सरकार की टोपी

सरस्वतीपुत्र सरस्वती को साथ लिए जब इंटरव्यू देते- देते थक गया तो उस रात चारपाई पर पड़ते ही उसने निर्णय लिया कि कल उठ कर वह सबसे पहले सबसे पहला काम यह करेगा कि अपनी सारी किताबें कबाड़ी को औने- पौने में दे सफलता के नए सूत्र तलाशेगा।

बड़ी आई थी ज्ञान की देवी उसे आशीर्वाद देने कि आ, सरस्वतीपुत्र हो जा! जीवन में, शहर में लाइट न होने के बाद भी मेरे कमरे में बिन तारों, बल्बों के प्रकाश ही प्रकाश रहेगा। मुझे किसी बिजली के मीटर की जरूरत नहीं पड़ेगी। जितना चाहे प्रकाश का उपयोग- दुरूपयोग करता रहूं। न बल्ब फ्यूज होने का प्राब्लम न बिजली का बिल देने का कि अबके वह रीडिंग गलत ले गया। बिल गलत दे गया। ….कि बिजली उपयोग कम की थी और बिल चार गुणा आ गया।

वह अगली सुबह किताबें कबाड़ी को बेचने का दृढ़ निश्चय और संकल्प एक साथ ले ज्यों ही रजाई में घुसा तो ज्ञान की देवी मां सरस्वती परेशान हो गईं। उन्हें लगा कि अगर सरस्वतीपुत्र ने सच्ची को ही किताबें कबाड़ी को दे दीं तो उनके हाथ से एक और सरस्वतीपुत्र फिसल जाएगा।  वैसे भी उनके पुत्र समाज में उंगलियों पर गिनने लायक ही तो बचे हैं।

 तब ज्ञान की देवी सरस्वती ने अपनी नींद की परवाह किए बिना बड़ी देर तक अकेले ही चिंतन- मनन किया कि किस तरह  इस सरस्वतीपुत्र को किताबें कबाड़ी को देने से रोका जाए।  टीवी और किताबों के डिजिटाइजेशन के दौर में एक तो वैसे ही समाज किताबें खरीदने- पढ़ने से परहेज कर रहा है ,ऊपर से किताब खरीदने वालों में एक और कम हो गया तो प्रकाशक तो लेखक का पूरा खून ही चूस देगा। कल को  कहीं ऐसा न हो  कि प्रकाशक से तंग आकर लेखक लिखना ही छोड़ दें। जो ऐसा हो गया तो प्रलय हो जाएगा। उनकी तस्वीर बनाने वाले तब उनके हाथ में किताब के बदले क्या थमाएंगे?अगर कहीं कल को कलाकार ने उनका चित्र बनाते उनके हाथ में किताब के बदले टैब थमा दिया तो ?उन्हें तो टेब ऑन करना तक नहीं आता।

 ……वे घर में बिना किसीको बताए चुपचाप स्वर्ग से उतरीं और अपने परास्त हुए पुत्र के कमरे में प्रवेश कर गईं। अभी भी वह सोने की नाकाम कोशिश ही कर रहा था। आज के इंटरव्यू की बेईमानी ने उसे इतना तोड़ दिया था कि…… जितना वह नींद की गोद में जाने की कोशिश कर रहा था, नींद उससे उतनी ही दूर जा रही थी।

अचानक सरस्वतीपुत्र को लगा कि कोई उसके मुंह पर से फटी हुई रजाई खींच रहा है। पर दूसरे ही पल उसे लगा कि यह उसका भ्रम है। हो सकता है कि फटी रजाई भी शायद उसके साथ नहीं रहना चाह रही होगी अब। पर उसने तय कर लिया था कि कम से कम वह रजाई को तो किसी हाल में नहीं छोड़ेगा , वह चाहे फटी हुई ही क्यों न हो।

फिर एकबार फिर उसे लगा कि अबके कोई पहले से अधिक जोर से उसके मुंह पर से रजाई खींचने की सफल होती कोशिश कर रहा है तो उसने गुस्से में फटी रजाई के भीतर से कहा ,‘ लो, देख लो मेरा हारा हुआ चेहरा! अब खुष!फिर जैसे ही उसने भड़क कर अपने मुंह पर रजाई उठाई कि…….. पूरा कमरा दिव्य प्रकाश से जगमगाता हुआ। बिजली विभाग की दम तोड़ती बिजली तो वह कम से कम न थी।

देख वह हैरान हो गया।

कौन??’ उसने अपनी आंखों को उस प्रकाष से बचाते पूछा।

तुम्हारी मां पुत्र!

पर मेरी मां तो गांव में रहती है।

नहीं, वह मां नहीं! तुम्हारी सरस्वती मां हे मेरे सरस्वतीपुत्र! मैंने तुम्हें गोद लिया है।

जैसे सांसदों ने गांव गोद लिया है?’ वे कुछ कहने के बदले बस मुस्कुराती रहीं। तो वह गिड़गिड़ाते बोला,‘ मां! बहुत परेशान हूं। जिस भी इंटरव्यू में तुम्हारे बूते पर जाता हूं दरवाजे पर से ही खदेड़ दिया जाता हूं। मेरी रक्षा करो मां! पल- पल ओवरेज हो रहा हूं। अब मेरा पीछा छोड़ दो मां!कह सरस्वतीपुत्र ने चारपाई पर से ही सरस्वती मां के पांव छूने की कुचेश्टा की तो सरस्वती ने उसके सिर पर ज्ञानमयी हाथ फेरते कहा,‘ जानती हूं पुत्र! यह दौर मेरे पुत्रों का नहीं। कुबेर के पुत्रों का है। चमचेरे के पुत्रों का है।

मां ! ऐसे में तुम ही कहो में अब क्या करूं? अपनी मां बदल लूं क्या?’ सरस्वती के पुत्र ने जब यह कहा तो वे जान गईं कि पानी उसके पुत्र के गले से ऊपर जा चुका है। सो एक बार फिर पूरे स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरती बोलीं,‘ पुत्र, डरते नहीं। इतनी जल्दी हारकर मां- बाप नहीं बदलते। अभी घोर कलियुग नहीं आया है।

तो मां अंधों द्वारा अपनों को रेवड़ियां बांटने के दौर में दूसरा रास्ता तो अब और कोई सूझ नहीं रहा। इधर ओवरेज होने में दो महीने षेश बचे हैं।

बस! इतनी सी बात! अगले इंटरव्यू में तुम्हारा सिलेक्षन पक्का। हलफनामा ले लो।

पर आप तो हर बार यही कहती रहीं , और अब तो मेरे पास फार्म की फीस देने तक को पैसे नहीं,’ अपने पुत्र की व्यथा सुन सरस्वती ने  अपने पर्स से पांच सौ का नया नोट और तत्कालीन सरकार की टोपी निकाल उसे  भेंट करते कहा,‘ ये लो ….और साथ में ये भी। कल ही जाकर अप्लाई कर दो। अबकी बार तुम हंडरेड परसेंट सिलेक्ट हो जाओगे।

सरस्वतीपुत्र कुछ देर तक पांच सौ का नया नोट अदल- बदल कर देखता रहा। उसके बाद भी जब उसे नोट के नएपन पर विष्वास न हुआ तो भ्रम की स्थित से उबरने के लिए पूछा बैठा,‘ मां असली है न?’

हां पुत्र! पुराने तो मैंने कुबेर को जमा करने को दे दिए थे। कुछ गंगा में बहा दिए। कुछ जनता के जन धन खातों में जमा करवा दिए। ये एकदम असली है,’ तब उसने उस पांच सौ के नोट को तकिए के नीचे छिपाते पुनः पूछा,‘  और ये टोपी किसलिए?’

ये सरकार की टोपी है। बड़ी चमत्कारी! इसे लगाने से न कुबेर का पुत्र होना जरूरी है, न सरस्वती का। इसे लगा बूढ़ा पंछी भी आसमान से बातें करने लगता है।

मतलब???’ वह भौंचक्क रह गया।

जहां पर मेरा ज्ञान न चले, जहां कुबेर का मान न चले। वहां यह टोपी चलती है। इतिहास साक्षी है कि इसे पहनने के बाद इसके नीचे दिमाग की कतई आवश्यकता नहीं।  अबके इंटरव्यू देने जाते हुए सिर पर षान से सरकार की टोपी को लगाकर जाना। फिर देखना इसका चमत्कार!मां सरस्वती उसके सिर पर सरकार की टोपी सजाने लगीं तो उसने पुनः पूछा,‘ पर मां! कल को सरकार गिर गई तो??’

तो उस सरकार की टोपी लगा लेना। जनता को पता हो या न , पर टोपी- टोपी मौसेरी बहनें हैं। टोपी का टोपी कुछ नहीं बिगाड़ती। बस, बिगाड़ने का जनता के सामने ढोंग करती है। इस देष में कपड़े बदलने को टाइम लगता पर टोपी बदलने को नहीं। तथाकथित सफल परजीवी, बुद्धिजीवी सब ऐसा ही करते हैं। इस टोपी को लगाने वाले को किसी भी तरह के दिमाग की जरूरत नहीं होती। इस टोपी को लगा गधा तक बुद्धिमान हो जाता है। गधे तक को अपनी बुद्धिमता का प्रदर्शन नहीं करना पड़ता। वह बिना प्रमाणों के ही समाज में सर्वसम्मति से बुद्धिमान मान लिया जाता है।

सच मां???’

हां मेरे पुत्र!  अपने पुत्र को आषीर्वाद दे मां सरस्वती अपने लोक चली गईं।

अगले दिन सरस्वती द्वारा दिए पांच सौ के नोट से सरस्वतीपुत्र ने नौकरी के लिए आवेदन किया और दो महीने बाद उसका इंटरव्यू आ गया। 

इंटरव्यू वाले दिन सरस्वतीपुत्र ने सुबह उठकर  एकबार फिर मां की पूजा- अर्चना की और बिना नहाए ही टोपी सिर धर पर्सनल इंटरव्यू देने कमीषन के ऑफिस चल पड़ा। ज्यों ही उसने इंटरव्यू के लिए बिन तैयारी किए दिमाग वाले सिर पर सरकार की टोपी धरी कि उसे अपने षरीर में एक अजीब किस्म की ऊर्जा का आभास हुआ। उसे अपना दिमाग इतना भरा महसूस हुआ जितना कि पहले कई दिनों तक तैयारी करने  के बाद भी न लगता था।

सौभाग्य से उसका इंटरव्यू देने का नंबर पहले आ गया। ज्यों ही कमीशन ऑफिस में अध्यक्ष के कमरे के बाहर खैनी मुंह में डालते पीउन ने उसका नाम पुकारा तो उसने एक बार फिर मां सरस्वती द्वारा उसे दी सरकार की टोपी और सीधी की और धक्क से अध्यक्ष के कमरे में वैसे ही प्रवेष कर गया जैसे कोई आत्मा परकाया में प्रवेश करती है।

अध्यक्ष ने ज्यों ही सरकार की टोपी लगे साक्षात्कारी को अपने कमरे में प्रवेश करते देखा तो अपनी जगह से उठकर उसकी राह में अपनी पलकें बिछाते उसका अभिवादन करते बोले,‘ आइए सरकार! आपका स्वागत है। आपको आने की जरूरत नहीं थी। पर चलो, इस बहाने सरकार की टोपी के साक्षात्- बलात् दर्शन तो हुए। जय हो सरकार की टोपी की!यह सुन सरस्वतीपुत्र चौंका।  उसको लगा कि कमरे में उसको सपोर्ट करने के लिए सरकार आ गई है तो उसका सरकार की टोपी में कुछ और विश्वास बढ़ा।  जब उसने देखा कि कमरे में तो वह और अध्यक्ष दो ही हैं , तो उसने अपनी टोपी  और ठीक कर अध्यक्ष को सलाम ठोंकी,‘ नमस्कार सर!

अरे नमस्कार नहीं, गले लगिए बंधु ! दो सरकारी टोपियां गले लगीं तो कमरा प्रेममय हो उठा। सरकारी टोपियों का मिलन सम्पन्न हुआ तो अध्यक्ष ने पूछा ,‘ बैठिए!क्या लेंगे आप?’

सर! बस यह पोस्ट चाहता हूं!

अरे बस, इत्ती सी बात! आप आराम से बैठिए। इसे अपना ही कमरा समझिए। अपनी टोपी अब निकाल लीजिए। मैं सरकार को पहचान गया हूं। मैं भी सरकार की ही टोपी वाला हूं।

पर आपने तो टोपी नहीं पहन रखी?’

मेरी टोपी अदृश्य है। असल में ऊंचे पदों पर सरकार की टोपी दिखती नहीं। पर चैबीसों घंटे  हरेक सिर पर, दिमाग पर  रहती है। तुम भी इसे अब अपनी जेब में डाल लो। विपक्ष के बंदे ने देख लिया तो हो- हल्ला हो सकता है।

विपक्ष का काम तो हल्ला करना ही है सर! कल जब उनकी सरकार होगी तो उनकी टोपी सिर चढ़कर बोलेगी। नंगे सिर वाली जनता को यहां पूछता ही कौन है? उसके बारे में गाली गालौज तक करने वाली संसद भी मौन है ,’ सरस्वतीपुत्र ने जिस दमखम से कहा तो अध्यक्ष को बंदा इस पोस्ट के लिए बिलकुल फिट लगा।

चाय- पानी हुआ। बड़ी देर तक परिचय आदान- प्रदान, गप्प शप्प चलती रही दोनों टोपियों में। सरकार की टोपी के बारे में आगामी विचार विमरश हुआ। सरकार की टोपी की दोनों ने तारीफ के पुल बांधे और इंटव्यू खत्म हो गया।

 दूसरे दिन मैंने देखा कि अखबार में फ्रंट पेज पर प्रमुखता से सरकार की टोपी वाले सिर के साथ टोपीपुत्र के चयन की खबर छपी थी।

 

- अशोक गौतम

जन्म- २४ जून ( हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की अर्की तहसील के म्याणा गांव में)।

शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विशय पर पीएच.डी।

प्रकाशित व्यंग्य संग्रह- लट्ठमेव जयते, गधे ने जब मुंह खोला, ये जो पायजामे में हूं मैं, झूठ के होल सेलर।
लेखन- ब्लिट्ज, दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राज एक्सप्रेस, पंजाब केसरी, दिव्य हिमाचल, सरिता, सरस सलिल, कादंबिनी, मुक्ता, वागर्थ ,कथाबिंब, हिमप्रस्थ, सत्य स्वदेष , इतवारी अखबार , नूतन सवेरा, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान व वेब पत्रिकाओं- प्रवक्ता डॉट कॉम, जनकृति, सृजनगाथा, हिंद युग्म, रचनाकार, हिंदी चेतना , साहित्यकुंज आदि में रचनाएं प्रकाशित ।

संप्रति- हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


संपर्क- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन, हि.प्र.

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