स्त्री मुक्ति का यूटोपिया

 

सब कुछ अद्भुत अलौकिक असाधारण था उसके घर में। सर्वप्रथम तो जान लीजिए कि उसके घर की पारिवारिक व्यवस्था ऐसी बनी थी जिसकी ना पितृसत्तामकता थी ना मातृसत्तात्मकता। वहाँ व्यक्तिवादी सत्ता का सामराज्य था। एक सुन्दर सा फ्लेट जिसके ड्रार्इंग रूप में स्लेटी मेटेलिक कलर वाले साटन प्लस सुपर फाईन नेट के कांन्ट्रास परदों ने मुझे पहली ही नजर में आकर्षित कर लिया था। एक पल को मेरी नजरों में खुद के ड्रार्इंगरूम में लगे हेण्डलूम के खादीवाले परदे फैल गए। फैले इसलिए कि वे सरसराते तो थे ही नहीं अपनी रफ खद्दर भारी भरकम सर-फेस की वजह से। उसके घर में परदे सरसराते हुए अपने परदा होने का और परदा लहराने का अहसास कराते हुए मुझे मेरी पसंद पर ही शर्मिन्दा कर रहे थे। एक शानदार सोफा सेट और कार्नर पर फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता। साफ सुथरा करीने से सजा ड्रार्इंगरूम अपने साजो सामान के साथ अपनी भव्यता और ऐशवर्य का प्रमाण दे रहा था। वहाँ बैठते हुए मुझे अपना सलवार सूट मैला कुचैला लगा। भारतीय रेलवे के तृतीय श्रेणी के वातानुकूलित कम्र्पोडमेंट से उतरने के बाद भी मैं उतनी ही अस्तव्यस्त थी जितनी जनरल कोच में होती तो लगती। वह मुझे लेने नहीं आ पायी थी पर उसने अपनी गाड़ी कम्पनी के ड्रायवर के साथ भेजी थी। साथ में एक छोटा सा फूलों का गुलदस्ता भी। ड्रायवर ने गाड़ी का गेट खोलने से पहले उसकी तरफ से मेरा स्वागत किया था। मैं खुश थी”वाह उसे याद है मुझे गुलाब लाल नहीं पीले रंग के पसंद है”। ड्राईवर ने पलट कर देखा। उसकी आँखों में मेरे लिए थोड़ा विस्मय झलक रहा था।

“सारी मेम मैं थोड़ा लेट हो गया, दरअसल मैं आपको लेने एयरपोर्ट वाले रूट पर निकल गया था।” पर मैने तो शीरीन को अपना टिकिट मेल किया था”।”हाँ पर मैम को याद नहीं था बाद में फोन आया कि मैं एयरपोर्ट नहीं निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाऊँ।”

“ओह्।”मैं इसी घटना से एक हीन भावना का शिकार होना शुरू हो गयी थी- बची कसर उसके परदे की चिकनाई और सोफे ने कर दी। घर में एक फ्रिज पर एक चिट्ठी मेरे नाम पर चिपकी थी।

हाय स्वीटी, वेलकम टू माय हाऊस, एण्ड सॉरी कि आते ही नहीं मिल सकी, पर शाम को जरूर मिलती हूँ। गाड़ी और ड्रायवर तेरे लिए है तू दरियागंज का पब्लिशर वाला काम निपटा लेना। फ्रिज में फ्रोजन पराठे हैं नहीं तो दूध कार्नफ्लेक्स या ब्रोड आमलेट का नाश्ता कर लेना। फ्रिज के बॉयी तरफ एक लिस्ट है नम्बरों की अगर मेकडोनाल्ड का नम्बर चाहिए तो ऊपर वाला है और सब-वे का तो नीचे वाला है। एज यू लाईक। शाम को मिलते है। हॉ तेरे लिए बेडरूम तैयार है तीन नम्बर लिखा कमरा चाबी पेपरवेट के पास रखी है। मैं पत्र के साथ साथ व्यवस्थाएँ चैक कर रही थी। फ्रिज के बांयी तरफ, हाँ नम्बर है। पेपरवेट के पास हाँ चाबी भी है। मेन गेट की चाबी दरवाजे में खोलते वक्त लटकी रह गई थी और दरवाजा बाहर से लॉक हो गया था अब क्या करूँ? मुर्खता का पहला नमूना मैने यहीं दे दिया था। वो तो ड्रायवर का फोन मेरे मोबाइल में आया था तो उसी की मदद ली। तैयार हुई फ्रोजन पराठा खाना तो दूर पहली बार देखा था। वाह क्या व्यवस्था है, पराठा माइक्रोवेव में गरम करके खाया, चाय बना कर पी और तैयार होकर दरियागंज चली गयी तीन घंटे में मेरा काम खत्म हो गया था। मैं उसके दफ्तर पहुँच गई वो एकदम स्मार्ट, विदाऊट स्ट्रीपवाली कोई ड्रेस पहने थी उसकी टाँगे खुली थी शायद वह ड्रेस स्कर्ट होगी। उसने मुझे हलो हाय करके कहा कि मैं घर चलती हूँ एक ब्लेजर जैसा कोई कोट उसने ऊपर से डाला नीचे उतर आयी। हम साथ साथ गाड़ी तक पहुंचे उसने ड्रायवर को सौ का एक नोट पकड़या ओर चाबी ले ली। अब हम दोनों थे तीसरा कोई नहीं था। गाड़ी में बैठते ही उसने कहा”तू मेरे आफिस क्यूँ आ गयी कुछ अरजेंट काम था क्या?”

“नहीं सोचा तुझे सरप्राइज दूँ?”

वो हँसी, मुझे लगा वो मेरी बेवकूफी पर हँसी थी।

गाड़ी में यहाँ-वहाँ की बातें होती रही। घर पहुँचे तो उसने एक कार्ड डाला ताला खुल गया था

“तुने, खोला कैसे चाबी तो मेरे पास है?”

“कार्ड स्वेप करके।” उसने कार्ड दिखाया। “हमारे पास मेन गेट की तीन चाबियाँ हैं। एक मेरी, एक शैल की और एक गेस्ट के लिए।”

“अच्छा।”

“यहाँ सब व्यस्त है इतना समय नहीं होता कि चाबियों के लिए रूके रहे। फिर सब की अपनी अपनी पर्सनल लाइफ है अब मैट्रोस में तो यह सब व्यवस्थाएं रखनी ही होती है। यहाँ कोई किसी का दबाव बर्दाश्त नहीं कर पाता। इसलिए”घर” शेयर किया जाता है, तुम्हें जल्दी है तुम कर लो, तुम्हे देर है अपना खा कर आओ। अब थाली परोसने जैसी स्थितियाँ नहीं रही ना।”

“हाँ वो तो है, ” मुझे लगा मैं बहुत पिछड़ गयी हूँ अपने कॉलेज जाने से पहले तक भाग भाग कर पूरे घर की व्यवस्थाएँ संभालने वाला दृश्य आँखों में तैर गया। मैला कुचैला सूट पहने पहले बबलू का नाश्ता, फिर बाबूजी की दलिया, विनोद का फ्रूट जूस और लंच बाक्स सब के बाद अपना लंच बाक्स। सब करते करते थक जाती हूँ। बस यहाँ से जाकर मैं भी फ्रिज को अपटेड करूँगी ब्रोकफास्ट ओर लंच की सुविधाए फ्रिज के उपयोग से सुधर सकती है। माइक्रोवेव लेना है सब अपना-अपना खाना गरम कर लें मेरा समय बच सकता है। एक लिस्ट फोन की फ्रिज पर ही लगा दूंगी। सभी की चाबियाँ भी अलग अलग करना पडेगी। कभी चाबी विनोद को देते हुए जाना पड़ता। कभी पड़ोस में। मेरी पूरी एनर्जी उसके घर की तमाम सुविधाओं वाली तथाकथित सुव्यवस्थाओं को अपने घर में लागू करने पर खर्च हो रही थी। सात दिन का स्टे था मेरा। विज्ञान भवन में एक कान्फ्रेस थी जहाँ मुझे भी अपना रिसर्च पेपर पढ़ना था। अभी तो पहला ही दिन था थक गयी थी जल्दी ही सो गयी। अगले दिन सबेरे उठी, जल्दी उठने की आदत थी तीनों की चाय बना ली अखबार के साथ चाय पी। तब तक शैरिन तैयार होकर बाहर आ गयी थी, वह निकलने के मुड में थी। कोई विदेशी आ रहे है, जल्दी जाना था। मैं भी तैयार होने चली गयी मेरा लंच विज्ञान भवन में ही था। शाम को आयी तो कमरे में राजधानी का पैक डिनर रखा था। शैरीन का फोन आया ” सॉरी थोड़ा बिजी हूँ विदेशी मेहमान साथ है देर हो जायगी तू खाना खा कर आराम कर”। राजधानी का यह स्पेशल पैक है। शैल को भी बेहद पसंद है। दो दिन में दूसरी बार पति का नाम उसके मूँह से सुना था। उसी जगह में होती तो……..ऽऽऽ? मैं तो हर बात में कहती विनोद को तो ये चाहिए, वो चाहिए। विनोद तो बिल्कुल बाहर का पंसद नहीं करते उन्हें तो बस मेरे हाथ के —-पराठे, खीर, आलू गोभी………लम्बी श्रृंखला याद आने लगी मैं मन ही मन हँसने लगी। विनोद बाबू यहाँ भी साथ हो यहाँ तो पीछा छोड़ो यार …..ऽऽऽ।

हाँ वो मेरे घर आती तो मैं तो विनोद के साथ लेने जाती, “तुम छुट्टी ले लो मेरी दोस्त पहली बार आ रही है”।

राजधानी का पैक डिनर शानदार था। खा कर मैं उसके गेस्टरूम में अपना प्रेजेंटेशन तैयार कर रही थी। देर रात…………दरवाजे की आवाज आयी आहट से अन्दाज हुआ दो लोग है। फिर आहट से ही समझ आया कि एक आवाज शैरिन की है दूसरी किसी विदेशी पुरूष की। शायद शैरिन ने फ्रिज से आइस और ……….वोदका या कोई ड्रिंक निकाली थी, चियर्स की आवाज से पता चला वे लोग ड्रार्इंग रूम में ड्रिंक लेते रहे थे। मैं असंमजस में थी बाहर जाऊं —-ऽऽऽ—-ना जाऊं? फिर लगा अगर उसे मिलना होगा या मिलवाना होगा तो बुलायगी बाहर। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ कुछ देर बाद मेरे रूम के सामने से दोनों निकले, कदमों की आहट से पता चल रहा था फिर दरवाजा लॉक हुआ। मैं सकते में आ गई “ओह गॉड, दिस गर्ल …………..।” कुछ देर तक उनके कमरे से कुछ अनकही आहटें, आवाजे आती रही फिर सब शान्त हो गया। मैं रात भर सो नहीं पायी…………सुबह सुबह झपकी लगी, नौ बजे आँख खुली, बाहर निकली तो कैयर टेकर घर ठीक कर रही थी बोली “मेम हेज गॉन एंड दिस लेटर इस फार यू”।

साँरी डियर, आज शाम को पक्का साथ बैठेंगे। आज तुम्हारा प्रेजेंटेशन है …. मैं चलती पर एक बडी डील आज हो जायगी ऐसा लग रहा है। इसलिए …………खैर गुड लक।

मैं तैयार हो रही थी जब बाहर निकली तो शैलेन्द्र यानी शैल अपनी किसी गर्ल फ्रेन्ड के साथ लिफ्ट में मिला वो घर आ रहा था……”हाय सुमी…….तुम कब आयी?”

“आज चार दिन हो गए।”

“चलो शाम को मिलते है। बाय”।

“बाय”

प्रेजेंटेशन अच्छा रहा एकदम अच्छा शाम को शैरिन का फोन था…….”कैसा रहा”?

“फन्टास्टीक……यार तू आती तो मेरा कान्फिडेंस कुछ और बढ़ जाता।”

“चल मैं तुझे पिकअप करने आ रही हूँ दस मिनिट लगेंगे गेट पर मिलना।”

“ओ.के.”

फोन बंद किया तो विनोद के पाँच काल मिस हो गए थे – खुशी हुई तो जनाब उतावले हैं यह जानने के लिए कि मेरा प्रेजेंटेशन कैसा रहा। फोन उठाते ही झल्ला उठे “कब से लगा रहा हूँ फोन।”

सारा कुछ जानने के बाद फोन बन्द किया तो एक फोन घर से, था लैंड लाइन नम्बर बाबूजी जानना चाहते थे कैसा रहा?

फोन बन्द किया तो शैरिन सामने थी “कौन है…… ऽऽ..?”

“विनोद है यार और बाबूजी……”

“ये ….ऽऽ ये बाबूजी …… कहीं…….?” उसकी आवाज में कालेज वाली शरारत भरी थी। उसने चिकोटी काटी “तू पागल है शैरिन …. बाबूजी मेरे फादर इन लॉ …. ऽऽऽ हैं।

“व्हाट ?”

“हाँ” मेरे ससुरजी? वो आश्चर्य चकित थी वो भी तेरे से बात कर रहे हैं।

“हाँ उन्होंने मेरी हेल्प की थी प्रेजेंटेशन में … वो बॉटनी के हेड आफ द डिपार्टमेंट थे युनिवर्सिटी में।”

“तेरे ससुर भी साथ ही रहते थे ना?”

”हाँ! अब हमने उन्हें ओल्ड एज होम “आस्था’ में रख दिया है कभी-कभी चले जाते हैं मिलने।”

“क्या….. तूने उन्हें वृद्धाश्रम? आई एम शोक्केड़”।

“खर्चा तो भेजते ही हैं ना हम!” उसने सफाई दी।

“और तेरा बेटा वो भी नहीं दिखा मुझे इन दिनों?”

“हाँ, वो गुड़गाँव में है एक बोर्डिंग में।”

“क्यों? ऐसा भी क्या घर जहाँ पति पत्नी केवल एक पता यानी एड्रेस यानी मकान नम्बर भर शेयर कर रहे बाकि सब अलग हैं। जहाँ बच्चा बोर्डिंग में और पिता बृद्धावस्था में।

यह तेरा इंदौर नहीं है….. यहाँ घर मेनेज करना बड़ा टफ जॉब है… केयर टेकर खाली घर तो देख लेती है। बूढ़ों और बच्चों वाले घर में मिलती ही नहीं है। शैल और मैं एक मार्डन सोसायटी के पार्ट हैं। गृहस्थी के साथ जॉब टू मच यार। नहीं हो सकता सब। ट्वन्टी फर्स्ट सेंन्चूरी है जहाँ ग्लोबलाइजेशन का दौर है। घूंघट स्त्री के सर पर से चला गया है – बल्कि सूट से दुपट्टा भी हट गया है। बराबरी से कमाते हैं बल्कि ज्यादा ही कमाते हैं तब फिर क्या जरूरी है वंचितों, शोषितों, दुखियाओं की तरह बने रहे। किचन और पालने की भावनात्मक दुनिया में ही बंधे रहे। नौकरानी नहीं है, और हम देह भी नहीं हैं केवल देह, हम स्वतंत्र हैं हमारी भी इच्छाएँ है हमारी देह की भी जरूरतें हैं। जब जहां जो जरूरत लगे उसके साधन होना चाहिए हमारे पास भी।

मैं अपने दायरे में ही थी, हालांकि मेरे पास शब्द बहुत मजबूत थे उसे नकारने के उसे बेइज्जत करने को पर मैंने मानवीय प्रेमपूर्ण रिश्तों से पायी ऊर्जा उस पर खर्च करना उचित नहीं समझा।

“मैंने प्रश्न ही दागा था उस पर शैरीन कल तेरे बेडरूम में?”

“हाँ….. यह तो सामान्य बात है, नया क्या था इसमें?”

“शैल को पता है?” मैंने गंभीर होते हुए पूछा।

“होगा? मैं परवा नहीं करती”। हमारे बेडरूम अलग अलग है – जब मन होता है साथ होते वरना दोनों की निजता बनी रहती है। शरीर की माँग पेट जैसी ही होती है, पेट को खाना चाहिए ना?

“पर निष्ठा, पवित्रता और विश्वास की त्रिवेणी का क्या होगा शैरिन?”

“वॉट इज त्रिवेणी?”

“क्या ये अपराध या भटकाव नहीं?”

उसका तर्क था इम्मोरल ट्रैफिकिंग पर बुल्फेनडेन की रिपोर्ट कहती है कि “कोई भी व्यस्क रजामंदी से निजी तथा अंतरंग रूप से जो कुछ भी करते हैं वह अपराध या पाप-पूण्य का मामला नहीं होता, बल्कि उनका निजी मामला है।”

“चल छोड़? शाम खराब करेगी क्या? क्या नया खिला रही है आज।” मैने प्रशन किया बात बदलने के लिए।

“आज खिला नहीं पिला रही हूँ तुझे।”

“क्या?”

“वोदका पिएगी?”

समझ नहीं पा रही हूँ? मैं ये किससे मुखातिब थी? स्त्री मुक्ति के यथार्थ से या स्त्री मुक्ति के यूटोपिया से?

- डा. स्वाति तिवारी

 

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क -  चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

 

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