शादी का कार्ड

अपने दफ्तर से लौटते समय आज शाम को जब रामेष्वर को किसी औरत ने नाम लेकर आवाज लगाई तो, उसके दोनों तेज दौडने वाले पैर जैसे जमीन से चिपक कर ही तो रह गए थे!
रामेष्वर जिस तेजी के साथ सडक से चिपक कर रह गया था, उससे कही तेजी से उसकी सीधी दिषा में देखने वाली गर्दन पीछे की तरफ मुडी और गर्दन के मुडते ही जब रामेष्वर की दोनों आंखें उस आवाज देने वाली पर टिकी, तो वह सन्न रह गया!
रामेष्वर सोच में पड गया कि आज सालों बाद मिलने वाले अपने इस अतीत को देखकर वह मुस्कराए या फिर बिना कुछ कहे सुने आगे की तरफ निकल जाए, वह चंद लम्हों में अपने आप से ही ढेर सारे सवाल जवाब कर बैठा था!
जब रामेष्वर की जुबान ने उसका साथ देने से साफ इंकार कर दिया, तो खामोषी तोडते हुए वह औरत पूछने लगी –‘‘रामेष्वर इतनी जल्दी भूल गये क्या? तुम तो कहते थे मैं तुम्हें ख्बावो में भी नही भूल सकता!’’
‘‘सच कहा था मैने एक दम सच ही कहा था, कौन भूला है तुम्हे? क्या तुम्हें ऐसा लगा कि मैं तुम्हें भूल गया हू?’’
‘‘मुझे आज भी तुम्हारा नाम याद है, मुझे आज भी तुम्हारे लिखे खतों की एक एक बात याद है, मुझे ये भी याद है कि कभी तुमनें एक साथ जिन्दगी जीने की कसमें भी खाई थी, इतना ही नही तुमसे मिलने की खुषी से लेकर तुम से बिछडने तक के सफर मे जो भी हुआ, सब याद है!’’
‘‘आज भी तुम्हारी एक आवाज ने मेरे दौडते पैरो को रोक दिया, जबकि इस भागते-दौडते षहर की तेज जिन्दगी में लोग अपने अंदर तक की आवाज को नही सुन पाते!’’
‘‘लाखों की तादाद में चलने वाली तेज गाडियो की आवाजें, तेज कदमों की आवाजो के बीच कितनी ही खामोषियों की आवाज टूट कर रह जाती है, मगर मै ने और मेरी खामोषीयों ने आज  भी तुम्हारी आवाज की ताकत बढा दी, क्या तुम्हें ऐसा नही लगता …….कीर्ति जी?’’
रामेष्वर अभी अपनी पूरी बात कहने ही वाला था कि तभी एक लाल रंग की तेज कार बडी तेजी से उसकी और बढती दिखी, कीर्ति ने बडी फूरती से रामेष्वर को अपनी तरफ खींच लिया!
दोनों के सांसो की रफ्तार उस कार की रफ्तार से भी तेज हो गई थी,कुछ संभलते हुए रामेष्वर बुदबुदाया —– ‘‘ फिर तेरे कर्ज में डूबा ये दीवाना !
मरे हुए को बचाकर तूने अच्छा नही किया!!’’
कीर्ति जी एक बार फिर मैं और मेरी जिन्दगी तुम्हारी कर्जदार हो गई है,इतने एहसान भी मत करो, आज मिली भी तो मिलते ही एक एहसान और चढा दिया!’’ रामेष्वर की आवाज में दर्द की चीखें साफ सुनाई दे रही थी!
‘‘कैसी बात कर रहे हो रामेष्वर, मैने कोई एहसान नही किया, मेरी जगह कोई और होता तो वह भी यही सब करता! क्या तुम नही बचाते रामेष्वर —?’’
‘‘और ये तुमने जो —जी—जी—की क्या रट लगा रखी है, क्या मैं अब इतनी परायी हो गयी हॅूं?—– भूल गये उस रात को जब पूरी रात तुम व्हाटसप पर मेरे हर सवाल का जवाब अपनी षायरी में दे रहे थे !’’ वह थोडा नजाकर मे मुस्कराकर बोली –‘‘ चलो किसी रेस्टोरेंट में बैठकर चाय पीते है, चलोगे ना मेरे साथ चाय पीने ?’’
कीर्ति के अंदाज में एक नषा सा था, तभी तो रामेष्वर चाह कर भी उसे मना नही कर सका था! चाय का प्याला लेते हुए कीर्ति मुस्कराते हुए बोली —‘‘रामेष्वर कैसी गुजर रही है तुम्हारी जिन्दगी ? कितने बच्चे है? अच्छा ये तो बताओ तुम्हारी बीवी तुम्हारा कितना ख्याल रखती है?’’
कीर्ति की आॅंखों में आज भी पहले जैसा ही तेज नषा और होठों पर पहले जैसी रंगत थी, हां चेहरे की ताजगी में कुछ रूखापन जरूर आ गया था! कीर्ति आज भी बला की खूबसूरत थी,उसके बात करने का अंदाज आज भी उतना ही कातिल था जितना की पांच साल पहले था !
‘‘मैं एक कम्पनी में असिस्टैंट मैनेजर के पद पर हॅूं,यहीं कुछ दूरी पर रहता हॅूं, वैसे आप इस षहर में अकेली क्या कर रही हो कीर्ति जी!’’ रामेष्वर ने पूछा
‘‘तुम भी तो इस षहर की भीड में अकेले ही चल रहे थे,बस कुछ ऐसे ही मैं भी!’’ इतना कह कर कीर्ति खिखिलाकर हंस दी,उसके सावंले चेहरे पर मोती जैसे मुस्कराते हुए दाॅंत कीर्ति की खूबसूरती और बढा रहे थे!
‘‘कीर्ति जी एक बात कहू……..अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो…..रामेष्वर के चेहरे पर हजारों सवाल आसानी से पढे जा सकते थे!
‘‘मैनें आज तक तुम्हारी बात का बुरा माना ही कब है,जो आज मानूगीं…….वो तो उस दिन मुझे नींद आने लगी थी और तुम बातों मे से बातें निकाल रहे थे, तब मैनें सोने के लिए नाराजगी जतायी थी, कहो जो कहना है, मुद्दतो बाद की इस मुलाकात को किसी तरह आगे तो बढाया जाए……..क्यों मिस्टर रामेष्वर ?’’ कीर्ति के बात करने के अंदाज अब और भी कातिल होते जा रहे थे!
कुछ सकपकाते हुए रामेष्वर ने कहना षुरू किया —-‘‘वह तो ठीक है, पहले कुछ और बात थी……..‘‘बात को बीच में ही काटते हुए कीर्ति बोली —-‘‘ बात आज भी वही है, इतना पराया ना बनाओ यार !’’
कीर्ति के बोलने और देखने के अंदाज रामेष्वर को परेषानी में डाल रहे थे, वह कहने लगा —-‘‘मैं तो बस ये कह रहा था कि तुम आज भी बहुत खूबसूरत लग रही हो, कुछ भी नही बदला तुम कितनी ………’’आगे रामेष्वर कुछ भी नही कह पाया,ऐसा लगा जैसे और षब्द उसके हलक में चिपक कर रह गये हो!
‘‘तुम भी तो पहले जैसे ही हो,हां पहले मेरे मना करने पर भी मेरी तारिफ किया करते थे और आज तारिफ करने के लिए भी तुम्हें सोचना और पूछना पडता है, …….तेज आवाज में हंसते हुए कीर्ति आगे कहने लगी —-‘‘ हां तो मिस्टर रामेष्वर एक फर्क और भी आया है आप में!’’
रामेष्वर ने चोंकते हुए पूछा —-‘‘क्या फर्क आया है मुझमें कीर्ति जी?’’
रामेष्वर का उदास चेहरा देख कीर्ति हसते हुए बोली—–‘‘इतना क्यों घबराते हो मेरे राम…….फर्क आया है मूंछांे का, पहले इस चेहरे पर ये काली – काली हसीन मूछें नही थी!’’ इस बात पर दोनों खिलखिला कर हंस पडे!
‘‘कीर्ति जी आपने बताया नही कि आप इस षहर में कैसे? तुम्हारे पति क्या करते है? ’’ रामेष्वर ने सवाल किये!
‘‘ पहले तो ये बताओ तुमने ये आप कीर्ति जी क्या लगा रखा रखा है……फिर थोडा सा खामोष हो कीर्ति बताने लगी —–‘‘मैं तो इस षहर में नौकरी की तलाष में आयी थी, नौकरी ना सही तुम ही सही, वैसे मेरे पति क्या करते है यह मुझे अभी तक नही पता!’’
‘‘ठीक है बाबा ……पर तुमने क्यों इतना खुला छोड रखा है उसे? अब रामेष्वर ने चुटकी लेते हुए पूछा!’’
‘‘तुमको भी तो खुला छोड रखा है तुम्हारी पत्नि ने!’’ अपनी मोटी-मोटी तीखी नजरों को रामेष्वर के चेहरे पर गडाते हुए कीर्ति ने कहा!
‘‘आज क्या रेस्टौरेन्ट में ही ठहरने का इरादा है?तुम्हारे पति तुम्हारा इंतजार कर रहे होगें, फिर कभी मिलते है कीर्ति !’’ रामेष्वर ने अनमने मन से कहा!
कीर्ति अपनी माधुरी कट जुल्फांे को लहराते हुए आषिकाना अंदाज में कहने लगी —‘‘ इतने सालो बाद तो आज मिले है…..अब की बार बिछ ुडे तो कौन जाने फिर मिले या न मिलें, वैसे भी इस कटी पंतग की डोर का कोई मालिक नही है…..हां षायद आपकी पत्नि आपका इंतजार जरूर कर रही होगी!’’ कीर्ति की आंखों में नमी साफ दिखाई दे रही थी उसका गला भी भर आया था!
‘‘क्या ….रामेष्वर कटी पंतग सुन कर चैंका और उस से पूछने लगा, …..‘‘क्यों तलाक हो गया क्या ?’’
‘‘तलाक तो तब होता जब षादी होती !’’रामेष्वर, अब की बार उसके मुंह से निकले षब्द थके थके से थे!
‘‘क्या कह रही हो कीर्ति…..? तुम्हारी षादी के तो कार्ड भी छपे थे , फिर वह सब क्या था? ’’ रामेष्वर ने सवाल किये
‘‘वे कार्ड तो कार्ड ही बनकर रह गये, तुमने तो जाकर देखा तक भी नही, देखते भी कैसे ,कौन अपनी मौहब्बत का जनाजा उठते देख सकता है? कैसे देखते तुम अपनी मौहब्बत का सौदा किसी दूसरे के हाथों होता! मैं भी नही देख सकती थी!’’ अब की बार कीर्ति की आॅंखों नम ही नही हुई थी बल्कि आॅंखों से दो आसू टपक ही गये थे ! उसके चेहरे की उदासी को कोई भी आसानी से पढ सकता था!
थोडा सभल कर कीर्ति आगे बताने लगी ….‘‘हुआ यूं रामेष्वर, षादी के कार्ड भी छपे बारात भी आयी, मेहमान भी आए, मंडप भी सजा, और बाजे भी बजे और मुझे दुल्हन के रूप में सजाया भी गया ’’……..आगे के अल्फाज कीर्ति के मुंह में ही जैसे अपना दम तोड चुके थे!
‘‘लेकिन क्या कीर्ति ….?’’.रामेष्वर ने चैंकते हुए गंभीरता से पूछा!
‘‘पिता जी ने मेरी लाख खिलाफत करने के  बावजूद भी मेरी षादी दूसरी जगह तय कर दी, मैने तुम्हारे बारे मे बताया, मगर तुम्हारी बेरोजगारी के चलते वे अपनी जिद पर अड गए….असल में वे तुम्हारी अलग जाति की वजह से भी मना कर रहे थे और मेरा विरोध उनके सिद्धान्तों के सामने टूट कर रह गया और तुुम भी काफी दूर निकल गये, कभी सोचा भी नही था कि हम ऐसे भी मिलेगें!’’ कहते कहते कीर्ति ने अपनी गर्दन नीचे की तरफ झुकाली और उसकी आंखों से टपकते आसू जैसे जमीन के सीने पर षोले बनकर गिर रहे थे!!
‘‘आगे क्या हुआ कीर्ति….क्या हुआ बोलो?’’ रामेष्वर की उत्सुकता बढने लगी!
‘‘मुझे मंडप मैं फेरो के लिए लाया ही गया था कि अचानक मंडप में पुलिस आ गई और दूल्हे के हाथों में हथकडी लगा कर अपने साथ ले गई! कीर्ति की आँखों के आंसू उसके उसके सूर्ख गालों को भिगोने लगे!
‘‘लेकिन क्यों कीर्ति? रामेष्वर ने चैककर पूछा !
‘‘इसलिए की वह एक स्मगलिंग करता था और उसने पापा जी को एक कंपनी का मालिक बताया था,उस के बाद न तो पापा ही जिद्द कर सके और न ही मैं ने षादी करनी चाही!’’
‘‘मैं अब परिवार पर बोझ बन कर जीना नही चाहती थी, इसलिए नौकरी की तलाष में यहां तक आ गई और तुम से मुलाकात हो गयी!’’
अपनी बाजू से अपनी आंखों को पौछते हुए बोली —-‘‘अब तुम बताओ कि तुम्हारा परिवार कैसा है?…..कीर्ति ने खुद को सभालते हुए रामेष्वर को बोलने का मौका दिया!
‘‘किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है……कहां हो तुम के ये दिल बेकरार आज भी है!’’………….यही लाईने मेरे जीने का जरिया बन चुकी थी,कीर्ति मैं तो अभी तक तुम्हारे ही इंतजार मे बैठा तुम्हारे लौटने की राह ताक रहा था!’’ इतना सुन कीर्ति सभी से बेखबर हो रामेष्वर से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी और सिसकियंा लेते हुए कहने लगी…….‘‘रामेष्वर अबकि बार मुझे अकेला मत छोडना,इस कटी पतंग की डोर तुम उम्रभर के लिए अपने हाथों में ले लो…….रामेष्वर अपने हाथों मे ले लो!’’
‘‘ठीक है, हम अपनी षादी के कार्ड छपवा लेते है,’’……रामेष्वर मुस्कराते हुए बोला
‘‘अब की बार कार्ड नही सीधे षादी करेगें रामेष्वर!’’ कीर्ति की बात सुन कर रामेष्वर ने उसे अपनी आगोष में ले कीर्ति को चुम ही तो लिया था!
रैस्टोरेंट में बैठे बाकी लोग जो काफी समय से इन दोनों की बातें सुन रहे थे,एक साथ खडे हो कर तालियां बजाने लगे! दोनों षरमाते हुए एक दूसरे को गले लगाते हुए बाहर निकल गये!

 
- डॉ नरेश कुमार ‘‘सागर’’


षिक्षा - स्नातक , वी0ए0एम0एस0
व्यवसाय - आप्टीषियन
जन्म स्थान - ग्राम – भटौना, जिला – बुलन्दषहर – उ0प्र0!

गतिविधयां -  मंडल प्रभारी – आगमन साहित्य संस्था , संवाददाता – फारर्वड प्रेस,नई दिल्ली, मंत्री – काव्यद्वीप , अतिथि संपादक – इक्कीसवी सदी के श्रेश्ठ रचनाकार – दिल्ली, पूर्वसहसम्पादक – गौरव विचार पत्रिका,  सहसंपादक – फोर्स मिषन , प्रदेष सचिव – पत्रकार वालफेयर एसोसिएसन, उ0प्र0,  जिला सचिव – आल प्रेस एण्ड राईटर्स एसोसियषन , लखनउं, मुख्य सलाहकार- पंचषील भारत, राश्टीय कोशाध्यक्ष – जन जागृति विकाष संस्था , अखिल भारतीय साहित्य परिशद – सदस्य , क्षेत्रीय व राश्टीय  कवि सम्मेलनो में मंचासीन, अभिनय व मंच संचालन, क्षेत्र पंचायत सदस्य आदि ! 

उपलब्धियां - डा अम्बेडकर फैलोसिप  से सम्मानित- नई दिल्ली, मानव मित्र सम्मान दो बार ‘‘पूर्व राज्यपाल श्री माता प्रसाद जी द्वारा‘‘,  अमिताभ खण्डेलवाल स्मृति पुरस्कार- मुजफ्फरनगर , अमन सिंह आत्रेय पुरस्कार- मेरठ , संस्कार भारती पुरस्कार , षषी – सुशमा स्मृति पुरस्कार , गंगा – जमुनी पुरस्कार , संत गंगादास पुरस्कार ,व अन्य साहित्यक , सामाजिक व राजनैतिक पुरस्कारो से सम्मानित ! 

प्रकाषय - चेतना हिन्दी – यू0एस0ए0, गजाला , सरस सलिल , कुसुम परख ,फारर्वड प्रेस ,हाषिये की आवाज,  वंचित जनता, हम दलित, बयान ,बहुजन भूमि, मूल नायक, दलित प्रहरी ,सारर्प रिपोर्टर , अभिनव , अमर उजाला , दैनिक जागरण , गौरव विचार ,  आदि पत्रिकाओं में काव्य संकलन – -इस मौसम से उस मौसम तक , गुफतगू , षब्द प्रवाह – गजल संग्रह , काव्यषाला , युवा रचनाकार संगम , इक्कसवी सदी के श्रेश्ठ रचनाकार , काव्यद्वीप भाग एक व दो, आदि राश्टीय व अन्तराश्टीय पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाषित लेख , पत्र, कहानियां, गीत – गजल, निबन्ध आदि !

अभिरूची - साहित्य लेखन , स्वतंत्र पत्रकारिता , अभिन्य , मंच संचालन , समाज सेवा व राजनैतिक गतिविधयां आदि ! 

पता - सागर कालोनी, गढ रोड – नई मण्डी ,  जिला – हापुड 

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