साक्षात्कार: डोगरी साहित्यकार यशपाल निर्मल के साथ बंदना ठाकुर की बातचीत

    वर्ष 2015 में साहित्य अकादेमी के राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित
डोगरी साहित्यकार यशपाल निर्मल के साथ बंदना ठाकुर की बातचीत
{ सन् 1977 में जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती गांव गढ़ी बिशना में जन्में डोगरी भाषा के साहित्यकार, आलोचक, अनुवादक, सांस्कृतिककर्मी एवं पत्रकार यशपाल निर्मल को पिछले वर्ष साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रस्तुत है उनके साथ बंदना ठाकुर की बातचीत}
ब्ंादना-यशपाल निर्मल जी आपने डुग्गर प्रदेश के ऐतिहासिक लोक नायक तथा देशभक्त ‘‘मियां डीडो ‘‘ को अपने अनुवाद के द्वारा फिर से जिं़दा कर दिया है तथा जम्मू वासि को उनकी शहादत की याद दिलाई है। क्या आप हमें बतायेंगे कि यह नाटक आपको कब और कहां से मिला ? और कैसे आप इसका अनुवाद करने के लिए प्रेरित हुए ?
यशपाल- आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया। मैं यह कहना चाहूँगा कि ‘‘ मियां डीडो ‘‘ नाटक जिसका मैंने डोगरी भाषा में अनुवाद किया है वास्तव में यह मूल पंजाबी भाषा में है। इसका नाम डीडो जम्वाल है। इसको लाला कृपा सागर ने लिखा है और यह सन् 1934 ई0 में लाहौर से प्रकाशित हुआ था। अक्सर सुनता रहता था कि पंजाबी भाषा में ‘ डीडो ’  कोई किताब है। चूंकि हमारे यहां ‘डीडो’ एक लोकनायक के रूप् में प्रसिद्ध है। लोग उन्हें बहुत मानते हैं। हमारा लोक साहित्य मियां डीडो के बहादुरी के किस्सों से भरा पड़ा है। लोक गीतों, लोक कहसनियों एवं लोक गाथाओं के माध्यम से हम अपने बड़े बुजुर्गों से डीडो की बहादुरी के बारे में बचपन से ही सुनते आए हैं। परंतु इतिहास में डीडो नदारद था। एक तरफ जहां लोक मानस में डीडो को इतना मान सम्मान हासिल था वहीं उसके बारे में हमारे बुद्धिजीवी एवं साहित्यक समाज के पास कोई खास जानकारी नहीं थी। सन् 2008 की बात है। उन दिनों मैं ब्मदजतंस प्देजपजनजम व िप्दकपंद स्ंदहनंहमेए डलेवतम की शाखा छवतजीमतद त्महपवदंस स्ंदहनंहम ब्मदजतमए च्नदरंइप न्दपअमतेपजल ब्ंउचनेए च्ंजपंसं में देश के विभिन्न भागों से आए हुए प्रशिक्षुओं को भाषा विज्ञान और डोगरी पढ़ाने के लिए बतौर गैस्ट लैक्चरर कार्य कर रहा था। हमने उस वर्ष  प्रशिक्षुओं को मगजमदेपवद स्मबजनतम देने के लिए डोगरी के सुप्रसिद्ध कवि, नाटककार एवं आलोचक श्री मोहन सिंह को पटियाला बुलया। उन्होंने बातों बातों में मुझे कहा ’यार निर्मल पद्मश्री रामनाथ शास्त्री जी अक्सर कहा करते थे कि मियां डीडो पर पंजाबी भाषा में कोई पुस्तक है। परंतु क्या है किसी को कुछ पता नहीं है। आप यहां पर हो तो वह किताब ढूंढने का प्रयास करो जो मियां डीडो पर पंजाबी भाषा में लिखी गयी है ताकि पता चल सके कि पंजाबी लेखक ने डीडो के बारे में क्या लिखा है ? चूंकि डीडो का संघर्ष, उसकी लड़ाई पंजाब के शासक महाराजा रंजीत सिंह के खिलाफ थी। मैं मोहन सिंह की बातों से बहुत प्रभावित हुआ और मियां डीडो पर लिखी हुई पंजाबी किताब की खोज में जुट गया। मैने बहुत खोजबीन की छवतजीमतद त्महपवदंस स्ंदहनंहम ब्मदजतमए च्ंजपंसं की लाइब्रेरी, पंजाबी यूनीवर्सिटी की लाइब्रेरी, पब्लिक लाइब्रेरी और भाषा विभाग , पंजाब की लाइब्रेरी के साथ-साथ स्थानीय साहियकारों की व्यक्तिगत लाइब्रेरियों में भी खोज की परंतु डीडो पर कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं हुई।
आखिर में हार कर मैने अपने एक विद्यार्थी हरप्रीत सिंह से इस विषय में बात की। वह डोगरी सीखने के साथ-साथ पंजाबी यूनीवर्सिटी के थिएटर डिपार्टमैंट से पी-एचडी0 भी कर रहा था। उसने कहा ’’सर किताब तो मिल जाएगी आपको पार्टी करानी पड़ेगी। ’’ मैने कहा कोई बात नहीं पार्टी भी करवा दूंगा पहले वो किताब तो ला के दो। कुछ दिनों के बाद हरप्रीत वह किताब ले आया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। किताब थी सन् 1934 में लाहौर से प्रकाशित लाला कृपा सागर का लिखा हुआ पंजाबी नाटक ‘डीडो जम्वाल’। आप सोच भी नहीं सकते कि मुझे कितनी खुशी हुई होगी पुस्तक मिलने की। परंतु पुस्तक थी बहुत ही खस्ता हालत में। मैं जैसे ही उसका पन्ना पलटता तो वह भुरभुरा जाता इस बात से मैं परेशान हो गया। मैने उसको सवसे पहले फोटोस्टेट करवाया। असली वाला बापिस कर दिया और फोटोकापी पढ़ने लगा।
जब मैंने इसको पढ़ा तो मुझे अपनी डोगरा कौम पर एक तरह से शर्म महसूस हुई। जिस व्यक्ति ने अपनी मातृभूमि और अपनी कौम के लिए इतना कुछ किया। अपना और अपने परिवार का बलिदान दे दिया। उसको हमने भूला दिया। हमारे इतिहासकारों ने उसे इतिहास में उपयुक्त स्थान नहीं दिया। इतिहास में अगर कहीं नाम आता भी है तो वह इस तरहा से कि डीडो लुटेरा था। मैने इस पंजाबी नाटक को दो-तीन बार पढ़ा। जब भी नाटक को पढ़ता आंखों से आंसू अपने आप बहने लगते। नाटक पढ़ते-पढ़ते मैं कब डीडो बन जाता मुझे पता ही न चलता। डीडो के बारे में बचपन से ही किस्से कहानियां अपने बड़े बुजुर्गों से सुनते आए थे। उनके व्यक्तित्व से मै बहुत ही प्रभावित था। डीडो मेरे आदर्श पुरूषों में से एक हैं। मैने विचार किया कि इस महान आत्मा के साथ डोगरा कौम को परिचित करवाना चाहिये। यही कारण हैं कि तो मैने इसका डोगरी भाषा में अनुवाद कर दिया। इस प्रकार सन् 2011 में पंजाबी नाटक ‘‘ डीडो जम्वाल ‘‘ डोगरी में ‘‘ मियां डीडो ’’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ और डोगरी पाठकों के हाथों में पहुंचा।
ब्ंादना-यशपाल निर्मल जी जैसा कि आपने कहा कि इस नाटक की खोज काफी समय से की जा रही थी और अब जब आपने इसे ढूंढ कर डोगरी भाषा में प्रकाशित भी करवा दिया तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही ? मतलब आपको कैसा त्मेचवदेम मिला ?
यशपाल- मैने जब इस नाटक का अनुवाद किया था तो मेरा मकसद सिर्फ और सिर्फ डोगरा कौम को अपने लोकनायक डीडो से परिचित करवाना था। लेकिन इसका जो मुझे त्मेचवदेम मिला वह मेरी उम्मीद से कहीं बढ़ कर है। इसका पहला संस्करण एक वर्ष के भीतर ही समाप्त हो गया । इस नाटक को लोगों ने हाथें हाथ खरीदा जबकि डोगरी की किताबों को खरीद कर तो क्या लोग मुफत में भी नहीं पढ़ते। फिर दूसरा संस्करण प्रकाशित करवाना पड़ा। इस नाटक का जम्मू में इतना स्वागत हुआ कि डोगरी के स्तम्भ कहे जाने वाले कई स्थापित साहित्यकारों , विद्वानों और आलोचकों ने इस नाटक पर अपने शोधपरक एवं आलोचनात्मक लेख लिखे। डोगरी शोध पत्रिका ‘‘ सोच-साधना ‘‘ ने इस नाटक पर आधारित अपना विशेषांक प्रकाशित किया। जिसमें हिंदी, डोगरी एवं अंग्रेजी भाषा में डोगरी नाटक ‘‘ मियां डीडो ‘‘ पर अलग अलग विद्वानों के लगभग 20 आलोचनात्मक एवं शोध लेखों को संकलित किया है। यह लेख पहले ही राज्य एवं राष्ट्र स्तर की साहित्यक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे। इसके साथ ही वर्ष 2014 का साहित्य अकादेमी का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार भी मेरे इस अनुवाद पर मुझे मिला। मेरे इस अनूदित नाटक को आधार बना कर इसके अंग्रेजी, हिंदी , उर्दू एवं कश्मीरी भाषाओं में अनुवाद हो रहें हैं। इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि मुझे इसका बहुत अच्छा त्मेचवदेम मिला।
बंदना-निर्मल जी क्या आपने ‘‘ मियां डीडो ’’ के इलावा और भी अनुवाद कार्य किए हैं ? और आप कौैन कौन सी भाषाओं में अनुवाद कार्य कर रहे हैं ?
यशपाल- बंदना जी मैने सन् 1996 में ‘‘ श्रीमद्भागवत पुराण ‘‘ के डोगरी अनुवाद से अनुवाद कार्य आरम्भ किया था। उसके बाद ‘‘ सिद्ध बाबा बालक नाथ ’’ पुस्तक का हिन्दी से डोगरी भाषा में अनुवाद किया। सन् 2011 में ‘‘ मियां डीडो ’’ का पंजाबी से डोगरी अनुवाद प्रकाशन किया और फिर  सन् 2013 में डाॅ0 सुशील शर्मा के शोध कार्य ‘‘ देवी पूजा विधि विधान: समाज सांस्कृतिक अध्ययन ‘‘ का पंजाबी से डोगरी अनुवाद, सन् 2014 में प्रो0 एस0एस0 छीना के संस्मरण ‘‘ वाह्गे आह्ली लकीर ’’ का पंजाबी से डोगरी में अनुवाद , सन् 2015 में ‘‘ मनुक्खता दे पैह्रेदार: लाला जगत नारायण ‘‘ जीवनी का हिन्दी से डोगरी अनुवाद, सन् 2015 में  बलजीत सिंह रैणा के पुरस्कृत पंजाबी कहानी संग्रह ‘‘ सुधीश पचौरी ने आक्खेआ हा ‘‘ का जम्मू कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकैडमी के लिए डोगरी में अनुवाद , सन् 2015 में ही श्री मोहन सिंह के डोगरी निर्बन्ध काव्य ‘‘ घड़ी ‘‘ का हिन्दी अनुवाद और सन् 2016 में श्री प्रदीप बिहारी की साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत मैथिली कहानी संग्रह ‘‘ सरोकार ’’ का डोगरी अनुवाद प्रमुख हैं। इसके इलावा बहुत सी किताबों का अनुवाद किया हुआ है जो प्रकाशन के इंतजार में हैं जिनमें ‘‘सरकार ‘‘, ’’लैहरां ’’ , ‘‘ क्लीन चिट्ट ‘‘,  ’’ ऐंटीगोनी ‘‘ , ‘‘ दस दिन दा अनशन ‘‘ , ‘‘ हैलो माया ’’ , ’’ पाखलो ’’ , ‘‘ अंतिम साक्ष्य ‘‘ , ’’ हंस अकेला रोआ ’’ आदि प्रमुख हैं। आपका दूसरा प्रश्न था किन किन भाषाओं में अनुवाद करते हैं। मैं डोगरी, हिन्दी, पंजाबी, अंग्रजी और उर्दू भाषाओं में काम कर रहा हूं।
बंदना- अनुवाद के इलावा अपने मौलिक लेखन के बारे में बताएं ?
यशपाल-मौलिक लेखन की मेरी पहली पुस्तक ‘‘ अनमोल जिंदड़ी ’’ शीर्षक से सन् 1996 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद सन् 2007 में ‘‘ लोक धारा ’’ , सन् 2008 में ‘‘ बस तूं गै तूं ऐं ’’ प्रकाशित हुई। अब तक मेरी कुल 24 पुस्तकें सभी विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
बंदना- आपको ‘‘ मियां डीडो ’’ के लिए साहित्य अकादेमी का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार प्राप्त हुआ है। क्या इसके अतिरिक्त आपको कोई और पुरस्कार प्राप्त हुआ है ?
यशपाल- बंदना जी, ‘‘ मियां डीडो ’’ के लिए साहित्य अकादेमी का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार 2015 में प्राप्त हुआ। इसके इलावा जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकैडमी और कुछ गैर-सरकारी संस्थाएं हैं जिन्होंने मुझे समय समय पर पुरस्कृत एवं सम्मानित किया है। उनमें  कमला भारती, बिहार, डोगरी कला मंच ज्यौड़ियां, त्रिवेणी कला कुंज, कठुआ, तपस्या कला संगम, अखनूर, डोगरी भाषा अकैडमी, जम्मू, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जम्मू, राष्ट्रीय कवि संगम, जम्मू-कश्मीर, डुग्गर मंच, जम्मू, राइटर्स क्लब, अखनूर, नटमंच, जम्मू , प्रोग्रेसिव यूथ सोसाइटी, रामनगर आदि प्रमुख हैं।
बंदना-निर्मल जी क्या आप जम्मू-कश्मीर के बाहर भी साहित्यक गतिविधियों के लिए सक्रिय हैं ?
यशपाल- जी बंदना जी, ब्मदजतंस प्देजपजनजम व िप्दकपंद स्ंदहनंहमे ;डलेवतमद्धए छवतजीमतद त्महपवदंस स्ंदहनंहम ब्मदजतम ;च्ंजपंसंद्धए साहित्य अकादेमी, छवतर्जी वदम ब्नसजनतंस ब्मदजतमए ब्ींदकपहंतीए न्तकन ज्मंबीपदह ंदक त्मेमंतबी ब्मदजतमए;ैवसंदद्ध राष्ट्रीय कवि संगम एवं केद्रीय हिन्दी निदेशालय के कई साहित्यक कार्यक्रमों में भाग लेने का सुअवसर मिला है।
बंदना- आप हिन्दी, डोगरी और पंजाबी भाषाओं में अनुवाद एवं सृजनात्मक लेखन करते हैं, भाषाविज्ञान और व्याकरण पर भी आपने कार्य किया है। आलोचना में भी अपका हस्तक्षेप है। सृजनात्मक लेखन में भी आपने कविता, कहानी, लघु कथा, निबंध, बाल साहित्य आदि बहुविधाओं में कलम चलाई है तो इतना सब कैसे कर लेते हैं आप ?
यशपाल- बंदना जी, मैने लेखन की शाुरूआत कविता से की थी। उसके बाद कब मुझसे प्रकृति ने कहानी लिखवाना शुरू करवा दिया मुझे स्वयं भी पता नहीं चला। अनुवाद तो शुरू से ही मेरा पसंदीदा विषय रहा है। सन् 1998 के आद पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद मैने आलोचना में भी हाथ आजमाया। सन् 2007 में मेरी नियुक्ति छवतजीमतद त्महपवदंस स्ंदहनंहम ब्मदजतमए च्नदरंइप न्दपअमतेपजल ब्ंउचनेए च्ंजपंसं में देश के विभिन्न भागों से आए हुए प्रशिक्षुओं को भाषा विज्ञान और डोगरी पढ़ाने के लिए बतौर गैस्ट लैक्चरर हुई।  वहां मैने महसूस किया कि ैजनकल डंजमतपंस की कमीं थी। जब मैने उन प्रशिक्षुओं के लिए ैजनकल डंजमतपंस तैयार करने की दिशा में कार्य करना आरम्भ किया तो भाषाविज्ञान एवं व्याकरण में मेरी रूची बढ़ी। मैने छवतजीमतद त्महपवदंस स्ंदहनंहम ब्मदजतमए च्नदरंइप न्दपअमतेपजल ब्ंउचने ;च्ंजपंसंद्धए ब्मदजतंस प्देजपजनजम व िप्दकपंद स्ंदहनंहमे ;डलेवतमद्ध और न्तकन ज्मंबीपदह ंदक त्मेमंतबी ब्मदजतम ;ैवसंदद्ध के लिए कई प्राजैक्टस पर कीर्य किया। और भाषाविज्ञान, व्याकरण और शिक्षण से संबंधित कई पुस्तकों का लेखन किया। मैं तो केवल मात्र साधन हंू । करने करवाने वाली तो कोई और शक्ति है। वह मुझसे जो करवाती है वह हो जाता है। मैं स्वयं कुछ नहीं करता और न ही मुझमें इतनी योग्यता है कि मैं कुछ कर पाउं। ब सवह परम शक्ति ही है जो मेरे माध्यम से यह सब करती है। मैं तो इतना ही जानता हूं।
बंदना-आपका रूझान कैसे हुआ इन सब चीजों की ओर ? क्या घर में कोई साहित्यक माहौल था ?
यशपाल – घर में उस प्रकार का कोई साहित्यक माहौल तो नहीं था। मेरी माता जी सात्विक विचारों की महिला थी। पिता जी किसान थे। दादा जी श्रीमद्भागवत गीता और श्रीमद्भगवत गीता का पाठ किया करते थे और हम सभी भाई बहन उनके पास बैठ कर सुना करते थे।  जब तक हम दादी से कोई लोक कत्थ न सुन लेते हम बच्चों को नींद न आती। इन सब चीजों का मिला-जुला प्रभाव मेरे बालमन पर भी पड़ा होगा। बचपन में मुझे डायरी लिखने का बहुत शोक था। मैं किसी पर अन्याय होते नहीं देख सकता। प्रकृति से मुझे असीम प्रेम है। यही कारण रहें हैं जिन्होंने मुझे लेखन की ओर प्रेरित किया।
बंदना-अनुवाद के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?
यशपाल -अनुवाद एक कठिन एवं श्रमसाध्य कार्य है। किसी मूल भाषा के विचार को सौंदर्यपूर्वक लक्ष्य भाषा में परिवतिर्त करना ही अनुवाद है। मेरा यह मानना है कि अनुवाद तोे मौलिक लेखन का पुनर्सृजन है। मूल भाषा की रचना को आत्मसात करके अनुवादक को लक्ष्य भाषा की सुंदरता को बरकरार रखने हुए पुनर्सृजन ही करना पड़ता है। अनुवादक का कार्य इतना कठिन होने के बावजूद उसे वह मान सम्मान और मानदेय नहीं मिलता जो उसे मिलना चाहिये। जबकि अनुवादक का कार्य है बहुत ही महत्वपूर्ण। जहां मूल लेखक एक भाषा को समृद्ध करता है वहीं अनुवादक दो भाषाओं को समृद्ध करता है। अनुवादक जोड़ने का कार्य करता है वह विभन्न भाषाओं और संस्कृतियों को आपस में जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।। भारत जैसे बहुभाषीय देश में अनुवाद और अनुवादक का महत्व और भी अधिक है।
बंदना- आपको ‘‘ मियां डीडो ’’ के लिए साहित्य अकादेमी का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार प्राप्त हुआ है। आप कैसा महसूस करते हैं ?
यशपाल – मैं समझता हूं कि यह केवल मेरा ही सम्मान नहीं है। यह डुग्गर के महान लोक नायक मियां डीडो का सम्मान है। डुग्गर प्रदेश का सम्मान है और डुग्गर प्रदेश की वीर बहादुर एवं राष्ट्रवादी डोगरा कौम का सम्मान है। मैं इस सम्मान का सम्मान और सतकार करता हूं। इस से मेरे कंधों पर जिम्मेवारी और  भी बढ़ गयी है। मैं अपने कार्य को और भी उत्साह और पूरी इमानदारी से करूंगा।
बंदना- आप पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं, इस पर प्रकाश डालना चाहेंगेेेेे ?
यशपाल – मैंने कइ्र्र समाचार पत्रों के साथ बतौर संवाददाता कार्य किया है जिनमें , ‘‘ दैनिक जागरण’’, ’’ अमर उजाला ’’, ‘‘ विदर्भ चंडिका ’’ आदि प्रमुख हैं। वर्तमान में भी मै तीन साहित्यक पत्रिकाओं के साथ जुड़ा हुआ हंू जिनमें ’’ सोच-साधना’’ एवं ‘‘ डोगरी अनुसंधान ’’ पत्रिकाएं डोगरी भाषा की हैं। और ‘‘ अमर सेतु ‘‘ हिन्दी की पत्रिका है।
बंदना- अंत में युवाओं के लिए क्या कहना चाहेंगें ?
यशपाल – मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि आप जीवन में कभी भी निराश न हों। मेहनत करें, काम करें और सिर्फ काम करने की नियत से काम करें। जिस भी क्षेत्र को चुनें उसमें अपनी पूरी जान लगा दें। फल भी बहुत अच्छा मिलेगा, चाहे देर से ही क्यो न मिले। मिलेगा जरूर।
- बन्दना ठाकुर                           
- यशपाल निर्मल

 

डोगरी एवं हिंदी भाषा के युवा लघुकथाकार, कथाकार, कवि, आलोचक,लेखक, अनुवादक, भाषाविद् एवं सांस्कृतिककर्मी  यशपाल निर्मल का जन्म 15 अप्रैल 1977 को जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र छंब ज्यौडियां के गांव गड़ी बिशना में श्रीमती कांता शर्मा एवं श्री चमन लाल शर्मा के घर पर हुआ।

आपने जम्मू विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा में स्नातकोतर एवं एम.फिल. की उपाधियां प्राप्त की। आपने वर्ष 2005 में जम्मू विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा में स्लेट एवं वर्ष 2006 में डोगरी भाषा में यू.जी.सी. की नेट परीक्षा उतीर्ण की । आपको डोगरी,हिन्दी,पंजाबी, उर्दू एवं अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान है। आप कई भाषाओं में अनुवाद कार्य कर रहें है। आपने सन् 1996 में एक प्राईवेट स्कूल टीचर के रूप में अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत की। उसके उपरांत “दैनिक जागरण”, “अमर उजाला” एवं “विदर्भ चंडिका” जैसे समाचार पत्रों के साथ बतौर संवाददाता कार्य किया। वर्ष 2007 में आप नार्दन रीजनल लैंग्वेज सैंटर ,पंजाबी यूनिवर्सिटी कैंपस,पटियाला में डोगरी भाषा एवं भाषा विज्ञान के शिक्षण हेतु अतिथि ब्याख्याता नियुक्त हुए और तीन वर्षों तक अध्यापन के उपरांत दिसंबर 2009  में जम्मू कश्मीर कला,संस्कृति एवं भाषा अकैडमी में शोध सहायक के पद पर नियुक्ता हुए और  जून 2017 में पदोन्नत होकर सहायक संपादक पद पर नियुक्त हुए। 

आपने लेखन की शुरुआत वर्ष 1994 में की और सन 1995 में श्रीमद्भागवत पुराण को डोगरी भाषा में अनूदित किया। 

सन् 1996 में आपका पहला डोगरी कविता संग्रह ” अनमोल जिंदड़ी” प्रकाशित हुआ।

अब तक हिन्दी , डोगरी एवं अंग्रेजी भाषा में विभिन्न विषयों पर 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके अनुवाद कार्य, साहित्य सृजन ,समाज सेवा,पत्रकारिता और सांस्कृतिक क्षेत्रों  में अतुल्निय योगदान हेतु आपको कईं मान सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं:-

1. नाटक “मियां डीडो” पर वर्ष 2014 का साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार।

2. पत्रकारिता भारती सम्मान(2004)

3. जम्मू कश्मीर रत्न सम्मान (2010)

4. डुग्गर प्रदेश युवा संगठन सम्मान (2011)

5. लीला देवी स्मृति सम्मान(2012)

6. महाराजा रणबीर सिंह सम्मान(2013)

 7. राष्ट्रीय अनुवाद साहित्य गौरव सम्मान (निर्मला स्मृति साहित्यक समिति, चरखी दादरी एवं भारतीय अनुवाद परिषद, दिल्ली, 2017)

 

आपकी  चर्चित पुस्तकें हैं:-

 1. अनमोल जिंदड़ी (डोगरी कविता संग्रह, 1996)

2. पैहली गैं ( कविता संकलन संपादन,2002)

3. लोक धारा ( लोकवार्ता पर शोध कार्य,2007)

4. आओ डोगरी सिखचै( Dogri Script, Phonetics and Vocabulary,2008)

5. बस तूं गै तूं ऐं (डोगरी कविता संग्रह,2008)

6. डोगरी व्याकरण(2009)

7. Dogri Phonetic Reader(2010)

8. मियां डीडो ( अनुवाद,नाटक,2011)

9. डोगरी भाषा ते व्याकरण(2011)

10. पिण्डी दर्शन (हिन्दी,2012)

11. देवी पूजा विधि विधान: समाज सांस्कृतिक अध्ययन ( अनुवाद, 2013)

12. बाहगे आहली लकीर ( अनुवाद, संस्मरण 2014)

13. सुधीश पचौरी ने आक्खेआ हाँ ( अनुवाद, कहानी संग्रह,2015)

14. दस लेख (लेख संग्रह ,2015)

15. मनुखता दे पैहरेदार लाला जगत नारायण ( अनुवाद , जीवनी,2015)

16. घड़ी ( अनुवाद, लम्बी कविता, 2015)

17. समाज-भाशाविग्यान ते डोगरी (2015)

18. साहित्य मंथन ( हिन्दी आलोचना, 2016)

19. डोगरी व्याकरण ते संवाद कौशल (2016)

20. शोध ते परचोल (डोगरी आलोचना, 2016)

21. भारती इतेहास दा अध्ययन :इक परीचे (डी.डी. कोसंबी की मूल अंग्रेजी पुस्तक का डोगरी में अनुवाद,2017)

22. गागर ( लघुकथा संग्रह, प्रकाशनाधीन)

 

 इसके इलावा सैंकड़ो लेख, कहानियां लघु कथाएं एवं कविताएँ समय समय पर राज्य एवं राष्ट्र स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित।

कई राश्टरीय स्तर की कार्यशालाओं, संगोश्ठिओं, सम्मेलनों, कवि गोश्ठिओं एवं साहित्यक कार्यक्रमों में भागीदारिता।

 

आप कई साहित्यक पत्रिकाओं में बतौर सम्मानित संपादक कार्यरत हैं जिनमें से प्रमुख हैं:-

1. अमर सेतु (हिन्दी)

2. डोगरी अनुसंधान (डोगरी)

3. सोच साधना(डोगरी)

4. परख पड़ताल(डोगरी)

 

आपको कई साहित्यक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं ने सम्मानित किया हुआ है जिनमें प्रमुख हैं:-

1. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

2. राष्ट्रीय कवि संगम

3. डुग्गर मंच

4. डोगरी भाषा अकैडमी

5.डोगरी कला मंच

6. तपस्या कला संगम

7. त्रिवेणी कला कुंज

8. हिंद समाचार पत्र समूह

9. जम्मू कश्मीर अकैडमी आफ आर्ट , कल्चर एंड लैंग्वेजिज।

 सम्पर्ति- सहायक संपादक, जम्मू कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकैडमी, जम्मू

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