समाज में शांति एवं अहिंसा की स्थापना : धर्म , अध्यात्म और राजयोग की भूमिका

सृष्टि के आरंभ से ही सामाजिक जीवन की विभिन्न स्थितियों में प्राणी मात्र के मध्य आपसी संबंधो के विभिन्न आयाम निर्मित रहने के कारण एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से लोक-व्यवहार करते हुए गतिशील था । जीवन का आरंभिक काल न्यूनतम आवश्यताओं के साथ पूर्णता के प्रति संतोषजनक परिवेश से होता हुआ सदा की भांति व्यतीत हो जाना एक सहज स्थिति का परिचायक है जिसमें आपसी संघर्ष के लिए कोई स्थान शेष नहीं  रह जाता है । मनुष्य ने जब जीवन की इच्छाओं के लिए अपनी आन्तरिक क्षमताओं का प्रयोग किया उस समय बाह्य जगत के प्रति विस्तारवादी दृष्टिकोंण  को अपनाना अनिवार्य स्थिति बन गयी  जिसकी परिणिति सब कुछ समेटने के लिए तत्परता से कार्यरत होने लगी । व्यक्तिवादी मन: स्थिति के अंतर्गत ‘ मैं ’ और  ‘मेरा’  का तार्किक प्रस्तुतिकरण ‘ स्व – नाम – धन्य ’ से भरपूर होने के कारण सम्पूर्ण व्यवहार केवल   व्यक्ति , घटना , विचार एवम् भावना तक सीमित हो गया जिसमें संकीर्ण मानसिकता की स्थितियां एक दूसरे को आहत करने का प्रमुख कारण बन कर रह गयीं  । समाज में सभी मनुष्य सर्व के कल्याण हेतु मनन एवम् चिंतन करने लगे तथा एक दूसरे के सुख – दुःख में भागीदारी निभायें, जिससे सामाजिक सदभाव का जन्म हो जाए और यह व्यवहार समाज के व्यक्तियों के लिए सदा स्वीकार्य भाव में संपन्न हो सके । यह स्थिति सात्विक परिकल्पना का परिणाम है जीवन के विविध पक्ष अपने आप में सब कुछ प्रगट करने के लिए पर्याप्त होते हैं लेकिन मानवीय कर्तव्य निष्ठा धर्मगत व्यवहार के लिए सदा से ही आशान्वित रहती है जिससे अधिकार एवम् कर्तव्य का संतुलन बना रहना सुनिश्चित हो जाता है । एक मनुष्य समाज में रहते हुए इस बात को समझता है कि  मुझे क्या करना है ? क्या नहीं करना है ? और वह स्वयं की ‘समझ’ के अनुसार सत्य एवं असत्य का आंकलन करते हुए जीवन पर्यंत अपने व्यवहार को नियंत्रित करता  रहता  है । कई बार सामाजिक दबाव की समाज शास्त्रीय स्थितियां मानवीय आचरण को निर्धारित करती हैं जिसमें  धर्म सम्मत ‘आचार – व्यवहार’ की मर्यादाएं कार्यरत रहती हैं  जो जीवन के ‘धारण’ पक्ष को क्रियान्वित करने  में मददगार सिद्ध होती हैं ।  एक सामाजिक व्यवस्था में स्थूल संसाधनों की पूर्ति के पश्चात् सूक्ष्म श्रेष्ठ व्यवहार की आवश्यकता होती है जिससे समाज व्यवस्थित रूप से गतिशील हो सके । समाज में शांति एवं अहिंसा की स्थापना जब सामान्य मानवीय प्रयास से पूर्णता को प्राप्त नहीं  हो पाती है  तब धर्म पक्ष की आवश्यकता अच्छे कर्म की प्रासंगिकता के रूप में अनिवार्य हो जाती है ।  

धर्मगत आचरण के कर्मगत उदाहरण : मनुष्यगत आचरण की सामाजिक स्वीकारोक्ति उन स्थितियों में व्यक्ति के द्वारा घटित हो जाती है जिस समय व्यक्ति धर्म – कर्म की व्यावहारिकता को भक्ति – भाव के साथ जीवन के व्यवहार में मानवीय आस्था के साथ प्रकट कर देता है । यदि हम जीव-जगत के संबंधो की बात करें तो हमें यह ज्ञात हो जाएगा की कैसे समाज के भीतर विभिन्न धर्म और उनसे उपजे सम्प्रदाय जो किसी निश्चित विषय-वस्तु के अंतर्गत  कल्याणकारी कार्यो में संलगन हैं । राम चरित मानस की एक चौपाई धर्मगत विभिन्ताओं के पश्चात् भी सामाजिक समरूपता को एकाकार करने में मददगार सिद्ध होती है जिसके अंतर्गत ‘ नदिया एक घाट बहुतेरे ……’ जैसे सत्य का स्वरुप विद्यमान है । मानवजाति के द्वारा ‘सामाजिक शांति एवं अहिंसा’ की स्थितियों को बनाये रखने हेतु ‘ धर्म के मर्म ’  को गहरे स्तर पर स्वीकार करना होता है जिससे समाज में धर्मगत आचरण के कर्मगत उदाहरण मर्मगत स्वरुप में स्थापित हो सकें । सामाजिक परिवेश में मानव द्वारा रचित स्वरुप जब कर्तव्य एवम् अधिकार के सामंजस्य को बोध के स्तर से व्यवहार के क्रियान्वयन तक  स्थानान्तरित कर देता है तब धर्म सम्मत आस्था पर किसी भी प्रकार का कुठाराघात नहीं  होता है । स्व कल्याण की दिशा में किये गए कार्यों का लेखा – जोखा भले ही बाह्य स्वरूप में प्रगट नहीं होता लेकिन आतंरिक समझ को सीखने के अभ्यास से जोड़ने की मन : स्थिति व्यक्ति को नवीन अनुभवों की ओर अग्रसित करने में मददगार होती है । जीवन के जागृत परिदृश्य को स्वयं की बोधगम्यता के लिए आधार मानकर व्यक्ति इस सत्य को अंगीकार कर लेता है कि इस नश्वर शरीर  में आत्मा विराजित  है जिसे विज्ञान जगत ने ‘जीव-आत्मा’ के रूप में स्वीकार कर लेता है । आत्मिक विकास के अनुक्रम में निज जीवन के प्रति आशान्वित भाव मनुष्य को बढ़ते क्रम के लिए अभिप्रेरित करते हैं जहां से वह आत्मा के संदर्भ को कल्याण के सुखद प्रसंग में परिवर्तित होते हुए अनुभव करने लगता है ।

आध्यात्मिक जगत की सूक्ष्म अवधारणा : भौतिकवाद के मध्य अध्यात्मवाद का पुरुषार्थ जीवन की गतिशीलता में कठिन अवश्य लगता है लेकिन किसी भी युग में इस प्रकार का आत्मिक परिष्कार असंभव नही होता है ।  जीवन में शांति एवम् अहिंसा का मार्ग आत्मा से जुड़ा गहन पक्ष है जिसकी विराटता सामाजिक सौहार्द के रूप में प्रकट होती है क्योंकि आत्म दर्शन की व्याहारिकता आध्यात्मिक जगत की सूक्ष्म अवधारणा से प्रतिपादित होती है । व्यक्तिगत जीवन के पुरुषार्थ में आत्मा के गुण एवम् शक्ति को विकसित करने के लिए आत्मिक शक्ति के प्रति जागृत मनोभाव स्वयं को सक्षम बनाने के निमित कार्य करते हुए अग्रसर रहते हैं तब जीवन की मौलिकता आत्मिक उत्कर्ष का कारण बन जाती   है । आत्मिक स्मृति का सर्वाधिक लाभ उस समय आत्मा को प्राप्त होता है जब वह स्वयं की श्रेष्ठ स्थिति से विपरीत परिस्थितियों में भी विजयी बन जाती है और आत्मिकता के भाव को निरंतर बनाये रखते हुए पुरुषार्थ के पवित्र कार्य में अपना सब कुछ अर्पित करने के लिए तत्पर हो जाती है । सामाजिक जीवन के अंतर्गत  व्यक्तिगत मनुष्य के सम्बन्ध में जिन मानवीय  संरचनाओं का जन्म सुनिश्चित होता है उसमें अति सूक्ष्म आध्यात्मिक पुरुषार्थ सम्मिलित है जो एक व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरुप से अवगत कराता है । स्वयं की उपयोगिता  को स्व कल्याण से विश्व कल्याण के मंगल कार्य में संलग्न कर देने से स्वयं की अवस्था को ऊँचा बनाने की ओर गतिशील किया जा सकता है जो अंतत: आत्मा को श्रेष्ठ स्वरुप में रूपांतरित करने में मददगार होता है । 

सामाजिक शांति एवम् अहिंसा की स्थापना मानवीय विचारधारा का वह सबल पक्ष है जिसमें व्यक्तिगत व्यवहार की उच्चता उसके द्वारा स्वीकृत की गयी धार्मिक व्यवस्था में सम्मिलित रहती है । जीवन की गतिशीलता में आत्मिक कल्याण का भाव पोषित होते हुए आत्मा के गुणात्मक स्वरुप में व्यावहारिक होने की स्थिति के लिए कार्य करना मानव की श्रेष्ठता का प्रमाण है । स्वयं के व्यक्तिगत अस्तित्व की महत्ता को सदा शक्तिशाली बनाने की चेष्ठा के साथ अंगीकार करने हेतु पुरुषार्थ करना आवश्यक होता है जिसमें आत्मा का संबंध परमात्मा से स्थापित हो जाता है और आत्मा गुण एवम् शक्तियों से सुसज्जित होने लगती है । शरीर और शरीर से जुड़े बन्धनों को निभाने के लिये धर्म की उपादेयता लौकिक जगत के पोषण का पर्याय बनती है जिसकी सहजता मानवीय आचरण का केंद्र बिंदु बन जाती है जिसमें भक्ति- भाव के साथ की गयी साधना अंतत: मनुष्य के संतोष का कारण होती है ।

राजयोग की मौलिकता से आत्मिक विकास : जीवन में आत्मा एवम् आत्मा से सम्बंधित गतिविधियों के प्रति चेतना का विकास आध्यात्मिक जगत का आलौकिक स्वरुप है जो मनुष्य को उसके ‘आगमन एवम् प्रस्थान’ के परिदृश्य में छिपे रहस्यों को उजागर करता है जिससे आत्मा अपनी चेतनता को आत्मसात करके अपने वास्तविक स्वरुप में विद्यमान होने के लिए सजग हो जाती है । सामान्यत: मानव द्वारा चेतन मन से धर्म को अपनाते हुए जीवन की पूर्णता तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है जिसके अंतर्गत मानवीय भावनाओं की प्रधानता नीहित  रहती है ।  सामाजिक व्यवस्थाओं के भीतर मनुष्य के अंतर्मन में स्वयं की अनुभूति जब स्व संवाद का कारण बन जाती है तब अध्यात्म अर्थात् आत्मिक स्थितियों के लिए कार्य करना और आत्मा के उत्थान हेतु मनन – चिंतन किया जाना श्रेष्ठ पुरुषार्थ का प्रमाण होता है । जीवन की चेतना में सदा यह उथल – पुथल बनी रहती है कि क्या एक मात्र धर्म अथवा अकेला अध्यात्म या केवल राजयोग से जीवन ज्योति की गुणवत्ता को आलोकित करना संभव है ?  इस सत्य के प्रत्युतर में धर्म की लौकिकता के साथ अध्यात्म के आलौकिक स्वरुप और राजयोग की पारलौकिकता का श्रेष्ठ सामंजस्य आत्मा की उच्चता का आधार है । अतः सृष्टि पर सामाजिक व्यवस्था  में शांति एवम् अहिंसा की स्थापना हेतु मानव जाति द्वारा हृदय और मस्तिष्क  से धर्म के आचरण को स्वीकृत करते हुए व्यवहार में अध्यात्म की मौलिकता से आत्मिक विकास तथा राजयोग से आत्मा को शक्ति एवम् गुण संपन्न बनाकर सामाजिक सदभाव का साम्राज्य निर्मित किया जा सकता है ।

 

 

- मेधावी शुक्ला

स्नातक शिक्षा :

बी.ए ( पत्रकारिता एवं जनसंचार ) श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय

अकादमिक शिक्षा  : 

उच्च शिक्षा : एम.ए  ( जनसंचार , संस्कृति विद्यापीठ ) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा , महाराष्ट्र

व्यावसायिक शिक्षा  :

एम.फिल ( जनसंचार ) School Of Journalism & Mass Communication , Dissertation : “ अवेकनिंग विद ब्रह्मकुमारिज़ आस्था चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम पर आधारित – दर्शकों का एक विश्लेष्णात्मक अध्ययन

Devi Ahilya Vishwavidyalaya , Indore , Madhya Pradesh.

 

तकनीकी शिक्षा  :

पी.जी.डी. ( मूल्य परक शिक्षा एवं आध्यात्मिकता ) Dissertation : राजयोग द्वारा संस्कारों में परिवर्तन - ब्रह्माकुमारिज़ आश्रम  (वर्धा )  महाराष्ट्र के विशेष संदर्भ में एक अध्ययन ” Annamalai University , Tamilnadu.

अनुसंधान शिक्षा :

अनुसंधान : पी.एच.डी   अहिंसक जीवन – शैली में राजयोग का अवदान : परम्परा , स्वरुप , प्रयोग और मीडिया की भूमिका ”  गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा , महाराष्ट्र

प्रकाशनाधीन पुस्तक :

  1. 1.        श्रेष्ठ मनुष्य बनने के उपाय , वही  मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे …. राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त जी की              “ मनुष्यता ” कविता से उद्दत वह श्रेष्ठ पंक्ति है जो ‘ मानवीय संवेदना के आरम्भ को एक नवीन आयाम प्रदान करती है जिसमें मनुष्य की मनुष्यता को बनाए रखने के साथ बचाए रखने के सम्पूर्ण स्वरुप अपनी जीवंतता से विद्यमान हैं……

सृजनात्मक लेखन :

  1. 1.        “ आध्यात्मिक उत्कृष्टता  का प्रस्फुटन ”  ( सत्य , प्रेम  एवं अहिंसा का जीवन्त संस्करण )
  2. 2.        “ आत्मवाद का संवर्धन ”  ( उर्धगामी चिंतन की दिशा में अनुसंधान  )
  3. 3.        “ मानवीय संस्कार का परिमार्जन ”  ( संस्कारगत परिवर्तन के बीजारोपण का श्रेष्ठ आधार )

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन :

प्रकाशन :  प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार एवं वर्कशॉप हेतु शोध पेपर का लेखन तथा प्रस्तुतीकरण    मासिक , द्विमासिक एवं त्रैमासिक पत्र – पत्रिकाओं तथा शोध जर्नल्स में मौलिक आलेख एवं शोध आलेख का प्रकाशन

राष्ट्रीय ( मासिक पत्रिका ) प्रकाशन :

  1. 1.        कार्ष्ण कलाप :  ( मथुरा )  उतर प्रदेश
  2. 2.        राष्ट्रभाषा : राष्टभाषा प्रचार समिति  ( वर्धा )   महाराष्ट्र
  3. 3.        शिव आमंत्रण : अध्यात्म की नई  उड़ान ( सिरोही ) राजस्थान
  4. 4.        वीणा : मध्य भारत की साहित्यिकी ( इंदौर )  म.प्र
  5. 5.        अक्षरा :  मध्य प्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ,  हिंदी भवन  ( भोपाल ) म.प्र
  6. 6.        ज्ञानवीणा : नैतिक एवं आध्यात्मिक जागृति ( भोपाल ) म.प्र  

 राष्ट्रीय ( द्विमासिक पत्रिका ) प्रकाशन :

  1. 1.        रचना  :  म.प्र शासन उच्च शिक्षा विभाग एवं हिंदी ग्रन्थ अकादमी  ( भोपाल ) म.प्र
  2. 2.        मूल्यानुगत मीडिया :  ( इंदौर ) मध्य प्रदेश    

 

राष्ट्रीय ( त्रैमासिक पत्रिका ) प्रकाशन :

  1. 1.        नटराज सार्थक संकेत :  समाज विज्ञान ,  शोध पत्रिका  ( बड़वानी )  म.प्र
  2. 2.        सर्व भाषा  : सर्व भाषा ट्रस्ट ( नई दिल्ली )

 

अंतर्राष्ट्रीय( मासिक पत्रिका ) प्रकाशन :

  1. 1.        अंतर्राष्ट्रीय शोध जर्नल्स  : प्रिंटिंग एरिया ,  बहुभाषिक शोध पत्रिका  ( मुंबई )  महाराष्ट्र
  2. 2.        साहित्य जगत :  ( कुरुक्षेत्र ) हरियाणा

अंतर्राष्ट्रीय( द्विमासिक पत्रिका ) प्रकाशन :

  1. 1.        अंतर्राष्ट्रीय शोध जर्नल्स : हिंदी शोध अंतर्राष्ट्रीय जर्नल ( दिल्ली )
  2. 2.        Transframe  Journal : ( Mumbai )  Maharastra

 

अंतर्राष्ट्रीय( त्रैमासिक ) प्रकाशन :

  1. 1.        अंतर्राष्ट्रीय शोध जर्नल्स : विद्यावार्ता ,  बहुभाषिक शोध पत्रिका ( मुंबई ) महाराष्ट्र
  2. 2.        बोहल शोध मंजूषा :  ( कुरुक्षेत्र ) हरियाणा
  3. 3.        रासो :  “ इतिहास , संस्कृति , साहित्य , दर्शन ” ( अजमेर ) राजस्थान
  4. 4.        Equaniminist : A Peer Reviewed Journal : ( Allahabad ) U.P

AWARDS AND ACHIVMENTS :

  • Award : Certification of  National Integration Camp for Integrating Self to Integrate Bharat , Ministry of  Youth  Affairs  And Sports  Government  Of  India , New Delhi , 2009
  • Kaviyitriin Hindi Academy, New Delh , During 2004-2007
    • Stood Third in Position in Poetry competition, organized by P.G.D.A.V College, DU, Delhi.2006
    • Stood Third in Position in GyanGanga (shlok Uchaaran), organized by P.G.D.A.V College, DU, Delhi.2006
    • Certificate for Joint Secretary, Hindi Sahitya Sabha, Shri Guru Nanak Dev Khalsa College, Delhi University, Delhi. 2006
    • Participated in Blood Donation Camp, organized by Shri Guru Nanak Dev Khalsa College, Delhi University. 2005
    • Joint Editor in Surlok News Paper, Shri Guru Nanak Dev Khalsa Collage, DU., 2005
    • Certificate   awarded  for  social services to  the Cancer Patients, Delhi. 2004
    • Awarded the NCC Certificate for training at Tikri Khurd, Conducted by Shri Guru Nanak Dev Khalsa Collage, New Delhi. 2004
      • Paryavaran Ratan  Award, Delhi. 2000

 

 

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