संवेदना की आर्द्रता – डॉ पुष्पिता अवस्थी

 

पुस्तक के कुछ अंश :

·        गत वर्षों से लगातार मैं चिंतक रिल्के की तरह ही यह महसूस कर रही हूं कि “ समय इतनी तेजी से गुज़र रहा है कि मैंने काफी समय से इससे होड़ लगानी छोड़ दी है। मेरे लिए प्रसन्नता का कारण है कि मैं फल में एक ऐसे बीज की तरह जी रहा हूँ जो अंधकार में अपना काम करने के लिए अपने आसपास की हर चीज़ को छितरा देता है। जितना ही मैं चारो ओर देखता हूँ मुझे लगता है,  मेरे जीने का यही एक रास्ता है नहीं तो मैं अपने गिर्द ज़मी हुई खटास को मधुरता में नहीं बदल पाऊंगा। ऐसा करना मेरा सदा से प्रभु के प्रति ऋण है। एक शब्द में कहूँ तो यह है कि मैं अपने खड़े होने की जगह पर खड़ा हूँ, बस….”

o   (जूली बेरोनस फ़ान त्सूर राबनाउ, 29, रियू कासेत, पेरिस, 10 अगस्त, 1907, रिल्के के प्रतिनिधि पत्र, राइनेर मारिया रिल्के, पृ. 119, साहित्य अकादमी दिल्ली)

 

     इस भूमिका को उकेरते हुए मैं अपने मानस की भूमि पर ऐसे ही प्रतीक्षारत हूँ कि संवेदनहीनता के इस क्रूर संकट में शब्द कुछ ऐसी ताकत के साथ साहित्य और संस्कृति को संपुष्ट करेंगे कि विश्व मे संवेदनाओं की सजल शक्ति का विस्तार हो सकेगा। इसी संदर्भ में कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का मानना है कि ‘कोई भी भावना न तो अपने-आप मे प्रतिक्रियावादी होती है,न प्रगतिशील। वह वास्तविक जीवन सम्बन्धो से मुक्त होकर ही उचित या अनुचित, संगत या असंगत, सिद्ध हो सकती है।‘ 

                                                                         (मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड-5 पृ. 130)

संवेदना, साहित्य, भाषा, संस्कृति, धर्म, देश और विश्व से जुड़ी इसी तरह की वैश्विक चिंताओं से प्रेरित होकर कुछ आलेख समय-समय पर लिखे गए थे जो गत बीस वर्षों के कालखंड के अंतर्गत अनेकानेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए जिनका अब, उपलब्ध हो पाना, असम्भव की तरह दुसाध्य है। इस भावबोध के तहत इन्हें एकीकृत करने का प्रयास किया है। प्रयास कितना सार्थक और उपयोगी है इसका निर्धारण पाठकों की संवेदना की आर्द्रता पर जितना निर्भर है उतना ही समय की प्रासंगिकता पर भी।

                                           

- अम्स्टेल गंगा परिवार 

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