सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य

भवानी प्रसाद मिश्र ने जिस युग में लिखना आरम्भ किया था वह छायावादी युग था। हिन्दी जगत् में नवजागरण की चेतना भी तीव्र से तीव्रतर होती जा रही थी। राष्ट्रीय सांस्कृतिक-आन्दोलन का जिस ढ़ँग से विस्तार हो रहा था, उसी ढ़ँग से सृजनात्मकता भी बदल रही थी। अपने समय की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के भीतर से मिश्र जी की कविता फूटती है। भारतीय परम्परा रही है कि हमारी जातीय चेतना एक कमलों से पटा हुआ वन-उपवन रही है, यदि जिसमें हम कमल को अलग कर दें, तो उत्सर्ग और अर्पण के भाव पर ही कुठाराघात होता है। हमारी संस्कृति ने आरम्भ से ही लोकमंगल के बीज देश के भीतर बोये हैं और इन्हीं से हमारा सारा अस्तित्व बँधा हुआ है। हमारी कुरूप और कुरंग आकृतियाँ हिंसा से नहीं, प्रेम की पीर से मिट सकती हैं। संस्कृति का आधार समाज है और समाज का आधार संस्कृति है। सामान्यतः संस्कृति शब्द के अर्थ में संस्कार, परिमार्जन, परिशोधन एवं परिष्कार शब्द आदि को लिया जाता है। संभवतः किसी राष्ट्र और समाज में परम्परागत प्रचलित आदर्शों, प्रथाओं, रीतियों, नीतियों, स्थापनाओं, व्यवहार, संस्कारों एवं मूल्यों के समन्वित रूप को संस्कृति कहा जा सकता है, जिसका सम्बन्ध मानवीय जीवन के विभिन्न्ा पक्षों से हैं। गैरोला वाचस्पति संस्कृति के विकास में सभी रूढ़ियों, परम्पराओं और रीति-रिवाज़ों को समाहित करते हुए आदर्श समाज में संस्कृति का उद्गम मानते हैं। उनका विचार है कि-‘‘मानव जीवन के विकास की व्यष्टिमय और समष्टिमय उपलब्धियाँ ही संस्कृति होती है। डाॅ॰ राधाकृष्णन का मन्तव्य है कि-‘‘जीवन की विभिन्न और घन्ष्ठि समस्याओं पर हुआ चिंतन और उसकी अभिव्यक्ति ही संस्कृति है।’’ भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में संस्कृति के बहुतेरे चित्र उकरे हुए मिलते हैं जिनमें मूल्यों का विघटन, आधुनिकतावाद और प्रकृति के प्रति प्रेम भावना का स्पष्टांकन देखने को मिलता है।
मूल्यों का ह्रास
आज़ादी के बाद जो संस्कार, मान-मर्यादा, मानव-मूल्यों की बात की गई थी वह हाशिये पर आ गई। क्योंकि ऐसी त्रासदपरक स्थिति पैदा हुई कि मूल्यों का हास होना आरम्भ हो गया। व्यक्ति-व्यक्ति में सौहार्द्र नहीं रहा, संस्कारों की अवहेलना की गई। जीवन मूल्य किसी बंद पड़़े संदूक में धरे रह गए। भवानी भाई के काव्य में इन सबका यथार्थ वर्णन परिलक्षित होता है। आज मानव की स्थिति बड़ी असमंजस की हो गयी है। कवि इस स्थिति को देख रहा है साथ ही भोग भी रहा है। पग-पग पर उसके स्वाभिमान को चोट पहुँचायी जाती हैं उसका मनचाहा उसे नहीं मिलता, अपना मनचाहा वह नहीं कर पाता। ऐसे में जो व्यंग्य उभरे हैं, वे तीखे हैं, कड़वे हैं, हास्य उनमें नहीं है वे अन्तर्मन को बेधने की शक्ति रखते हैं।
आज के दौर में आदमी कितना निरीह प्राणी होकर रह गया हैं उससे ज़्यादा मूर्ख या असहाय प्राणी ही दूसरा नहीं दिखाई देता। यथा-
भगवान चाहता
तो वह आदमी से भी
अधिक मूर्ख
कोई प्राणी
बना सकता था।
मगर
नहीं बनाया उसने
आदमी से अधिक मूर्ख
कोई प्राणी।
व्यक्ति की स्वयं की मान्यताएँ कुछ भी नहीं रही। वह स्वयं अपने लिए जीवन मूल्यों की स्थापना नहीं कर सकता। स्वयं अपने ढ़ँग से सोचने और जीने की बात नहीं कर सकता। दूसरों के द्वारा तय किये जीवन-मूल्यों के अनुसार ही उसे अपना जीवन बिताना है। ऐसी स्थिति पर व्यंग्य करते हुए मिश्र जी लिखते हैं। यथा-

कुछ जानकारी
कुछ मान्यताएँ
कुछ तय करके थमा दिये गये
मूल्य
खोखले कुछ शब्द
ठोस कुछ धमकियाँ
क्यों मियां इन्हीं को थामे हुए
घूमते रहोगे।
समाज में सांस्कृतिक मूल्यों का निरन्तर ह्रास और उसके स्थान पर नवीन संस्कृति का विकास निश्चय ही कष्टकर स्थिति है। पश्चिम का अंधानुकरण, बढ़ता यांत्रिकरण, नगरों का बढ़ता समूह, खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा के बदलते मूल्य निश्चय ही सहर्ष ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर पुनः विचार करने की आवश्यकता है। इस स्वर को मिश्र जी ने अपनी नई कविताओं में उभारा है। ‘संस्कृति का मोर्चा’ कविता में संस्कृति की स्थिति सम्वादों के माध्यम से उभारी है। यथा-
(क) क्या ख्याल है आपका
कैसा है हमारा यह विज्ञान भवन
(ख) क्या कहने हैं
(क) गहने हैं ये हमारी नयी तहजीब के
(ख) बेशक तहजीब इनसे सजती है
(क) जैसे पायल बजती है किसी नाजुक पाँवों में
(ख) मगर
(क) क्या
(ख) यह पाँवों की बात जो तुमने कही
(क) सो क्या हुआ
(ख) कुछ नहीं है मैं तुक्कड़ हूँ
पाँवांें की बात सुनते ही ख़्याल आ गया गाँवों का और
भटक गया मन कि
ये ज्ञान भवन विज्ञान भवन
उनके किस मर्ज की दवा है।
सम्पूर्ण कविता ही नवीन संस्कृति पर व्यंग्य है। इसमें कहीं पीड़ा है, कहीं बदला लेने की तीव्र आकाँक्षा है। हमारा यह दुर्भाग्य रहा है कि हमने हज़ारों सालों के मानसिक विकास को अपर्याप्त और अक्षम मान लिया है और हम अपनी हर समस्या का हल विदेशों से माँगने लगे हैं। विदेशों के पास क्या है कुछ रक़्त फल हैं बाँट रहे हैं और अगर इन्हें कोई नहीं ले रहा है तो वह उन्हें डाँट रहे हैं। स्वयं गाँधी जी ने विदेशी विचारों को परखा था और उनका विश्वास था कि विचार और प्रेम की शक्ति से ही आदमी को बदला जा सकता है। गाँधी विरोधी देश और देश के बाहर गाँधी जी की निन्दा करते रहे हैं और समूची मानवता की प्रगति और परिणाम के नाम पर हिंसावादी और कभी समाज विरोधी विचार-दर्शन-दर्शनों का समर्थन करते रहते हैं। मिश्र जी मानते हैं कि मानवता का सही रास्ता गाँधी विचार दर्शन का ही रास्ता है-
आदमी का आदमी से भेद
आधार चाहे जाति हो गया वर्ग हो या रँग हो
धर्म हो या देश हो या सोचने का ढंग हो,
तुम को नहीं है सह्य।
भारतीय-संस्कृति सदा से मानव मूल्यों के शिक्षण एंव परिपोषण के लिए सचेष्ट रही है और संस्कृति में जीवन मूल्यों का संवर्द्धन एवं निर्वाह आवश्यक समझा गया है। संस्कृति का संवाहक साहित्य भी सतत् जीवन मूल्यों के संवर्द्धन में व्यस्त मिलता है और भारतीय मनीषा उसी कृतिकार को सफल मानती है जो मानवता के पोषक मूल्यों की पुष्टि के लिए साहित्य-सृजन करता है। मिश्र जी भी जीवन-मूल्यों के सम्पोषक रचनाकार हैं।
वैयक्तिक और समाजिक जीवन में मनुष्य सबसे बड़ा जीवन-मूल्य है। मनुष्यता के अभाव में अन्य समस्त उपलब्धियाँ व्यर्थ हो जाती है। कवि भवानी प्रसाद मिश्र जी ने मनुष्य को मनुष्य बनने की प्रेरणा दी है। उनके अनुसार, मनुष्य संज्ञा का सच्चा अध्किारी वह है जो-
लँगड़े को पाँव और
लूले को हाथ दे,
सत की संभार में
मरने तक साथ दे,
बोले तो हमेशा सच
सच से हटे नहीं,
झूठ के डराये से
हरगिज डरे नहीं।
सचमुच वही सच्चा है।
प्राणी का वैसे और
दुनियाँ में टोटा नहीं,
कोई प्राणी बड़ा नहीं
कोई प्राणी छोटा नहीं।
मिश्र जी की यह अवधारणा मानवता के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण है। आज का अतिभौतिकवादी समाज मनुष्य को धन से तौलता है। जिसके पास जितनी आधिक सम्पत्ति शक्ति है, वह उतना ही बड़ा आदमी समझा जाता है। भवानी प्रसाद मिश्र इस भ्रान्ति को तोड़ते हैं और मानवीय समता का ही नहीं अपतिु जीवनमात्र की समानता को अभिव्यक्ति देते हैं।
पाश्चात्य संस्कृति के भारतीय संस्कृति में मिलने से जो कुरूपता आ गई है उस कारण मूल्यों का नैतिक पतन होना आरम्भ हो गया है। पाश्चात्य सभ्यता के आत्म-केन्द्रित स्वार्थी भाव ष्म्ंजए कतपदा ंदक इम उमततलष् से नितान्त भिन्न निःस्वार्थ भाव से स्वयं को निःशेष कर देने में भारतीयता अपनी सार्थकता समझती है। पाश्चात्य संस्कृति के कारण व्यक्ति जहाँ व्यक्तिवाद तक केन्द्रित हो गया है भवनी प्रसाद मिश्र वहाँ व्यक्ति को व्यष्टि से समष्टि में ले जाते हैं। वे मन को साधते हुए लिखते हैं-
दर्द है भीतर तो अपने दर्द
की कीमत चुका
प्यार-प्रत्यंचा से अपने
देह की धनुही झुका
छोड़ दे विश्वास के उस पर
चढाकर तीर मन
तू किसे देगा अभय जो,
खुद हुआ दिलगीर मन।
मुक्त व्यक्ति ही अन्य बन्धन-बद्ध जन को मुक्त कर सकता है। जो स्वयं बद्ध है वह किसी को मुक्ति कैसे दिला सकता है? इसीलिए मिश्र जी सर्वविध मुक्तता को जीवन का अनिवार्य मूल्य मानते हैं। भवानी प्रसाद मिश्र ने भी इस जीवन मूल्य की प्रतिष्ठा का प्रयत्न किया है। गाँधी पंचशती में वे लिखते हैं कि अकर्मण्य जीवन-बेस्वाद होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन एवं मृत्यु दोनों के आनन्द से वंचित रह जाता है। वे लिखते हैं-
हम जिन्दा तो रहना चाहते है।
मगर जितना बने उतना बचकर काम से
याने ज़रूरत से ज़्यादा आराम से
और फिर दुख उठाते हैं विवश बेमज़ा
सिवा शिकायत के फिर हम
कुछ कर नहीं पाते
ढ़ँग से जीना तो दूर
ढ़ँग से भर नहीं पाते।
भवानी प्रसाद मिश्र जी का मानना है कि आज के दौर में मनुष्य होना का अर्थ निर्भीक और स्वाभिमानी भी है। सीधेे तनकर खड़ा होना मनुष्य का गुण है। आज तुच्छ स्वार्थों; लालसाओं की पूर्ति के लिए बहुत से जन श्वानरत परमुखापेक्षी बनकर अपनी मानवीय गरीमा को आघात पहुँचाते हैं। कवि लिखता है-
सीधी बात समय पर सूझे
कठिनाई से बढ़कर जूझे
दिशा समझकर चले बराबर
उसे आदमी कहो सरासर
दो दिन रूप
तीन दिन रूपा
गुन बिन
छूँछ उड़े ज्यों सूपा।
भवानी प्रसाद मिश्र लोक को पहचानते थे। यहाँ ‘लोक’ के अन्तर्गत दृश्य तथा अदृश्य जगत् समाहित है लेकिन फिर भी वे ग्राम्य-नगरीय लोकजीवन, शिक्षित-अशिक्षित सज्जन तथा संस्कृति और सभ्यता के अन्तर्सबंधों के आधार पर लोक की अस्मिता के लिए सुचिन्तित थे। मिश्र जी मानते हैं कि कविता रचने के लिए आन्तरिक प्रेरणा और विचारों को आत्मसात् कर सकने की क्षमता को आवश्यक मानते थे। सामाजिक मूल्यों, सांस्कृतिक मूल्यों एवं पारम्परिक मूल्यों के क्षरण एवं हरण पर रचनाकार मिश्र जी व्यथित हैं, चिन्तित हैं एवं आश्चर्यचकित हैं क्योंकि समाज में विघटन एवं निराशा का प्राधान्य है। सामाजिक आराजकता पर अफसोस व्यक्त करते हुए वे लिखते है। यथा-
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने।
सांस्कृतिक परिदृश्य में जहाँ मानवीय मूल्यों और जीवनादर्शों का घोर अकाल है, सर्वत्र निराशा, आराजकता, आतंकवाद एवं क्रूरता का तांडव नृत्य हो रहा है, वहाँ भी मिश्र जी का यथार्थ कहीं रचनाकार पूँजीवादी तानाशाही प्रवृत्ति की पोल खोलते हुए आक्रोशित स्वरध् ध्वनित करता है। यथा-
आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
आप सभ्य हैं क्यांेंकि आग बरसा देते हैं भूपर
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े महज बने हैं
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके जबड़े खू़न सने हैं।
भवानी प्रसाद मिश्र को जीवन मूल्यों की चिन्ता है इसलिए वह शान्त जल के सरोवर में कमल की सुरक्षा चाहता है, कहीं तूफ़ानी लहरों में मन का रक़्त कमल न बिखर जाये। कवि को मानव की अटूट शक्ति पर अगाध विश्वास है, व्यक्ति ख़ुद निर्माता है और समय का नियन्त्रक भी। वह चारों ओर फैली उथल-पुथल के बीच शान्ति का स्थापक है। सिर पर बोझ लिए औरत और कन्धे पर हल धरे किसान सर्जन शक्ति के परिचायक हैं। समय, शान्ति, निर्माण, पूर्णता-सब कर्मठ व्यक्ति के हाथों में हैं। संघर्षरत मानव के भावी जीवन की सुखद संभावनाएँ इस काव्य पंक्तियों में देखिए-
सिर पर बोझा लिये
जा रही है एक औरत
कंधे पर हल धरे
लौट रहा है एक किसान
दौड़ रहा है तांगे में
जुता हुआ छोड़ा
थोड़ा-बहुत निर्माण भी
कहीं नहीं है
निर्माण तुम ख़ु़द हो
जिनती देर तुम हो
उतनी देर निर्माण है
शान्ति है समय है।
कालपुरूष किसी को नहीं छोड़ता। वह रचता है, सँवारता है, उसके हाथ सृजन पटु हैं किन्तु वह अपने में सब कुछ समेट भी लेता है चाहे मिस्त्र की सभ्यता हो, चाहे रोम की, चाहे बालक हो या वृद्ध किन्तु यहीं से नया सृजन चालू होता है। यही जीवन चक्र है। इसलिए कवि सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास से ज़रा भी हतोत्साहित नहीं होता, आहत ज़रूर हुआ है। परन्तु वे मानते हैं कि बीज वृक्ष के रूप में पनपकर फल-फूल देता हुआ वंश वृद्धि करता है और अंत में पुनः बीज रूप में परिवर्तित होता है, उसके सृजन पक्ष की महत्ता कम नहीं। कवि भवानी प्रसाद मिश्र जीवन के इसी सृजन पक्ष से पूर्णतः आसक्त हैं, वे जीवन से हताश नहीं है। वे नकारात्मकता से ही सकारात्मकता की अ®र आते जाते हैं कवि ‘अन्ध-विश्वास’ नामक कविता में मूल्यों के अवमूल्यन की, मानव के नैतिक पतन की स्पष्ट झाँकी इस प्रकार व्यक्त करता है। यथा-
‘अन्ध’ किसी अर्थ में
नहीं माना जा रहा है
क्योंकि दृष्टि इसमें
जानने से आगे जाकर
लूटने-खसोटने
डरने-डराने
मरने-मारने की है।
कहने का आशय है कि आज चहुँओर मारा-मारी है, लूटखोरी है। शोरगुल है। यहाँ सच में स्वतन्त्रता पराजित हो गई है। कवि वेदना के स्वरों में व्यथित होकर लिखता है। यथा-
अब शोर को
किस चीज़ से तोड़ें
भीड़ को जो सौ तरह की है
किस विचार या
भाव से जोड़ें
चुप्पी समस्या नहीं थी
एकाकीपन नहीं या
समस्या
शोर समस्या है
भीड़ समस्या है
और अपरम्पार है
स्वीकार करनी चाहिए
हमें अपनी हार
सीधे-सीधे।
बहुत सी व्यथाएँ हैं, वेदनाएँ हैं जिनको कवि बयान नहीं कर सकता क्योंकि जितना वह उसे बयान करता जाता है उतना ही वह अन्तर्मन से द्रवित हो जाता है। ‘विषाद-योग’ कविता का उदाहरण देखें-
मेरे देश के जंगलों में
पंछी हिरन चीतल नील गाय
साँभर नहीं हैं अब
दरिंदे ही दरिंदे हैं इसमें
अब जगह-जगह
धधका नहीं पाता मैं अब।
अपने मन की चिनगारियाँ यों
कि सब जगह दरिंदे ही दरिंदे हैं
कैसे जला दूँ समूचे अपने देश को
देखता हूँ चुपचाप।
आधुनिकता
संस्कृति पर जब कुठाराघात होता है तो संस्कृति अपसंस्कृति हो जाती है। जब मूल्यों का पतन हुआ, मानसिकता औंधे मुँह काल के गर्त मे ंजा गिरी तो ऐसे में मानव सभ्यता का विकास असंभव ही है। ब्रिटिश औपनिवेशिकता के कारण समाज में सभ्य होने का लबादा चढ़ गया। अन्दर से कुछ और बाहर से सभ्य और सुसंस्कृत होने का दिखावा लोग करते हैं। इन पर मिश्र जी लिखते हैं। यथा-

ऐसी सुविधा कम करों कि कोई
सिर्फ़ दस्तख़त करता रहकर
महल अटारी मोटर तांगे
वायुयान पर चढ़ डोले
ऐसी सुविधाएँ ख़त्म करों
जिसमें कोई पढ़कर लिखकर
कमकर किसान बुनकर सुनार लठिया
लुहार से बढ़कर बोले।
नवीन व आधुनिक बनने एवं दिखने के लिए, सीधे-सादे व्यवहार और रहन-सहन एवं खानपान के छोड़ने वालों के लिए मिश्र जी ने ‘एकदम दरबारी’ नामक कविता में कहा है। यथा-
तुम बंजर हो जाओगे
यदि इतने व्यवस्थित ढ़ँग से रहोगे
यदि इतने सोच समझकर
बोलोगे चलोगे कभी मन की नहीं कहोगे
सच को दबाकर झूठे प्रेम के गाने गाओगे
तो मैं तुमसे कहता हूँ तुम बंजर हो जाओगे।
यहाँ बंजर ह® जाने से अभिप्राय अपनी संस्कृति की ऊर्वर भूमि का बंजर हो जाना है; विस्मृत हो जाना है। सामाजिक सांस्कृतिक संकट रचनाकार को विवश करने के साथ-साथ चुनौती भी देता है। इस चुनौती क® रचनाकार कितनी शक्ति से झेल पाता है, यह उसकी प्राण शक्ति पर निर्भर करती है। नए जीवन मूल्यों की तलाश का संकट नए कवियों की भान्ति मिश्र जी के सामने भी था। किन्तु उनके सांसारिक मन ने गाँधी विचार दर्शन से बड़ी वैचारिक आँच और कहीं महसूस नहीं की। बीसवीं शताब्दी के आध्ुानिक औद्योगिक संघर्षरत संसार में अनेक समस्याएँ प्रखर हो उठी थी। उनके समाधान के लिए अनेक भारतीय रचनाकार हताश होकर माक्र्सवाद, अस्तित्त्ववाद, अतियथार्थवाद की ओर भाग खड़े हुए। विदेशी विचारों से आक्रान्त भारत का सामाजिक सांस्कृतिक ढ़ाँचा हिलने लगा था। कुछ बुद्धिजीवी यह कहने लगे कि इस समस्या को समाजवादी क्रान्ति द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। ये आधुनिक बुद्धिजीवी महानगर®ं की संस्कृति के एक अंग और अंश थे और इनका सीधा सम्पर्क पश्चिम की आधुनिक संस्कृति से था। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के बुद्धिजीवियो ंने पश्चिम की इस सामाजिक व्यवस्था से समझौता कर लिया और वे उसका नाम लेकर अपनी संस्कृति के विद्रोही हो गये। परन्तु मिश्र जी ने इस पर प्रहार करते हुए लिखा है-
झूठे लेख उसके फै़शन भर कविता
पढ़ते हैं सुनते हैं लोग चाव से आग्रह से भी
किन्तु हाय करते क्यों हैं।
कब तक चलेगा यही
रोना किसान के मज़दूर के दुखड़े को
शीशे में हज़ार बार देखना मुखड़े को।
मिश्र जी मत है कि विदेशी अनुकरण पर आधुनिकता का नशा हमारी संस्कृति का विसर्जन है। वह हमें कृत्रिम जीवन में फँसाता हैं हम फै़शन और आधुनिकता के नाम पर क्लबों में डांस करते हैं, सुरा-सुन्दरी में डूबते हैं और जो बस्ती के किसी कोने में दिनभर के कठोर परिश्रम के बाद सोते हैं; उन्हें गिरा हुआ समझकर उनका उपहास करते हैं। इसी पर मिश्र जी कहते हैं-
और जब लौटते हैं
मनकार जश्न
वह हमारी तरफ़
ऐसे देखता है
जैसे हम लोटे हैं
किसी को दफ़नाकर।
वास्तव में इस तरह जश्न मनाना अपनी संस्कृति को दफ़नाना ही तो है। मिश्र जी तमाम भारतीय से उद्भूत जीवन्त तत्त्वों के हिमायती हैं वे अवचेतन या कुण्ठाओं के द्वारा शासित अथवा विदेशी अनुकरण के शिकार नहीं है। उनमें चेतना और विकासशील चिनगारियाँ हैं। आधुनिकता की बानगी ‘‘स्वस्थ रहे शरीर और काम का’’ नामक कविता मंें इस प्रकार मुखरित हुई हैं-
परिस्थितियाँ यही हैं इसीलिए
जीना गड़ने लगता है या गड़ने लगता है
दूसरों का निकम्मे रहकर
दूसरों के श्रम की शराब के
नशे में जीते चले जाना।
मज़बूती से।
व्यवस्थाएँ ऐसी ही
पक्की हो रही हैं।
नगर में पिसता निम्न और मध्यवर्ग, बढ़ती नौकरशाही, भ्रष्टाचार, मज़दूरों का घटिया जीवन स्तर और उनका शोषण-सभी पर मिश्र ने दृष्टिपात किया है। नगर की विसंगतियाँ, विडम्बनाएँ आदि सभी को अभिव्यक्ति दी है-
अनगनिती लोग जगत भर में
हैरान हजारों ढ़ँग से हैं
अनगिनती यों हैरान कि कोई काम नहीं
हर रोज सबेरे काम ढूँढ़ने जाते हैं
और काम नहीं मिलता गोया वह ईश्वर है।
आधुनिकता का अजगर आज सबको निगल चुका है। कवि व्यथित हृदय से लिखता है। यथा-
क्या तुमने लोगों को
अपने ही लोगों के खू़न में
बतख की तरह तैरते देखा है
नहीं देखा तो आओ
भारत में आकर देख जाओ
यह दृश्य आजकल यहाँ आम है।
आराम मिलता है इस दृश्य से
यहाँ की कुछ आँखों को
उन आँखों को भी देख जाओ
सत्ता के नशे में लाल
विकराल और खु़श।
आधुनिक कवि को समाज की नहीं अपनी चिन्ता हैं वह अपने में ही पूर्णतः केन्द्रित है और इसलिए अपनी व्यक्तिगत निराशा, घुटन, कुण्ठा को व्यक्त करना ही काव्य का उ६ेश्य समझता हैं उन्होंने भी अपना सुख-दुःख का वर्णन इस प्रकार किया है-
अब महफिल नहीं
अकेलापन मेरा है
यही मेरा विस्तार है यही मेरा घर है
इसमें बाधा आती है
तो लगता है टूट गया कुछ
कोई और आ जाता है
तो लगता है
पीछे छूट गया कुछ।
कवि भवानी प्रसाद मिश्र जी की चेतना से निःसृत शब्द आधुनिकता की पराकाष्ठा को उसकी विकासशीलता को आत्मसात् करते हुए कहते हैं। यथा-
मौसम नए छूते रहते हैं मगर इसलिए
कि वे नए होते हैं लौट लौट कर
फिकना चाहिए अर्थ पुराने से पुराने शब्दों में से
नए सन्दर्भों में
मेरा आज का मन एक नया सन्दर्भ है
मगर ऐसा नया भी नहीं
कि लगाव न हो उसका किसी पुराने के साथ।
उपनिवेशवाद की बस्तियों के बस जाने से गाँवों की स्थिति खस्ताहाल होनी शुरू हो गई। शहर दर शहर में औद्योगिकीकरण का विकास होने से यांत्रिक सभ्यता का पैर पसर गया। मशीनीकरण ने हथकरघा व्यवसाय पर विराम लगा दिया। रोज़गार के अवसर ख़त्म होने लगे। जिससे कृषक आत्महत्या करने पर मज़बू हो गए। और यह आत्महत्या का सिलसिला वर्तमान में भी जटिल समस्या के रूप में सामने प्रकट हुआ है। बड़े-बड़े उद्योगों-कारखानों के स्थापित हो जाने से पर्यावरण गहरे संकट में पड़ गया। प्रदूषित वातावरण से गाँवों की शुद्ध निर्मल की सी हवा शहरों में धूल और धुएँ के बादलों की तरह बहती रही जो शनैः-शनैः मानवता को विनाश के कगार पर ला खड़ी कर रही हैं दूसरी और आधुनिकता ने कृत्रिम विकास का चोला सबको ओढ़ा दिया। लोग आकर्षित होकर इस कृत्रिम चकाचैंध में अपनी आँखों की रौशनी, (पहचान करने की) तक को भी खो बैठे। समाज का मानक अब आलिशान गाड़ियों, कोठियों तक ही सीमित हो गया। लोगांे की सोच समष्टि न होकर व्यष्टि तक ही सीमित हो गई भवानी प्रसाद मिश्र ऐसे आमूल चूल परिवर्तन से जहाँ एक ओर व्यथित हैं वहीं दूसरी और सकारात्मक सोच के साथ चेतना को जागृत करते हैं और फिर से नया जीवन प्रारम्भ होने की बात करते हैं। वे एक ओर निःशब्द होकर जड़ हो जाते हैं अ©र फिर उसी जड़ता में से शान्ति की कामना करते हैं तथा शान्ति की अवस्था से ही पुनः जीवन का नवसृजन करते हैं यही मनुष्य का जीवन चक्र है। वास्तव में वे जीवन की खेती करते हैं और कविता अपने आप उगती चलती हैं। यथा-
शरीर और फसलें
कविता और फूल, सब एक हैं
सबको बोना बखरना पड़ता है
जितना गहरा कूप खुदे, उतना मीठा जल
आज नहीं कल।
कवि ‘अँधेरी कविताओं’ में चिनगारियों की तरह चमक रहे हैं। मरण से भयभीत वे नहीं हैं। मरण को साक्षी बनाकर उन्होंने जीवन के नवसृजन पर जो लिखा है वह अद्वितीय है। यथा-
घड़ी राख होने की आये बुरा इसमें कुछ नहीं है
बुरा यह है कि मन राख होने से घबराये
मैं ख़ुश हूँ कि वह नहीं हो रहा है।
प्रकृति के प्रति प्रेम
प्रकृति और मानव का सम्बन्ध युगों पुराना है। प्रकृति पग-पग पर उसके साथ रही है। उसकी आँखें खुलने से लेकर अन्त तक प्रकृति किसी न किसी रूप में उसे छूती रही है। इसीलिए प्रकृति से अप्रभावित रहना उसके लिए असम्भव है। प्रकृति के अपार सौन्दर्य से मंत्र मुग्ध होकर मानव अपने भावों को चित्रों के द्वारा, वास्तुकला के द्वारा, काव्य के द्वारा प्रकट करता है। मिश्र जी प्रकृति के चतुर चितेरे हैं और प्रकृति की हर वस्तु उनकी आत्मीय हैं। वह उन्हें वैचारिक भावभूमि प्रदान करती हैं। उनका प्राकृतिक दृश्यों का चित्रांकन रमणीक, अनुभूतिपरक और सूक्ष्म है। कवि नर्मदा के हू-ब-हू चित्र उतारता है। टेढ़ी-मेढ़ी रेवा आँखों को स्वास्थ्य देती है। प्रकृति का रंग-रूप, उसका सहज आकर्षण कवि मिश्र को अपनी ओर खींच लेता है। प्रकृति की राशि-राशि दृश्यावलियाँ, हवा के गंधिल झोंके, शबनम की पारदर्शी तरलता, आकाश का नीलापन, किरणों का सुनहलापन, सिहरती-पुलकती दूब, घाटी में प्रतिध्वनित गीत, भटकती सरिता-सब कवि को मुग्ध कर लेती है। यथा-
लहरेें हवा और पानी की
बहर रही हैं
कुछ ऐसी गति साध कर
कि लगता है अलग-अलग
नहीं बह रही है वे ़ ़ ़ ़
गाढ़ा नीला आसमान
तेज यमकीला सुरज
तरल पानी
सरल वहा
ठोस धरती
हम पाँचों
काल को जानते हैं
और काल जानता है हमें।
प्रकृति के अत्यन्त अनुपम निराले एवं मनमोहक रूप भवानी प्रसाद की कविताओं में दिखाई देते हैं। यथा-
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएँ!
आज पीले हैं सरसों के खेत, लो;
आज किरने हैं कंचन समेत, लो;
आज कोयल बहन हो गयी बावली
उसकी कू हू में अपनी लड़ी गीत की
हम मिलाएँ!
चलो, फागुन की खुशियाँ मनाएँ!!
भवानी प्रसाद मिश्र के कारण प्रकृति का निर्वाह दो रूपों में हुआ है। एक तो पारम्परिक रूप में दूसरा नवीन रूप में। ‘सतपुड़ा के जंगल’ कविता में प्रकृति अपने पूरे अकृत्रिम रूप में आँखों के समक्ष आती है, जहाँ सौन्दर्य भी है और यथार्थ चित्रण भी। यथा-
झूमते वन, फूल, फलियाँ
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ
हरित दूर्वा, रक्त किसलय
पूत सावनपूर्ण रसमय
सतपुड़ा के घने जंगल
लताओं के बने जंगल।

कवि ने प्रकृति को इतने निकट से अन्वेषण किया है कि छोटी से छोटी बात भी आँखों से ओझल नहीं हो पाई है। वर्षा के एकदम बाद धुला-धुला सा प्रकृति का रूप आँखों को स्वास्थ्य सा प्रदान करता प्रतीत होता है। यथा-
धुली धुली दूर्वा का
निखरा बिखरा हुआ रूप
हल्के हल्के बादल
खुली मुंदी हल्की धूप।
उनकी कविता का विषय उन सुनहले दृश्यों उनके निमित अनेक आकर्षण का आगार है-
छोटी सी एक तलैया
भरपूर भरी पानी से
हरी धरती का एक टुकड़ा
उसी सी लगा हुआ
और फैला हुआ।
वर्षा की निरन्तर झड़ी, छोटे-बड़े सभ पोखरों, तालाबों का मिट्टी युक्त पानी से भर जाना व चारों और मटमैला-मटमैला पानी आरै हरे-हरे लहलहाते खेत-यही वर्षा ऋतु का यथार्थ चित्रण है-
यही भरी बरसात
वह सूना किनारा
मिट्टी रंगा पानी
कि धानी खेत।
प्रकृति का संयोग और वियोग दोनों क® ही उ६ीपन रूप में मिश्र जी ने प्रस्तुत किया है, किन्तु इस प्रकार के वर्णन इनकी कविताओं में बहुत ही काम आये हैं। संयोगावस्था में सभी प्राकृतिक उपादान अपनी प्रसन्नता में साथ देते से अनुभव होते हैं। मानों वे सभी हमारी खु़शी में सम्मिलित हों। डालें फूलों से लदी जान पड़ती है, भैरों का गुँजार ख़ुशी का गीत लगाता है, हर प्राकृतिक वस्तु मानों पूर्ण यौवन को प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार के भाव मिश्र जी की एक कविता में इस प्रकार से आये हैं-
वे हंसे और आया वसन्त,
खिल गये फूल, लद गई डाल।
भौरों ने गाना शुरू किया,
पत्ते हिलकर, दे चले ताल।
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खेतों में सरसों फूल उसी, जंगल में टेसू हुआ लाल।
जो हवा अभी तक चंचल थी उसकी धीमी हो गई चाल।
अब तक की सूनी अमराई में उतर पड़ी जैसे बरात।
बंध गया भौर, हो गया और, उस बड़े आम का पीत गात।
किन्तु वियोगावस्था में यही प्रकृति कष्टदायक प्रतीत होती है, इसका सौन्दर्य हीन लगता है, दुःख में यह प्रकृति आँसू बहाती दृष्टिगोचर होती हैं संझ और प्रातः का सौन्दर्य वेदना उत्पन्न करता है-
सांझ प्रातः आते है लेकिन नहीं सुनहरे हो पाते हैं
नहीं उमड़ता है सुख, वैसे पक्षी गाने को गाते हैं।
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डालें वहाँ लदी रहती है, आँखें यहाँ भरी रहती हैं
वहाँ लाल होता है टेसू यादें यहाँ हरी होती है।
भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में प्रकृति का मानवीकरण बहुतायत में हुआ है। मिश्र जी ने भी कहीं सूरज, चाँद, चाँदनी, फूल आदि में मानव व्यवहार के क्रिया-कलापों की छाया देखी है और कहीं यह आकँाक्षा की है-मानव प्रकृति से कुछ सीखे। सूर्य के आते ही ओस के सूख जाने पर सूर्य का मानवीकरण करते हुए मिश्र जी कहते हैं। यथा-
सुबह होते ही फूल
हवा में झूल
खोल देता है अपने दल
ओस पी लेता है केवल
पिपासी रवि।
सूर्य के उगते ही कोहरे का धीरे-धीरे समाप्त होना देख मिश्र जी दिशाओं का मानवीकरण करते हुए लिखते हैं-
सूर्य पहिन केसरिया बढ़ता आ रहा
उष्ण किये देता है सब वातारवरण
यह सफेद घूंघट कोहरे का उठा कर
देख रही है शस्य श्यामला भूमि को
स्निग्ध पे्रेम की दृष्टि डालकर दिशाएँ।
प्रकृति की हर घटना नियम में बँधी होती है। उसका हर क्रिया-क्लाप, उसका नियम-बन्धन मानव के क्रिया-क्लाप की अपेक्षा स्थायीत्व लिए होता है। मिश्र जी के अनुसार मानव को अपनी पूरी सामथ्र्य एवं शक्ति के साथ क्रियाशील होना चाहिए-जैसे सूर्य क्रियाशील होता है। यथा-
एक बार अखिल में फिर
शक्ति आनी चाहिए
बार-बार बिखरने और संहत होने की
जैसे सूर्य किरनों में होती है
या कहो जैसी होती है
सूर्य में
बिखरा कर रोज अपना अस्तित्व
संहरण कर लेने की
अस्त के क्षण में इसीलिए
कि फिर आये
पहले दिन की पहली किरण
दूसरे दिन
नयी आभा के साथ।
मिश्र जी इस बात का यथार्थ दिखाते हैं कि आजकल की आपाधापी भरी ज़िन्दगी में रत्ती भर का भी अवकाश नहीं है कि हम एक जगह रूककर प्रकृति का आनन्द लें। शहरों में कृत्रिमता है तो ऐसे में कवि का मन उचाट जाता है तो वह गाँवों की ओर लौट आता है। गांवों के खेतों में लहलहाती फ़सलें, मिट्टी की सांधी महक शरीर के रोम-रोम को आनन्दित कर देती हैैं। लेकिन आधुनिकता के कारण जो आज सभ्य कहे जाने वाले क्षेत्रों में स्थान नहीं जिससे प्रकृति छटाओं का आनंद लिया जा सके। कवि को इस बात से निराशा है। यथा-
किरन भी सूर्य की हमने नहीं पी
साँस भी पूरी नहीं ली
फेफड़ों में बंद कमरों में विरस बैठे रहे
मान कर ऐसा कि हम हैं सभ्य
जड़ से शाख तक ऐंठे रहे।
मिश्र जी आगे इस भागमभाग ज़िन्दगी पर प्रकृति के माध्यम से व्यंग्य करते है। यथा-
आँखें उठाओ
देखें आकाश नीला है
हल्के लाल बादल हैं
चाँद गहरा पीला है
अच्छी शाम है
पंछी गा रहे हैं
ंमगर इन सबसे क्या होगा
मुझे चेटियार साहब बुला रहे हैं।
कवि आज के मानव को समझाते हैं कि व्यर्थ की दौड़ में आधुनिक बनने की होड़ में हम आस-पास की प्राकृतिक सम्पदा तो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, का तिरस्कार कर रहे हैं, अपना जीवन इन भौतिकता की दौड़ में गँवाते जा रहे हैं। प्रकृ ति ही जीवन का प्राण है। जब तक यह प्राण सम्पदा सुरक्षित है तब तक मानव जीवन सम्पदा सुरक्षित है। कवि एक तरीके स प्रकृ ति के माध्यम से वर्तमान की विसंगतियों पर भी प्रकाश डालता है। भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण प्राकृ तिक सम्पदा नष्ट हो रही है और प्रकृ ति के हनन के साथ-साथ अपनी उपजीविका भी नष्ट कर रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। कारखाने स्थापित हो गए। वन सम्पदा नष्ट हो रही है। यह एक मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा संकट है। जितनी प्रकृ ति का सुन्दर वर्णन भवानी प्रसाद मिश्र की कविता मेें हुआ है। उतना अन्यत्र कहीं नहीं हुआ है।
कवि पावस का गायक है। अतः सावन पर उसकी दृष्टि विशेषतः टिकी है। सावन को आमन्त्रित करते हुए कवि कहता है कि बिना इन्द्रधनुष के सावन अधूरा है, क्योंकि सुरचाप ही तो उसकी छाप है। अतः वह उसके अभाव में सावन की अभ्यर्थना को स्वीकार नहीं कर सकता। बादलों के बदलते रंग, किलकते बच्चे, मचलते युवक, धानों के खेत-ये सब कवि को मोहित कर लेते हैं। वह लिखता है-
इसलिए हम चलें
सावन के सम्हालें खेत अपने
बखेर दें, बो दें, उगा दें
आज उनमें नये सपने
ये कि जब फागुन सजीला
फूल-से सपने खिला दे
गा उठे इस जोर से
आवाज़ जगती को गुँजा दे।
कवि ने प्रकृति के अंचल विशेष को भी बड़ी यथार्थता के साथ चित्रित किया है। यथा-
झाड़ ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे
धास चुप है, काश-चुप है
मूक शाल, पलाश चुप हैं
बन सके तो धँसों इनमें
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते, अनमने जंगल।
इसी तरह वर्षा का सुन्दर पुट इन पंक्तियों मे निहित है।
देखो भाई-वर्षा आई,
छिपते तारे, प्यारे-प्यारे।।
बादल काले, कुछ घुँघराले,
बूँदें छम-छम, गिरतीं धम-धम,
वीर बहूटी ने सुध लूटी।
यह सह है, मन भावन है।
भवानी भाई प्रकृति के माध्यम से समष्टि चेतना को मुखरित करते हैं। मेघ से वर माँगते समय भी उनकी यही भावना काम करती है। यथा-
जहाँ बरसूँ एक हरियाल जगे
ज्वलदर्चिमाला पहिन लू लाली जगे।
मिश्र जी के काव्य में प्रकृति के कुछ चित्र लोक जीवन का पूरा प्रतिबिम्ब अपने में समेटे हैं- जहाँ पर रँग और लय सब ज्यों का त्यों है। सावन का आगमन मंगल वर्षा से किसी भी रूप में काम नहीं है। यथा-
पीके फूटे आज प्यार के पानी बरसा री
हरियाली छा गई हमारे सावन बसरसा री
बादल छाये आसमान मेें धरती फूली री
अरी सुहागिन, भरी माँग में भूली-भूली री
बिजली चमकी भाग सखी री दादुर बोले री।
पूरी कविता लोक जीवन का रंग अपने में समेटे है। कहीं फिसली-सी पगडंडी है तो कहीं इन्द्रधनुष के रंग। कहीं बिछिया की रूनझुन, कहीं हिंडोले, किसानिन की कजरी-सभी ने मिलकर एक चित्र-सा उपस्थित कर दिया है। कहीं-कहीं इस प्रकार के वर्णन में आँचलिकता भी आ गयी है। जो काव्य सौन्दर्य में श्रीवृद्धि करती है।
कवि भवानी प्रकृति का पूरा-पूरा लुत्फ़ उठाते हुए मर्मस्पर्शी भी हो जाते हैं वे प्रकृति का अपने भीतर की दुनिया के साथ तादात्मय स्थापित कर लेते हैं। यह उनकी अपनी प्रवृत्ति हैं। चाहे कमल के पत्तों के बीच सिर उठा रहे सरसों के पीले फूल हांे, चाहे फुदकती हुई चिड़िया, चाहे आँगन का पीपल हो या गिलहरी का खेल-सब आदान उनको रसमयता प्रदान करते हैं। वे अपने गीतों में दर्द की ऐसी तस्वीर खींचना चाहते है; जो पत्थर के हृदय को भी पिघला सके। यदि वह अपने गीतों से संसार के दुःख का लघुतम अंश भी कम कर सका तो उसके जीवन की सार्थकता होगी। यथा-
एक कण भी दुःख का यदि मैं जगत् से खो सका रे,
एक क्षण भी यदि किसी की सांत्वना मैं हो सका रे,
तो सफल यह रात, यह तारे तरंगों की रवानी,
वायु की हलचल सुरभि की गति सघन वन की कहानी
तो सफल तब गीत पीड़ामय सफल अस्तित्व मेरा,
जा रहा हूँ स्वर भरो तुम, मैं लिखूँगा गीत तेरा।
कवि की संवेदनशीलता का स्पष्ट उद्घाटन यहाँ होता है कि सुबह-सुबह टहलते हुए हरी-भरी दूब पर पैर पड़ने से उसे ऐसा प्रतीत होता है, जैसे किसी सोते हुए आदमी के शरीर पर पैर पड़ गया हो। उसके मन मेें एक सिहरन-सी उठती है, वह चाहता है कि ‘यह बोध-चेतना बन जाये’, चाहे इसे हम ‘आदमी का प्रकृतिकरण’ कहें या यों समझें कि ‘प्रकृति‘ कवि के लिए इन्सानी दुनिया की एवजी में है। कवि का लक्ष्य निद्र्वन्द्व होकर स्नेहवर्षण से समस्त मानवता को उल्लसित और हरा-भरा बनाता है। इतना ही नहीं वह इतना उत्सुक भी हो जाता है कि आषाढ़ का पहला पानी बरसता देखकर वह अपनी लेखनी तक न्योछावर कर देता है। यथा-
तू उठ के बैठ जा रे लिखने में क्या धरा है
खिड़की से झाँक तो ले कैसा हरा भरा है?
यह बड़ी प्रसिद्ध कविता है। वर्षागमन का ऐसा उल्लास का वर्णन दूसरा देखने में नहीं आया।
‘व्यक्तिगत’ में कवि प्रकृति से सम्पृक्त करता हुआ प्रसन्न हो उठता है। और वह अपने दुःख को विस्मृत कर अतीत-अनागत से कोसों दूर हो जाता है। यथा-
ये फूल वह ओस
वह झील मानों हमारे
मनसूबे हुए थे साकार
और हम ख़ुश थे
और हल्के थे
न अतीत ध्यान में था
न अनागत
भरी हुई आँखों से
खु़शबू जी रहे थे।
इस प्रकार प्रकृति के मनोहर चित्रण उकेरने में भवानी भाई ने अपी कौशलता का बाखू़बी परिचय दिया है। डाॅ॰ प्रेमशंकर का इस सन्दर्भ में कहना है, ‘‘भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में प्रकृति का जो सहज, नैसर्गिक, अनौपचारिक और स्वतन्त्र अंकन हुआ है वह हिन्दी के किसी अन्य कवि के काव्य में नहीं।’’
प्रगतिवाद
प्रगतवाद विकास के साथ-साथ विरोध का भी परिचायक है। भवानी भाई के काव्य में प्रगतिवादी लहर प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त होती हैं। क्योंकि भवानी प्रसाद मिश्र के सामने प्रगतिशील आन्दोलन का अन्धड़ चल रहा था और वे ‘प्रलय में पले हुए हम वीर’ की मुद्रा में उसे ललकार रहे थे। उनके सामने समस्या थी कि ‘मसिधार पैनी है कि यह मसिधार पैनी है।’ यह मसिधारी सियाही मसि-गौरव के लिए छायावाद-प्रगतिवाद के सन्धिकाल में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक नवजागरण के गीत गा रहा है। सन्नाटा कविता में कवि को ही सन्नाटे का उद्घोषक मान ले तो कोई हर्ज नहीं है-
मैं शान्त नहीं; निस्तबध नहीं, फिर क्या हूँ
मैं मौन नहीं हूँ मुझ में स्वर बहते हैं।
कभी-कभी कुछ मुझमें चल जाता है,
कभी-कभी कुछ मुझमें जल जाता है;
जो चलता है, वह शायद है मेढ़क हो,
वह जुगनू है, जो मुझको छल जाता है।
चूंकि गांधी दर्शन भी प्रगतिशील जीवन को लेकर चला है। किंतु उसका आधार राजनीति प्रेरित माक्र्सवाद या साम्यवाद नहीं है। प्रगति प्रकृति का शाश्वत नियम है, वह विकासशील है। प्रगति कोई संयोग मात्र नहीं, वह शुद्ध बुद्धि एवं शुद्ध कर्म का योग है तभी हमारो जीवन हरा भी। वर्ग-संघर्ष सामाजिक यथार्थ का पर्याय बनकर अधिक दिनों तक नहीं छल सकता। शुद्ध बुद्धि कभी हिंसा या संघर्ष नहीं कराती और न शुद्ध कर्म कभी किसी व्यक्ति या वर्ण का ह्रास करने की प्रेरणा देता है। जब तक गाँधी दर्शन के आधार पर उत्तम साधनों का उपयोग न होगा तब तक उत्तम लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं। सच तो यह है कि हमने अपने ढ़ँग से उसे अपनाया फिर भी हमारी उपलब्धियाँ कम नहीं-
इसे वर्ग संघर्ष आदि से पैदा करना
निश्चय ही गति-हत होना है
किन्तु प्रकारान्तर से तो यह मृतवत होना है
प्रगति साध्य-साधन का सामंजस्य
यही तुमने बतलाया
हमने बहुत अधूरे ढ़ँग से
पालन इसका किया
किंतु फिर भी जो पाया
कितना पाया।
प्रगतिशीलता केवल शोषित और शोषक के वर्ग-संघर्ष से नहीं आती। वर्ग-संघर्ष सामाजिक यथार्थ का पर्याय बनकर अधिक दिनों तक नहीं छल सकता। इस तथ्य से वे भली भाँति परिचित हैं। यही कारण है कि वे पारिभाषिक अर्थांे मंे प्रतिशील न होकर सही अर्थों में प्रगतिशील है। समाज की प्रगतिशील शक्तियों के साथ मिश्र जी की निरन्तर सहानुभूति रही है और उन्होंने अपने वैयक्तिक जीवन की तरह ही अपने काव्य में भी कभी बेईमानी, अत्याचार व अन्याय के साथ समझौता नहीं किया। वे कवि हैं-अतः स्वतः सिद्ध हैं कि वे प्रगतिवादी हैं, उन्हीं के शब्दों में-‘‘विस्तृत अर्थों में जो प्रगतिवादी नहीं है वह कवि नहीं है। अर्थात् जिसके अपने और दूसरों को अँधेरे से उजाले में जाने की कल्पना नहीं जगाती वह कवि नहीं है। इस अर्थ में मैं अपने को प्रगतिवादी मानता हूँ। कवि भवानी प्रसाद मिश्र इसी प्रगतिशीलता के बल पर मानवता की सुविधाओं की कल्पना अपने काव्य संग्रहों में की है। यथा-
असहनीय है यह कि काल से हार रहें धरती के बेटे
सोचें भर अपना अभाग कर आँख बन्द लेटे-लेटे
अभी काल रथ अपने आगे, इसको पीछे छोड़े है-
जैसे भी हम मुड़े, कि इसको वैसा मोड़े, तब है।
कवि प्रगतिवादिता के परिप्रेक्ष्य मानवता के प्रति आस्थावान है। सुख-दुःख एक ही हैं। ऐसा स्वीकार करते हुए वह आशा के गीत गाता है। वह मंगल विधाता से याचना करता है कि विचारों की चिनगारियाँ सुलगा दे, ताकि अपना अस्तित्व नष्ट न हो और व्यर्थ का रोना न पड़े। उन्होंने कभी निराशा को अपने पास फटकने नहीं दिया क्योंकि उनकी मानवीय करूणा विद्रोह तथा क्रान्ति की ज्वाला सदा उनके भीतर धधकती रहीं उन्हें विश्वास है कि ‘व्यर्थ जाता ही नहीं जग में कहीं विद्रोह कोई; किन्तु विद्रोह करना ही कवि का उ६ेश्य नहीं है, वह तो गन्तव्य तक जाने की एक राह है-

ये नहीं मकसद
कि ये राह की कुछ मंजिलें हैं
मंजिले हैं और तय करना
हमारा काम है री,
जो बढ़ा जाए कि बस इनसान
उसका नाम है री।
मिश्र जी वर्गवाद को मिटकार समानता क स्तर लाना चाहते थे वे लिखते हैं-
हरिजन परिजन के भेद वर्ग के भेद
धरम के भेद बगैरा को मेंटो
उसने हमसे यह कहा कि समता लाना है
उसने हमसे सह कहा कि शोषण की दुनिया में
हमको प्यार बसाना है।
इस प्रकार प्रगतिवाद का स्वर कहीं वर्ग संघर्ष के रूप में तो कहीं मानवता के विकास के परिचायक के रूप में मुखरित हुआ है।
पाश्चात्य विचारों का प्रभाव
प्रत्येक साहित्यकार किसी न किसी  उदात्त व्यक्ति के प्रभार से अनुप्राणित होता है जैसा कि गाँधी-पंचशती का सृजन कर डाला। वास्तव में ये प्रेरणा इसी प्रभाव का ही अंश होता है। हर व्यक्ति एक दूसरे की प्रेरणा होता है और इसी प्रेरणा से वह अपने भीतर के गुणों को ज़्यादा अच्छे ढ़ँग से जानने लगता है और सृजनता के धरातल को नयी गति प्रदान करता है। भवानी प्रसाद मिश्र अपने काव्य पर कालिदास, विलियम वर्डसवर्थ, शैली, ब्राऊनिंग और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का प्रभाव स्वीकार करते हैं। ये समस्त कवि सौन्दर्य चेतना के कवि हैं। उनके काव्य में सौन्दर्य चेतना कभी उनकी सात्विक रामात्मकता को कभी आक्रान्त नहीं करने पाती। उसका मन कभी प्रकृति में रमता है और वे प्रकृति के छोटे छोटे, बड़े-बड़े उपादानों पर सौ-सौ जान से निछावर  होने को तत्पर दीखते हैं। भवानी प्रसाद के लिए वर्डसवर्थ की ही तरह-
देअर वाज़ जाॅय इन द फाउंटेन्स
देअर वाज़ जाॅय इन द माउन्टेन्स।
कवि अपेन आत्मकथ्य में इस बात को स्वीकारोक्ति देता है कि अँगेज़ी कवियों में मैंने वर्ड्सवर्थ पढ़ा था और ब्राऊनिंग विस्तार से। बहुत अच्छे लगते थे मुझे दोनों। वर्ड़सवर्थ की एक बात मुझे बहुत पटी कि कविता की भाषा यथासम्भव बोलचाल के क़रीब हो। तत्कालीन हिन्दी कविता इस ख़्याल के बिल्कुल दूसरे सिरे पर थी। तो मैंने जाने-अनजाने कविता की भाषा सहज रखी। इसके अतिरिक्त अंगे्रज़ी के नये आलोचकों से भी वे प्रभावित हो चुके थे। उनके काव्य में जहाँ-जहाँ प्रकृति की गहन संवेदना उभरी है वहाँ-वहाँ उनका पाश्चात्य विचारकों का अध्ययन आंशिक रूप से मुखरित होता है क्येांकि उन्होंने बड़ी तल्लीनता के साथ, इन कवियों को पढ़ा है उनके सौन्दर्य बोध को जाना है यही कारण है कि भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य साहित्य सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति बन साकार हो उठा है। ऐसा नहीं है कि उन्हेांने स्वयं को इन पाश्चात्य विचारकों तक ही अपने को समेटे रखा जैसे-जैसा उनका जीवन आगे बढ़ता गया वैस-वैसे उनके जीवन में अन्य वयक्तियों का सान्निध्य भी बढ़ता गया। आन्दोलनों के समय उनका गाँधी के सम्पर्क में रहना और मानवता के लिए मानवता की विजय के लिए आत्मसंघर्षी होना उनके काव्य में दीख पड़ता है। कुछ कविताएँ आत्मगत हैं, कुछ कविताएँ स्वतन्त्रता के बाद की नाना घटनाओं और व्यक्तियों पर लिखी गई हैं, कुछ कविताएँ प्रकृति सम्बन्धी हैंः परन्तु इन सभी कविताओं का प्रधान स्वर गाँाधी विचार दर्शन है। उनका गाँधीवादी संस्कार इतना प्रबल है कि वे इससे हटकर भी आस्था के पुनर्लाभ की बात करने लगते हैं-
एक झंडे के तले अब चलें हम
भेद इसके तले अपने दलें हम
हो गया झण्डा हमारा तय
अब नहीं है हमें कोई भय।
स्वयं कवि का मानना है कि आदमी जो बार-बार रचा जाता है और वह जो हर बार रचता है-दोनों ही ठहरे हुए नहीं हैं। वह हर क्षण बदलता हुआ सत्य हैं पाश्चात्य विचारकों के प्रभाव से भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य-लेखका का सौन्दर्य और अधिक निखटा कवि भवानी भारतीयता के अग्रणी कवि है। वे भारत के दुःख से आहत हैं। वे ‘स्टालिन के जन्मदिन पर’ नामक कविता में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखते हैं-
जो तुम्हंे हटायेंगे या लेंगे तुम्हारी जगह
कह नहीं सकते यह कि वे तमसे भी आगे बढ़कर
बुरा कोई और काम नहीं करेंगे
मुझे तो भय है, वे हिंसा की दिशा में
तुमसे भी ज़्यादा नाम करेंगे
और जब मैं सोचता हूँ यह
तो तुम्हारे होने न होने के बारे में
यह तय नहीं कर पाता
कि तुम्हारा होना अच्छा है कि न होना।
यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि कवि का विस्तार एवं उसकी लेखन का विस्तार अलग-अलग साहित्यिक मित्रों एवं विचारकों तथा काव्य आन्दोलनों में निरन्तर विचरण करते हुए अधिक हुआ है। हालांकि कवि ने पाश्चात्य विचारकों को पढ़ा ज़रूर है परन्तु उन्होंने जितना भी लिखा या रचा वह मूलतः भारतीयता के परिप्रेक्ष्य में ही। यह उनके भारतीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। निःसन्देह, मिश्र जी की प्रत्येक कविता आधुनिकता को अपनी शैली में आत्सात् किए हुए हैं। कविता की भाषा जब सरलता की ओर उन्मुख होती है, तब उसमें सहज ही मुहावरेदार भाषा की सी मधुरता आ जाती है और तब काव्य-भाषा, वडर््सवर्थ के अनुकरण यथासम्भव बोलचाल के क़रीब हो जाती है। यही कारण है कि मिश्र जी से बात करना और उनकी कविता को पढ़ना एक ही बात मालूम होती है। मिश्र जी में रोजमर्रा की महज़ मामूली बातों को युक्ति के साथ अपनी भंगी में कहने या ग्रन्थन के कौशल की पर्याप्त विशेषता है। अतएव, उनकी कविताएँ सायास रची गई न होकर सहज हैं। इसीलिए तो मिश्र जी कहते हैंः ‘शब्द टप-टप टपकते हैं फूल-से; सही हो जाते हैं मेरी भूल-से।’ ‘भूल से’ यह भोलाभाला प्रयोग ही मिश्र जी की वायोयुक्ति और वचोभंगी की युगपत्-प्रत्यभिज्ञा के लिए पर्याप्त है। मिश्र जी की भाव-सृष्टि बड़ी रमणीय है। वे विभिन्न मनःस्थितियों के विविध रूपचित्रों को बड़ी कुशलता कसे उकेरते हैं। यथा-
बूँद टपकी एक नभ से
किसी ने झुककर झरोखे से
कि जैसे हँस दिया हो,
हँस रही-सी आँख ने जैसे
किसी को कर दिया हो;
छू मुस्कान, चैंके और घूमे
आँख उसकी, जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे।
काव्यांदोलन के प्रति उपेक्षा भाव
भवानी प्रसाद मिश्र आज की कविता पर गहराते संकट से भली-भान्ति परिचित थे। वे कहते हैं कि बेचारी कविता आज झंझट मेें पड़ गई है। वह एक दो कारणों से नहीं, कितनी ही चीज़ों से त्रस्त है। उसके लिए किसी भी एक जगह को अपना मानकर स्थिर रहना, सोचना, समझना, जानना, कहना कठिन हो गया है। यदि वह हठ कर के इतना करती भी है, तो किसी को उसकी हठ परख कर उससे कुछ लेने याउसे कुछ देनें की ज़रूरत नहीं लगती। पहले कविता अधिकाँशतः आस्था एवं आशापूर्ण होती थी किन्तु आज की कविता का स्थाई भाव ही कुंठा और निराशा का हो गया है। तब वह स्वाभाविक था। जब छायावाद अपने पूर्ण उत्कर्ष काल में था तब भवानी प्रसाद मिश्र का काव्यांदोलनों में प्रवेश हुआ। उन्हीं के शब्दों में-‘‘लगभग सभी कुछ बँधे-बँधाए ढ़ँग से बँधी बँधाई बातें कहते थे। उन दिनों उसे छायावाद कहा जाता था। लेकिन मैंने वह सब कुछ नहीं लिखा और उस ढ़ँग से नहीं लिखा।’’ समाज के वैषम्य, शोषण, दैत्य और अनाचार आदि से वे क्षुब्ध हैं और उससे मानव मुक्ति के आँकाक्षी हैं। किन्तु उनके पीछे कोई आयातित विचारधारा काप्रभाव नहीं है। वह भारतीय जीवन की सामाजिा, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों की उपज है जिसके पीछे मानवीय दृष्टि है। आज के दौर की कविता से और उस कविता के मूल में छिपे हुए व्यक्ति के मंसूबे से कवि भलि-भान्ति परिचित है। मिश्र जी ने अनुभव किया कि कवि-सम्मेलन के नाम से सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने और आयोजकों की रूचि-प्रवृत्ति के अनुरूप उनका स्तवन करने वाले कोकिल कंठी गीतकार गीत को पेट से जोड़ कर अपना करतब दिखाने लगे हैं और गीत को बाज़ारू बनाकर नीलाम करने पर तुले हुए हैं-
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ
मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत बेचता हूँ।
इसलिए कवि उदासीन है आजकल के कवियों की दिशाहीनता से। भवानी प्रासद मिश्र जी कहते हैं कि कला एक घना जंगल ही तो है जिसमें से कलाकार को हिम्मत के साथ घुसकर स्वयं एक रास्ता बनना पड़ता है। गीत-फ़रोश और सन्नाटा कविता का सिंहासन दोनों मिलकर यहाँ कुर्सी (चेटियार साहब) के रूप में व्यवधान बनकर खड़ा है। चूँकि यह व्यवधान ज़िन्दगी से सीधा सम्बन्ध रखता है इसीलिए लाचार होकर इतनी अच्छी शाम भी कवि को एक मामूली आदमी होकर चेटियार साहब के कमरे में बिताने को मज़बूर हो जाना पड़ा है। वैसे भी कला थी प्रगति तो साधनावस्था से जुड़ी हुई है और साधनावस्था ज़िन्दगी से और ज़िन्दगी भूख से और भूख कुर्सी से; अतः कभी-कभी कलाकार को मज़बूर भी हो जाना पड़ता है। कवि मानता है सभी किसी न किसी कमज़ोरी के शिकार हैं इसीलिए ठीक आदमी के कद में कोई भी नहंी है। शायद इसीलिए उदास होकर चेतना विहीन होना चाहता है। इसी कारण वह इन काव्यांदोलन के प्रति उपेक्षित है। क्योंकि आज काम के सम्मेलनों में पहले की सी गंभीरता नहीं है क्योंकि भ्रष्ट राजनीति का जाल यहाँ फैल चुका है। उनकी दृष्टि में कला और सौन्दर्य पर सत्ता अपना शासन चाहती है। जिस कारण वह उदासीन है। नई युग धारा के नई कविता के कवि कम गाम्भीर्य है न उनमें गहनता है न ही धीरता है। केवल शाब्दिक चमत्कार का प्रदर्शन कर नाम कमाना ही साहित्याकर का उ६ेश्य नहीं होना चाहिए। वरन् सामाजिक दिशा को नई गति प्रदान करना ही साहित्यकार का मर्म होना चाहिए। भवानी भाई इन सम्मेलनों के आयोजकों के प्रति भी उदासीन है क्योंकि आज बाज़ारवाद का पैर पसर गया है और सत्ता पर बैठे पदाधिकारी अपने-अपने दल के प्रचार-प्रसार हेतु अपना स्वार्थ साधते हैं। इसीलिए सच्चा साधक होना और कला की साधना करना ही कुशल साहित्यकार का मन्तव्य है। इसलिए ये आन्दोलन अब नाम के ही रह गए हैं। जिनमें कला की कोई पूछ नहीं है। फिर भी कवि सन्नाटा कविता के माध्यम से सामन्ती संकुचित घेरे में पड़ी कला के घेरे को तोड़कर उसे सर्वोपरि स्थान प्रदान किया है। यथा-
तब और बरस बीते, राजा भी बीते
रह गये किले के कमरे-कमरे रीते
तब मैं आया, कुछ मेरे साथी आये
अब हम सब मिलकर करते हैं मन चीते
पर कभी-कभी जब पागल आ जाता है
लाता है रानी को, या गा जाता है
तब मेरे उल्लू साँाप और गिरगिट पर
अनजान एक सकता-सा छा जाता है।
अस्तु, भवानी प्रसाद के काव्य में सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परिदृश्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भवानी प्रसाद मिश्र का योगदान शब्द को कर्म से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण है। जहाँ एक ओर मानवीय मूल्य विखण्डित हो रहे थे वहीं दूसरी ओर उनकी कविता सबकी दबी हुई चेतना को पोषित कर रही थी और नई ऊर्जा प्रदान कर रही थी, इन सबसे इतर कवि मिश्र प्रकृति के नवीन उपादानों के माध्यम से मानवता के चित्र उकेरता है तो कहीं-कहीं अपने हृदय की मार्मिक संवेदना को प्रकृति के माध्यम से साक्षत्कार कराता है। कवि मिश्र का साहित्य के प्रति जो आत्मीय लगाव है वह कोरा नहीं है वरन् हृदय के गहन तारों के साथ सम्पृक्त हैं वे उदासीन भी हैं नए कवियों के मार्ग के लिए, और प्रगतिवादी चेतना की लहर के साथ अपना मूल नहीं छोड़ते और मानवता का पोषक बनते हैं। इस प्रकार उक्त अध्ययन भवानी प्रसाद मिश्र के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अपदान के लिए महतनीय है।

 
सन्दर्भसूची-
1गैरोला वाचस्पतिः भारतीय संस्कृति और कला, पृष्ठ-60
2रामसजन पाण्डेयः निर्गुण काव्य की संस्कृति का भूमिका, पृष्ठ-15 उद्धृृत
3 परिवर्तन जिए-भगवान चाहता, पृष्ठ-36
4 वही, कुछ जानकारी, पृष्ठ-70
5 गाँधी पंचशती, संस्कृति की मोर्चा, पृष्ठ-279
6गाँधी पंचशती, पृष्ठ-15
7दूसरा सप्तक, पृष्ठ-22
8 गांधी पंचशती, पृष्ठ-103
9गांधी पंचशती, पृष्ठ-415
10गीत फ़रोश, पृष्ठ-151
11 सं (विजय बहादुर सिंह)-भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः एक, पृष्ठ-348
12सं (व्यास मणि त्रिपाठी)भवानी प्रसाद मिश्रः अनुभव-वैविध्य के अप्रतिम सर्जक, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्र.सं. 2014, पृष्ठ-134
13 अंधेरी कविताएँ, पृष्ठ-30
14सं. विजय बहादुर सिंह-भवानी प्रसाद मिश्र स्वनावलीः सात, पृष्ठ-133
15सं. विजय बहादुर सिंह-भवानी प्रसाद मिश्र रचनवालीः सात, पृष्ठ-133
16वही, पृष्ठ 130-131
17गांधी पंचशती-अमृतपथ, पृष्ठ-143
18वही-दरबारी, पृष्ठ-265
19गांधी पंचशती, पृष्ठ-116
20बुनी हुई रस्सी, पृष्ठ-76
21 भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः पाँच, पृष्ठ-262
22 गांधी पंचशती, पृष्ठ-161
23 भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः चार, पृष्ठ-435-436
24 जिन्होंने मुझे रचा, पृष्ठ-19
25प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ 62-63
26प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ-92
27वही पृष्ठ-92
28 तूस की आग,पृष्ठ-74-75
29 भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः सात, पृष्ठ-363
30 गीत फ़रोश-सतपुड़ा के जंगल, पृष्ठ-63
31बुनी हुई रस्सी-कठिन है, पृष्ठ-367
32गाँधी पंचशती-स्वर्गिक-पृष्ठ-367
33गीत फ़रोश-सावन, पृष्ठ-67
34गीत फ़रोश-वे हंसे अ©र आया वसन्त, पृष्ठ-13
35गीत फ़रोश-द® बातें, पृष्ठ-2,3
36गीत फ़रोश-फूल अ©र दिन, पृष्ठ-20
37वही,नर्मदा के चित्र, पृष्ठ-24
38शरीर, कविता, फसलंे, फूल, प्यास पर प्यास, पृष्ठ-50
39 गाँधी पंचशती-वचनछाया-पृष्ठ-405
40अप्रस्तुत-चकित है दुःख, पृष्ठ-11
41गीत फ़रोश, पृष्ठ-73
42 दूसरा सप्तक पृष्ठ-10
43 भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः सात, पृष्ठ-284, 285
44गीत फ़रोश, आषाढ,़ पृष्ठ-73
45दूसरा सप्तक, मंगलवर्षा पृष्ठ-17
46गीत फ़रोश, आषाढ,़ पृष्ठ-82
47प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ-48
48 व्यकितगत-एक अनुभव, पृष्ठ-145
49प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ-133
50कृष्णदत पालीवाल- भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य संसार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-73
51डाॅ॰ संत¨ष कुमार तिवारी- भवानी प्रसाद मिश्र की काव्य यात्रा, भारतीय ग्रंथ निकेतन, नई दिल्ली, पृष्ठ-62,63
52डाॅ॰ हरिम®हन-कालजयी कवि भवानी प्रसाद मिश्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्र.सं.1986, पृष्ठ-44,
53वही, पृष्ठ-45
54वही, पृष्ठ-45
55 गाँधी पंचशती-वचनछाया-पृष्ठ-141
56प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ-50
57गाँधी पंचशती-पृष्ठ-12
58भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः एक, पृष्ठ-491
59प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ-39
60बुनी हई रस्सी, पृष्ठ-6
61 भवानी प्रसाद मिश्र रचनावलीः एक, पृष्ठ-347
62प्रेमशंकर रघुवंशी-भवानी भाई, पृष्ठ-290

 

 

- डा. संगम वर्मा

सहायक प्राध्यापक
स्नातक¨त्तर हिन्दी विभाग,
सतीश चन्द्र धवन राजकीय महाविद्यालय,
लुधियाना, पंजाब

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