सीमायें

सीमायें-

प्रगाढ़ होती निरंतर किसी वृद्धा के चेहरे की झुर्रियों सी

असीम बलवती- वर्गों की, कागजों, देशों की

 

सीमायें वर्गों की –

तय करती अंधे-बहरे-गूंगे मापदंड,

अद्भुत किन्तु सत्य श्वेत-श्याम-रंग-बेरंग

 

मेहनत, विफलता और संघर्ष फिर भी,

इधर भूख और प्यास भी अपराध सा है

 

आराम, सफलता और विजय के दावे ही

उधर दावतों का नित संवाद सा है

 

सीमायें कागजों की –

तय करती पारंगतता सच्चे-झूठे प्रमाणों से

संचालक अनकही-अनसुनी-अनदेखी पीड़ा के

 

इधर गली कूंचे का मेकेनिक छोकरा

असफल ही कहलाता है मैला-कुचैला,

 

उधर अनाड़ी टाई पहने सफल ही कहलाता

कागज धारी तथाकथित इन्जिनीयर छैला

 

सीमायें देशों की-

संघर्ष, युद्ध, शांति, संधियाँ, वार्ताएं

संकुचन-प्रसारण, सफलताएँ-विफलताएं

 

इन्सान तो क्या-पौधों, पशु-पक्षियों पर

लगवाती लेबल, बंध्वती ट्रांसमीटर

 

इन्सान है परन्तु हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी तय करती

नदी निरुत्तर, किन्कार्त्ताव्यव्विमूढ, इधर या उधर का पानी तय करती

 

सीमायें-

 

प्रगाढ़ होती निरंतर किसी वृद्धा के चेहरे की झुर्रियों सी

असीम बलवती- वर्गों की, कागजों, देशों की

 

- डॉ. कविता भट्ट

शैक्षिक योग्यता- स्नातकोत्तर (दर्शनशास्त्र, योग, अंग्रेजी, समाजकार्य), 

पुरस्कार- नेट, जे०आर० एफ०, जी०आर०एफ०, पी०डी०एफ०,

अध्यापन-अनुसन्धान अनुभव- क्रमश: छ:/चार वर्ष,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड

प्रकाशित- तीन पुस्तकें, दो काव्य संग्रह, अनेक रास्ट्रीय-अंतरास्ट्रीय शोध पत्रिकाओ/पत्रिकाओ में लगभग चालीस शोध पत्र/लोकप्रिय लेख, अनेक रास्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओ में अनेक कविताएँ 

शैक्षणिक/साहित्यिक/सामाजिक गतिविधियाँ- विभिन्न संगोष्ठियों, कवि सम्मेलनों में शोध-पत्रों और कविताओ का प्रस्तुतीकरण, योग शिविर आयोजन, आकाशवाणी से समकालीन विषयों पर वार्ताओं का प्रसारण, सदस्या- हिमालय लोक नीति मसौदा समिति

5 thoughts on “सीमायें

  1. अति सूंदर कविता जी की कविता हार्दिक बधाई

  2. अद्भुत…..
    सीमाओं में वैचारिक संभावनाओं का अपरिमित विस्तार…..
    साधुवाद…!

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