स्वयं से किया गया वादा

मैं चुपचाप बालकनी के एक कोने में पड़ी इस कुर्सी पर सिमटी-सी बैठी हूं। जाने क्यों मन आज इतना उदास है। जानती हूं, ऐसा कुछ नहीं हुआ है, फिर भी पता नहीं कौन-सी चिंता मन को मथ रही है। अपने-आप में उलझी मैं अपने ही अंतद्र्वंद्व में इतनी तल्लीन और खोई-सी थी कि इनके आने का आभास तक नहीं हुआ। जाने कब आंखों के दायरे तोड़, खारे जल की कुछ बूंदें गालों पर लुढ़क पड़ीं। इन्होंने घबराकर पीछे से मुझे बांहों के घेरे में लेते हुए प्रश्न दाग दिया,‘‘ क्या हुआ, अनु?’’

‘‘कुछ भी नहीं, बस यूं ही मन उदास है।’’ मैंने सहज होते हुए कहा।
‘‘आज तो तुम्हें सबसे ज्यादा खुश होना चाहिए, तुम्हारी जिम्मेदारियां अब पूर्ण होने जा रही हैं और तुम हो कि यूं आंखों में सावन-भादों समेटे जाने कहां खोई हो?’’
मैंने झट संभलते हुए कहा, ‘‘कुछ भी तो नहीं हुआ?’’
‘‘फिर भी कुछ तो बात है, वरना तुम इस तरह उदास बुझी-बुझी कभी नहीं रहतीं।’’ इनकी पारखी आंखों ने ताड़ ही लिया था और ताड़े भी कैसे नहीं, आखिर एक-दूसरे की रग-रग से वाकिफ हम सहज ही एक-दूसरे की परेशानी की चिंता-रेखाओं को पकड़ लेते हैं।
तीस साल का साथ है। चेहरा तो चेहरा, मन के हावभाव भी शायद समझ जाते हैं। ये मुझे सहेजते हुए से बोले, ‘‘ए अनु! बोलो भई। कुछ बताओ तो!’’
मैंने सहज होने की पूरी कोशिश के साथ कहा, ‘‘यूं ही आज रह-रहकर मांजी याद आ रही हैं।’’
‘‘क्यों भई? सास बनने की खबर से ही सास याद आ गई क्या? ये मां आज क्यों याद आ रही हैं। उनसे तो, जब तुम आई थीं, तुम्हारी पटरी लंबे समय तक नहीं जमी थी।’’ ये मजाक के मूड में बोल गए।
‘‘मेरी पटरी? वाह, आप भी न…’’ चिड़चिड़ाते हुए मैंने आंखों को पोछते हुए कहा।
‘‘मतलब तो एक ही हुआ न, पटरी तुम्हारी कहो चाहे मां की? आज पता चला मुझे तुम्हारी स्थिति देखकर। सास भी कभी बहू थी वाली उक्ति का अर्थ?’’ वे समझौते के लहजे में बोल रहे थे।
‘‘चाय पीने का मन हो रहा है, आप लेंगे क्या?’’ मैं उठने लगी।
‘‘हां, हां… आधा कप चल जाएगी। चाय की कब मना है, इसी बहाने थोड़ी देर तुम पास बैठोगी तो सही।’’
‘‘क्यों? क्या मैं तुम्हारे पास नहीं, कहीं दूर लंका में रहती हूं?’’
‘‘लगता है, आज तो तुम लड़ने के मूड में हो। अरे, मेरा मतलब है, अब तुम्हारी बहू आ जाएगी और तुम्हारा प्रमोशन हो जाएगा। फिर तुम सास बनकर रूतबा झाड़ने लगोगी! क्यों, गलत कहा क्या मैंने।’’ ये हमेशा हल्के-फुल्के मूड में ही बात करते हैं। शाम का अखबार फैलाकर बैठ गए।
चाय का प्याला पकड़े-पकड़े मैं फिर गुमसुम हो गई। इन्होंने फिर टोका था, ‘‘प्लीज अनु…हां कुछ तो बात है? बताओ भी।’’
‘‘सच बताने लायक कोई बात नहीं।’’ मैं मुस्करा उठी।
‘‘कुछ तो जरूर है, ये मृगनयनी आंखें क्या यूं ही सजल हो रही हैं? ये दुलारते हुए-से बोल रहे थे।
इस स्नेह भरे संवाद ने मुझे और रूंआसा कर डाला, पर बताने जैसी कोई बात थी भी कहां? क्या बताती कि अभिनव की पसंद मुझे नापसंद है। ठीक उसी तरह जैसे तीस साल पहले मांजी ने मुझे नापसंद करार दिया था। तभी फोन की घंटी बजी और ये उठकर चले गए। मैंने राहत की सांस ली। चलो, सच उगलने से बची, वरना ये तो मेरे अंदर के चोर को जरूर पकड़ लेते, पर यह चोर कब मेरे मन में प्रवेश कर गया, मैं नहीं जानती। हां, जब से अंदर है दिलोदिमाग में एक खलबली-सी मची हुई है। एक शीतयुद्ध चल रहा है मेरा मेरे ही साथ। आज पहली बार मुझे भी लगा कि मेरा अस्तित्व अब खतरे में है। तो क्या ऐसा ही मांजी को भी लगा होगा, जब प्रियेश ने मुझसे ब्याह करने की इच्छा मांजी को बताई होगी?
‘बहू का आना’ क्या हर सास के मन में ऐसा ही कोई अंतद्र्वंद्व शुरू कर देता होगा? मन की इस उठा-पटक को तो मैं प्रियेश के साथ भी तो शेयर नहीं करना चाहती। पता नहीं क्या सोचेंगे मेरे बारे में। प्रियेश मेरे इस रूप को जाने किस तरह लेंगे। आज जीवन में दूसरी बार मुझे बदलाव के घूमते हुए चक्र ने वहीं लाकर पटक दिया है जहां तीस साल पहले मैं भी इसी देहरी पर आकर खड़ी हुई थी। मेरे कदम देहरी के बाहर ही थे और मैंने महसूस कर लिया था कि देहरी के अंदर जमे हुए पैर मेरा, मेरे आगमन का उस तरह स्वागत नहीं कर रहे जैसी मेरी अपेक्षाएं थीं। बाहर मैं थी, अंदर मांजी, जिनके हाथ में आरती की थाली जरूर थी, पर बढ़ती उम्र के झुर्राते-से चेहरे पर एक तमतमाया-सा मौन था और आंखों में मुझे तौलती-तपती-सी आभा थी। जाने क्या था उन आंखों के तेज में जो मुझे ईष्र्या की तरह लगी थी। मैं मन ही मन कुछ-कुछ डरी हुई-सी थी-जाने कैसा व्यवहार करेंगी वे मेरे साथ।
सतरंगी सपनों का हिंडोला उनके सामने आते ही रूक गया था, पर मन का कोई कोना आश्वस्त भी था कि प्रियेश मुझे पसंद करते हैं, असीम प्यार करते हैं। मांजी करें न करें, क्या फर्क पड़ता है, पर बाद में महसूस हुआ कि एक छत के नीचे हर रिश्ते की अहमियत है और रिश्ते को निभाने से बहुत फर्क पड़ता है। सुबह-शाम छोड़ दो तो दिन के शेष समय को उन्हीं के साथ गुजारना होता था। ब्याह के पांच सालों तक मांजी और मैं अलगाव के दो किनारों पर ही थे। वह तो पांच वर्ष बाद अभिनव रूपी सेतु ने हम सास-बहू को दादी और मां बनाकर अलगाव को लगाव में ऐसा बदला था कि मरते वक्त भी मांजी ने इनकी नहीं, मेरी गोदी में सिर रखकर गंगाजल ग्रहण करते हुए प्राण त्यागे थे।
पर अलगाव के वे पांच वर्ष एक युग की तरह ही तो बीते थे। मांजी कानपुर की ब्राह्मण और मैं राजस्थान की ब्राह्मण बेटी, क्या फर्क था, केवल प्रांत का? केवल भाषा का? रीति-रिवाजों और खानपान का? केवल सांस्कृतिक भेद ही तो था-थीं तो दोनों एक ही जाति कीं। ब्राह्मण कुलों में जन्मीं थीं, पर मांजी कुछ यूं व्यवहार करतीं मानो अछूत कन्या उनके घर आ गई हो और वे अबड़ा (भ्रष्ट) गई हों। अलग पकाना, अलग पूजा-पाठ, उनका इस तरह का व्यवहार मुझे अंदर ही अंदर तोड़ देता था। एक हीनता का बोध करवाता था-तब हमेशा लगता मांजी गलत हैं, पर आज लग रहा है वे गलत नहीं थीं। वह उनकी उथल-पुथल होती मनःस्थिति का ही परिणाम रहा होगा। ऐसा ही तो मैं भी सोच रही हूं अभिनव की पसंद को लेकर! लड़की आईआईटी है, अभिनव के साथ पढ़ी, उच्च शिक्षित है, पर मेरे अंदर उसकी शिक्षा, अभिनव की पसंद के बावजूद, कुछ ऐसा अलग-सा पक रहा है जो मुझे ही द्वंद्व में डाल रहा है। मैं और मांजी तो केवल प्रांत के अंतर से ही बंटे थे पर सुकन्या तो जाति और धर्म से भी अलग है। कैसे हम उसके साथ निभा पाएंगे? आज सुकन्या को मैं उसी अलगाव के दूसरे किनारे पर देख रही हूं। मैं शुद्ध भारतीय परंपराओं की कायल हूं। कायदे, मान-मर्यादा, संस्कार सभी कुछ मेरे निर्धारित मानदंडों पर चलते हैं। बड़ों के चरण-स्पर्श को दुनिया का सबसे अच्छा अभिवादन मानने वाली मेरी संस्कृति में सुकन्या का ‘हलो आंटी, हाय अंकल’ कहां समायोजित हो पाएगा! एक तीखी चुभन-सी उठी भीतर। मन लगातार उलझता ही जा रहा है। ‘‘सुकन्या को बदलना पड़ेगा स्वयं को, ऐसे नहीं चलेगा।’’ मैं बुदबुदा उठी।
‘‘क्या हुआ, मम्मी?’’ अभिनव ने पीछे से आकर गले में बांहें डालते हुए, मेरे गाल से गाल सटाकर प्यार करते हुए पूछा।
‘‘कुछ नहीं रे, बस यूं ही।’’ मैंने उसका गाल थपथपाते हुए कहा।
‘‘नाराज हो आप?’’ उसकी आवाज में भय की झलक थी।
‘‘नहीं तो।’’ सहज होने का मेरा प्रयास व्यर्थ गया।
‘‘मम्मी, जब से आप सुकन्या से मिली हैं, आप चुप हैं, उदास हैं। पसंद नहीं आई क्या?’’ वह गंभीर लहजे में बोल रहा था।
‘‘ऐसा कुछ नहीं है।’’ मैं उठकर अपने कमरे में आ गई थी। मैं अभिनव के प्रश्नों से बचना चाहती थी। जानती हूं, इन दिनों वह नए जीवन के ख्वाबों की दुनिया में तैरता रहता है। मैं नहीं चाहती कि वह दुःखी हो। उसका दिल टूटे। उस पर अपने कमजोर होते पुरातनपंथी मन की झलक भी न पड़े, यही सोचकर उठ गई थी मैं बालकनी से, पर वह मेरे पीछे-पीछे कमरे में चला आया।
‘‘यू नो मम्मा, सुकन्या इज वेरी इंटेलीजेंट।’’
‘‘आई नो वेरी वेल।’’ मैंने मुस्कराते हुए सहज होने की कोशिश की।
‘‘शी इज वेरी स्वीट।’’ वह वहीं मेरे पलंग पर लेट गया और शायद भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गया। उसे झपकी आ गई। मैंने चादर उढ़ाकर उसके बालों में हाथ फेरा तो नजरों के सामने नन्हा-सा अभिनव आ गया। यादों का छोटा-सा एलबम फिर मन में खुल गया, जब वह कहानी सुनते-सुनते या होमवर्क करते-करते यूं ही सो जाता था। उसका बचपन रिवर्स होती फिल्म की तरह मेरे सामने खुलता गया। एक-एक घटना, एक-एक बात मेरे स्मृतिपटल पर उभरती जा रही थी। उसके चेहरे पर नजरें गईं तो लगा जैसे वह आज भी उतना ही मासूम है। मैंने उसके माथे को चूम लिया। ‘क्या इसकी इच्छा के लिए मैं स्वयं को नहीं बदल सकतीं?’
पर मैं ही क्यूं बदलूं हर बार? पहले मांजी के लिए, अब बहू के लिए? मैं और सुकन्या, सुकन्या और मैं, मैं और मांजी, मांजी और मैं… लगातार यह चक्र मेरे दिलोदिमाग पर मंडराने लगा। सैकड़ों नए सवाल पुराने संदर्भों के साथ मन में उठने लगे। दिल आक्रांत हो उठा।
सुकन्या के आते ही अभिनव मुझसे दूर हो जाएगा? मुझे अभिनव से दूर होने का भय लगातार सताने लगा। अब तक अभिनव के जीवन में कोई स्त्री थी तो वह केवल मैं-उसकी मां। दादी के साथ भी उसका प्यार बंटना मुझे अच्छा नहीं लगता था। तब उस पराई लड़की के साथ….? सुकन्या के आने की कल्पना से ही मुझे बेटा अपने से दूर होता लगा। कितना सुख मिलता है मुझे उसके लिए बनाने में, उसके लिए जागने में, उसके स्वेटर, उसके कपड़े पसंद करने में, पर धीरे-धीरे यह सब सुकन्या का सुख हो जाएगा। सुकन्या की पसंद में बदल जाएगा। मैं घर की धुरी से हटकर हाशिये पर चली जाऊंगी। सिहरन-सी हुई तन-मन में, तो क्या अपनी स्वतंत्रता और एकाधिकार के बंटवारे का भय मुझे डरा रहा है? अपने सर्वाधिकार, अपने वजूद के घटने का डर है। क्या परिवार में एक दूसरी स्त्री का प्रवेश मेरी सŸाा और मेरे महत्व को चुनौती नहीं दे रहा? मन में गुबार-सा उठा और सारे प्रश्न धुंधले-से होने लगे। पसीने से तर-बतर हो गई मैं। रात सोचते-सोचते ही आधी हो गई, पर नींद का नामोनिशान नहीं था।
कितना उत्साह था मुझमें जब मैं दुल्हन बनकर इस घर में आना चाहती थी। प्रियेश के साथ काम करते हुए अक्सर मां की बात होने लगती। मां का जिक्र, मां की कल्पना से ही रोमांचित हो उठती थी मैं। बचपन में ही माँ खोकर अधूरी हो गई ममता की छांव को बाबा ने पूरा करने की लाख कोशिश की थी, पर फिर भी प्यार, स्नेह और आषीर्वाद की रिक्तता को सदा महसूस किया था मैंने। प्रियेश से मां के बारे में सुन-सुनकर एक सुंदर कल्पना ने जन्म लिया था मेरे मन में-जहां सास-बहू नहीं मां-बेटी हुआ करती थीं… पर क्या? फिर अपनी बहू को बेटी बनाऊंगी, यह वादा मैंने अपने-आपसे ही किया था…फिर अब क्यों मैं परेशान हूं?
क्या हाथी के दांत की तरह विचार भी दिखाने के अलग होते हैं और निभाने के अलग?

 

- डा. स्वाति तिवारी

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क - चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

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