स्मृति-आँगन में उसका किलकना…

जब उसके समीप बैठता तो जैसे किसी सुरम्य-हरित पर्वतीय प्रदेश में किन्हीं हरी-भरी झाड़ियों की छाया में बैठने का अहसास होता जहाँ शीतल हवा हौले-हौले प्रवेश करती हुई वहाँ एक कोने में सिमटकर स्वयं को धन्य मान रही हो। जब वह उवाच करती तो ऐसा लगता कि जैसे उसकी वाणी मालती की खुशबू से सुवासित उस पूरे वातावरण में मंथर गति से बहते हुए किसी बहाने से वहाँ कुछ समय तक रहने के लिए ठिठक गई हो। उसके पास बैठकर जब उसके हाथ से अनायास स्पर्श हो जाता तो समूचा शरीर सिहर उठता; तब ऐसा लगता जैसेकि मन स्निग्ध-धवल विचारों से सुवासित हो गया हो और दिन-भर की थकान गंगोत्री से लाए गए शीतल गंगाजल से धुल गई हो।

बिटिया-सरीखी भगिनी थी वह। उसे गोद में खिलाया था और जब कोई दस-ग्यारह साल की हुई तो उससे अपनी खूब सेवा भी कराई। कई तरह के खेल खेलते समय बेईमानी से उसे हराकर उसे अपना सिर दबाने या सिर पर तेल-मालिश करने का दंड बार-बार दिया। वह किसी उलाहना-उपालंभ के बिना, मेरी सेवा में जुट जाया करती थी। बालपन से ही इतनी भावुक थी कि किसी के भी प्रति वह मोहग्रस्त हो जाया करती थी। पड़ोस में मेरे रिश्ते के एक बड़े भाई थे–अशोक निगम, जो नित्य शाम आकर उसे गोद में लेकर घंटो-घंटो खिलाया करते थे। कभी-कभार एकाध महीने के लिए वह कहीं चले जाया करते थे–अपने किसी ताई या मौसी के घर। तब वह उन्हें आस-पास न पाकर हुड़क-सी जाती थी; न छींक-खाँसी न बुखार–पर, वह क्षण-प्रति-क्षण क्षीण-सी होती जाती थी। माँ बड़ी चिंतामग्न! कहीं उसे किसी बीमारी ने तो नहीं जकड़ लिया!! वह उसे लेकर उमेशोनाथ जी के मंदिर मन्नतें मानने जाती। या, सिद्ध संतों-फकीरों से झाड़-फूँक कराने चली जाती और रोज़ उसकी नज़र उतारा करती। लेकिन, इसके पहले कि उसे वैद्य-हकीमों के पास ले जाने की नौबत आती, अशोक भाई साहब वापस आ जाते। फिर, एक-दो दिन में ही वह उनकी गोद में खेलकर पूर्ववत स्वस्थ-चित्त हो जाती। खूब चहकने-किलकने लगती जिसे स्मृतियों के आँगन से आज भी देख-सुन पा रहा हूँ।

साँवला-सा इकहरा बदन, माथा शिव के मस्तक जैसा उत्तल, कनपटी से साँठगाँठ करती हुई बड़ी-बड़ी आँखें, नासिका बड़ी सहजता से उभरती हुई, उत्सुक-से होठ कुछ सकारात्मक घटनाओं का नित उद्घाटन करने को आतुर, स्पंदनशील कान पीपल के सुनहरे पत्तों जैसे चेहरे के दोनों ओर फैले हुए जहाँ बेहद चमकदार-घने काले केश दोनों कनपटियों को घेरे हुए, स्निग्ध बाएं कपोल पर बचपन की किसी चोट का हल्का-सा निशान, दक्षिण भारत के किसी मंदिर में देवि-प्रतिमा के मुखड़े जैसा तनिक साँवला लमछर चेहरा, ग्रीवा सुराही की गरदन की भाँति पतली और लंबी, वक्ष-उर-कटि स्वाभाविक रूप से पूरे तन को आकर्षक परिपूर्णता प्रदान करते हुए, घुटनों को आराम से छू रहे हाथ–आदि-आदि उसकी संपूर्ण शख़्सियत को एक ऐसा विस्तार प्रदान करते थे जिसे शब्दों में समेटकर सीमाबद्ध करना निःसंदेह सरल नहीं है।

इस दरम्यान काल के पहियों वाला रथ जीवन-पथ के कई दुर्गम मोड़ों को पार करते हुए तेज गति से भागने लगा। मैं उस पर सवार, दिल्ली आकर एक सरकारी मोहकमे में कार्यरत हो गया। मुश्किल से कोई तीन बरस गुजरे ही थे कि मुझसे ममता रूठ गई। तदनन्तर विवाहित होकर ग़ाज़ियाबाद में रच-बस गया। किंतु, परिवारजनों से विछोह की पीड़ा अकथनीय थी। बनारस जाकर उनसे मिलने का क्रम भी कम हो गया। पर, प्रायः वर्षांतर पर वहाँ किसी बहाने से जाने का अवसर मिल जाता। ऐसे में मन चंचल हो जाता–सभी से मिलना है; बचपन के आँगन में फिर से किलकना है–उस मृदुला के साथ, जिसे नटखट ज्योति, बहन कम, दोस्त अधिक मानती थी। चलिए, उसका मंथर गति से चलकर दरवाजे तक आना फिर मेरा पैर छूकर उसका मुझसे आशीर्वाद लेना याद करता हूं: अधिकतर दिन का कोई दस बजे से बारह बजे तक का समय होता जबकि मैं रेलवे स्टेशन से किसी रिक्शे या थ्री-व्हिलर की सवारी करके दरवाजे पर दस्तक देता। तब अनुजा ज्योति जो या तो रसोई में होती या डायनिंग टेबल पर चावल बीनने, सब्जी काटने या अन्यमनस्क-सी पढ़ने-लिखने जैसा कोई काम कर रही होती या नहा-धोकर डायनिंग टेबल से आसन्न पूजा-स्थल पर ईश-वंदन कर रही होती, उसे मेरे अचानक आने का पूर्वाभास शायद नहीं होता जबकि मृदुला सामने बैठक से झट उठकर और पहले-पहल पैर छूकर जग-जीतने के हाव-भाव में, मेरा स्वागत करती–कुछ सार्थक शब्द बुदबुदाते हुए एवं मुस्कराकर, ताकि मैं आश्वस्त हो जाऊँ कि उसकी कितनी व्यग्रता से मैं उसके लिए प्रतीक्षित था। मैं उसकी उनींदी आँखों में झाँककर गौर से देखता और फिर आश्वस्त हो जाता कि मेरी बाट जोहते हुए और रात-भर घड़ी की ओर टकटकी लगाए हुए सुबह होने का बेसब्री से इंतज़ार करते हुए उसने कैसे युगों जैसा भारी समय काटा होगा। मैं ठगा-सा उसके पास आकर बैठ जाता और यह बात उस पर ज़ाहिर नहीं होने देता कि उसके लिए मैं कितना महत्वपूर्ण हूँ!

उस आतिथ्य-दिवस पर मेरे भाई-बहन मेरा गर्मजोशी से जो सेवा-सत्कार करते, उसके पीछे मृदुला की तैयारी साफ दिखाई देती। जैसे सब कुछ उसी की प्रेरणा से हो रहा हो…जैसे साफ-सुथरी आलमारियाँ, गुलदानों में चमचमाते आर्टीफिशियल प्लांट्स, दीवारों पर टंगी तस्वीरें, रसोई में करीने से सजे हुए बर्तन, बाहर अलगनी पर झूलते कपड़े, धूल से निज़ात पा चुके मुस्कराते हुए कमरे तथा शयन-कक्ष और डायनिंग टेबल वाला साफ-सुथरा स्थान–सब कुछ उसी की शख़्सियत के पीछे छिपे मेरे सहोदरों का निश्छल परिश्रम बयां करते। वैसे तो सब कुछ सम्मिलित प्रयास से निष्पादित-सा लगता; पर, मैं तो हतप्रभ रह जाता, यह कल्पना करके कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस सजीली व्यवस्था का जायज़ा लेने स्वर्ग से माँ नित्य आती हों! ऐसा तो माँ के जीवन-काल में ही नज़र आता था। अरे नहीं, इस व्यवस्था की उन्नायक तो मृदुला ही है जो स्वप्रयास से इसकी सूत्रधार है। जब मैं नीचे कालीन पर आराम फरमाते हुए चाय की चुस्कियाँ लेने को होता तो वह उठकर बरबस सोफ़े पर मुझे बैठाती और ज्योति को गुहारती, ‘ज्योति, कहाँ हो? मनोज भइया को ऐसे चाय पिलाओगी!’ ज्योति अल्हड़ कदमों से चहलकदमी करती हुई आकर, झट मेरे आगे टेबल खींच देती और मैं लापरवाह-सा टांग पसारे हुए चाय-नाश्ता करने लगता। अनुराग और ज्योति भी वहीं बैठ जाते। लेकिन, मैं खींझ उठता–जब वह मेरे आगे नमकीन या मिठाई की कुछ और प्लेटें सरका देती–’भइया, ये वाली नमकीन अच्छी है।’ तब मैं ढेर-सारी चीज़ें खाते-खाते अघाकर जोर से बोल उठता–’बहुत खा लिया। अब नहीं।’ वह मेरी प्रतिक्रिया से तनिक उदास होती कि भइया ने कुछ ख़ास खाया नहीं; पर, शीघ्र ही कुछ ऐसे मुस्कराने लगती जैसेकि कुछ हुआ ही न हो। मेरा मन कचोट उठता–आख़िर, इतने समय बाद भाई-बहनों से मिलना हुआ है तो उनसे स्नेह-भाव से ही बोलना चाहिए और ख़ास तौर से मृदुला से जो अभी-अभी रुग्णावस्था से उबरी है।

दोपहर को खान-पान की औपचारिकताओं से निपटने के बाद, जब मैं घर में घूम-घूमकर हरेक चीज़ का निरीक्षण करता तो उसकी निग़ाह मेरे पीछे चिपकी रहती। वह सोचती, कहीं कोई ऐसी बात या चीज़ तो नहीं छूटी रह गई जिससे कि मनोज भइया को कोई शिकायत हो। फिर मैं यक-ब-यक शयन-कक्ष में उसकी और ज्योति की पेंटिंग के सामने मुख़ातिब हो जाता। वह समयाभाव के कारण किसी चित्र के पूर्ण न हो पाने पर ख़ेद प्रकट करती; तब वह स्वयं द्वारा गमलों पर की गई पेंटिंग दिखाने ले जाती और मुझे यह कहते हुए आश्वस्त करती कि उक्त अधूरी रह गई पेंटिंग को मेरे अगली बार बनारस आने से पहले पूरा कर लेगी।

मैं शयन-कक्ष में आ जाता तो ज्योति भी आकर बात करने के मूड में बैठ जाती। मृदुला उसके पीछे-पीछे आती–एक कापी लिए हुए जिसमें दोनों बहनों द्वारा रचित भजनों के साथ-साथ वे भजन भी लिखे होते जिन्हें हम कभी जन्माष्टमी के अवसर पर बाकायदा ढोल-मजीरे के साथ संगत करते हुए सामूहिक रूप से गाया करते थे। जन्माष्टमी का धार्मिक पर्व हम-सभी मिल-जुलकर मनाया करते थे–पूरे जोश और उल्लास के साथ, कृष्णाष्टमी से छट्ठी-बरही तक, माँ की सक्रिय प्रतिभागिता के साथ। तब, घर में शायद ही किसी का ध्यान गया हो, मृदुला पूरे विनीत और श्रद्धा-भाव से, कोई अवांछित रार-तकरार किए बिना, ऐसे आयोजनों को अंज़ाम तक पहुंचाने में तल्लीन रहा करती थी। यदि घर में दो जनों के बीच कोई तुनक-झुनक हो जाती तो उसका मुख-पुष्प मलिन हो जाता और वह तत्क्षण उनके बीच मान-मनौव्वल के लिए पहल करती। बहरहाल, जब ज्योति उसके हाथ से कापी लेकर उसमें लिखे भजनों के बारे में बात करना चाहती तो मृदुल बोल उठती, “रहने दो, ज्योति! अभी भइया थके-मांदे हैं। थोड़ा आराम कर लेने दो। शाम को बात करेंगे।” तब मैं दोनों की बातों और भजन-पुस्तिका में रुचि लेने लगता। निःसंदेह, यह उसकी अपार खुशी का सबब बनता।

ऐसा बहुत कम होता था जबकि मुझे ग़ाज़ियाबाद से बनारस जाकर ऐसी देवि-रूपिणी भगिनी के सान्निध्य में आने का सौभाग्य मिल पाता था। इसे मेरी परिस्थितिजन्य विवशता ही कहिए या मेरा दुर्भाग्य जिससे मैं भगीरथी प्रयासों के बावज़ूद मुक्त नहीं हो सका। वह मेरे सहोदरों में पाँचवें स्थान पर थी; माँ वर्ष 1993 में हमें आश्चर्य के असीम सागर में शेष जीवन तक गोते लगाने के लिए, ईश्वरीय आमंत्रण पर असमय ही गोलोक में जा बसी थीं और उसके कुछ सालों बाद ज्येष्ठ भगिनी–नलिनी ससुराल चली गई थी; पर, उम्र में अत्यंत छोटी मृदुला में स्पष्टतया माँ का विराट व्यक्तित्व अंतरित होता गया था। उदासीन पितृत्व की छत्रछाया में अपने सहोदरों के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह करने के लिए वह स्वतः प्रेरित होती गई–इस संकल्प के साथ कि माँ द्वारा रोपित इस अल्प-विकसित परिवार-पौध को पोषित करते हुए इसे एक विशाल झकड़दार-फलदार-छायादार वृक्ष में रूपायित करने के लिए सिंचित करते रहना है। जब मैं पूर्वापेक्षी दृष्टि अपने अतीत पर डालता हूँ तो पूरे परिवार का जीवन भूगर्भजल से पोषित उस स्वच्छ जलाशय की भाँति प्रतीत होता है जिसकी सतह पर झीनी-झीनी-सी जमी हुई काई को वह सतत हटाने की कोशिश में लगी रहती थी। बीते वर्षों में रुग्णावस्था में भी उसने इस जीवन-जल की सतह पर तैर रही काई और तल पर बैठे अवसाद को कभी स्थायी रूप से अड़ने नहीं दिया।

विषम परिस्थितियों में उसने अपने आत्म-विश्वास और आत्मबल के जरिए अपने मनोबल को सशक्त बनाए रखा। जब नलिनी अपनी ससुराल से अल्पकालिक प्रवास के दौरान बनारस में होती थी तो तीनों बहनों के समूह में उसके चेहरे पर हिल्लोर मारती खुशी का छलकना सबसे अधिक होता था। इस खुशी के इज़हार का सीधा-सादा उद्देश्य घर को नकारात्मक ऊर्जा से निज़ात दिलाकर खुशी की बयार बहाना होता था। इसके विपरीत, उसने अपने अंतर्मन की पीड़ा को कभी अपने चेहरे पर छलकने नहीं दिया। माँ के अल्पायु में निधन पर वह सबसे कम बिलखी थी; पर उसका मन आँसुओं के बाढ़ से घुटता जा रहा था। उसने अपनी शोकातुर ज्येष्ठ और कनिष्ठ भगिनियों को अपनी सहानुभूति की बैसाखी का स्थायी संबल दिया था और जब नलिनी ससुराल के लिए विदा हुई तो वह अपनी कनिष्ठ भगिनी की मार्गदर्शिका बन बैठी और उसे उसकी रिसर्च संबंधी गतिविधियों में जितना सहयोग दिया, उतना तो उसके रिसर्च गाइड ने भी नहीं दिया होगा।

हाँ, वर्ष 2011 के निर्मम शीतकाल में उसके जीवन के सबसे काले दौर की शुरुआत हुई। दरअसल, वह भावुक, सहृदय और सदाचारी बाला थी जो किन्हीं मानसिक दुश्चिंताओं के कारण भीतर ही भीतर घुलती जा रही थी। संभवतः वह मोम की गुड़िया स्वयं को माँ की अनुपस्थिति में लिए गए संकल्प को पूरा न कर पाने की आंतरिक दाहक पीड़ा से पिघलती हुई कृशगात हुई जा रही थी। पर, हम भाइयों ने उसे किसी अज्ञात दानवी रोग में जकड़ा हुआ मानकर, बनारस से लेकर दिल्ली तक चिकित्सकों और चिकित्सालयों की कृपा पर छोड़ दिया। यहाँ-वहाँ डॉक्टरों के निर्दयी हाथों वह औषधि के दुष्प्रयोग की शिकार हुई तथा अंग्रेज़ी औषधि के साइड-इफेक्ट ने उसे मरणासन्न-सा कर दिया। ऐसे डॉक्टरों को क्या विशेषण दूँ–निकम्मा, अहंकारी, लोलुप, स्वार्थी या कुछ और–जिन्होंने उसे इतनी सख़्त दवा ऐसी बीमारी के लिए दी, जो बीमारी उसे थी ही नहीं? बहरहाल, उसके मनोबल ने हमें चकित कर दिया। वह औषधि-दुष्प्रयोग के अभिशाप से लगभग उबरने-सी लगी थी। हाँ, निःसंदेह उबर भी गई थी। पर, दुःखद है कि काल की काली छाया से वह कभी मुक्त नहीं हो पाई; कोई तीन सालों तक वह इसकी पकड़ से अपना दामन छुड़ाती रही और बार-बार पल्ले झाड़ती रही; पर, अंततः विफल ही रही। अचानक झपट्टा मारकर पीलिया नामक सर्पणी के रूप में कालदंश ने उसकी सांसें बड़ी क्रूरता से 3 दिसंबर, 2014 को छीन लीं। हमारे सिर से ममता का साया फिर से उठ गया और हम दोबारा अनाथ हो गए।

***

 

 

- डॉमनोज मोक्षेंद्र

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र  {वर्ष २०१४ (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके   पूर्व ‘डॉ. मनोज श्रीवास्तव’ के नाम से लिखता रहा हूँ।}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल–जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ’ नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह–प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह–ऑनलाइन गाथा, 2014); 9–मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

संपादनमहेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति

–अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

–Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

–इन्टरनेट पर ‘कविता कोश’ में कविताओं और ‘गद्य कोश’ में कहानियों का प्रकाशन

–महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट ‘हिंदी समय’ में रचनाओं का संकलन

सम्मान: ‘भगवतप्रसाद कथा सम्मान–2002′ (प्रथम स्थान); ‘रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान–2012′; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार ‘बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक’ घोषित; ‘गगन स्वर’ संस्था द्वारा ‘ऋतुराज सम्मान-2014′ राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक  द्वारा ‘साहित्य-भूषण सम्मान’; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)

“नूतन प्रतिबिंब”, राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका वी-विटनेस” (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

‘मृगमरीचिका’ नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, शब्दव्यंजना, अनहदकृति, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से  प्रकाशित

आवासीय पता: विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत.

सम्प्रति: भारतीय संसद में प्रथम श्रेणी के अधिकारी के पद पर कार्यरत

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