शिक्षक पनडुब्बी की तरह है और छात्र नवागत रडार

अध्यापक बरगद की तरह होता है जिसकी असंख्य बेलें होती हैं। उन बेलों पर हर तरह का बच्चा खेलता, चढ़ता, उछल कूद करता प्रतीत होता है। आज बरगद ज्यों के त्यों ही खड़े हैं अकेले भी, दुकेले भी। ये अकेलापन छीन लिया है विकासशील के नाम पर विकसित होते भारत ने, भारत के सरमायदारों की कुटिलताओं ने। जब इस तरह से कोताही आराम्भ हो जाए, तो पिछड़ना लाजमी हो जाता है। कारक हम जैसे ही बनते हैं।
समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी पीढ़ी को सुनहरे भविष्य में देखना चाहता है, अच्छे संस्कार, अच्छी तालीम, अच्छा घराना। नायाब बनाना चाहता है कि उसकी आने वाली नस्ल उससे भी आगे निकले। इसीलिये दिन रात के अथक परिश्रम में वे कार्यरत होते हैं। प्राचीन में गुरुकल ही ऐसे आधार स्तम्भ होते थे, जो व्यक्ति और कुशल समाज की रीढ़ होती थीं। आज के शिक्षक दूसरे रूप में कहें अभिभावक जो अतल गहरे अथाह समुद्र में चलने वाली पनडुब्बी की तरह होते हैं, जो गुप्त रूप से अपना कार्य करते रहते हैं, और दूसरी बंदरगाहों (अनन्त सीमाओं) रुपी मंजिलों तक अपने निर्देशन में हज़ारों की संख्या में या उससे भी कहीं ज़्यादा की मात्रा में उन्हें कामयाब बनाने के लिए जी तोड़ लगे रहते हैं। पनडुब्बी सदैव रडार पर ही कार्य करती है, जीवन के रडार में भी भांति भांति प्रकार की कठिनाइयाँ, परिस्थितियों में परिवर्तन निरन्तर आता रहता है। उनसे सामना करना, जूझना, संघर्षरत रहना ये सब नैसर्गिक गुण इन्हीं के कुशल प्रशिक्षण में सिखाया जाता है। कहना आसान होता है बड़ा होकर क्या बनना है टीचर बनना है, डॉक्टर बनना है, इत्यादि इत्यादि। असल में जब भी, जो भी बनना होता है, उसमें प्रकृति बहुत कारगार सिद्ध होती है, शेष हमारा कार्य श्रम करता है। जब तक भट्टी में तपोगे नहीं तब तक बनोगे या निखरोगे नहीं। ब्लेड की शार्पनेस      (तीख़ापन) धारदार पैनी होती है, जीवन में भी छात्र वर्ग की उम्र भी ऐसी होती है जिसे ब्लेड की तरह धारदार बनाना होता है, जिसका सम्पूर्ण कार्यभार एक शिक्षक पर होता है। क्योंकि वे भी कभी इसी तरह धारदार हुए होंगे। हालाँकि समाज सदा एक सा नहीं रहा है, क्योंकि वैसाखी पकड़ कर चलने की लत लगी हुई है, हम सब मंजिल पर पहुंचने से पहले ही आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, जुगाड़ू संस्कृति पैदा कर के रख दी है आज के सभ्य समाज की वैचारिकता ने। यहीं से संघर्ष पेचीदा होता रहता है। और आये दिन शोषक की शोषण नीति पैर पसारे समाज को खोखला कर रही है। शायद यही कारण है कि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्य में उदबोधन कविता के हवाले से लिखा है-
“हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिलकर यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव प्रकृति का पुण्यलीला स्थल कहाँ
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहाँ
जो थे कभी गुरू है न उनमें शिष्य की भी योग्यता
जो थे सभी से अग्रगामी आज पीछे भी नहीं
है दीखती संसार में विपरीतता ऐसी कहीं?”
ये तो है वर्तमान समाज की हालत। पर ऐसा नहीं है कि सत्व का अंश नष्ट हो चुका है, वो भी इस संसार में मौजूद रहते हैं बस ढूँढने की ज़रूरत हैं। सिनेमा जगत में आरक्षण फ़िल्म इस बात का उदाहरण है (ये ध्यान रखें, मैं फ़िल्म की कहानी की बात नहीं कर रहा,) में डॉ. आनन्द और उनके कोचिंग सेंटर की कथा संघर्ष की कथा की बात कर रहा हूँ। उन्हें अपने पसंदीदा अध्यापक से पढ़ने से इतना आत्मीय लगाव है कि वो उनकी कुटिया में ट्यूशन तक पढ़ने को आते हैं। जाहिर सी बात है, तकनीक ने हमें तकनीक का आदि बना दिया है, सदुपयोग करना हम नहीं चाहते। लगाव कब क्यों कैसे होता है, वो पढ़ाने में तौर तरीक़े से जाहिर होता है। वो परिवार की तरह आपको ज्ञान देता है, भरण पोषण करता है। ये तो हुई एक बात, दुसरा हवाला आगामी माह में रिलीज़ होने वाली सुपर 30 फिल्म है, जिसमें आईटी सेंटर को चलाने वाले पटना के आनंद कुमार की कहानी है, जो जीता जागता उदाहरण है। गणित विषय की बात होगी तो जनक रामानुजन को माना जाता है, क्या समाज में रामानुजन जैसा बना जा सकता है।  इसके लिए लक्ष्य निर्धारित करना ज़रूरी होता है। आज की आवाम की लक्ष्य जग जाहिर हैं। लेक्चर ख़त्म बात ख़त्म।
बड़ी कोफ़्त होती है ये सुनकर। क्या गुरुकल सांकल हो गए हैं? क्या शिक्षण हाशिये पर धकेल दिया गया है? क्या सरोकार, पैरोकार कुछ भी सशेष नहीं रहे हैं? क्या अतिमानवीय हो गये हैं, और छोटी सी सत्ता का दम्भ भरने लगे हैं, जो कुछ सालों की है? बहुतेरे प्रश्न मुँह बाएँ खड़े है? और सदैव खड़े रहेंगे….मुझे याद है छात्र जीवन के दौरान एक प्रश्न पूछा गया था कि यदि आपको इस संसार में पुनः जन्म लेना पड़े तो इतिहास की सुप्रसिद्ध हस्ती के रूप में जन्म लोगे? बहुतों ने कहा भांति भांति के जवाब दिए, मैंने भी जो सूझ बूझ थी मुंशी प्रेमचंद का नाम लिया की मैंने दोबारा मुंशी प्रेमचंद के रूप में जन्म लेना चाहूँगा, क्योंकि उन्होंने बहुत बड़ा परिवर्तन लाया था। आम व्यक्ति की बात की पैरवी की थी। सबको जोड़ा था। यही कारण है कि वो आज कालजयी रचनाकार हैं। ये लगाव पैदा कहाँ से होता है, कौन प्रेरित करता है? जैसे किसी नदी का उद्गम स्रोत पता करना हो तो आपको पता चलता है कि उद्गम से भी आगे और उद्गम है। ठीक उसी प्रकार अच्छे शिक्षक का उद्गम स्रोत भी कुछ ऐसा ही है। ताली सदा एक हाथ से नहीं बजती। छात्र यदि अनगढ़ है तो शिक्षक का दायित्व है वो उसकी अनगढ़ता को दूर करे पर यदि शिक्षक अनगढ़ है तो उसे स्वाध्ययन की ज़रूरत है। तभी आप कुशल रामसेतु बना सकोगे अपने और अपने ऊर्जावान छात्रों के बीच। ख़ुद को मारने की ज़रूरत है, खपाने की जरुरत है, उद्यम की जरूरत है। तभी तो गुरुकल के सांकल टूटेंगे। ये कोई बाहर से आकरके नहीं तोड़ने वाला या स्वयं टूटेगा। इसे तोड़ना ख़ुद पड़ेगा। बिलकुल वैसे जैसे सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की कविता
“तोड़ो कारा तोड़ो’ है। या जागो फिर इक बार की तरह।
अन्ततः मुझे कैफ़ी आज़मी की पँक्तियाँ याद हो आती हैं-
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी
हाथ ढलते गए साँचे में तो थकते कैसे
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हम ने
की ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद
बाम ओ दर और, ज़रा और सँवारे हम ने

 

- डॉ. संगम वर्मा

 

जन्म: 17 अप्रैल , शिकोहाबाद  (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा:  एमए (हिन्दी) स्वर्ण पदक, यूजीसी. नेट, हिन्दी-2006, जे आर एफ़ 2009,

शोध कार्य- भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में तदयुगीन परिदृश्य 2017

सम्प्रति:  सहायक प्राध्यापक,  हिंदी विभाग, स्नातकोत्तर राजकीय कन्या महाविद्यालय ,चण्डीगढ़, 160036
लेखन:  1) मानक हिन्दी व्याकरण
            2) मानक हिन्दी कार्यशाला  (संयुक्त लेखन)
प्रकाशन: विभिन्न राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में शोध-पत्र  प्रकाशित एवं अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय  संगोष्ठियों में पत्र वाचन, रेडियो पर काव्य पाठन और साक्षात्कार
संपादन:  राष्ट्र भाषा हिन्दी स्मारिका, पंजाब
सम्मान: पंजाब स्तरीय ‘हिन्दी सेवी सम्मान’ (सन 2012, 2013, 2014 और 2015); खन्ना में “युवा कवि सम्मान”से सम्मानित

पत्राचार:  गुरू हरकृष्ण नगर, खन्ना, ज़िला- लुधियाना 

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