समाज के उत्थान में डिज़ाइन का महत्व

भारत की पहचान इसकी विविधता है।सामाजिक,आर्थिक, सांस्कृतिकऔरपर्यावरणीय हर दृष्टि से हमारादेशअनुपम औरविशिष्टहै। बोलियां, खान-पान, रीति-रिवाज, हर जगह विविधता ही विविधता है। विविधता में व्यवस्था लाने से ही समाज के उत्थान का मार्ग तय होता है। डिज़ाइन या परिवेश की समझ समाज में व्यवस्था लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन जरूरी यह है कि परिवेश को समाज के विभिन्नसंदर्भों में समझा जाए मसलन आज के समय मेंमहत्वपूर्णपरिस्थितियां क्या हैं। इसके बाद ही समाज के उत्थान की रूपरेखा और प्राथमिकतायें तय की जानी चाहिये।

 

प्रत्येकव्यक्ति अपने जीवन में सुरक्षा चाहता है। सुरक्षा मतलब खाने-पीने की अच्छीव्यवस्था, अच्छीशिक्षाके पर्याप्त अवसर, बेहतर स्वास्थ्य के लिये कुशल चिकित्सा, सस्ता परिवहनआदि-आदि। ये हर व्यक्ति के जीवन की मूलभूत जरूरतें हैं। बेहतर समाज के निर्माण के लिये हर व्यक्ति की मूलभूत जरूरतों का पूरा होना प्राथमिक शर्त है। यदि हम अपने देश और समाज को बेहतर बनाना चाहते हैं तो उपलब्ध संसाधनों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन बेहद आवश्यक है।

 

डिज़ाइन या परिवेश की समझ हो तो बहुतेरी समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है। परिवेश की समझ अल्प संसाधनों में भी बेहतर विकल्प सुझा सकती है क्योंकि असली चुनौती पैसा, साधन और संसाधन पर्याप्त न होने पर होती है। जब इन सब अभावों के बावजूद हमें ऐसी चीजों का डिज़ाइनकरनाहै जिससे समाज का उत्थान हो, समाज के हर तबके का भला हो तो इन चुनौतियों के समाधान के लिये डिज़ाइन का महत्व बढ़ जाता है।

 

हमारी पूरी जनसंख्या में तकरीबन 50प्रतिशतयुवा हैं। जाहिर सी बात है कि यदि युवाओं की संख्याअधिकहै तोरोजगारकी भीआवश्यकता अधिक होगी।  यह एक महत्वपूर्ण बिन्दु है।  उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिये उन्हें रोजगार दिये जाने की जरूरत है। यही हमारी ताकत भी बन सकती है और कमजोरी भी। यदि हम युवाओं की इस विशाल जनशक्ति का सार्थक इस्तेमाल कर सकें तो देश और समाज का उत्थान निश्चित है। टेक्नोलॉजी या तकनीक की मदद से रोजगार का सृजन किया जा सकता है।इसमेंडिज़ाइनर कीभूमिकामहत्वपूर्ण होती है।

 

तकनीक के जरिये रोजगार का सृजन कैसे हो सकता है। इसे समझने के लिये हमें फिर से अपने आस-पास ही देखना होगा और जो कुछ दिख रहा है उसे ठीक से समझना होगा कि वो किन विशिष्ट कारकों का परिणाम है। उदाहरण स्वरूप एसटीडी सेवा को लें, जब देश ने एसटीडी सेवा की टेक्नोलॉजी को अपनाया तो अचानक ही पूरे देश में संचार (कम्युनिकेशन) क्रांति आ गयी। जब इस टेक्नोलॉजी का प्रसार और हुआ तो लोग संचार क्रांति पर आधारित बिज़नेस के नए-नएमॉडलबनाने लगे। कई लोग टेलीफोन बूथ से व्यापार करने लगे। इससे संबंधित कई और बिज़नेस मॉडल भी बनाये गये।

 

यह उपलब्धि संदर्भ को समझ कर तकनीक का प्रयोग करने से हासिल हुई और तकनीक ने बेरोजगारी की समस्या का तत्कालीन संदर्भों में समाधान निकाला। संचार क्रांति के आगे की कड़ी देश में इंटरनेट का आगमन है। कंप्यूटर आधारित इंटरनेट व्यवस्था ने युवाओं के लिए रोजगार के अग्रिम अवसर प्रदान किये। तकनीक को परिवेश के साथ समायोजित करना डिज़ाइनर का काम है और इसके लिये समाज के विविध पहलुओं का बारीकी से अध्ययन आवश्यक है। टेक्नोलॉजी को आईटी के साथएकीकृतकर के अर्थात इसे माध्यम बना कर हमारा देश अपनी विशाल जनसंख्या को बेहतर सुविधायें और रोजगार के भरपूर अवसर प्रदान कर सकता है।

 

सम्मिलितविकासके लिये डिज़ाइन या परिवेश की समग्र समझ का सब तक पहुंचना जरूरी है। यदि हम केवल छोटे-छोटे केचमेंट एरिया (प्रभावित क्षेत्र) पर ही फोकस करते रहे तो समस्याओं के समाधान अल्पकालिक होंगे साथ ही लाभ भी कम होगा। डिज़ाइनर के लिए यही प्रमुख चुनौती है। इसे ठीक से समझने के लिए कुछ और उदाहरणों का अध्ययन करते हैं।

 

मान लीजिए कि हमें एक बस स्टेशन डिज़ाइन करना है। इसके लिये सबसे पहले यह सोचें कि बस स्टेशन का इस्तेमाल कौन करेगा, अधिकतम कितने लोगों के लिये इसे बनाना है, उनकी भाषा क्या होगी, वो समाज के किस तबके के लोग हैं, सामन्यतया उनकी जीवन शैली क्या है? अर्थात हर तरह की सूचनाएं हमारे पास होनी चाहिए। इसके बाद ही बस स्टेशन का डिज़ाइन शुरू हो सकता है। सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर भी पूरी तरह से फोकस किया जाना चाहिये। इसके अलावा कई अन्य छोटी मगर जरूरी बातें होती हैं जिनके बारे में डिज़ाइनर को सोचना पड़ता है,जैसेबस स्टेशन काप्रमुखकार्यआश्रयदेनाहै लेकिन इसे ठीक से डिज़ाइन न किये जाने पर इसका इस्तेमाल लोग अन्य बेकार के कामों के लिये भी करने लगते हैं जिससे वहां अव्यवस्था हो सकती है। जैसे यदि आश्रय को बहुत बड़ा बना दिया तो लोग उसमें सो भी जाते हैं, बारिश और ठंड के मौसम में जानवर भी वहां घुस सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए इसका डिज़ाइन करना होता है।

 

दरअसल किसी जगह का निर्माण ईंट-पत्थर से नहीं विचारों से होता है। क्योंकि लोग इसका प्रयोग करते हैं और जब लोग इसका प्रयोग करते हैं तो आपको लोगों के व्यवहार को भी जानना आवश्यक होता है। जब आप खुद को लोगों के व्यवहार पैटर्न से जोड़ेगें तभी सार्वजिनक स्थानों के लिये डिज़ाइन संबंधी निर्णय आप ले सकते हैं।

 

सार्वजनिक स्थानों का खाका खींचते वक्त डिज़ाइन के माध्यम से इसमे ऐसी व्यवस्था जोड़ सकते हैं जिससे लोग उसे इस्तेमाल करने की अपनी मानसिकता बदलें और उसे ज्यादा जिम्मेदारी से प्रयोग में लायें। जाहिर है मनुष्य का व्यवहार उसकी सोच की देन होता है। उदाहरण के लिये लोगों का व्यवहार एयरपोर्ट और पंच सिताराहोटलमें अमूमन बेहतर होता है। वहां पर सब तरीके से रहते हैं लेकिन जब वही लोग म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के बस स्टेशन पर जाते हैं तो उनका व्यवहार पूरी तरह से बदल जाता है।

 

हमको सभी जगह ऐसी ही सोच को विकसित करना होगा ताकि लोगों के व्यवहार को हम नियंत्रित कर पाएँ। उदाहरण के लिये एक कचरे के डब्बा को हम उसे ऐसा बना देते हैं कि लोग कचरा डब्बे में डालने के बजाए उसके बाहरसामानफेंकते हैं। यदि उसे ऐसा डिज़ाइन किया जाए कि लोग अपना कचरा उस डब्बे में ही डालें, तो हमारा काम अपने आप आसान हो जायेगा।

 

दरअसल लोगों को प्रोत्साहित कियाजानाचाहिए, लोगों में येभावना पैदा होनी चाहिए कि यह मेरे लिए बनाया गया है, मेरी सुविधा के लिए बनाया गया है। ऐसा नहीं कि ये सरकारी सामान है, इसे चाहे जैसे इस्तेमाल में लाओ, कोई फर्क नहीं पड़ता। लोगों में अपनापन जगाने से इस व्यवहार को बदला जा सकता है। इसके लिये सामाजिक संप्रेषण (कम्युनिकेशन) की जरूरत है।

सामाजिक कम्युनिकेशन के लिये एनीमेटेडफिल्मया पोस्टर डिज़ाइन बना कर संदेश प्रेषित कर सकते हैं। ये सम्प्रेषण की एकरणनीतिहै यानी लोगों को बताया जाए कि उनके लिए और समाज के लिए क्या अच्छा है और क्याबुराहै।

 

डिज़ाइन बहुविषयक होती है, इसमें बेहद प्रभावशील सामाजिक संप्रेषण करने की जरूरत है। डिज़ाइन का संप्रेषण, प्रजातंत्र के भीतर नागरिक को उसकी जिम्मेवारियां निर्वहन करना सिखाने में प्राथमिक भूमिका निभा सकता है। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है क्योंकि प्रजातंत्र और जिम्मेवारी साथ-साथ चलें तो समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिये सरकार की कानून पर निर्भरता घटेगी । कानून का इस्तेमाल तब होता है जब लोगनियमों सेपरेकोई काम करते हैं। यदि उपभोक्ताओं के व्यवहार पैटर्न के साथउत्पादऔर सेवाओं को डिज़ाइन किया जाए तो नियमों एवं कानूनों का पालन करना लोगों के लिये आसान बनाया जा सकता है।

 

एकशहरमें कई सार्वजनिक स्थान होते हैं जैसे बस स्टॉप, गार्डन, पार्क आदि। यदि इन सब जगहों का डिज़ाइन अच्छे से किया जाए तो लोग अपने आप को इससे जोड़ पाएंगे। उन्हें यह एहसास होगा कि शहर उनका है और इसे साफ-सुथरा रखना उनके लिये ही फायदेमंद है। यदमदफफ

 

दूसरे उदाहरण केरूपमेंस्कूलकोले सकते हैं। हम स्कूल मेंकईउम्रके बच्चों को देखते हैं। बच्चे 3-4 साल में पढ़ना चालूकरते हैं। हर साल वे बढ़ते हैं। उनकी रीढ़ कीहड्डीनाजुक होती है। इसलिये उन्हे रीढ़ की दिक्कतोंसेबचानेके लिएहर उम्र के बच्चों के लिए अलग-अलग प्रकार काफर्नीचरबनानाचाहिए। उनके बाथरूम, लाइट, वर्कस्टेशन कीआवश्यकताओं की पूर्ति उनके बढ़ते कद को देखते हुए होनी चाहिए। साथ ही यहभीदेखाजानाचाहिए कि ऐसी कौन-कौन से मेटेरियल्स (सामग्री) हैं जोज्यादामहंगीनहींहै। इस संदर्भ मेंबाँसका उल्लेख जरूर किया जाना चाहिए। यह बहुतजल्दीउग जाता है और हल्का होने की वजह से स्कूल का फर्नीचर बनाने के लिये बिल्कुल उपयुक्त है। ये भी डिज़ाइन की बात है और डिज़ाइन की समझ किसी भी समस्या का सटीक समाधान देती है।

 

यदिस्कूलों में टीचर नहीं है तो इंटरनेट के माध्यम से भी बच्चों कोशिक्षादी जा सकती है। ये टेक्नोलॉजी और डिज़ाइन केसंयोगसे संभव है लेकिनमहत्वपूर्णबात यह है कि ऐसे यंत्रों को यूज़र फ्रेंडली बनाने की बहुतआवश्यकताहै।

 

अस्पताल किसी भी गांव या शहर की महत्वपूर्ण जगह है। कई बार अस्पताल मेंलोगों को बिस्तर नहीं मिलते। कम लागत के बिस्तरों को डिज़ाइन करना, इस समस्या का समाधान हो सकता है। सीमित संसाधनों केभीतरअच्छे चीजें बनानाएकचुनौतीपूर्णकार्यहोता है और डिज़ाइन की मदद से ये संभव है।

 

बेंगलुरू के डॉ. देवी शेट्टी का उदाहरण इस संदर्भ में अनुकरणीय है। बैंगलूरू स्थित नारायण हृदयालय डिज़ाइन की अनोखी कार्यशाला है। यहां पर 2-3 साल से भी कम उम्र के बच्चों की हार्टसर्जरीकी जाती है। आज वो तीस हजारबेड का अस्पतालशहरमें बना रहे हैं। उन्होंने हार्ट सर्जरी का ऐसा सस्ता और टिकाऊ मॉडल विकसित किया है जिसने हार्ट सर्जरी के खर्चे को 5-7लाखसे घटा कर सीधे 60-70 हजार कर दिया। साथ ही यहां टेलीमेडीसिन की सेवामुफ्तदी जाती है।

 

दरअसल ये चमत्कार उन्होंने टेक्नोलॉजी और इकोनॉमी को स्केल कर के किया है। यदि स्केल बढ़ा दी जाएगी तो लागत खुद ही कम हो जाएगी। दिल के मरीजों के लिये उनका ये प्रयोग किसी चमत्कार से कम नहीं है। नारायण हृदायालय जैसे नवोन्मेषकारी प्रयोग देश के अन्य हिस्सों में भी किये जा रहे हैं। आई सर्जरी के क्षेत्र में एक ऐसे ही मॉडल की शुरूआत चेन्नई में की गयी है। यह मॉडल भी भारत की जरूरतों को ध्यान में रख कर ही विकसित किया गया है।

 

‘अमूल’ ब्रैंड के तहत डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में प्राप्त की गयी ‘श्वेत क्रांति’ भी डिज़ाइन का एक अनुपम उदाहरण है। इस क्रांति ने भारत को विश्व में सर्वाधिक दूध उत्पादनकर्ता देश बना दिया। इस ऑपरेशन के तहत को-ऑपरेटीव सोसायटी ने लाखों लोगों कोरोजगारदिया। दरअसल ये एक सिस्टम सेंट्रिक मॉडल है जिसने गुजरात के लोगों की जरूरतों और वहां की भौगोलिक परिस्थितियों को समायोजित कर एक अनोखा मॉडल विकसित किया और समय के साथ दूर-दूर तक प्रोसेस्ड दूध का विस्तार किया।

 

वर्तमान में सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सेल्फ एम्प्लॉयमेंट वीमन्स एसोसिएशन का उदाहरण भी एकदम अलग तरह का है। इसने क्राफ्ट को आधुनिक बना कर लोगों को रोजगार दिया और शहरी मध्यवर्ग को गांव के शिल्प से जोड़ कर एक तरह की खाई को पाटने का काम किया।  जाने कितने लोगों को इसने सम्मान का अवसर दिया है।

 

लगभग इसी तरह का एक अन्य उदाहरण फैब इंडिया का है। जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला। क्राफ्ट या हस्तशिल्प हमारी पारम्परिक कला है। समसामयिक जरूरतों और फैशन से इसका जुड़ना एक बड़ी उपलब्धि है। दरअसल इंडिया की क्राफ्ट, आर्ट और कल्चर की समझ एक डिज़ाइनर के लिये बेहद जरूरी है। परिवेश की समझ को सृजनात्मकता के साथ समायोजित कर एक दूसरी दुनिया बनायी जा सकती है।

 

सही मायने में क्राफ्ट सोने की खान है। यदि क्राफ्ट की उत्पादन पद्धति को विकेन्द्रीकृत(डिसेन्ट्रलाइज) कर दिया जाय तो इसकी पहुंच आम लोगों तक भी हो सकती है। क्राफ्ट एक स्थानीय सामग्री है, स्थानीयउत्पादहै और उसकासांस्कृतिकऔर स्थानीय महत्व यकीनन अधिक है। यदि डिज़ाइनर इस समझ के साथ काम करें तो हेंडलूम का विकासभी हो सकता है।

 

आजपूरादेशपरिवेश को लेकर जूझ रहा है। कार्बन फुटप्रिंट को कम करना देश की ही नहीं पूरे विश्व की समस्या है। यदि हम पारंपरिक शिल्प को आधुनिक परिवेश के साथ समायोजित कर दें तो इन बड़ी समस्याओं का हल भी आसानी से निकाला जा सकता है। सही बात ये है कि हेंडलूम बुनने में न बिज़ली लगती है, न कोयला और न ही कोई कार्बन डाईऑक्साइड बनती है।हाथसे बुनाईएक बढ़िया विकल्प है जो प्रासंगिक और फैशनेबल भी हो सकता है।

 

ऐसा ही एक अन्य विकल्प खादी है। खादी के ताकत के बारे में हमें गांधी जी ने बताया था। सत्याग्रह की तरह खादी भी गांधी जी का एक अन्य दुर्लभ प्रयोग था। उन्होंने 60-70 साल पहले ही स्वराज के लिये सबका उत्थान जरूरी माना था। गांधी जी के मुताबिक व्यवसायिक कुशलता को समसामयिक बनाना जरूरी था।चाहेवो चमड़ें काउत्पादहो या हैंडलूम उत्पाद हो, चाहे पत्थर के हों या लकड़ी के हों, चाहे कांच की चीजें हो इन सबकानिर्माणहमस्वयंकरें तभीस्थानीयरोजगार केअवसरपैदा होंगे। कईनिर्यातकर्ता (एक्सपोटर) हैं जो इन चीजों को बना-बनाकर विदेशों में बेचते हैं लेकिन इसके लिए एक ऐसा सिस्टम विकसित किया जाना चाहिए जिसके अंदर पूरे हैंडक्राफ्ट के परिवेश को नियंत्रित किया जा सके।

 

कई ऐसे उत्पाद हैं जो घास और नेचुरल फाइबर जैसे केला, सिसिल से बनते हैं। नेचुरल फाइबर का सबसे बड़ाफायदायह है कि इसेआसानी से उगा सकते हैं। इससे परिवेश को भी क्षति नहीं पहुंचती है। अतः इसके बने उत्पाद वातावरण केअनुकूल(एन्वायरनमेंट फ्रेंडली) होते हैं। हमें इससे बने उत्पादों पर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है। यदि हम इसे दूसरे देशों को निर्यात कर सकें तो हम रोजगार और पैसे दोनों पैदा कर सकते हैं। इसकी सफलता डिज़ाइन का एक नायाब उदाहरण हो सकती है।

 

दरअसल समाज के उत्थान के लिये सबसे महत्वपूर्ण चुनौती समावेशी विकास की है। समावेशी विकास में महिलायें, बच्चे और युवा सभी का विकास मायने रखता है। हमारे देश की महिलाएँ बहुत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में समाजिक उत्पादन में अपना योगदान देती हैं। महिलाओं की सुरक्षा एक ज्वलंत समस्या है। सुरक्षा की समस्या के समाधान के लिये संचार को प्रभावी बनाना बेहतर कदम साबित हो सकता है।

 

इसी तरह एक बेहतर समाज अपने बुजर्गों को पर्याप्त सम्मान और स्थान देता है। इसके लिये सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाना और उन्हे आत्मनिर्भरता बनाना दो बड़ी प्राथमिकतायें हैं। बूढों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अगर उनके लिये विशेषीकृत उत्पाद डिज़ाइन किये जायें तो उनकी बहुत सारी समस्याओं का हल आसानी से निकाला जा सकता है। जैसे कई लोग बाथरूम में फिसल जाते हैं। बाथरूम के अंदर इस्तेमाल में लायी जाने वाली चीजें, सीढ़ियां, बस या ट्रेन, व्हील चेयर, वगैरह को उन के हिसाब से डिज़ाइन किया जाये तो उनकी दूसरों पर निर्भरता कम हो सकती है। गर्भवती स्त्रियों और विकलांगों के लिये भी इस तरह के विशेषीकृत उत्पाद बेहद मददगार साबित हो सकते हैं। इस तरह से परिवेश को समाज के साथ समायोजित कर या डिज़ाइन करके हम एक सक्षम और आत्मनिर्भर समाज डिज़ाइन कर सकते हैं।

 

- प्रद्युम्न व्यास

निदेशक,
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन (एनआईडी)
अहमदाबाद ,गुजरात ,
भारत

लेख संपादन – डॉ. दिनेश कुमार प्रसाद
हिन्दी अधिकारी, एनआईडी

 

 

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