समय के साथ सम्वाद करती लघुकथाएं : मूल्यहीनता का संत्रास

 पुस्तक -   मूल्यहीनता का संत्रास

नारी चेतना की लघुकथाएं

लेखिका -  डॉ . लता अग्रवाल

समीक्षक – श्रीमती भूपिंदर कौर भोपाल

प्रकाशक – जी. एस. पब्लिशर एंड डिस्ट्रीब्यूटर दिल्ली

पृष्ठ संख्या-133

मूल्य – 395

 

‘मूल्यहीनता का संत्रास’ अपने रूप व बनावट में जहाँ सुन्दरता लिए हुए हैं वहीं भूमिका में श्री बलराम अग्रवाल जी एवं डॉ. अंजना जी की उपस्थिति उसमें चार चाँद लगाती है |

डॉ लता अग्रवाल की लघुकथाएं समय के साथ- वार्तालाप करती । दोगलेपन का पर्दाफाश करती स्वयं अपने सोच को दर्शाती है ‘आशीष’ पुराने विचारों की जंजीरों को तोड़ती जान पड़ती है | भोलेपन द्वारा किया गया अनुत्तरित प्रश्न ‘दादा ! देवि क्या विसर्जन के लिए ही होती हैं इन्हें घर में नहीं रखा जा सकता …?” ‘प्रतिमा विसर्जन’ ,वहीं कुंती का पंडित जी की भविष्यवाणी को पूर्णता नकारना जहाँ चाह वहाँ राह को चरित्रार्थ करती है। ‘साझा दुख’ किन्नरों की व्यथा को चित्रित करता है । लेखिका ने इस वर्ग की संवेदनाओं को बखूबी उकेरते हुए इस वर्ग को सफलता पूर्वक जीवन जीने की इच्छा का सम्मान किया है।

       नारी के बरगद सामान विशाल व्यक्तित्व को बोनसाई के रूप में परिवर्तित कर सिर्फ शो पीस सा ड्राइंग रूम के हिस्से में दिखाया गया है | माँ के प्रति बने गलत धारणा का पट्टाभिषेक उसके मरने के बाद होता है | तब गलती से क्या फायदा ‘सॉरी मॉम’ कान का कच्चा होने का संकेत देती है। ‘तवायफ का बेटा’ बच्चे की भोली मानसिकता को दर्शाती मर्मस्पर्शी लघुकथा है। आज की युवा पीढ़ी ने अपने बड़ों की सोच को गलत ‘नजरिया’ बताने में कोई गुरेज नहीं किया आधुनिक युग की आपाधापी में दूर होते रिश्ते व मां बेटे के कम संवादों को दर्शाती ‘ऑनलाइन’ पर करारा व्यंग्य किया है हजारों सवालों के घेरे में ‘पीर पराई ‘भी धराशायी दिखाई देती है ।

          समाज में फैल रहे बुजुर्गों को कूड़ा करकट समझ कर ‘छूत के रोग’ बता कर वृद्धाश्रम में पहुँचाकर बीमारी से बचने का सही उपाय ढूंढ लेना आज की बड़ी विडंबना बन गई है। ‘रीति रिवाज’ के माध्यम से कन्या भ्रूण हत्या पर करारा व्यंग करते हुए भविष्य में होने वाले भारी नुकसान की तरफ खुला इशारा किया है। लिंग भेद के चलते माँ वह उनकी बच्चियों के प्रति बदलते नजरिए को स्पष्ट करते ‘नौ दिन की महारानी’ सार्थकता सिद्ध करती है। वहीं दूसरी तरफ खोखली मान्यताओं पर वैज्ञानिक तर्कों की जीत को दर्शाती तथा मानव को व्यावहारिक होने को प्रेरित करते ‘नास्तिक’ को सही ठहराती आस्था को परे धकेल ही सही जान पड़ती है ।अपने आँसुओं के ‘एडजस्ट का धुआँ बनाकर उड़ाना सिर्फ नारी ही सफलतापूर्वक कर सकती है। आज ऐसे तावीजों की हमारे समाज में बहुत आवश्यकता है जिससे वृद्धाश्रम जैसी समस्याएँ चुटकी बजाते ही अपना मुँह छिपाने लग जाएँगी। ‘कही – अनकही के माध्यम से लेखिका ने सैनिक की पत्नी की पीड़ा को स्पष्ट किया है। बढ़ती बेटी की भावनाएं खुले खत से ‘बंद लिफाफा’ कब अपने आप में समेट लेता है कोई नहीं जान पाता। ‘त्रिया चरित्र’ भी इसी के समान होता है ।

                  ‘व्यवहारिक कुंडली मिलान’ से आधे से ज्यादा समस्याएं उत्पन्न होने से पहले ही दम तोड़ देंगी । मार्शल आर्ट के महत्व को आत्मरक्षा में ‘मैं कृष्ण हूँ ‘की सार्थकता सिद्ध करती है। ‘माँ का कर्ज ‘ चाहकर भी बेटा नहीं उतार सकता। स्वावलंबी औरत का पति को पैसे की बाबत प्रश्न पूछना क्यों ‘गुनाह’ हो गया यह अनुत्तरित प्रश्न है। ‘लक्ष्मण रेखा’ को लाँघने के भुगतान को दर्शाती लघुकथा अच्छी है। बेटियों के संदर्भ में खर्च व लालच को चुड़ैल बताकर लेखिका ने उससे मुक्ति की गुजारिश की है। जिससे पाठक सोचने पर मजबूर होता है।गर बेटियों को पढ़ा दिया जाये तो स्वयं ही वह इससे निजात पा लेंगी। पहली तारीख से संबंधित ‘टक्साली रिश्ते’ कभी निस्वार्थ नहीं हो सकते। हमारी संस्कारी प्रवृत्ति को ‘पश्चिम का पर्दा’ बखूबी ढकने में कामयाब दिख पड़ता है ।’ओहदेदार’ बिडम्बना को स्पष्ट दर्शाता है। ‘सुहागन’ के देह स्पर्श  सुहागन चिन्हों को धारण करना विरोधाभास दर्शाता है | ‘ईगो’ ने जीवन के पक्ष में अपनी अहमियत दर- किनार कर दी। नारी की संवेदनहीनता को दर्शाती प्रतिष्ठा कटु सत्य उजागर करती है कर्म फल को सही ठहराती है प्रायश्चित जुर्म की दस्तक को पहचानने का संदेश देती है। ‘आलंबन’ नकारात्मक संदेश देती नजर आ रही हैं महिला-महिला की बुराई करने से नहीं चूकती । भले ही बात ‘आस्था’ की हो| कभी- कभी जिंदगी सिर्फ ‘पैबंद’ लगाने में ही गुजरती है  एक लगाओ तो दूसरा मँंह बाए खड़ा रहता है सार्थक लघुकथा  है। लायक बेटे की  लियाकत ‘झाँकी’ स्पष्ट करती है। ‘ भले घर की बेटी’ ने अपनी महानता स्वयं सिद्ध  कर दी ।’अभागिन’ में सुहाग चिन्ह उतारे जाने पर प्रश्न चिन्ह सदा रहेगा। ‘थके कदम’ आज भी नारी को उसके घर लौटने को मजबूर करते हैं। ‘उमराव जान’ का स्वागत नारी को स्वाभिमान से जीने का मार्ग प्रशस्त करेगा । इस विश्वास को पुष्ट करती लघुकथा सार्थक विचार को प्रेक्षित करती है। माँ के साथ किया गया ‘वादा’ सराहनीय है या निंदनीय है अनबूझ प्रश्न छोड़ती पाठकों को सोचने पर विवश करती है। ‘विस्थापित का दर्द पौधे के माध्यम से लेखिका ने पाठकों के समक्ष रखा बेटियां मां की रीढ़ की हड्डी होती है ये कथा द्वारा लेखिका ने स्पष्ट किया कि औरत को कमजोर न समझा जाए । ‘मेरा दुःख’ लघुकथा संदेश देने में सक्षम दिख पड़ती है।

                  घर के भीतर बड़ों के तिरस्कार का पर्दा फाश करते ‘श्रावणी’ सटीक चोट के साथ सामान पाठकों को जान पड़ी ।नारी के बाँझ पन पर ‘ नपुंसक’ ने जोरदार कटाक्ष किया है मंदिर में प्रवेश कर जाने पर ‘पवित्रता ‘ के ज्वलंत मुद्दे को उठाने का प्रयास लेखिका ने किया है। पाश्चात्य परंपरा रिलेशनशिप को हमारे परिवारों के बच्चों द्वारा अपनाने के दुष्परिणाम को इंगित करती लघुकथा ‘तटहीन’ सागर के स्वभाव पर प्रकाश डालती है। ‘अवतार’ जहां रिक्शे वाले के रूप में सहायता करता है वहीं लघुकथा में छिपे संदेश को भी प्रसारित करता है कि औरत पढ़ाई के साथ साथ कार चलाने में भी सक्षम होना चाहिए । अनकही व्यथा बयान करता ‘पासवर्ड’ समाज के युवा वर्ग को महत्वपूर्ण संदेश देता है। पुरानी मान्यताओं को तोड़ता ‘मोक्ष’ प्रभावकारी लघुकथा है जिसमें बेटियों ने पिता को अग्नि दी। ‘वसीयत’ ने बेटियों की दुखती रग पर हाथ रख कर आखिर जता ही दिया कि बेटियां आज भी पराया धन ही मानी जाती हैं ‘मूल्यहीनता का संत्रास’ ‘मूल्य’ से  अभर कर सिर उठा रहा है| ‘ इकत्तीस का महीना’ , सास की रोटी के बंटवारे पर बहुओं पर कलंक लगा जाता है। आज की नारी का ‘मुखौटा’ प्रधान है उसके पास कोई चारा नहीं।

            ‘एकलव्य’ के गुरु द्रोणाचार्य की पुनरावृति आज की बेटी अपनी घोषणा में स्पष्ट करती है। पति- पत्नी के बराबरी के हक को ‘साझेदारी’ स्पष्ट करती है ।आज भी बेटियाँ मां बाप को अपने- अपने दुःख से बचा कर आपस में  दुखों को’ रफू’ करने का काम गुपचुप तरीके से करती हैं।वक्त रहते नारी की अवहेलना और ‘साँझ ‘का दीपक कौन देखता है ।बेटियां सबकी साँझी होती हैं। सोने के अंडे देने वाली ‘मुर्गी’ लघुकथा हमारे सामने प्रश्नचिन्ह बन कर खड़ी होती है।’मुहावरा जीवन का’, ‘गुलामी की रोटी’, ‘पति की सत्ता’ लघुकथा में लेखिका ने सामाजिक कुरीति पर तीक्ष्ण प्रहार किया है। । ‘थिकम्मा ‘के नाम से मशहूर हो उसके आँगन में पुत्र प्राप्ति हेतु जमघट लगना एक सकारात्मक सोच को जन्म देती सार्थक जन्म देना सार्थक होता है। नारी महत्व को दर्शाती ‘वापसी’, ‘क्लेश’, ‘बंजर जमीन’ पाठक मन को द्रवित कर जाती है। नारी शक्ति को स्पष्ट करती ‘ना का मतलब ना’, ‘ऐसी मांग का उजड़ जाना ही बेहतर के माध्यम से नारी के अधिकार को लेखिका ने  और सबको  मार्गदर्शन भी दिया । ‘ नारी का पुरुष विरोधी सकारात्मक सोच को जाहिर करता है।’महत्वाकांक्षा’ , ‘संवेदना’ , ‘कानून का दायरा’ , ‘रबर स्टाम्प ‘, ‘इनाम’ व ‘मर्दानगी  नारी के दुःख को करीब से परिचित कराती सत्य की मोहर साबित होती है।  ‘देह’ , ‘शोध’ पर पत्नी का कटाक्ष देखते ही बनता है। हर गुस्सा उतारने के लिए भगवान ने पुरुष को औरत ही दी है चाहे वो स्वयं की ‘बेरोजगारी का गुस्सा’ ही क्यों न हो सही कहा है गिरे गधे से गुस्सा कुम्हारी पर।

                मूल्यहीनता का संत्रास के लघुकथाएँ नारी जीवन के विभिन्न कोणों से ली गई हैं। वर्णनात्मक शैली का प्रयोग बहुत कम मिला है। अधिकतर लघुकथाएँ है संवादात्मक शैली में पाठकों के समक्ष अपनी बात स्पष्ट करती नजर आई हैं । भाषा पात्रा अनुकूल है। पात्रों की भीड़ नहीं दिखाई पड़ती । लघुकथाओं के पैमाने पर खरी उतरती है जैसा देश वैसा वेश के अंतर्गत पात्र की बोली भी उनके अनुरूप जान पड़ती है।

कहीं कहीं लघुकथाएं पाठकों के सामने कुछ प्रश्नों को छोड़ जाती हैं। कुछ शीर्षक इंग्लिश में आये हैं जैसे बोनसाई, सॉरी मैम ,ऑनलाइन और ऐट जस्ट एगो वाट्सऐप आदि।  लघुकथाएँ मानक पर खरी उतरी हैं। पाठक उनके अगले संग्रहको दिल से पढ़ना चाहेगा । आज की नारी के द्वारा पुरानी मान्यताओं को दरकिनार कर आज के आधुनिक नारी अपने प्रति जागरूक होती दिखाई दी है। कहीं- कहीं सशक्त नारी के रूप में भी सामने आई है। कहना ना होगा संपूर्ण नारी जीवन को आईने में उतार ‘मूल्यहीनता के संत्रास’ को पाठकों के सामने लाने में सफल हुई है । हम अगला संग्रह आने व पढ़ने का इंतजार करेंगे और इस संग्रह की सफलता की बधाई देते हुए आशा व दुआ करते हैं कि इसी तरह वे आगे भी लघुकथा के क्षेत्र में अपना परचम लहराएँ।

 

- भूपिंदर कौर

भूपिंदर कौर का साहित्यिक उपनाम ‘पाली’ है। जन्म तारीख १ अप्रैल १९५७ तथा जन्म स्थान-पटियाला (पंजाब)है। आपका वर्तमान और स्थाई पता भोपाल (म.प्र.)है। पंजाबी एंव हिन्दी का भाषा का ज्ञान रखने वाली भूपिंदर  कौर एम.ए.और बी.एड. शिक्षित हैं। स्वतंत्र लेखन ही कार्यक्षेत्र है। सामाजिक  गतिविधि के अंतर्गत कई सामाजिक व साहित्यिक संस्थाओं में सक्रियता से जुड़ी हुई हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी,लघुकथा,समीक्षा,बाल साहित्य, हायकु और वर्ण पिरामिड आदि है। प्रकाशन में आपके खाते में-वो हुए न हमारे(कथा संग्रह)है। पंजाबी भाषा सहित अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाएँ और समीक्षा आदि प्रकाशन हुआ है। इनकी विशेष उपलब्धि-साझा संग्रह-शत हाइकुकार,लघुकथा संग्रह-खंड-खंड जिंदगी और सहोदरी लघुकथा है। पाली की लेखनी का उद्देश्य-स्वांतः सुखाय ही है। प्रेरणा पुंज-पूज्य माता जी हैं।

 

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