श्रीमद्भगवद्गीता में संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा का स्वरूप

सार

श्रीमद्भगवद् गीता कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच एक परस्पर चल रहे संवाद पर आधारित हिन्दू धर्म का एक विशिष्ट ग्रन्थ है जो मनोचिकित्सा के विभिन्न सिद्धांतों को स्पष्ट करता है। वस्तुत: श्रीमद्भगवद्गीता और समकालीन मनोचिकित्सा के सिद्धान्तों एवं तरीकों में बहुत अधिक समानताऐं हैं और इस पत्र के माध्यम से उन्हीं समानत्ताओं की चर्चा  हैं। पश्चिमी मानसिक अपचालन की अवधारणा और मानसिक संरचनाओं के मनोविज्ञान सिद्धांतों और तीन गुणों की अवधारणा के बीच  काफ़ी समानता दिखाई देती है। यदि आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से श्रीमद्भगवद्गीता के प्रार्ंभिक अध्यायों को देखे तो श्रीमद्भगवद्गीता और फ़्रायडीयन सिद्धान्तों में बहुत सी समानता मिलती है। जहां श्रीमद्भगवद्गीता के आरंभिक अध्याय अर्जुन विकृत सोच के तत्वों को दर्शाते है जिसमें डीबीटी एवं सीबीटी की समसामयिक पश्चिमी अवधारणा सिद्धान्त प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है वहीं दूसरी ओर, श्रीमद्भगवद्गीता मनोचिकित्सा के उन आयामों को दर्शाती है जो वर्तमान में भी उतने ही प्रभावी है जितने महाभारतीय काल में थे।वस्तुत: श्रीकृष्ण अर्जुन को देश-कालवित होने का संदेश देते हैं। भगवान कृष्ण संज्ञानात्मक व्यवहारशील थेरेपी (सीबीटी) एवं डायलेक्टिकल व्यवहार  चिकित्सा पद्धति के माध्यम से अर्जुन का सफ़ल उपचार करते हैं जिसके परिणामस्वरूप अर्जुन की मानसिक स्थिति बेहतर बनती है और वह निर्लिप्त भाव से युद्ध करते हुऐ कौरवों को परास्त करते है।  अत: हमें गीता और सीबीटी, दु:ख मुक्ति, भूमिका परिवर्तन, आत्मसम्मान, और प्रेरणा वृद्धि के साथ-साथ पारस्परिक और सहायक मनोचिकित्सा के सिद्धांतों के बीच सादृश्य का पता चलता हैं। हम भारतीय उपमहाद्वीप के मरीजों के लिए मनोचिकित्सात्मक हस्तक्षेप की प्रभावकारिता बढ़ाने और पश्चिमी मनोचिकित्सा की कला में मूल्य जोड़ने के लिए श्रीमदद्भगवद्गीता के वर्णित ज्ञान के व्यावहारिक अनुप्रयोग का समर्थन करते हैं।

 

Keywords: संस्कृत साहित्य में चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक चिकित्सा, संज्ञानात्मक चिकित्सा सिद्धानत्, श्रीमद्भगवद्गीता मे मनोचिकित्सा

 

व्यवहार चिकित्सा अथवा व्यवहार संशोधन चिकित्सा (सीबीटी) का साधारण शब्दों में अर्थ है कि अस्वस्थ अथवा अवांछनीय व्यवहार के पीछे कारणों को खोज कर उन्हें सामाजिक मानदण्डों के अनुरूप बदलना । आधुनिक मनोविज्ञान के उपचारों के आरंभिक उपचारों में इस चिकित्सा पद्धति का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है क्योंकि इस चिकित्सा पद्धति के माध्यम से मानसिक अवसाद की स्थिति  के पीछे उसके कारण को खोजने का प्रयास किया जाता है ताकि उन कारणों का पता लगा कर उन कारणों के परिणामस्वरूप व्यवहार में आये अवसाद का निवारण किया जा सके अथवा इसे इस प्रकार क्कह सकते हैं कि  संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा पद्धति व्यवहार संशोधन तकनीकों के साथ संज्ञानात्मक उपचार एक तरीका है जिसमें चिकित्सक मरीज की वास्तविक मानसिक स्थिति से अवगत होता है, रोगी के मन में चल रही अवांछनीय गतिविधि को पहचानता है और उन अवांछनीय विचारों को बदलने के लिए कुछ सामाजिक मर्यादाओं, सीमाओं और नियमों के अधीन मरीज़ के अपव्यवहार को सलाह मश्वरे के माध्यम से बदलने का प्रयास करता है । कुछ मामलों में रोगी की कुछ मौलिक मान्यताओं, जो कि त्रुटिपूर्ण होती है और जिनमें संशोधन की आवश्यकता हो सकती है,  के संदर्भ में विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से रोगी को समझाने का प्रयास करता है ताकि वह अपने पूर्वाग्रहों को त्याग कर पुन: एक नवीन एवं स्वस्थ जीवनयापन कर सके। उदाहरण के लिए, मानसिक अवसाद से पीड़ित मरीज को दूसरों के साथ सामाजिक संपर्क से परहेज हो सकता है और  अलगाव के कारण ऐसा रोगी मानसिक तनाव को महसूस करता है जिसके परिणाम स्वरूप उसकी स्वस्थ सोच एवं समझ बाधित होती है और वह आत्महत्या करने तक बाधित हो सकता है। ऐसे समय में पर्याप्त “अतार्किक संज्ञानों” को केवल एवं केवल मंत्रणा के माध्यम से रोगी की मनोदशा को बदला जा सकता हैं और इससे रोगी को अवसाद से काफी राहत मिल सकती हैं।संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा मानता है कि प्रतिकूलित अथवा दोषपूर्ण सोच का कारण है कि प्रतिकूल व्यवहार और “नकारात्मक” भावनाओं का जब संघट्ट जिसके माध्यम से रोगी का मनोचालन होता है और उस समय मनोवैज्ञानिक चिकित्सा की रोगी को आवश्यकता होती है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रतिकूल व्यवहार वह व्यवहार है जो रोगी के दैनिक जीवन में नकारात्मक हस्तक्षेप करता है। उपचार की यह विधि रोगी के विचारों (संज्ञानात्मक पैटर्न) को बदलने के साथ ही साथ रोगि के व्यवहार और भावनात्मक स्थिति को बदलने पर केंद्रित रहता है। संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा संज्ञानात्मक उपचार और व्यवहार थेरेपी के अलग-अलग लक्ष्यों को जोड़ती है।

१९६० के दशक में पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों आरोन बेक और अल्बर्ट एलिस द्वारा शुरू, संज्ञानात्मक उपचार पद्धति यह स्वीकार करती है कि प्रतिकूल व्यवहार और परेशान मूड या भावनाओं का अनुचित प्रयोग ही तर्कहीन सोच का परिणाम है। ऐसी स्थिति में रोगी वास्तविकता को अस्वीकार करता हुआ शोकाकुल होता हुआ सही निर्णय न लेने की स्थिति में होता है। ऐसा रोगी स्थिति स्वयं की विकृत दृष्टिकोण के प्रति सामाजिक रूप से मान्य प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अपने असफ़ल प्रयासों का यह निष्कर्ष निकाल सकता हैं कि वह “बेकार” है क्योंकि वह परीक्षा में सफ़ल नहीं हो सका और उसका यह जीवन इस कारण जीने योग्य नहीं है। इसी प्रकार आर्थिक रूप से असफ़ल व्यक्ति द्वारा किया निर्णय सही नहीं माना जा सकता क्योंकि वह अपनी आर्थिक असफ़लता के माध्यम से निराश होकर आत्महत्या का प्रयास करन्ए को उद्यत होता है जो कि सामाजिक रूप से अमान्य कर्म है।अत: व्यवहार चिकित्सा अथवा व्यवहार संशोधन चिकित्सा (सीबीटी) संज्ञानात्मक मॉडल पर आधारित है जिसमें रोगी की अपचालित मनोस्थिति, भावनात्मक प्रतिक्रिया, या व्यवहार की दोषपूर्ण या प्रतिकूल चालन की पहचान कर उसे सोच के वांछनीय तरीके, भावनात्मक प्रतिक्रि्या या व्यवहार से परिचित करवाती हुई जीवन को एक नई दिशा प्रदान करती हुई रोगी को एक सामान्य जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

यहां यह बात स्पष्ट करना उचित होगा कि यह बात तो निश्चित है कि जो मनुष्य जाति के लिये वर्तमान समय में जो समस्याऐं अपना मुंह बाये खडी हैं वे सदियों पूर्व  प्राचीनतम संस्कृतियों में भी विद्यमान रहीं है। पश्चिमी मनोवैज्ञानिको को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों का हल जब पश्चिमी चिकित्सा पद्धति में नहीं मिला तो उन्होंने प्राचीन संस्कृतियों में उन समस्याओं का हल तलाशने की कोशिश की है जिनमें भारतीय संस्कृति का स्थान प्रमुख रहा है। यह बात तो निश्चित है कि जहां पतंजलि मुनि के योग सूत्र ने जहां ध्यान धारणा और समाधि योग ने पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति को प्रभावित किया है वहीं, दूसरी ओर, श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग ने भी मनो-चिकित्सा के क्षेत्र में पश्चिमी मनोचिकित्सा की अवधारणा को प्रभावित किया है। अत: आध्यात्मिक मूल्य के प्रयोग की अवधारणा यद्यपि आजकल के संदर्भों में नवीन मानी जाती है और आधुनिक संचार के विभिन्न माध्यमों और व्यवस्थाओं के कारण आध्यात्मिक का मूल्य की स्थापना जहां बडी शीघ्रता से विकसित हुई है वहीं दूसरी ओर इन्हीं कारणों के परिणामस्वरूप मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढी है और पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के सिद्धान्तों में पूर्वी एवं विशेषकर भारतीय चिन्तन पद्धति का संदर्भ बहुधा में मनोवैज्ञानिक उपचार में उद्धृत किया जाता है। उदाहरण के लिए, डायलेक्टिकल व्यवहार  चिकित्सा पद्धति  (डीबीटी: एक ऐसा मानसिक अवस्था जिसमें मनुष्य मन में मनोवस्था संबंधी विकार विद्यमान रहता है) के रूप में चीन की  ज़ेन पद्धति के सिद्धांतों का प्रयोग के साथ साथ संज्ञानातात्मक व्यवहार थेरेपी (सीबीटी) में पातंजल योग सूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धान्तों का वर्तमान मनोचिकित्सकी प्रणाली में प्रयोग किया जाना इसी ओर संकेत देता है कि भारतीय चिकित्सा पद्धति पश्चिमी चिकित्सा पद्धति से अधिक विकसित रही है इसी कारण पश्चिमी चिकित्सा पद्धति में ध्यान एवं समाधि योग पर इन्हीं संदर्भों में आजकल विशेषतया अधिक बल दिया जाने लगा है। इन दोनों ग्रन्थों का विश्व की लगभग सभी भाषाओं में लिप्यन्तरण हो चुकना भी इस बात की ओर संकेत करता है कि ये दोनो ही ग्रन्थ संपूर्ण विश्व को एवं मानसिक चिकित्सा पद्धतियों को एक नयी दिशा देने में सक्षम हैं। यह बात यद्यपि अलग है कि इस चिकित्सा अनुशासन के संदर्भों में अधिकांश रूप में फ्रायडियन अध्ययन को ही स्वीकृति प्राप्त हुई है परन्तु फ़िर भी पश्चिमी चिकित्सा पद्धति में हिंदू धर्म और दर्शन में से श्रीमद्भगवद्गीता और योगसूत्र को चिकित्सा में उद्धृत करना इसी तथ्य को बताता है। इस पत्र के शीर्षकानुसार मैं इस पत्र को केवल एवं केवल श्रीमद्भगवद्गीता तक ही सीमित रखने का प्रयास करता हुआ इस पत्र के माध्यम से आधुनिक मनोचिकित्सा क्षेत्र में श्रीमद्भगवद्गीता की संभव उपादेयता पर विचार करना चाहूंगा।

यह बात तो निश्चित है कि श्रीमद्भगवद्गीता ने न केवल हिंदू जन-मानस पर व्यापक प्रभाव डाला है अपितु इसमें वर्णित ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग विषयक अवधारणा ने समकालीन विश्व की नवीन सभ्यताओं और संस्कृतियों को भी प्रकारान्तर से प्रभावित कर जीवन को एक नई दिशा देने का प्रयत्न किया है। अत: श्रीमद्भगवद्गीता अपनी इसी विशेषता के कारण वर्तमान में संपूर्ण संसार में न केवल एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में प्रस्थापित हैं अपितु इसके दशम एवं एकादश अध्याय का हिन्दू भक्ति अवधारणा एवं साहित्य पर व्यापक प्रभाव डाला है क्योंकि इसमें अर्जुन को श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत नामक ग्रंथ का एक भाग है जो कि महर्षि व्यास द्वारा प्रणीत है। इस में कुल १००,००० श्लोक हैं एवं श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत की अध्याय संख्या २५-४२ में वर्णित है। ऐसा माना जाता है कि इस ग्रन्थ की रचना ईसा के जन्म से लगभग २५०००० से ५००० वर्ष पूर्व की गई है और श्रीमद्भगवद्गीता में कुल १८ अध्याय और ७०१ श्लोक हैं जिसमें छ: अध्याय ज्ञान योग, छ: अध्याय  भक्ति योग एवं छ: अध्याय कर्म योग पर आधारित है।  श्रीमद्भगवद्गीता की मूल कथा चचेरे भाईयों के दो समूह, कौरव और पांडवों के मध्य हो रहे युद्ध से पूर्व अर्जुन की मानसिक स्थिति पर आधारित है जिसमें अर्जुन स्वस्थ (अपने स्व में स्थित हो कर: स्वस्मिन् स्थित:) हो कर अन्तत: युद्ध करते है।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रारंभ कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र से होता है जिसमें अर्जुन अपने रथ पर आरूढ हो कर युद्ध-क्षेत्र में आते हैं और उनका रथ श्रीकृष्ण द्वारा संचालित है और अर्जुन श्रीकृष्ण को अनुरोध करते हैं कि युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व श्रीकृष्ण उनका रथ दोनो सेनाओं के मध्य स्थापित करें ताकि वे यह जान सके कि वे किन व्यक्तियों से युद्ध करने जा रहें है। वे दोनो सेनाओं का निरीक्षण करने पर पाते हैं कि उनके अपने चचेरे भाई, रिश्तेदार, शिक्षक आदि ही उनके विरुद्ध युद्धक्षेत्र में उपस्थित हो उनसे युद्ध करना चाहते हैं।  परिणाम स्वरूप अर्जुन मानसिक रूप से अस्वस्थ होकर दिग्भ्रमित हो जाते हैं और श्रीकृष्ण को पूछते हैं

“निहत्य धार्तराष्टान् न: का प्रीति स्याज्जनार्दन।                                                            पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिन:॥१.३६”

कि इन कौरवों को मार कर मुझे क्या प्रसन्नता मिलेगी अपितु केवल और कौरवों को मार कर केवल पाप की ही प्राप्ति होगी। अत:

“यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणय:।

धार्तराष्ट्रा रणे हन्यु तन्मे क्षेमतरं भवेत”॥१.४६॥

अर्थात  अर्जुन श्रीकृष्ण को कहते हैं कि रण में यदि कौरव ही उन्हें मृत्यु दे दें तो इससे कल्याणकारी उनके लिये इससे और क्या बढिया होगा।द्वितीय अध्याय में उनके इस शोक भाव में उत्तरोत्तर विकास ही होता जाता है और वे कहते हैं कि पितामाह भीष्म और गुरु द्रोण, जो पूजनीय है, पर मैं कैसे प्रहार करूंगा। रक्त से लिप्त राज्य को प्राप्त करने से बेहतर यह होगा कि वे भिक्षा मांग कर जीवन यापन करें। ऐसा कह कर अर्जुन शोक संविग्न हो धनुष को छोड. रथ पर बैठ जाते है एवं इसके अनन्तर द्वितीय अध्याय में कृष्ण को अर्जुन कहते हैं कि जो भी उनके लिये श्रेयस्कर हो वह उनको बताये क्योंकि

“शिष्यस्तेÅहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥२.७॥

एवं तत्पश्चात् अर्जुन  युद्ध न करने के लिये कहते है

“न योत्स्य इति गोविन्द उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥२.९॥”

अर्थात अर्जुन युद्ध करने से स्पष्टतया मना कर देते हैं।

यहां यह कहना एक आवश्यकता बन जाती है कि मनुष्य मन प्रकृतिगत दोष के कारण दिग्भ्रमित होता है जिसमें उसके संस्कार, मानसिक स्थिति, वातावरण आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इन्हीं संदर्भों में अर्जुन की मानसिक स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है। अर्जुन के क्षोभ का कारण कौरवों की वह व्यवस्था है जिसमें कौरव पाण्डवों को अधिकारच्युत करने का प्रयास करते है और फ़लस्वरूप जहां कौरव अपने अधर्म को ध्यान में रख कर युद्ध के लिये समुपस्थित होते हैं वहीं पाण्डव अपने प्रति होरहे अन्याय का प्रतिकार करने के लिये प्रस्तुत होते है।  यदि हम श्रीमद्भगवद्गीता को ध्यान से देखें तो हमें प्रथम अध्याय में ही अर्जुन एक योद्धा के रूप मिलते हैं जो युद्ध क्षेत्र में खडा है और यह देखता है कि उसके विभिन्न संबंधी उनसे युद्ध करने के लिये कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में उपस्थित हैं। वस्तुत: अर्जुन की यह मानसिक स्थिति युद्ध के अपराध बोध से प्रेरित होने के साथ साथ कई अन्य संज्ञानात्मक विकृतियों का भी पता चलता हैं जिसमें मानसिक खिन्नता, मन में द्विधा भाव, अविचारित त्याग की भावना, मुंह का सूखा होना, अंगों में कम्पन, शरीर में जलन, एवं गलत निर्णय आदि प्रमुख रूप से विद्यमान हैं । यद्यपि अर्जुन एक शक्तिशाली योद्धा है परन्तु उसमें युद्ध करने की इच्छा नहीं हैं क्योंकि  अपने रिश्तेदारों एवं गुरु आदि व्यक्तियों के विनाश से भय, प्रेम, सम्मान की भावना एवं श्रद्धा है। यद्यपि अर्जुन यह जानता है कि युद्ध  की जिम्मेदारी संपूर्ण रूप से कौरवों विशेषकर दुर्योधन की है परन्तु सभी आदरणीय जनो के साथ स्नेह एवं सम्मान होने के कारण अर्जुन युद्ध के मैदान से हटते हुऐ युद्ध न करने का विचार करता है। वस्तुत: यह तो निश्चित है कि जिस स्थिति को युद्ध पूर्व अर्जुन ने अनुभव किया वह स्थिति कहीं न कहीं प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आती है इसीलिये अर्जुन के संदर्भ में की जाने वाली मनोचिकित्सा उपचार पद्धति केवल महाभारत तक ही सीमित नहीं रही है वरन इस उपचार पद्धति की उपादेयता आज के संदर्भों में उतनी ही है जितना महाभारतीय काल में थी।

श्रीकृष्ण द्वारा की गई मनोचिकित्सा के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व यहां यह बताना आवश्यक है कि संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा करने वाले व्यक्ति के लिये आवश्यक है कि वह अपने सान्निध्य में आये रोगी की मनोदशा को पूर्ण रूप से समझे, रोगी के मनोभावों से अच्छी तरह परिचित हो, रोगी की वर्तमान स्थिति का कार्य-कारण भाव से विश्लेषण एवं विवेचन करने में समर्थ हो एवं स्वयं शांत चित्त हो। वैसे भी यदि संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का ध्यानपूर्वक अनुशीलन करें तो यह बात तो स्प्श्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को देश-काल के अनुसार कर्म करने की प्रेरणा दे रहें है अर्थात ऐसा कर्म सिद्धान्त जिसमें देश-काल के औचित्य का समावेश हो। यदि कर्म के विषय में अपेक्षित देश काल का औचित्य नहीं रखा जाता तो वह कर्म चाहे जितना भी भली प्रकार से किया गया हो वह निश्चित रूप से गर्हित ही माना जाता है। त्याग करना एक बात है परन्तु युद्ध के क्षेत्र में त्याग, बिना युद्ध के आत्मसमर्पण की भावना का कहीं भी औचित्य नहीं प्रतीत नहीं होता। अर्जुन की भी यही स्थिति है कि वह मानसिक व्यामोह से ग्रसित हो कर त्याग करने की बात कर रहे हैं जो देश एवं काल के अनुरूप नहीं है।

श्रीकृष्ण युद्ध पूर्व अर्जुन के इस मानसिक व्यामोह से जब परिचित होते हैं उनकी प्रथम प्रतिक्रिया यही होती है कि अर्जुन के चित्त में कश्मलता (कायरता) का भाव कहां से उपस्थित हो गया जो अनार्य द्वारा सेवित किया जाता है और जो सभी प्रकार से निन्दनीय एवं त्याज्य भाव है। अत: प्रथमतया ही श्रीकृष्ण अर्जुन को हृदय के क्षुद्र भावों का त्यागने को कहते हैं क्योंकि युद्ध के क्षेत्र में अर्जुन के व्यक्तित्त्व के अनुसार ठीक ये भाव सही नहीं है। तत्पश्चात श्रीकृष्ण को समझाते हुऐ कहते हैं कि उन्हें उन व्यक्तियों के लिये शोकमग्न नहीं है जो युद्धक्षेत्र में उपस्थित अर्जुन से युद्ध करना चाहते है। श्रीकृष्ण अर्जुन के ज्ञान की बडी बडी बातों को अतार्किक मानते हुए नकार देते है क्योंकि श्रीकृष्ण के अनुसार प्रज्ञावान पुरुष न तो मृत के लिये शोक करता है और न ही जीवित के लिये। अपनी बात को अधिक स्पष्ट करते हुऐ श्री कृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि मनुष्य निश्चित रूप से मरणधर्मा है परन्तु शरीर को धारण करने वाली आत्मा नित्य एवं शाश्वत है एवं श्रीकृष्ण इसी प्रकार की बातें अर्जुन को बताते है और कहते हैं कि जो व्यक्ति जीवन एवं मृत्यु के इस रहस्य को जानता है वह इन विषयों पर शोकमग्न नहीं होता। अत: अर्जुन को इस कारण शोक नहीं करना चाहिये। वास्तव में श्रीकृष्ण आत्मा को अनन्त बनाकर अर्जुन के अन्त:संघर्ष को संबोधित करते हैं जिसके परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण की बाते अर्जुन  के शोक निवारण में सहायक सिद्ध होती हैं।

अत: श्रीकृष्ण अर्जुन को दुविधा से मुकाबला करने में मदद करने के लिए, भगवान कृष्ण बताते हैं कि अर्जुन अपनी क्षमता को नजरंदाज़ कर रहा है  क्योंकि

“स्वधर्मपि चावेक्ष्यन विकम्पितुमर्हसि।                                                                      धर्म्यद्धि युद्धाच्छ्रेयोÅन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते”।।२.३१॥

अर्थात् श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि वह पथभ्रष्ट न हो क्योंकि वह क्षत्रिय है और ऐसा धर्मयुद्ध जो स्वर्ग का द्वार खोल दे, क्षत्रिय का यही अहोभाग्य है। यदि अर्जुन नियत कर्म नहीं करता है तो श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि उसे नियत कर्म न करने का पाप लगेगा और लोग प्रथमतया तो यही कहेंगे कि अर्जुन युद्ध कायर था अत: वह युद्धक्षेत्र छोड कर भाग गया और द्वितीय लोग उसके सामर्थ की निन्दा करेंगे और यह निन्दा मृत्यु से भी अधिक कष्टकर होगी। अत: यदि अर्जुन युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त होता है तो वह निश्चय ही स्वर्ग का अधिकारी होगा अन्यथा युद्ध जीत कर वह राज्य को प्राप्त करेगा। अत: अर्जुन को बिना किसी अपेक्षा, राग द्वेष, लाभ अथवा हानि की भावना के बिना ही युद्ध करना चाहिये क्योंकि इन भावों के बिना किया गया युद्ध न तो हर्ष का विषय रहेगा और न ही शोक का विषय बनेगा और न ही वह पाप का भागीदार बनेगा

“सुखदु:खे समेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।                                                                          ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि”॥२.३८॥

श्रीकृष्ण अपनी बात को आगे बढाते हुऐ कहते हैं कि अर्जुन को नियत कर्म करना चाहिये क्योंकि कर्म करने की स्थिति कर्म न करने की स्थिति से बेहतर है क्योंकि जब तक जीवन है तब तक उसे अपने स्व की रक्षा के लिये भी कर्म करने पडेगा। कहने का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को परिस्थिति जन्य उपयुक्त कर्म करने को कहते है जो सार्वकालिक रूप में सही है।

संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा का लक्ष्य  है कि वर्तमान समस्या में विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि प्राप्त करना  और श्रीमद्भगवद्गीता और समस्त उपनिषद साहित्य इसी लक्ष्य को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि “ज्ञान की प्राप्ति ही मनुष्य का उद्धार करती है”॥६.५॥  यहां ज्ञान विषयक अवधारणा स्पष्ट करना एक आवश्यकता बन जाती है। वास्तविक ज्ञान वही हो सकता है जो मनुष्य को विपत्ति के समय में मनुष्य को लोभ, मोह, अहंकार, निजता के बंधनों की सीमा से परे ले जा कर उसे  श्रेष्ठ्ता के मार्ग पर अग्रसर कर उसके लिये श्रेयस् का मार्ग प्रशस्त करता है। वस्तुत: श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त ज्ञान अर्जुन को समस्त बन्धनों से मुक्त करता हुआ उसके लिये श्रेयस् का मार्ग प्रतिपादित करता है। यह एक ऐसा प्रवचन है जो अर्जुन को युद्ध में अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर नियति को पूरा करने में मदद करने के लिए सही कार्य करने के लिए मार्गदर्शन करते हैं जिसका परिणाम बुराई पर कर्म निष्ठ धार्मिकता की जीत है।

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय की श्लोक संख्या ६२-६४ में श्रीकृष्ण बताते है कि इंद्रियां वस्तु के प्रति आकर्षित होती हैं जो बदले में मन को अनायास ही उस ओर लेजाती हैं जिधर विषय होता है और इसके परिणामस्वरूप मनुष्य में संग की भावना उत्पन्न होती है और वह उसको पाने का प्रयास करता है  और ईप्सित वस्तु की अप्राप्ति के  कारण  मनुष्य में क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध के कारण बुद्धि में सम्मोह, सम्मोह से स्मृति विभ्रम और इसका परिणाम स्मृतिभ्रंश और तत्पश्चात बुद्धि का नाश होता है। वस्तुत: फ्राइडियन सिद्धन्तों में ईड का यह पदानुक्रम श्रीमद्भगवद्गीता की अवधारणा के बराबर है। श्रीमद्भगवद्गीता का यह तर्क है कि मन इंद्रियों की शक्ति से बेहतर है और मनोचिकित्सा के क्षेत्र में  फ़्रायडियन चिकित्सा सिद्धान्त इन्ही सिद्धान्तों पर आश्रित हैं। श्रीमद्भगवद्गीता गुणों के माध्यम से चित्त की भावभूमि (सात्विक, राजसिक एवं तामसिक) एवं इनके द्वारा प्रेरित कर्म का विवेचन करता हुआ चेतना और अवचेतन की कई परतों का वर्णन करती है। फ्राइडियन साइकोडायनेमिक मनोचिकित्सा भी गीता के  अट्ठारवें अध्याय के समान मन की तीन अवस्थाऐं मानता है। वस्तुत: श्रीमद्भगवद्गीता कर्म की पृष्ठभूमि  का आधार तीन गुणों को मानता हुआ अर्जुन में सत्वगुण प्रधान कर्म करने का संदेश देता है। वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता का उद्देश्य जीवन में सात्विक गुणों का विकास एवं जीवन में सफलता के लिए आवश्यक दिशा निर्देश भी विद्यमान है जिन्हें हम भी निश्चित रूप से उपयोग में लाते हैं ।

यह तो निश्चित है कि श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित मनोचिकित्सा के सिद्धान्त औपनिषदिक सिद्धान्तों का एक घनीभूत स्वरूप है जिसे हम श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच बातचीत के स्वरूप में देखते हैं क्योंकि हिंदुओं का मानना है कि श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषदों का एक सार हैं जो मनुष्य को स्वस्थ जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करती है। वस्तुत: यदि हम अर्जुन की दुविधा को हम जीवन के एक रूपक में देखते है तो यह बात हमारे सामने स्वत: ही उभर कर आती है कि हमारे दिमाग के युद्धक्षेत्र में सकारात्मक और नकारात्मक गतिशीलता से संबंधित हमारा आंतरिक संघर्ष सदा ही चलता रहता है और श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए गीता के उपदेश हमें कार्रवाई के सही दिशा निर्धारित करने के विषय के बारे में बताते हैं। कई विषयों में श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश संघर्ष के समाधान हेतु एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर के कार्य के समान है जो  रोगी के चिंता और संघर्ष को संबोधित करते हुए समाधान देने में मदद करते है और दीर्घकालिक सामान्य जीवन के मार्ग को प्रशस्त करता है। एम. वी गोविन्दस्वामी एवं ए वी राव जैसे कई प्रतिष्ठित भारतीय मनोचिकित्सकों ने मनोचिकित्सा और उपचार के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांतों के उपयोग की कई स्थानों पर सिफारिश की है और अपनी चिकित्सा में वे श्रीमद्भगवद्गीता के उन्हीं सिद्धन्तों का प्रयोग करते है।

 सहायक ग्रन्थ सूची

 १. श्रीमद्भगवद्गीता

 

- आदित्य आंगिरस

बीए  (आनर्स इन संस्कृत) एम ए (हिन्दी), एमलिब साईंस, पी एचडी (पंजाबविश्व विद्यालय)

हिन्दी प्राचार्य, वीई बी आई एस (पीयू)

साधु आश्रम, होशियारपुर

सम्प्रति: विभागाध्यक्ष , वी वी बी आई एस (पीयू) होशियारपुर पंजाब

लगभग ६५ रिसर्च आर्टिकल्स

१०० के लगभग राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्टिय संगोष्ठियों में विभिन्न विषयों पर शोध पत्र पढे.

३ पी एच डी  छात्र एवं ४ का दिशा निर्देशन

 

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