हंगामा है क्यों बरपा

      हंगामा है क्यों बरपा – इसका कोई जवाब नहीं है. हंगामा जो है वह बस बरपाने के लिए ही होता है. हंगामा बरपा है तो केवल धैर्य बनाए रखना है. कुछ नुकसान बेशक हो जाएगा, होना ही है. लेकिन जैसे बाड़ का पानी थम जाता है वैसे ही हंगामा भी थम ही जाएगा. चिता न करें. यही सुचिन्त्य चितन है. जो भी सरकार में नहीं रहा उसने हंगामा बरपा है. कोई नई बात नहीं है. आज की राजनीति हंगामे और हुड़दंग की राजनीति है.  विरोध का अब एकमात्र यही तरीका है. ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. पड़े लिखे लोगों की तरह आज कोई भी सांसद कायर नहीं बनाना चाहता कि ख्वाह-म-ख्वाह बहस-मुवाहिसा करता फिरे. बहस से कुछ होने जाने वाला नहीं है. बल्कि जनता में इससे नेता की छबि खराब ही होती है. उसकी सक्रियता पर प्रश्न चिह्न लगता है. इसके विपरीत हंगामा करते हुए जब उसे टीवी पर प्रस्तुत किया जाता है, जनता को यकीन हो जाता है, वह चुप बैठने वालों में नहीं हैं. वाह, क्या हंगामा बरपा है ! ज़रा देखें तो सही.

राजनीति के वे उदास दिन थे. अपने को पड़े-लिखे सुसंस्कृत समझने वाले लोग तब समाज का नेतृत्व करते थे, निर्वाचन द्वारा चुने जाते थे, और सांसद / विधायक बनते थे. धीरे धीरे जनता को समझ में आगया कि इन्हें केवल वाद-विवाद भर करना आता है. वे लोगों के हित में कोई काम नहीं कर सकते. जो महाबली इन्हें संसद तक पहुंचाते वे ठगे से रह जाते. सो उन्हीं लोगों ने धीरे धीरे नेतृत्व संभाल लिया. ये सक्रिय लोग हैं. इनके साथ बाहु-बल है, पशु-बल है, धन-बल है. आज की राजनीति के लिए और क्या चाहिए ! कभी दिमाग का काम पडा तो उसके लिए बुद्धिजीवियों को आराम से, और सस्ते में, खरीदा ही जा सकता है !

भारत एक रईस देश है. यहाँ पैसे की कमी नहीं है. अरबों करोड़ों के तो यहाँ घोटाले हो जाते हैं. इनसे क्या कभी आर्थिक कठिनाई आई ? मुकद्दमें चलते रहते हैं, नए नए घोटाले प्रकाश में आते रहते हैं. देश चलता रहता है. ऐसे में अगर संसद न चल पाने से करोड़-दो करोड़ का थोड़ा सा नुकसान भी हो जाए तो क्या फर्क पड़ता है ? जनता का पैसा, जनता का पैसा है –चिल्लाने से काम नहीं चलता. बेशक काम पैसे से ही होता है और पैसा कैसा भी हो –सफ़ेद या काला –जनता का ही होता है. पैसे की तो यह नियति ही है. कमाइए या दान में लीजिए. बर्बादी कीजिए या आबादी कीजिए. एक ही बात है. हंगामा होने दीजिए. मत पूछिए हंगामा है क्यों बरपा !

हंगामा और हुडदंग, प्रदर्शन और नारेबाज़ी, ये कभी नहीं देखते कि कहाँ, कब और किसके लिए संपन्न हो रहे हैं. बाज़ार में तो होते ही हैं, विधानसभाओं और संसद में भी इन्होंने अपनी जगह सुरक्षित कर ली है. किसने ही पीठासीन इसके शिकार हुए है. होते रहेंगे. संसद के अध्यक्ष की कुरसी है तो क्या? आखिर कुरसी ही तो है. वह क्यों सुनने लगी ! हम तो ठीक उसके सामने खड़े होकर लगाएंगे नारे, करेंगे हुड़दंग, कोई क्या कर लेगा ? अजी, निलंबन तो होते ही रहते हैं, और निलंबित बहाल भी होते रहते हैं. चलता है. हुड़दंग तो जारी रहेगा. निलंबन तो उसे और भी हवा देगा. हंगामे को हवा देना है तो शौक से दीजिए, देते रहिए – परनाला तो यहीं बहेगा. हंगामा करना तो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है, करते रहेंगे. विपक्षी हैं. अभी क्या हुआ है ? बोफोर्स जितना फ़ोर्स तक तो अभी इस्तेमाल हुआ नहीं है ! न बहस न सवाल – हमारा मकसद है सिर्फ बवाल. माना इस हुड़दंग को देखकर दर्शक दंग हैं, पर उन्हें तंग करने के लिए तो यह है ही. हंगामा बरपा ही इसीलिए है न.

 

 

- डा. सुरेन्द्र वर्मा

कवि, चिन्तक और समीक्षक डा. सुरेन्द्र वर्मा की ख्याति एक सफल व्यंग्यकार के रूप में भी है | डा. वर्मा के अबतक आधे-दर्जन से अधिक व्यंग्य प्रकाशित हो चुके हैं | इनमें से “कुरसियाँ हिल रही हैं”, काफी चर्चित रहा है और उसके संकलन दो संस्करण, प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली, से आ चुके हैं | इसी तरह उनका एक अन्य संकलन ‘हंसो लेकिन अपने पर” उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, से शरद जोशी पुरस्कार से सम्मानित हो चुका है | प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का कहना है कि सुरेन्द्र वर्मा की “रचनाएं मेरे लिए इस अर्थ में मूल्यवान हैं कि इनके द्वारा मैं एक ऐसे रचना जगत से परिचित हो सका जो आज के चालू व्यंग्य लेखन के परिदृश्य से कई अर्थों में अलग है” | उनकी रचनाओं में “उनकी अध्ययनशील पृष्ठभूमि का सहज परिचय मिलता है | फिर भी उनकी यह पृष्ठ भूमि उनकी रचनाओं को बोझिल नहीं बनाती | सिर्फ संकेतों से उनके व्यंग्य में बहुस्तरीयता की रंगत पैदा करती है |”

डा. सुरेन्द्र वर्मा का जन्म २६ सितम्बर १९३२ को मैंनपुरी, उ.प्र.में हुआ | उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से दर्शनशास्त्र में १९५४ में प्रथम श्रेणी में एम् ए किया | बाद में विक्रम वि.वि. उज्जैन से गांधी दर्शन पर पीएच. डी. | वे इंदौर में शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे; इंदौर विश्वविद्यालय (अब, देवी अहिल्या वि. वि.) में दर्शनशास्त्र समिति के अध्यक्ष तथा कला-संकाय के डीन रहे | वे म. प्र. के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों के प्राचार्य पद से १९९२ में सेवानिवृत्त हुए उन्होंने सेवानिवृत्ति के उपरांत अपना सारा समय साहित्य-सृजन में को अर्पित कर दिया |

    डा. सुरेन्द्र वर्मा के प्रकाशित ग्रन्थ

    व्यंग्य संकलन लोटा और लिफाफा ० कुरसियाँ हिल रही हैं ० हंसो लेकिन अपने पर ० अपने अपने अधबीच ० राम भरोसे ० हंसी की तलाश में ० बंधे एक डोरी से

    साहित्य कला और संस्कृति साहित्य समाज और रचना (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा निबंध के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार ) ० कला विमर्श और चित्रांकन ० संस्कृति का अपहरण ० भारतीय कला एवं सस्कृति के प्रतीक ० कला संस्कृति और मूल्य ० चित्रकार प्रो.रामचन्द्र शुक्ल पर मोनोग्राफ ० सरोकार (निबंध संग्रह)

 कविता अमृत कण (उपनिषदादि का काव्यानुवाद)० कविता के पार कविता ० अस्वीकृत सूर्य ० राग खटराग (हास्य-व्यंग्य ‘तिपाइयाँ) ० धूप कुंदन (हाइकु संग्रह) ० उसके लिए (कविता संग्रह)

इसके अतिरिक्त १० और ग्रन्थ, दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान पर |

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,लखनऊ से तो दो बार डा. सुरेन्द्र वर्मा की पुस्तकें पुरस्कार प्राप्त कर ही चुकी हैं, इसके अतिरिक्त दर्शन के अध्ययन-अध्यापन तथा शोध कार्य के लिए म.प्र. दर्शन-परिषद् द्वारा प्रशस्ति पत्र भी उन्हें मिल चुका है| भारतीय साहित्य सुधा संस्थान, प्रयाग ने उन्हें “भारतीय सुधा रत्न’ तथा विश्व भारतीय कला निकेतन, इलाहाबाद ने उन्हें “साहित्य शिरोमणि” उपाधियों से सम्मानित किया है.

  विशेष डा. वर्मा रेखांकन भी करते हैं और उनके रेखांकनों की एक प्रदर्शिनी इलाहाबाद संग्रहालय में लग चुकी है| कई हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके रेखांकन प्रकाशित होते रहते हैं |

   सम्प्रति- स्वतन्त्र लेखन तथा गांधी दर्शन के विशेषज्ञ के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा राजर्षि ओपन वि.वि., इलाहाबाद से सम्बद्ध |

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