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया (राजस्थान चैप्टर की सदस्य)।अध्यक्ष(PRCI)।
साहित्य अपने युग का आइना होता है, जो समाज से आपको जोड़ता है, किसी ने सच कहा है कि बिना अनुभूति के अभिव्यक्ति नहीं होती !यहाँ मैं उल्लेख करना चाहूंगी रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक छोटी कविता का जिसे पढ़ कर मुझे जीवन जीने की प्रेरणा मिली है !

कवि रविंद्रनाथ टैगोर की कविता का अंश है : “सांध्य रवि ने कहा मेरा काम लेगा कौन ? रह गया सुनकर जगत सारा निरुत्तर मौन एक माटी के दिए ने नम्रता के साथ कहा जितना हो सकेगा मैं करूँगा नाथ !” इस कविता में माटी के दिए की रोशनी हमारी अनुभूतियों को जगाती है, उन्हें बेजान होने से बचने का अवसर प्रदान करती है !यह ऱोशनी मुझे लिखने की प्रेरणा देती है मेरी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति को साकार करती है और सकारत्मक साहित्य से जोड़ती है।

 

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