साहेब का रूमाल

जंगल के राजा के दर्शनों का प्यासा मन मुझे कहां-कहां न लिये फिरा है, कैसी-कैसी जगहों की खाक न छानी है। मगर वे मुझ जैसी अपनी दीवानी को, बावली को दर्शन लाभ कब देने लगे शरमीले ? ऐसी ही एक तलाश का अंश थी मेरी बार नवापारा अभयारण्य की वह तीसरी यात्रा कि जिसमें कुछेक चीतल, मोरों के झुंड, खरहे और मात्र एक अकड़ू बाईसन देखकर ही संतोष करना पड़ रहा था। बच्चे बाईसन को देख बहुत हंसे कि जैसे भैंसे ने सफेद मौजे पहन रखे हों !
अभयारण्य की सीमा के बाहर आते ही मानो हमें अभय मिल गया था, सांपों की केंचुली, सूखी आर्टिस्टिक टहनियों आदि की तलाश में और बढ़कर पुरूष वर्ग को यत्र-तत्र-सर्वत्र यूरिनल की जो सुविधा उपलब्ध है उसी का लाभ उठाने के लिये गाड़ी एक अनजान मगर सुरक्षित जगह पर रोकी गई। कहते हैं कि यथा को तथा मिल ही जाता है ़ ़ ़ धुर घने वन में भी मुझे न जाने कैसे दिख पड़ी थी, पत्तों आदि के कुछ कचरे नुमा ढेर में दबी वह कोई कब्र। इतने जंगल में किसकी कैसी कब्र है वह ? जरा देखूं तो। इसी उत्सुकता में मैंने क्वालिस का डोर खोलना ही चाहा था कि पंडित जी ने आ कर मुझे रोक दिया ़ ़ ़
’‘रहने दीजिये, अंधेरा घिर आया है। उस कब्र का स्टोरी मैं बताता हूं आपको, किसी संपेरन की कब्र है वह जिसकी आत्मा ने किसी बाबू साहेब से बदला लिया था बताते हैं। उसके परिवार के लोग यहीं पास की बस्ती में बसे हुए हैं। उनमें से कोई आपको विस्तार से बता देगा ़ ़ ़’‘
मुझे सब्र कहां ? लौटते-लौटते ही संपेरों की उस बस्ती से एक अनुभवी संपेरे को साथ बिठा लिया गया।
बार नवापारा के स्वप्निल, रहस्य भरे अंधियारे से माहौल में जब हम अपनी काॅटेज तक पहुंचे तब वहां उस माहौल के अनुरूप अलाव जलाया जा चुका था। ठंड कुछ बढ़ चली थी। लालटेन की मंद-मंद रौशनी में गर्मागरम कबाब व अदरक की चाय की चुस्कियों के साथ अलाव तापते हुए उस संपेरे ने जो कुछ बताया वह रौंगटे खड़े कर देने वाला ही तो था।
बरसों पहले कभी किसी ’साहेब’ ने इन्हीं में से किसी काॅटेज में डेरा डाला था शिकार की तलाश में। उन्हें यहां की अति सुंदरी स्ंापेरन के बारे में बताया गया था। साहेब उसी की तलाश में यहां तब और घने रहे इस जंगल में आए थे। वह बुलवाई गई सांप दिखाने के बहाने से। उसका पति यहां से करीब सत्रह-अठारह किलामीटर दूर गांव में बाजार आदि के लिये गया हुआ था। अच्छी रकम मिलेगी इस उमीद में संपेरन अपनी सबसे ज्यादा करतब व जहर भरी नागिन की पिटारी ले कर आई। मगर नागिन और उसका जहर किसी काम न आया।
भोली संपेरन उस खेले-खाए, महा चालू साहेब के चंगुल से स्वयं का न बचा पाई। हालांकि बचने की जद्दो-जहद में साहेब का करीने से तह किया गया रूमाल संपेरन की मुठ्ठी में आ गया, या कि उसने जानते-बूझते किसी भी तरह से वह रूमाल अपने कब्जे में कर लिया, जिसे अपनी मुठ्ठी में दबा वह अपनी नागिन की पिटारी उठा कर भागते-दौड़ते उस जगह तक आई जहां उसकी कब्र बनी हुई है, और वहीं वह रूमाल पिटारी में रख उसने नागिन का जहर अपनी छोटी अंगुली में डंसवा पिटारी को उसी दम बंद कर दिया। मिनट के छठवें क्षण बीतते न बीतते उसके प्राण पखेरू उड़ लिये अनंत आकाश की और। उसका संुदर शरीर नीला पड़ गया। बाजार से लौटने पर रास्ते में ही संपेरे को यह सब देखना पड़ गया। उसने बुझे-लुटे दिल से नागिन की पिटारी खोली तो उसकी आशंकाऐं सत्य निकलीं। नागिन ने संपेरन को अकारण ही नहीं डंसा था। पिटारी में एक कोने में करीने से तह किया मगर तुड़-मुड सा गया एक महंगा रूमाल संपेरन की मैली मुठ्ठी के दाग वैसे ही दर्शा रहा था जैसे संपेरन की नुची-धजी काया किसी साहेब की खोटी नीयत के मैल को दर्शा रही थी। संपेरे व उसकी बस्ती के लोगों ने वहीं संपेरन का क्रिया-कर्म कर दिया।
’‘हमारे में बाई साब, वैसे तो दफनाते हैं ़ ़ ़ पर जिसका बदला लेना हो उसे जलाया जाता है।’‘ उस घटना की याद से कुछ दुखी सा वह संपेरा कह रहा था कहीं षून्य में तकता हुआ सा। सन्न सी बैठी मुझे बता रहा था वह- कि संपेरे के पास एक ढाई फुट लंबा व लगभग एक फुट चैड़ा लकड़ी का बक्सा था जिसकी निचली सतह लौहे की थी। संपेरन के क्रियाकर्म के ठीक बाद उसने सावधानी से उस नागिन को साहेब के रूमाल सहित उस बक्से में डाल बक्सा बंद कर दिया। अब बक्से में बंद थी वही जहरीली, भूखी नागिन जिसे ले कर संपेरन साहेब के पास गई थी। वह नागिन उस रूमाल की खुश्बू, उसमें बसी पसीने की गंध को तो ठीक से पहले ही ले चुकी थी। अब, बक्से को संपेरन की चिता के अंगारों पर रख, हल्के-हल्के तपाते थे वे लोग।
बक्से की गर्म होती सतह पर नागिन गर्मी से त्रस्त हो इधर-उधर, जिधर भी दौड़ती बक्से में तो पाती साहेब के रूमाल में बसी वही और केवल वही गंध। चिता शांत होने पर भी यही बक्से को गर्म करने का क्रम एक दिन और जारी रखा गया। अब तो न नागिन को चैन था न संपेरे को ही।
डाकबंगले से पता तो चल ही गया था कि कौन, कहां के बड़े साहेब पधारे थे। अपने करीब नौ बरस के इकलौते और संपेरन की मौत के बाद बिन मां के हो चुके पुत्र को ले संपेरा चल पड़ा था बड़े शहर की ओर, उस बक्से को भी अपने साथ बड़े एहतियात से ले कर। पता पूछते-पूछते वह अंततः उनके भव्य बंगले तक जा ही पहुंचा।
उधर, साहब का निष्ठावान ड्रायवर जो कि साहब की सारी करतूतों से पूरी तरह वाकिफ था ही, वह बार-बार मेम साहेब को आगाह करता रहा कि साहेब का कीमती रूमाल गायब हुआ है। उनका परफ्यूम बदल दें, उनका नहाने का साबुन बदल दें। संपेरों की बस्ती से गायब हुआ है जिसका अर्थ कुछ भी हो सकता है। लेकिन मेम साहेब को ऐसी अंधविश्वास भरी बातों में कोई यकीन न था, और यदि वे साहब का परफ्यूम, उनका साबुन बदल भी देतीं तो भी वे बेचारी अपने पति के पसीने की उस गंध को तो नहीं ही बदल सकती थीं जो कि नागिन के नथुनों में चढ़ चुकी थी।
संपेरा बड़े इतमीनान से बता रहा था कि इसी नागिन में आ समाई थी ’संपेरन की आत्मा’ जो अब पूरी तरह अपनी बेइज्जती व असमय मौत का बदला लेने को कुलबुला रही थी। चाय समाप्त कर वो अपनी ही धुन में अलाव की आग से बीड़ी सुलगा चुका था। उसके शब्द कहीं बड़ी दूर से आते लगते थे मुझे, जैसे वो वहीं उस जगह, उस काल में ही जा पहुंचा था। वो आगे बता रहा था कि उस संपेरे ने बड़ी चतुराई से मौका देखकर साहेब के बंगले में भीख मांगने का नाटक किया। बंगले से जब कुछ न मिला, किसीने उस पर ध्यान नहीं दिया, आसपास के सन्नाटे की भी जब उसे पूरी तसल्ली हो गई तो उसने अपनी पीठ पर गठरी में छिपाए लकड़ी के बक्से को जरा सा खोल भर दिया। नागिन पलक झपकते ही बंगले में घुस ली। थोड़ी देर तक वह वहीं मंडराता रहा। कहीं कोई हलचल नहीं थी बंगले में। यानि नागिन अपने ठिकाने में जा छुपी थी।
’‘और बाई साब वो कोई साधारण नागिन नहीं थी। संपेरन की आत्मा थी उसमें। बदला लेने के लिये उतावली थी।’‘
मैं अपनी रौ में सुने जाती थी, वह अपनी रौ में कहे जाता था।
’‘शाम को जब साहेब आॅफिस से घर वापस लौटे, मेमसाहेब उनसे हंसी-खुशी उनका हैट, टाई, कोट ले रहीं थीं तब फुर्ती से न जाने कहां छुपी वह नागिन रूपी आत्मा अचानक प्रकट हुई और उसी पल-छिन में ही, सोफे बैठ मौजे उतारते साहेब को उनके सीधे हाथ की अंगुली पर डंस लिया। साहेब चीख पड़े। मेमसाहेब बिचारी कुछ न समझ पाईं। और उनके देखते-देखते ही पल-छिन के छठवें हिस्से में ही साहेब की आंखें फटी की फटी रह गईं। उन आंखों में अपनी मौत का खौफ लिये साहेब सोफे पर ही ढेर हो गए।‘’ संपेरा प्रत्यक्षदर्शी सा सुना रहा था।
बंगले में शोर मच गया। सब जो भी थे वहां, वे दौड़े। ड्रायवर भी दौड़ा-दौड़ा पहुंचा। उसने नजारा देखा तो उसके लिये कुछ समझना बाकी न रहा। वहीं सोफे के ही नीचे एक कोने में दुबकी पड़ी थी वह संपेरन की आत्मा नागिन के रूप में। ड्रायवर उधर बढ़ा तो वह अपना पूरा फन फैलाकर सीधी खड़ी हो गई फुफकारती हुई। किसी और को लेकिन वह क्यों डंसती। उसे तो जिससे बदला लेना था ले चुकी थी। फिर भी किसीकी हिम्मत न हुई उसकी तरफ जाने की। कोई डाॅक्टर को बुलाओ, कोई ऐंबुलेंस बुलाओ, कोई अस्पताल ले जाओ जैसी पुकारों में अब कुछ न रक्खा था। क्योंकि साहेब की फटी-फटी आंखें बताती थीं कि संपेरन की आत्मा ने अपना राई-रत्ती पूरा बदला ले लिया था। बाकी जो भी बचा होगा उसे  ऊपर वाले पर छोड़ देने के अलावा कोई चारा न था। यहां का उसका बदला तो पूरा हो चुका था। आखिरकार उस नागिन को पकड़वाने के लिये किसी संपेरे को ढूंढा गया। ‘‘हम लोग तो वहीं थे ही। कहां है नागिन ? कैसी नागिन ? करते हम लोग वहां पहुंचे। हमने अपनी नागिन को उसका मुंह दबाकर पकड़ा और उसे पिटारी में डाल कर जहरीली नागिन को पकडने के नाम पर अपना मेहनताना वसूल कर वापस आ गए। मैं ही था तब नौ बरस का। मेरा बापू अब नहीं है। तब मैं नहीं जानता था कि कैसे नागिन के रूप में आ कर मेरी मां की आत्मा ने बदला लिया था। बाद में कुछ बड़ा होने पर मेरे बापू ने मुझे सब समझाया, सब बताया।’‘
हतप्रभ थी मैं, फिर भी यह समझ पाना कठिन न था कि एक सोची-समझी अपमान जनक हरकत का यह एक अपनी ही तरह से सोच-समझ कर लिया गया बदला था जिसे नागिन में आत्मा का प्रवेश मान कर वे लोग अपने दुखते-दरकते जख्मों पर मरहम रख लेते थे।
नागिन का बदला जैसे जुमले अक्सर सुने थे मगर इतना सटीक व वैज्ञानिक ढंग से बदला लिये जाने का यह पहला उदाहरण मेरे सामने आया था।
मंद होते अलाव की आग में संपेरा और लकड़ियां डाल रहा था। चटचट् करती लकड़ियां पहले धुंआती थीं फिर भड़कते शोलों में तब्दील हो रही थीं। मानव में जो आदिम भूख दबी हुई है उसे संतुलित न रख पाने की, उस अपनी हवस की कितनी वीभत्स व कितनी आदिम विधि से सजा पाई थी किसी दुर्बुद्धि मानव ने, यह सोच कर कलेजा कांपना स्वाभाविक था। वह तो चला गया सजा पा कर किंतु उसके कृत्य के कारण एक तरफ, एक पति से उसकी पत्नी असमय छिनी, एक बच्चा बिन मां का हुआ, तो दूसरी तरफ एक पत्नी व उसके बच्चों को भी अनायास ही बहुत कुछ खोना पड़ा था। यह लगभग् वैसा ही था कि करे कोई भरे कोई।
‘’इसे कुछ पैसे दे दीजियेगा कहानी के बदले। ये लोग थोड़े लालची होते हैं।’‘ पंडितजी ने कहा था सो मैने उस संपेरे को कुछ रूपयों की पेशकश की जिसे उसने बड़ी सहजता से ठुकरा दिया था यह कह कर कि सांप तो उसने दिखाया ही नहीं तब पैसा किस बात का ?
कितनी मासूमियत व ईमानदारी से उठ खड़ा हुआ था वापस जाने के लिये वह एक उस बदनसीब औरत का बेटा कि जिसने अपनी बेइज्जती का बदला उस एक रूमाल के आधार  पर लिया था। रह रह कर यह खयाल भी मेरे मन को मथता था कि यदि उन लोगों ने नागिन की आत्मा के रूप में वह तत्काल बदला न लिया होता तो आजाद भारत में आज भी उन्हें कौन सी कोर्ट में किस विधि के अंर्तगत, कैसा-क्या और कितने समय के बाद न्याय मिल पाता ?
बुझे मन से मैं बड़कू-छुटकू को सांप देखने के लिये बुला रही हूं।
- डॉ आशा चैधरी
मैं भारत के छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में शासकीय महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र में विभागाध्यक्ष हूं। बुद्ध-सुदर्शन, आदिकालीन भारतीय भौतिकवाद, वास्तु द्वारा भवन निर्माण तथा तर्कशास्त्र के सिद्धांत शीर्षक से मेरी चार पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। मैं मधुबनी पेंटिंग भी करती हूं। मेरी कुल पांच मधबनी पेंटिंग्स प्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा के कलेक्शन में भी ली जा चुकी हैं।

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