सरकार का पुतला जिंदाबाद

विपक्ष को उल्टियां ,दस्त, माइग्रेन, बुखार और भी पता नहीं क्या क्या रोग हो गए थे। इन सबके पीछे बस एक ही कारण था कि वह बड़े दिनों से सरकार के विरोध में शहर में बंद, रैली नहीं कर पा रहा था। इसी बीमारी के चलते वह सिर से लेकर पांव तक खुजला रहा था। उसे लग रहा था कि जो शहर में इसी तरह अमन-शांति कायम रही तो उसे कहीं परमानेंट लाइलाज  खुजली न हो जाए।

और वह सोया सोया भी खुजलाने, खुजलाते हुए हल्ला पाने का बहाना ढूंढता रहता। चौबीसों घंटे बंद के बहाने तलाशने की तलाश में परेशान! हद है यार! इत्ते दिन हो गए। अचानक शहर में अमन शांति कैसे हो गई? पहले तो दिन में चार चार बार सरकार के विरोध में रैली निकालते निकालते थक जाते थे।

पूरा विपक्ष परेशान था कि आखिर ये इस शहर को हो क्या गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने सरकार के जनता के प्रति उदासीन रवैये के चलते तंगियों में रहने की आदत डाल ली हो।

आखिर विपक्ष को जब सरकार के विरोध में रैली निकालने का कोई मुद्दा हाथ नहीं लगा तो उसने सरकार की कामयाबियों को ही मुद्दा बनाने की सोची।

 और विपक्ष की बंद एडवाइजरी कमेटी ने तय किया कि कल शहर के डीसी ऑफिस के सामने हर हाल में सरकार का पुतला जलाया जाएगा। इस कृत्य के लिए भले ही उन्हें कुछ भी करना पड़े।

पुतला जलाए जाने से पहले विपक्ष के सपोक्समैन ने गला फाड़ फाड़ कर मीडिया को संबोधित करते हुए कहा,‘ ये सरकार निक्कमी सरकार है। जनता को सुख सुविधाएं देने के पीछे उसका हीडन एजेंडा है।  वह जनता को सुख सुविधाएं प्रदान कर  जनता को सुविधा भोगी बना रही है। वह जनता को मुफ्त में सबकुछ दे बीमार करना चाहती है। लाचार करना चाहती है। हम इसका कड़ा विरोध करते हैं। सरकार यही चाहती है कि शहर में अमन चैन रहे। अगर शहर में अमन चैन रहेगा तो मोमबत्तियों का बाजार बंद हो जाएगा।  मोमबत्तियों की मांग कम हो जाने से हमारे मजदूर भाइयों के पेट पर सरकार लात मारना चाहती है। ये सरकार मजदूर विरोधी है। ये सरकार मोमबत्ती विरोधी है।  हम सरकार की इस नीति का कड़ा विरोध करते हैं।

विपक्ष के प्रवक्ता ने दिल खोलकर सरकार को कोसा। जब उसे लगा कि इस रैली में सरकार को कोसना जितना तय था, उतना वह सरकार को कोस चुका है तो विपक्ष की रैली जनता के  सुखों के  विरोध में सरकार की थू थू करती डीसी ऑफिस की ओर बढ़ी। थू थू करते जब उसका थूक खत्म हो गया तो उसने सामने पान वाले से थूक ले अपना मुंह भर लिया।

उधर सरकार ने पुलिस को सारे काम छोड़ सख्त आदेश दिए थे कि आज जनता जल जाए तो जल जाए, पर उसका पुतला हरगिज नहीं जलना चाहिए। सरकार के पुतले को जो खरोंच भी आई तो पूरा जिला प्रशासन इसका खामियाजा भुगतने को तैयार रहे। सरकार को जनता से अधिक अपना पुतला प्यारा होता है। वह  अपने से अधिक अपने पुतले से प्यार करती है। शहर जल जाए तो जल जाए। पर पुतला सही सलामत तो सरकार सही सलामत।

 रैली में विपक्ष वाले पचास तो उनसे निबटने के लिए पुलिस वाले पांच सौ। सभी पुलिस वालों के हाथ पांव ही नहीं, वे सिर से पांव तक फूले हुए। कल को ये सरकार में आएंगे तो पता नहीं हमारा क्या हाल होगा? विपक्षियों के हेड ने सबसे आगे कांधे पर शान से सरकार का पुतला उठाया हुआ था। उस वक्त वह अपने को ऐसा महसूस कर रहा था मानों उसने पूरी सरकार को ही अपने कांधे पर उठा रखा हो।

रैली ज्यों ही डीसी ऑफिस के पास पहुंची कि विपक्ष ने स्वभाववश सरकार विरोधी नारे लगाए।  रैली हेड ने जनता के बदले अपनों की संबोधित करते हुए अपने कांधे से सरकार का पुतला  उतार दूसरे को बड़े सम्मान के साथ थमाया और खुद पुलिस वालों को संबोधित करते कहने लगा,‘ आज हम सरकार का पुतला जाल कर रहेंगे। हमें कोई सरकार का पुतला जलाने से नहीं रोक सकता। भगवान भी नहीं। सरकार हाय! हाय! सरकार! हाय! हाय!

ज्यों ही पुतले को बचाने  आई पुलिस को लगा कि विपक्ष अब पुतला जलाने की तैयारी में है तो एकाएक पुलिस डतरी सहमती रैली के बीच घुस गई। इस टकराव में विपक्ष के चार जवान फट्टड़ हो गए। सरकार का पुतला जलने से बचाने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले चलाए जिनके कारण उनके अपने ही पुलिस वाले दिक्कत में आ गए। पुलिस ने सरकार का पुतला बचाने के लिए लाठियां विपक्ष पर भांजी।  हवाई फायर किए। पुलिस कप्तान को लग रहा था कि आज विपक्षियों से सरकार का पुतला बचाना सरकार बचाने से अधिक खतरनाक है। पर सवाल नाक का था। सरकार की नहीं, अपनी का। अपनी टूटी नाक तो अस्पताल में जा ठीक हो जाएगी जो सरकार का पुतला बच गया। पर जो सरकार का पुतला विपक्ष ने जला दिया तो सात जन्मों तक उसका खानदान सरकारों की नकटा ही रहेगा।

अभी नहीं तो प्यारे कभी नहीं। जय बजरंग बली! … पुलिस कप्तान ने अपनी वर्दी की परवाह किए बिना रैली में घुस, अपनी जान की बाजी लगा, पुतले को सही सलामत विपक्ष से बाज की तरह झपटा तो उसे अपने पर विश्वास ही नहीं हुआ, कि वह अभी भी फिट है।

 फिर बिना एक क्षण खोए उसने अपने सहयोगी को इशारा किया। पुलिस वैन का दरवाजा फटाक से खुला और  पुलिस सीना तान उसमें सरकार का पुतला सुरक्षित ले नौ दो ग्यारह हो गई। उधर दूसरी ओर विपक्ष सरकार का पुतला जलाने को हाथ में माचिस लिए हाथ मलता रह गया। ये पुलिस आज इतनी चुस्त कैसे हो गई भाई साहब! कल तक तो ये चोर के पीछे नहीं, चोर इनके पीछे भागता रहा था।

 

 

- अशोक गौतम

जन्म- २४ जून ( हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की अर्की तहसील के म्याणा गांव में)।

शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विशय पर पीएच.डी।

प्रकाशित व्यंग्य संग्रह- लट्ठमेव जयते, गधे ने जब मुंह खोला, ये जो पायजामे में हूं मैं, झूठ के होल सेलर।
लेखन- ब्लिट्ज, दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राज एक्सप्रेस, पंजाब केसरी, दिव्य हिमाचल, सरिता, सरस सलिल, कादंबिनी, मुक्ता, वागर्थ ,कथाबिंब, हिमप्रस्थ, सत्य स्वदेष , इतवारी अखबार , नूतन सवेरा, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान व वेब पत्रिकाओं- प्रवक्ता डॉट कॉम, जनकृति, सृजनगाथा, हिंद युग्म, रचनाकार, हिंदी चेतना , साहित्यकुंज आदि में रचनाएं प्रकाशित ।

संप्रति- हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


संपर्क- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन, हि.प्र. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>