स्तब्ध

मेरे दरवाजे खटखटाने से पहले ही  पीले चेहरे और अस्त – व्यस्त से कपड़ों में फीकी हँसी के साथ दरवाजा खोल उन्होंने सहज भाव से पूछा– ” आ गयीं आप ।”
” पर आपको कैसे पता चला मैं अभी आऊंगी ? “– चौंक कर पूछा मैंने ।
” चिंता लगी रहती है ना बच्चों की ।  कोई ढंग की टीचर मिल जाए तो बच्चों की अच्छी पढ़ाई – लिखाई  हो जाए  ।बच्चे अच्छे संस्कार सिख लें बस ।
फिर मैं भी इत्मीनान से चली जाऊँगी ।” गहरी चिंता में डूब कर उन्होंने कहा ।
” हाँ , मैंने भी सुना है बच्चों की माँ कई दिनों से गायब है अब कोर्ट ने भी उन्हें मृत मान लिया है ।” एक ठंढी आह भर कर कहा मैंने ।
हम्म ..कह कर उन्होंने अपने होठों को भींच लिया ।चन्द ही पलों में जाने कितने भाव उनके चेहरे पर आये और चले गए ।
“गायब हो गयी या ससुराल वालों ने गायब कर दी ?”– लगा जैसे किसी गहरे कुंए से आवाज आ रही हो ।
मैंने चौंक कर पूछा ” क्या कहा आपने ?… क्या आप सब कुछ जानती हैं  ?  ”
सामने दिवार की ओर देखते हुए उन्होंने कहा –” हाँ , सब कुछ जानती हूँ ।”
मेरी नजर दिवार की ओर गयी और जैसे मेरा  सर्वांग हिल सा गया हो । वही पीले चेहरे बाली स्त्री सजी – धजी खूबसूरत सी साड़ी में दीवार में लगे फ्रेम में चंदन की माला पहने मुस्कुरा रही थी ।
डर और घबराहट से मेरी नींद खुल गयी  ।
आज मुझे उसी पते पर बिना माँ के बच्चों को पढ़ाने जाना था ।
- सत्या शर्मा ” कीर्ति “

शिक्षा — एम . ए , एल एल .बी
विधा — छंदमुक्त , लघुकथा ,कहानी , लेख ।
सम्प्रति — स्वतंत्र लेखन
राँची ,झारखण्ड

3 thoughts on “स्तब्ध

  1. बहुत ही खूबसूरत और रहस्यों का उद्घाटन करती हुई

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