सीपियाँ हड़ताल पर: सजल संग्रह एक नई द्रष्टि

         हिंदी साहित्य में गद्य और पद्य की अनेक विधाओं से साहित्य संसार समृद्ध हुआ है| पद्य में गीत, कविता, गजल, महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्तक, हाइकु आदि| काव्य जगत में एक नई विधा का प्रादुर्भाव हुआ है जिसका नाम है ‘सजल’| मथुरा में हिंदी सजल सर्जना समिति के तत्वावधान में ‘प्रथम हिंदी सजल महोत्सव’  का भव्य आयोजन किया गया| देश भर के हिंदी के प्रोफ़ेसरों, कवियों, और अनेक साहित्य प्रेमियों ने हिस्सा लिया|

                   उर्दू के समकक्ष हिंदी काव्य की इस नई काव्य धारा “सजल” को अपने व्याकरण और मानकों के साथ हिंदी के सभी उपस्थित विद्द्वानों ने हिंदी साहित्य में नई विधा को मान्यता दी| सजल के प्रणेता डा. अनिल कुमार गहलौत ‘सजल सप्तक -१’ का लोकार्पण हुआ| सात सजलकारों के द्वारा  ग्यारह- ग्यारह सजल प्रकाशित हुई| हिंदी में गजल जैसी कविताओं की रचानाएं होती रही है लेकिन उसका हाल ठीक नहीं है| इन विसंगतियों के कारण ही गजल के समकक्ष हिंदी में सजल विधा आई है, जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है| “हिंदी काव्य में सजल विधा के पदार्पण की घोषणा हम लोगों ने ५/९/२०१६ को की थी | उसके एक वर्ष के अंदर, एक सजल सप्तक -१ (सात सजलकार) और तीन एकल सजल संग्रह प्रकाशित हो गए, जिनका लोकार्पण मथुरा में ५/९/२०१७ को प्रथम सजल महोत्सव २०१७ में मुख्य अतिथि श्री गोपाल दास नीरज ने किया| इसके छह महीने बाद २२/४/२०१८ को अर्धवार्षिक सजल महोत्सव -२०१८ मथुरा में हुआ| इस अवधि में सजल सप्तक-२ (सात महिला सजलकार) और सजल सप्तक -३ (सात पुरुष सजलकार) भी प्रकाशित हुए जिनका लोकार्पण अर्धवार्षिक सजल महोत्सव २०१८ में हुआ”(१)

               हिंदी गजल को उर्दू के उस्ताद लोग बह्य, रुक्न और अरकान के स्तर पर खारिज कर देते हैं इसलिए हम लोगों ने हिंदी गजल का नया नामकरण ‘सजल’ के रूप में किया है| अनेक विद्वानों सजल शिल्प हेतु वैकल्पिक  संबोधन शब्दों की सूची का निर्धारण किया वहां दूसरी ओर सजल के शिल्प के स्वरूप को भी तय किया गया| उसके स्वरूप को सर्व सहमति से मान्यता मिली है|

जैसे कि- १.सजल में दो –दो पंक्तियों के कम कम ५ या फिर कितने ही विषम संख्या में पदिक होंगे|

२. प्रथम पदिक को ‘आदिक’

३.अंतिम पदिक को ‘अन्तिक’

४.प्रत्येक पदिक में अंत के हर बार (आवृति) आने वाले एक शब्द मात्रा स्वर या पदांत कहा जाएगा|

५.पदिक में इस पदान्त से पहले आने वाले तुकांत के शब्द को ‘समान्त’कहा जाएगा|

“सजल में शेर को पदिक,  मिसरा को पल्लव, मतला अर्थात पहले पदिक को आदिक, मक्ता अर्थात अंतिम पदिक को अन्तिक, काफिया को समान्त और रदीफ़ को पदान्त कहा गया है| मतला –सानी को समादिक कहते हैं| सजल में गजल की बह्यों को नहीं रखा गया है| सजल में शिल्प के केवल तीन ही मूलभूत मानक रखे गए हैं- इसमें आदिक के ही आधार पर पूरी सजल में मात्राभार (मीटर) तथा लय की एकरुपता को अनिवार्यता रखा गया है| तीसरी बात यह है कि हर पदिक अपने आप में स्वतंत्र हो और उसकी कहन मुक्तक की कहन जैसी हो, गीत जैसी वर्णनात्मकता तथा विवरणात्मकता न हो| भाषा सांकेतिक, प्रतीकात्मक हो,व्यंजना से बात कही जाय, सपाटबयानी न हो|”(२ )

             “सजल की भाषा के भी अपने मानक है| सजल हिंदी की विधा है अत: इसकी भाषा हिंदी ही मानी है और हिंदी भी वह जो आम आदमी की बोलचाल की हिंदी है| इसी बात का संज्ञान लेते हुए उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं के जो शब्द लोक –प्रचलित हैं, एक अनपढ़ हिंदी भाषी जिस रूप में बोलता –समझता है, वे तो हिंदी के हो गए हैं| अत: ऐसे शब्द उसी रूप में मान्य हैं, जिस रूप में हम –आप बोलते हैं| हम आपसी बातचीत में उर्दू के प्रचलित शब्दों में नुक्ता का उच्चारण नहीं करते है. इसलिए सजल की भाषा में नुक्ता का प्रयोग सख्ती से अमान्य हैं| हम एकवचन ‘वह’ को ‘वो’, ‘यह’ को ‘ये’ तथा ‘और’ को ‘औ’ बोलते हैं अत: इनका प्रयोग सजल मान्य है| हम दर्द बोलते हैं, दिल बोलते हैं, जान बोलते हैं किन्तु हम दर्दे –दिल, दिलों जान, जानो-तन नहीं बोलते| हम मकान, निशान, जहान बोलते हैं किन्तु हम मकां, निशां, जहाँ कभी नहीं बोलते अत: इनका प्रयोग अमान्य है| बहुवचन परक शब्द –सवालात, खयालात, हालात ऐसे उर्दू के लहजे वाले शब्द हिंदी के नहीं है अत: इनका प्रयोग सजल में मान्य है|”(३ ) सजल भाषा और शिल्प अपने मानकों के कारण एक स्वतंत्र विधा है| 

      ‘सीपियाँ हड़ताल पर’  शीर्षक से प्रकाशित सजल संग्रह की लेखिका कवियित्री रेखा लोढ़ा ‘स्मित’ ने हिंदी साहित्य में नवोदित साहित्यिक धारा में अपनी रचना प्रकाशित करके एक और मोती को जोड़ने का प्रयास किया है| हिंदी में पहला सजल संग्रह है | इस संग्रह में १०१ रचनाओं का समावेश हुआ है| रेखा लोढ़ा की अन्य प्रकाशित रचनाएं सीप (काव्य संग्रह),मुखर होता मौन (गजल संग्रह), नागफनी का देश (दोहा संग्रह) सीपियाँ हड़ताल पर ( सजल संग्रह) आदि| साझा संग्रह: काव्योदय, कस्तूरी कंचन, विहग, प्रीति के गीतिका है मनोरम सभी के लिए, सजल सप्तक-१, साहित्य की तलाश, सुगंध मंजरी, समकालीन गीत कोश आदि| इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन एवं आकाशवाणी उदयपुर से १९८६ कविताएँ प्रसारित हो चूकी है| गीत नवगीत, सजल,मुक्तक, लघुकथा और कहानी संग्रह भी प्रकाशित है| हिंदी साहित्य में रेखा जी का विशेष योगदान माना जाएगा महिलाओं में एक मात्र सजलाकार के रूप में उनका उल्लेखनीय रहेगा| रेखा लोढ़ा जी सजल विधा के आदि प्रस्तोताओं में से एक है| अपनी रचनाओं में नवीनता, प्रासंगिकता, सन्देश तथा प्रतीकों के माध्यम से रेखा जी ने अपनी रचनाओं में नई संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया है|

समाज की चिंता व्यक्त करती हुई पंक्तियाँ निम्नलिखित है-

“सम्बन्ध को यूँ मत तू भुनाने की बात कर,

जो कर सके तो रिश्ते निभाने की बात कर|

आज तक सच से रहा सम्बन्ध भी जिनका नहीं,

वे ही हमको ज्ञान गीता का सुनाने आ गए |”( पृष्ठ-१५)

शहरीकरण तथा आधुनिक युग में आज जिस माहौल में हम सब रहते हैं, चारों ओर मकान बढ़ रहे हैं लेकिन एक परिवार जिस घर में रहते थे| वह घर कहीं खो गया है, घर की परिकल्पना भूल गए हैं| संवेदनाओं को कहीं खो दिया है| जो एक मकान को घर का स्वरूप देती थी| घर के लिए चिंता व्यक्त करती रचना देखिए-

                                            “दीवारों की हद में कैद है तमाम लोग

दीखते मकान हैं,दिखाई घर नहीं देता|”( पृष्ठ -७८)

राह में कांटे मिले या फिर बिछे हो फूल भी

बस हमें तो आपके घर की गली अच्छी लगी (पृष्ठ -४३)

जिन्दगी से जुड़ी रचनाओं को भी देख सकते हैं-

“अनकही सी रही ये मेरी जिन्दगी

इसलिए बन गई डायरी जिन्दगी

पृष्ठ बनकर न हम जी सके आज तक

हाशियों में सदा ही रही जिन्दगी

कैद में कब तलक ये गुजरती भला

पिंजड़ा तोड़ कर अब उड़ी जिन्दगी |”(पृष्ठ -६३)

दले हैं मुंग छाती पर किसी ने

दिखे हैं घाव उस की जिन्दगी के (पृष्ठ -५४)

राष्ट्र के प्रति चिंता –

अब चमन से दूर सारे खार होने चाहिए

अब सलीबों पर टंगे गद्दार होने चाहिए|

लिखली अपनी गैरों की बातें कितनी

अब तो भारत माँ की करूण पुकार लिखो|(पृष्ठ-१५)

देश की दुर्दम दशा पर लोग सारे मौन है

सरहदों पर लड़ रहे माँ के दुलारे मौन है |(पृष्ठ-४६)

मानवीय भावना –

“एक उजड़ा घर बसा कर देखिए

रो रहा बच्चा हंसाकर देखिए|”

“पीर पराई देखकर सजल न होते नैन

पशु सम होता वह मनुज धरे न सबका ध्यान|”(पृष्ठ-१६)

नारी चिंता –

“बेटीयों को भी पढ़ाया किजिए

लाड उनके भी लड़ाया कीजिए|”( पृष्ठ -५५)

रेखा जी ने अपनी रचनाओं में विविधता का भण्डार अभिव्यक्त किया है| कुछ प्रतीकों और सांकेतिक शैली की योजना ओं को हम देख सकते हैं|

सांकेतिक शैली –

 “खिल उठें फुलवारियां उपवन में तब चारों तरफ

दीमकों की जद से जब ये क्यारियाँ बच जाएंगी|”( पृष्ठ-१४)

पर्यावरण की चिंता –                       “लील जाती पेड़ लिप्साएं तुम्हारी

आज गोरैया कहाँ करती बसेरा

पेड़ न सायेदार बचे न पानी का ठिकाना

अब तो मुश्किल में ये सफ़र दिखाई देता है|”( पृष्ठ-१४)

नए प्रतीक-

 “धूप अब इस तरह ढा रही है कहर

दिख रही है यहाँ खौलती जिन्दगी|

कैद होकर रह गया मन का कबूतर

हम इसे नभ में उडाना चाहते हैं |”( पृष्ठ-१४ )

संदेश प्रदता-                      

                                               “छोड़ो रोना तुम अँधियारी रातों का

                                               आज उजालों पर अपना अधिकार लिखो|”( पृष्ठ-१४)

              रेखा जी ने “सीपियाँ हड़ताल पर” सजल संग्रह के  पदिक में गंभीर कथ्य और सजल की भाषा, सचेत लेखनी, सिद्ध हस्त, कवि-कर्म सजल की हर पंक्तियों में परिलक्षित होता है| समाज के आसपास और समाज में व्याप्त विसंगतियों, विडम्बनाओं, भूख, शोक, दर्द और आंसुओं को या जिन्दगी के उतार चढ़ाव निर्माण पतन, अपनापन, दोस्ती, प्रेम, नफ़रत आदि के भाव से उत्पन्न काव्य सहज रूप से बन गए है| महिलाओं में सशक्त और उभरता नाम माना जा सकता है| हिंदी साहित्य जगत में रेखा जी का यह ‘सीपियाँ हड़ताल पर” सजल संग्रह का ऐसा उपवन है जो आने वाले नजदीक के भविष्य में अन्य साहित्यकारों के प्रेरणा के स्वरूप रहेगा| रेखा जी ने समाज का बारीकी से निरीक्षण करते हुए अपनी रचनाओं में संवेदनाओं को व्यक्त किया है| सजल कार के रूप में उन्होंने एक विशेष स्थान बना लिया है| सकारात्मक सोच विभिन्न विचारों को बड़ी ही सरलता के साथ प्रस्तुत किया है| सचमुच “सीपियाँ हड़ताल पर” हिंदी जगत का एक ऐतिहासिक प्रथम महिला सजल संग्रह है| आनेवाले नजदीक के भविष्य में मील का पत्थर बनकर नए मुकाम के लिए सहाय करेगा| इस सराहनीय कार्य के लिए रेखा जी को हदय से बधाई देती हूँ| आपकी कलम निरंतर साहित्य की सेवा के लिए चलती रहे यही शुभकामनाएं|

अस्तु|

संदर्भ सूची-

(१) सीपियाँ हड़ताल पर: पृष्ठ:१३  

(२) सीपियाँ हड़ताल पर: पृष्ठ:११

(३) सीपियाँ हड़ताल पर: पृष्ठ:११-१२   

 

 

- डॉ कल्पना गवली

एसोसियेट प्रोफेसर,

हिंदी विभाग,
कला संकाय, महाराजा सयाजी राव विश्वविधालय, बडौदा.

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