साहित्य में शिवम की अवधारणा

लेखन ऐसा चाहिए,जिसमें हो ईमान ।
सद्कर्म और मर्म ही,हो जिसमें भगवान ।।
जिस प्रकार आत्मा और परमात्मा का बिम्ब एक दूसरे को प्रतिबिम्बित करता है , उसी प्रकार साहित्य एवं समाज भी एक दूसरे को प्रतिबिम्बित करते हैं । लेखक एवं साहित्यकार सदा से ही अपनी लेखनी के माध्यम से समाज की प्रतिष्ठा और नीति-नियम के अनुसार अपना पावन कर्तव्य बड़ी कर्मठता से निभाते रहे हैं । इतिहास गवाह है कि साहित्यकारों के लेखन ने , न केवल यूरोपीय पुनर्जागरण में अपनी महत्वपूर्ण और सशक्त भूमिका निभाई है वरन् भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी । इसके अतिरिक्त समाज और राष्ट्र-निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान देते हुए नवाचार के द्वारा विकास का एक नया अध्याय भी लिखा । आज भी इनकी प्रासंगिकता बनी हुई है । वर्तमान में अनेक प्रकार की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-भौगोलिक-ऐतिहासिक और सामयिक समस्याऐं वैश्विक समुदाय के सामने उपस्थित हैं जैसे– आतंकवाद , नक्सलवाद, मादक द्रव्यों की तस्करी , भ्रष्टाचार, भ्रूण हत्या, बलात्कार , गरीबी , बेरोजगारी , भूखमरी , साम्प्रदायिकता , ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण , एलनीनो प्रभाव ,सीमा पार घुसपैठ , अवैध व्यापार इत्यादि-इत्यादि । इस प्रकार की अनेक समस्याओं को लेखक अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से निर्भीक और स्वतंत्र होकर समाज के सामने उपस्थित करता है , ताकि देश के जिम्मेदार नागरिकों में जन-जागरूकता और सतर्कता का प्रसार हो ,और वे अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझें ।
साहित्य क्या है ?
 साहित्य शब्द की व्युत्पत्ति “सहित” शब्द से हुई है ,जिसका शाब्दिक अर्थ है – साथ-साथ हित अथवा कल्याण ।
अर्थात् साहित्य वह रचनात्मक विधा है ,जिसमें लोकहित की भावना का समावेश रहता है | दूसरे शब्दों में — साहित्य – शब्द , अर्थ और मानवीय भावों की वह त्रिवेणी है ,जो कि सतत् तरंगित प्रवाहित होती रहती है | साहित्य विचारों की वह अभिव्यक्ति है ,जो कि समाज का यथार्थवादी दृष्टिकोण उजागर करती है | यह दृष्टिकोण त्रिकालिक स्वरूप में होता है ,क्यों कि साहित्य न केवल भूतकाल एवं वर्तमान काल के मुद्दों एवं विषयों की सार्थक अभिव्यक्ति है, अपितु यह वर्तमान में हो रहे परिवर्तन को समाहित करते हुए समाज के गुण-दोषों को समाज के ही सम्मुख रखता है ,ताकि समाज को समाज का वास्तविक प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर हो सके । क्या सही है ? क्या गलत है ? यह निर्णय साहित्य , समाज का दर्पण बनकर दिखलाता है । साहित्य का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है । यह तो विविध रूपों में समाज के समक्ष प्रकट होता है । यदि साहित्य की तुलना जल से की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । क्यों कि जिस प्रकार पानी का कोई रंग नहीं होता ,किन्तु जब वह किसी भी तरल के साथ मिलता है तो वह उसी स्वरूप में समावेशित हो जाता है ,उसी प्रकार साहित्य भी विविध विचारों की भावाभिव्यक्ति के अनुरूप समावेशित होकर उद्घाटित होता है । अत : हम कह सकते हैं कि साहित्य का मर्म ही इसका चरम है । यही चरम समाज के लिए उपयोगी है ।
साहित्य और समाज का अंतर्सम्बंध
व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी  है , जो की समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचारशील , ज्ञानशील और नैतिकता के सार्वभौमिक नियमों से सदैव जकड़ा रहता है । यही नीतिमीमांसीय नियम व्यक्ति में संवेदनशीलता , सामाजिकता , मानवता और उच्चतम आदर्शों को निर्मित करते हैं । चूँकि साहित्यकार भी एक व्यक्ति है। अत : वह सद्गुणों की छाया में समाज के हित और अहित को ध्यान में रखते हुए साहित्य लेखन करता है , जो कि समाज का ही यथार्थवादी शाब्दिक-चित्रण होता है । समाज के नागरिकों में उत्तरदायित्व की भावनात्मक अभिव्यक्ति और शक्ति को उजागर करने तथा उसके क्रियान्वयन हेतु साहित्य एवं साहित्यकार एक प्रतिबिम्ब के रूप में होते हैं । यही कारण है कि सुयोग्य नागरिक अपनी जवाबदेहता और सक्षमता को समझकर अपने मूल अधिकारों की रक्षा करने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए अपना योगदान सुनिश्चित करते हैं । जब भी कोई सामाजिक या राष्ट्र से संबंधित समस्या उजागर होती है तो लेखक ही अपनी तलवार रूपी लेखनी को हथियार बना कर विजय को सुनिश्चित करते हैं ।
समाज और जीवन दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं । आदिकाल के वैदिक ग्रंथों व उपनिषदों से लेकर वर्तमान साहित्य ने मनुष्य जीवन को सदैव ही प्रभावित किया है । साहित्य की ही अद्‌भुत व महान शक्ति है जिससे समय-समय पर मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलते हैं । साहित्य की परम्पराओं और अंतर्दृष्टि का आंकलन करें  तो हम पाते हैं कि  समाज में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों पर प्रहार करने और विद्रूपताओं को उजागर करने के लिए साहित्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आता है।  इस काम को आगे बढाने के लिए स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श जैसे अनेक विमर्शों के माध्यम से हस्तक्षेप किया जा रहा है। जीवन और साहित्य का अटूट संबंध है । साहित्यकार अपने जीवन में जो दु:ख, अवसाद, कटुता, स्नेह, प्रेम, वात्सल्य, दया आदि का अनुभव करता है उन्हीं अनुभवों को वह साहित्य में उतारता है । इसके अतिरिक्त जो कुछ भी देश में घटित होता है जिस प्रकार का वातावरण उसे देखने को मिलता है उस वातावरण का प्रभाव अवश्य ही उसके साहित्य पर पड़ता है। अगर साहित्यकार में  ,दृष्टि  और प्रतिबद्धता  है तो उसकी रचना  जीवित, प्रासंगिक व वैश्विक रहेगी। और जिसमें नहीं है,  उसकी रचना न तो बहुत जीवंत रहेगी न सार्थक रहेगी।
अपने समय और समाज से साहित्यकार का गहरा नाता होता है। एक संवेदनशील प्राणी होने के नाते यह संभव नहीं है कि वह अपने देश और विश्व में होने वाली घटनाओं से निरपेक्ष और निर्द्वंद्व होकर रहे। वह अपने लेखन के द्वारा उन सब चुनौतियों और समस्याओं को जरूर अभिव्यक्ति  देता है जो उसे विचलित करते है। वह न केवल अभिव्यक्ति  देता है, बल्कि वह अपेक्षा भी करता है कि उसका साहित्य पढ़ने वालों में नर्इ चेतना पैदा करे। वह बेहतर दुनिया बनाने के उसके संघर्ष में भागीदार बने।इतिहास के पृष्ठों को पलट कर देखें तो हम पाते हैं कि साहित्यकार के क्रांतिकारी विचारों ने राजाओं-महाराजाओं को बड़ी-बड़ी विजय दिलवाई है । अनेक ऐसे राजाओं का उल्लेख मिलता है जिन्होंने स्वयं तथा अपनी सेना के मनोबल को उन्नत बनाए रखने के लिए कवियों व साहित्यकारों को विशेष रूप से अपने दरबार में नियुक्त किया था । प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी। हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं।  किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं। विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है। भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है। व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की। भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं।

मध्यकाल में भूषण जैसे वीररस के कवियों को दरबारी संरक्षण एवं सम्मान प्राप्त था । बिहारीलाल ने अपनी कवित्व-शक्ति से विलासी महाराज को उनके कर्तव्य का भान कराया था । संस्कृत के महान साहित्यकारों कालीदास और बाणभट्‌ट को अपने राजाओं का संरक्षण प्राप्त था ।
” नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहिं काल ।
अली, कली सी सौं बँध्यो आगैं कौन हवाल ।”
भारत की आजादी के 76वर्ष पूरे हो चुके हैं। 15 अगस्त, 1947 से शुरू हुर्इ इस यात्रा में जहाँ जमींदारी-जागाीरदारी प्रथा का उन्मूलन अस्पृश्यता उन्मूलन, ग्राम-भूदान आंदोलनऋ पंचवर्षीय योजनाएँ, पंचायती राज सत्ता का विकेंद्रीकरण,औद्योगीकरण -शहरीकरण, मिश्रित अर्थव्यवस्था, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रीवीपर्सों की समाप्ति आपातकाल एवं इंदिरा-युग का उत्थान व पतन कांग्रेस के एक छत्रराज का अंत व बहुदलीय सरकार या गठबंध्न राजनीति की शुरुआत वैश्वीकरण की असंख्य प्रक्रियाओं का विस्फोट भारत की नेहरूकालीन वैदेशिक नीति में परिवर्तन व यूरो-अमेरिकी शिविर की अनुचरी जैसी घटनाओं को ‘मील का पत्थर कहा जा सकता है।  वहीं इसके समानांतर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की त्रासदियों, विरूपताओं, विडंबनाओं आदि की भी यात्रा चलती रही है। इस यात्रा के रूप में भारत विभाजन की बेशुमार पीड़ाएं आधुनिकता के प्रयोग के साथ-साथ सामंती मूल्य व्यवस्था की निरंतरता कृषि भारत का विपन्नीकरण किसानों की आत्महिंसा का ज्वार नक्सलवादी-माओवादी आंदोलन की शक्ल में ग्रामीण-आदिवासी भारत के असंतोष का विस्पफोट मंडल-कमंडल आंदोलन व सामाजिक-सांप्रदायिक सौहाद्र् का  बिखराव दलित व स्त्री अस्मिता का उभार अपसंस्कृति  का प्लावन परिवार का विखंडन व तथाकथित मध्यमवर्ग का  बढ़ता वर्चस्व राज्य का जन से विलगन जैसी परिघटनाओं को गिनाया जा सकता है।
साहित्य में भी स्त्री  और दलित स्वर पहले के किसी भी दौर से अधिक व्यापक और मुखर हुआ है। आजादी के बाद के हिंदी साहित्य को पूंजीवादी विकास के साथ भी जोड़ा जाता है। उसने हमारे समय और समाज को विविध् रूपों और दृष्टियों से पेश किया है।
आज हमें यह विचार करना है कि क्या साहित्य  वर्तमान परिदृश्य में अपनी सार्थक भूमिका निभा रहा है? क्या यह आजादी के बाद के यथार्थ को अभिव्यक्ति प्रदान करने में सक्षम रहा है और क्या वह अनुभूति और अभिव्यक्ति से आगे जाकर अपने पाठकों को मानसिक विकास  की ओर अग्रसर कर सका है? मानसिक विकास  राजनीतिक अर्थों में नहीं बल्कि  चेतना और दृष्टि  के स्तर पर भी है।
आज के परिवेश में  व्यवस्था या अनुभूत घटनाओं का यथार्थ नहीं होता, बल्कि ऐतिहासिक या स्मृति का यथार्थ भी होता है, जिसने आज को बनाने में महती भूमिका निभार्इ होती है। पर जो साहित्य  को, मात्रा वृतांत या दस्तावेज से अलग बनाता है, वह घटित यथार्थ का विवरण नहीं, रचना में घुली-मिली, चिंतन से उत्पन्न लेखक की जीवन दृष्टि होती है।
साहित्य के  स्वरूप में उसका यथार्थ ही व्यंजित होता है, बल्कि अधिक तीक्ष्ण और विचारोत्तेजक ढंग समकालीन व्यवस्थाओं को उकेरने की क्षमता होनी चाहिए । क्योंकि वह समकालीन व भावी यथार्थ के विद्रूप और मोहभंग को उभारता है। इसीलिए वह पाठकों की दृष्टि और चेतना को विस्तृत, मुक्त और परिपक्व करने में, ज्यादा सटीक और प्रेरक भूमिका निभाता है।
मुक्तिबोध ने कहा था-  साहित्य  में अनुभूत का वह स्वरूप पुनर्सृजित है, जो स्मृति, कल्पना आदि से समृद्ध  हो।
जैनेंद्र ने भी  रचना में अनुभूति और चिंतन पर समान बल दिया था।
साहित्य का सबसे बड़ा कार्य अपने समय में उसका होना है यानी साहित्य एक नैतिक कर्म है। पशिचम में इस पर काफी बहस हुर्इ है। मिजेनेर तो यहां तक मानते हैं कि नैतिक समस्या ही साहित्यकार को विचलित करती है और वह संयत तथा तार्किक ढंग से उसका मुकाबला करता है।
डी.एच. लारेन्स भी कहते हैं कि साहित्य इसीलिए विशिष्ट है कि वह जिंदगी के बारे में होता है। साहित्य की नैतिकता जिंदगी से जुड़ी है  और कदाचित इसकी प्रतिबद्धता भी, पर प्रतिबद्धता की यांत्रिकता की साहित्य  को दरकार नहीं है। प्रतिबद्धता साहित्य में एक दृष्टि के रूप में अवश्य होना चाहिए, पर किसी भी किस्म की क्षेत्रीयता , स्थानीयता जैसी विचारधाररत्मक प्रतिबद्धताएं साहित्य को यांत्रिक बना देती हैं। प्रतिबद्धताएं  अपने से, अपने समाज से और अपने समय से अवश्य होनी चाहिए ,क्योंकि वह साहित्य  का नैतिक तकाजा है, लेकिन प्रतिबद्धताएं विचारधारात्मक घोषणा-पत्र न बन जाए ये देखना जरूरी है । यह देखा गया है कि अपने यहां लेखक संगठनों के लोग प्रतिबद्धता  का यांत्रिक इस्तेमाल कर रचनाओं के वैशिष्टय को नष्ट कर देते हैं। संगठन चूंकि उनके प्रसार में सहायक होता है, इसीलिए वे लेखक बन जाते हैं, पर वे जनता में जगह नहीं बना पाते।पिछले सात दशकों में, साहित्य में उन क्षेत्रों, अंचलों, जातियों, वर्गों को स्थान मिला है, जिन्हें अब तक नहीं मिला था। और अधिकतर भुक्तभोगियों के लेखन द्वारा। स्त्री और दलित इसी श्रेणी में आते हैं। जब भुक्तभोगी अपना अनुभव स्वयं लिखता है तो निश्चय ही उसका स्वरूप उससे भिन्न होता है, जो संवेदनशील दर्शक या चिंतक उसके बारे में लिखता है। पर समग्र सत्य या यथार्थ को ग्रहणशील बनाने में, दोनों महत्वपूर्ण हैं।

साहित्य की पाठकों की चेतना को विवेक-संपन्न बनाने में अहम भूमिका होती है। अति में व्यंजित जीवन-दृष्टि की होती है। इसलिए नहीं कि उसके केंद्रीय पात्र पुरुष हैं या स्त्री । महत्वपूर्ण यह नहीं है कि पात्र कहां से उठाए गए हैं या वे क्या कहते हैं,बल्कि यह कि वे विभिन्न जीवन-स्थितियों में क्या करते हैं। उनके किए को पढ़कर ही, पाठक रूढि़गत मान्यताओं व अन्याय से प्रतिरोध् करने की प्रेरणा पा सकता है। इसलिए यह सहज संभव है कि कोर्इ स्त्री-केंद्रित साहित्यिक रचना , इतिहास, राजनीति, समाज, और व्यवस्था के विद्रूप की सक्षम और सूक्ष्म व्यंजना करे जैसे पटरंगपुर पुराण या कठगुलाब और पुरुष-केंद्रित साहित्य ,स्त्री वादी  विमर्श का सबल प्रतिपादन करे, जैसे अनित्य और जिंदगीनामा आदि।  पिछले दो-तीन दशकों से हमारा अधिकतर साहित्य नगर केंद्रित  होता गया है। गांव-कस्बे का अनुभव, वहां की सामाजिक विसंगतियां, वहां के संघर्ष और वहां की जनता की आकांक्षाएं नगरीय लेखकों के अनुभवों का हिस्सा नहीं रह पार्इ हैं, इसलिए यांत्रिकता का दबाव बढ़ गया है। भाषा भी संकुचित हो गर्इ है। उसमें बड़े अनुभवों की जगह भी नहीं है। अलग-अलग अस्मिताओं को व्यक्त करने वाले चरित्रों  का भाषिक वैविध्य  अब गायब ही हो गया है। अब यथार्थवाद रचना की अंतर्वस्तु का हिस्सा नहीं होता, आजकी कविता के सीधे विन्यास में अमिधा ही व्यक्त होता है, यह साहित्य का सबसे बड़ा संकट है।
शिव ही साहित्य है  और साहित्य समाज का दर्पण है कहने की जगह अगर हम कहें कि साहित्य, यथार्थ का दर्पण होता है,क्योंकि दर्पण में छवि हमेशा विपरीत होती है दर्पण में सीधा उल्टी तरफ दाएं बाएं और बाएं दाएं दिखता है। वह आपकी सही छवि नहीं दिखाता। मगर साहित्य जो होता है, वो कसौटी का पत्थर होता है। वो आपको एक दृष्टि देता है।
साहित्य समाज का दर्पण
 साहित्यकार , समाज का चिंतनशील ,चेतन और जागरूक प्राणि होता है , जिसके साहित्य में व्यक्ति एवं समाज के कर्म का मर्म प्रतिबिम्बित होता है ।
“साहित्य समाज का दर्पण है ” – इसका तात्पर्य यह है कि , साहित्य, समाज के उच्चतम आदर्शों, विचारों और कार्यों को आत्मसात् करते हुए समाज का वास्तविक शब्द-चित्रण करता है । जबकि समाज में व्याप्त अवांछनीय कुरीतियों , कुविचारों और कुप्रथाओं को उद्घाटित करते हुए समाज को यथेष्ट और अपेक्षित दिशाबोध करवाता है | यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो यह सत्य उजागर होता है कि प्राचीनतम समाज में व्याप्त कुरीतियाँ जैसे – सती प्रथा ,  बाल विवाह , देवदासी प्रथा ,डावरिया प्रथा इत्यादि अमानवीय कुरीतियों को व्यक्ति और समाज से दूर करने में साहित्य का ही योगदान रहा है । साहित्य ने दर्पण बनकर व्यक्ति और समाज को उनका वास्तविक स्वरूप दिखलाया । इसी तरह राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने में भी साहित्य ने समाज के लिए एक अहम भूमिका निभाई है ।
साहित्य मानव के मस्तिष्क का भोजन है, जिसकी वैचारिक चेतना के विकास का सूचक और भावों का आदर्श है. इसी कारण मानव समाज में साहित्य का अत्यधिक महत्व है. यही एक माध्यम है जिससे मानव मस्तिष्क का विकास क्रम तथा मानवीय भावनाओं का परिचय मिलता है. परोक्ष रूप में साहित्य मानव सभ्यता के विकास का सूचक भी है।
साहित्य का उद्देश्य
विद्वानों ने साहित्य की अनेक परिभाषाएं दी है।
पंडितराज विश्वनाथ ने साहित्य का अर्थ उन समस्त काव्य रचनाओं से है., जिसमे  लोकिक ज्ञान का समावेश है। इस कारण साहित्य शब्द की व्युत्पति यह की गई ”हितेन सहितं सह वा सहितम तस्य भाव साहित्यम। अर्थात जिसमें हित का भाव, लोकमंगल का भाव विद्यमान हो, जिसके द्वारा समाज का हित चिन्तन व्यक्त हो।यद्यपि अपने हित और अहित का ज्ञान पशु पक्षियों को भी होता है। परन्तु मानव बुद्धिजीवी प्राणी है, वह अपने हित का चिन्तन अच्छी तरह से कर सकता है। समाज का संगठन भी मानव हित के लिए हुआ है। और मानव द्वारा समाज का हित करने के लिए साहित्य की रचना की जाती है।

इसी प्रकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य की यह परिभाषा दी है- ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है। आधुनिक काल में यह परिभाषा सर्वमान्य है और इससे साहित्य का महत्व स्पष्ट हो जाता है।
साहित्य रचना का उद्देश्य मानव समाज का हित चिन्तन करना तथा उसकी चेतना का पोषण करना है। इससे यह सिद्ध होता है कि साहित्य लोक संग्रह के कारण ही उपयोगी माना जाता है। बिना उद्देश्य एवं उपयोगिता के किसी वस्तु की रचना नही की जा सकती है।
बिना उपयोगिता के रचा गया साहित्य मात्र कूड़ा कचरा ही है। जो रद्दी के ढेर में विलीन हो जाता है। लेकिन उपयोगी साहित्य अमर बन जाता है। इसलिए साहित्य की कसौटी उपयोगिता ही है।साहित्य और समाज

साहित्य और समाज दोनों ही एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। साहित्य समाज के मानसिक तथा सांस्कृतिक उन्नति और सभ्यता के विकास का साक्षी है। ज्ञान  राशि के संचित कोष को साहित्य कहा जाता है। साहित्य एक ओर जहां समाज को प्रभावित करता है वहीं दूसरी ओर वह समाज से प्रभावित भी होता है। साहित्य शब्द की उत्पत्ति दो शब्दों से मिलकर हुई है पहला शब्द है ‘स’ जिसका मतलब होता है साथ-साथ जबकि दूसरा शब्द है ‘हित’ अर्थात कल्याण। इस तरह से साहित्य का अभिप्राय ऐसी लिखित सामग्री से है जिसके प्रत्येक शब्द और प्रत्येक अर्थ में लोक हित की भावना समाई रहती है। साहित्य के द्वारा हमें अपने गौरवशाली इतिहास की जानकारी मिलती है तथा साहित्य के द्वारा ही हमें किसी भी विषय पर विस्तृत जानकारी भी प्राप्त होती है। मानव की सीमित दृष्टि केवल अपना ही चक्कर लगाकर लौट आती है परन्तु साहित्य का चिन्तन वैश्वात्मैक्य और विश्व-कल्याण की भावना पर आधारित होता है। एक व्यक्तिगत हित-चिन्तन है, दूसरा समष्टिगत। अतः जिस ग्रन्थ में समष्टिगत हित-चिन्तन प्राप्त होता है वही साहित्य है। प्रत्येक युग का साहित्य अपने युग के प्रगतिशील विचारों द्वारा किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित होता है। साहित्य हमारी कौतूहल और जिज्ञासा वृत्तियों और ज्ञान की पिपासा को तृप्त करता है और क्षुधापूर्ति करता है। साहित्य से ही किसी राष्ट्र का इतिहास, गरिमा, संस्कृति और सभ्यता, वहां के पूर्वजों के विचारों एवं अनुसंधानों, प्राचीन रीति रिवाजों, रहन-सहन तथा परंपराओं आदि की जानकारी प्राप्त होती है। साहित्य ही समाज का आईना होता है। किस देश में कौन सी भाषा बोली जाती है, उस देश में किस प्रकार की वेशभूषा प्रचलित है, वहां के लोगों कैसा रहन सहन है तथा लोगों के सामाजिक और धार्मिक विचार कैसे हैं आदि बातों का पता साहित्य के अध्ययन से चल जाता है।
जठरानल से उद्विग्न मानव जैसे अन्न के एक-एक कण के लिए लालायित रहता है उसी प्रकार मस्तिष्क भी क्षुधाग्रस्त रहता है उसका भोजन हम साहित्य से प्राप्त करते हैं। हजारों साल पहले भारतवर्ष शिक्षा और आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति की चरम सीमा पर था यह बात हमें साहित्य से पता चलती है। हमारे पूर्वजों के श्लाध्य  कृत्य आज भी साहित्य द्वारा हमारे जीवन को अनुप्राणित करते हैं। बालकृष्ण भट्ट का कहना है कि प्रत्येक देश का साहित्य उस देश के मनुष्य के हृदय का आदर्श रूप है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में ‘साहित्य सामाजिक मंगल का विद्यालय है यह सत्य है कि व्यक्ति विशेष की प्रतिभा से ही साहित्य रचित होता है किंतु और भी अधिक सत्य यह है कि प्रतिभा सामाजिक प्रगति की ही उपज है।’साहित्यकार को समाज का छायाकार या चित्रकार भी कहा जाता है क्योंकि साहित्यकार अपनी कृति को समाज में चल रही मान्यताओं और परंपराओं के वर्णन द्वारा ही सजाता है इसलिए साहित्य और समाज में अन्यायोश्रित संबंध प्रत्येक देश के साहित्य में देखने को मिल जाता है। कबीर ने अपने समय के आडंबरों, सामाजिक कुरीतियों और मान्यताओं के विरोध में अपनी आवाज उठाई।

 ठीक इसी तरह प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में किसी न किसी समस्या के प्रति संवेदना जताई है। कोई भी साहित्यकार चाहे कितना भी अपने को समाज से अलग रखना चाहे लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाता है।
कवि वाल्मीकि की पवित्र वाणी आज भी हमारे ह्रदय मरूस्थल में मंजु मंदाकिनी प्रवाहित कर देती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी का अमर काव्य आज अज्ञानान्धकार में भटकते हुए असंख्य भारतीयों का आकाशदीप की भाँति पथ-प्रदर्शन कर रहा है।
कालिदास का अमर काव्य भी आज के शासकों के समक्ष रघुवंशियों के लोकप्रिय शासन का आदर्श उपस्थित करता है। जिस देश और जाति के पास जितना उन्नत और समृद्धशाली साहित्य होगा उस देश की जाति और वहां के लोग उतने ही उन्नत, सभ्य और समृद्धशाली माने जायेंगे।
आज भारतवर्ष युगों युगों से अचल हिमालय की भांति अडिग खड़ा है, जबकि प्रभंजन और झँझावात आए और चले गए। यदि आज हमारे पास चिर-समृद्ध साहित्य ना होता तो ना जाने हम कहां होते और होते भी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता था।
मानव एक ऐसा प्राणी है जो समाज में रहता है। समाज में रहकर ही उसका पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा होती है। वह समाज में रहकर ही अपना ज्ञानार्जन करता है और उसके बाद उसके मन में नैसर्गिक लालसा उत्पन्न होती है कि वह भी अपनी भावनाओं और विचारों को संसार के आगे व्यक्त करें। साहित्यकार समाज का प्राण होता है। समाज में रहकर समाज की रीति-नीति, धर्म-कर्म और व्यवहार वातावरण से ही अपनी रचना के लिए प्रेरणा ग्रहण करता है और लोक भावना का प्रतिनिधित्व करता है। अतः समाज की जैसी भावनाएं और विचार होंगे वैसा ही तत्कालीन साहित्य भी होगा। यदि समाज में धार्मिक भावना अधिक होगी तो समाज का साहित्य भी धार्मिक भावना से अधिक परिपूर्ण होगा। यदि समाज में विलासिता अधिक होगी तो समाज का साहित्य भी श्रृंगारिक होगा क्योंकि साहित्यकार तो सिर्फ लोक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।इस प्रकार सामाजिक गतिविधियों तथा समाज में चल रही परंपराओं से समाज का साहित्य अवश्य ही प्रभावित होता है। साहित्यकार समाज का एक जागरूक प्राणी होता है। वह समाज के सभी पहेलूओं को बड़ी गंभीरता के साथ देता है और उन पर विचार करता है फिर उन्हें अपने साहित्य में उतारता है। इस तरह वह समाज का कुशल चित्रकार बन जाता है और साहित्यकार की रचनाओं में समाज का एक प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है।

साहित्य समाज से भाव सामग्री और प्रेरणा ग्रहण करता है तो वह समाज को दिशाबोध देकर अपने दायित्व का भी पूर्णतः अनुभव करता है। परमुखापेक्षीता से बचाकर उनमें आत्मबल का संचार करता है। साहित्य का पांचजन्य उदासीनता का राग नहीं सुनता, वह तो कायरों और पराभव प्रेमियों को ललकारता हुआ एक बार उन्हें भी समर भूमि में उतरने के लिए बुलावा देता है। इसलिए श्री महावीर प्रसाद जी ने साहित्य की शक्ति को तोप, तलवार, तीर और बम के गोलों से भी बढ़कर स्वीकार किया है।
बिहारी के एक दोहे से-
नहिं पराग नहीं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल।
अली कली ही सौं बंध्यो, आगे कौन हवाल।।
राजा जयसिंह को अपने कर्तव्य का ज्ञान हो गया और उसके जीवन में बदलाव आ गया।
भूषण की वीर भावों से ओतप्रोत ओजस्वी कविता से मराठों को नव शक्ति प्राप्त हुई।
इतना ही नहीं स्वतंत्रता-संग्राम के दिनों में माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान जैसे कई कवियों ने अपनी ओजपूर्ण कविताओं से न जाने कितने युवा प्राणों में देशभक्ति की भावना भर दी।
साहित्य और समाज का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। समाज यदि आत्मा है तो साहित्य उसका शरीर है। बिना समाज के साहित्य जीवित नही रह सकता है। बिना साहित्य के समाज का स्पष्ट प्रतिबिम्ब नही देखा जा सकता है। साहित्यकार एक समाज का ही अंग होता है।
उसकी शिक्षा दीक्षा समाज में ही होती है।उसे सामाजिक जीवन में ही अपने भावों तथा अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की प्रेरणा मिलती है। इसलिए यह तात्कालीन समाज की रीती निति, धर्म-कर्म, आचार व्यवहार तथा अन्य परिस्थतियों में प्रभावित होकर अपनी प्रति के लिए प्रेरणा ग्रहण करता रहता है।साहित्य में उसी की अभिव्यक्ति रहती है।
समाज में जैसी परिस्थतियाँ एवं विचार होते है साहित्य में भी वैसा ही परिवर्तन आ जाता है। यदि समाज में वीर भावना है साहित्य में भी शौर्य का स्तवन होगा। समाज में विलासिता का सम्राज्य है तो साहित्य भी श्रंगारिक होगा इसी कारण साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। इस प्रकार स्पष्ट कहा जा सकता है कि साहित्य और समाज परस्पर आश्रित और एक दूसरे के पूरक है।साहित्य का प्रभाव

कोई भी साहित्य अपने समाज से अछुता नही रह सकता है। साहित्य का प्रतिभा प्रासाद समाज के वातावरण पर ही खड़ा होता है। यह स्पष्ट देखा जाता है कि जैसा समाज होता है वैसा ही उस काल का साहित्य बन जाता है। उदहारण के लिए हिंदी साहित्य का आदिकाल एक प्रकार से युद्ध युग था। समाज में शौर्य और बलिदान की भावना थी वीरयोद्धा प्राणोत्सर्ग करना सामान्य बात समझते थे।
फलस्वरूप वीरगाथा काव्यों की रचना हुई। परवर्ती काल में मुगलों के आक्रमण से हिन्दू जनता पीड़ित थी इस कारण सूर और तुलसी आदि भक्त कवियों ने भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया तथा सामाजिक समन्वय की भरपूर चेष्टा की।
वर्तमान काल में साहित्य में सामाजिक द्रष्टिकोण का परिचायक है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि समय की परिवर्तनशीलता के कारण समाज का साहित्य पर भी प्रभाव पड़ा है।
विशेषताएँ
साहित्य सामाजिक चेतना का परिचायक और मानव मस्तिष्क का पोषण है। समाज का साहित्य से और साहित्य का समाज से मौलिक सम्बन्ध है। समाज के बिना साहित्य की रचना संभव नही है। सामाजिक जीवन के साथ साथ साहित्य में भी परिवर्तन होता रहता है।
साहित्य का सौदर्य उसकी सामाजिक उपयोगिता ही है। यह व्यक्ति और समष्टि रूप में मानव समाज का उपकारक और उपदेष्टा है। इससे ही साहित्य में सत्य शिवम सुन्दरम की भावना पल्लवित होती है।
 साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है। किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है। समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है। साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है। साहित्य अजर-अमर है।
महान विद्वान योननागोची के अनुसार – समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता।
साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है। संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव । कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है। साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए।
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।।
महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं।
बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है।
 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है। पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं।
प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी। हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं। किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं। विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है। भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है। व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की। भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है। भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं। जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा। किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए।
मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया. मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है. इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए। साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है। साहित्य जनहित के लिए होता है। जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है।
मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है। मानव समाज का एक अभिन्न अंग है। जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है।  साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है। साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है।
निष्कर्ष
व्यक्ति ,साहित्यकार, समाज और साहित्य का आपस में अन्योन्याश्रय संबंध पाया जाता है ,जो कि एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं । यदि व्यक्ति सद्गुणी होगा ,तो साहित्यकार सद्गुणी होगा तथा साहित्यकार सद्गुणी होगा तो साहित्य भी उच्चतम आदर्शों से पूर्ण होगा । अत: साहित्य की पूर्णता समाज के लिए एक दर्पण का रूप होगा , जिसमें समाज का वास्तविक स्वरूप सदैव दिखाई देगा । अत : जरूरी है कि व्यक्ति को सद्गुणी होना चाहिए तथा साहित्यकार को सद्गुणों के साथ-साथ उपयोगितावादी दृष्टिकोण को आत्मसात् करना चाहिए ताकि साहित्य में उच्चतम आदर्शों का समावेश होने के साथ-साथ  “लोकसंग्रह” की भावना की भी पराकाष्ठा हो ताकि साहित्यकार व्यक्तिगत हित को त्यागकर लोकहित में कार्य कर सके और समाज को वास्तविक स्वरूप साहित्य में देखने को मिले।
  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह पशु की प्रवृतियों से उपर उठकर अपनी बुद्धि श्रेष्टताआधार पर समाज बनाता है। और अपनी सामाजिकता का परिचय देता है। समाज में रहकर वह जो कुछ देखता है और अनुभव करता है उसे अपनी रचना के माध्यम से प्रस्तुत भी करता है। उसका यही साहित्य सर्जन समाज और देश का पथ प्रदर्शन करता है।
तात्पर्य यह है कि समाज के विचारों, भावनाओं और परिस्थितियों का प्रभाव साहित्यकार और उसके साहित्य पर निश्चित रूप से पड़ता है। अतः सत्य ही शिव है शिव ही  साहित्य है जो समाज का दर्पण है वही सुंदर होना स्वाभाविक  है। साहित्य अपने समाज का प्रतिबिंब है, वह समाज के विकास का प्रमुख सहोदर है।
- डॉ. दिग्विजय कुमार शर्मा
अनुसंधान एवं भाषा विकास विभाग
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (भारत)

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