शाश्वत सत्य सनातन संस्कृति

धारा
सृजन शक्ति की धारा
सतत प्रवाहमान
धारा में आप्लावित मानवीय संवेदनाओं को चाहिए एक सम्पर्क
सजीव आन्दोलन का
नव युग जगा रहा
नवीन प्रेरणा
नव स्फूर्ति के लिये
मोह
अतीत से मोह ?
स्वाभाविक लगाव
सत्य की पिपासा
सदा जागृत रहे
यह ऊह
वह अपोह
यही  तो है
सुखद साहित्य
सम्यक् दर्शन
सूक्ष्म विज्ञान
सम्पूर्ण कला
इदं जगत्
विराट ब्रह्म
शून्य
सत्य, परम सत्य
हाँ! परम सत्य
धार्मिक हठधर्मिता नहीं
असहिष्णुता व दुराग्रहों से परे
परम सत्य है
सिर्फ़ और सिर्फ़
आध्यात्मिक सत्य
जिस पर
टिकी है हमारी संस्कृति
प्रकाशित है हमारा जीवन
आप्लावित हैं हमारे संस्कार
हमारे संस्कार
हमारी संस्कृति
हॄदय को करती हैं उद्वेलित
उद्वेलित हृदय भर जाता है
परिपूर्ण होता है
चैतन्य से
शुद्ध चैतन्य से
अन्तस्तल तक
रखता परख
तर्क
युक्ति व प्रमाण के मार्ग पर चलकर
निर्भय निरन्तर चलायमान
शाश्वत जयगान करता
समर्थ उद्घोष
*तमसो मा ज्योतिर्गमय*
यही है
शाश्वत सत्य
सनातन संस्कृति
जिसे खोजने में भटक रही
अशान्त सारी दुनिया
- डॉ धनंजय कुमार मिश्र

विभागाध्यक्ष संस्कृत विभाग सह अभिषद् सदस्य ,
सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका (झारखण्ड)

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