वो सुनहरा कल.कब आएगा .

 

गम रातों की स्याही का मिटाने
दीप जुगनुओं से जगमगा गए
भौर का संगीत गाने
खग – चह-चहाने आ गए
शृंगार ओस के अधरों का करने
आफ़ताब सज ही जाएगा…

मातरम वन्दे से गूंजे, सनातनी यह धरा
वो.. सुनहरा कल.. , कल.कब आएगा ..?.

बंदनवार सज रही, सुर-सुराहट फाग की
नो-जवानों की टोलियां, ढोलक पर थाप की
रंग-अबीर उड़ने लगा, नशा केसुले पर भी छाएगा
मातरम वन्दे से..गूंजे राम-कृष्ण की धरा … वो सुनहरा कल.कब आएगा . ?

बुझ रही है वो शमा, इंकलाब के नारों की
रुख हवा बदल रही, कसमें और वादों की
चोला पाखंड का धर , छल फिर कोई कर जाएगा
मातरम वन्दे से गूंजे पावन हिन्द की धरा ….वो सुनहरा कल… कल .. कब आएगा. ..?
सरहदों पर आज भी, गोलियां सीनों पर खा रहे
तिरंगे को धार शव, घर सुत-सुहागों के आ रहे
खूनी रेलों का सफर, कितना और रुलाएगा
मातरम वन्दे…से गूंजे राम-रहीम की धरा …. वो.सुनहरा कल.कल.कब आएगा .. . . …?

घुड़ चढ़ी बेटों की दखे, माताओं को गुजरे अरसे
लिए हाथ में काजल डिब्बी, भाभी भी दस्तूर को तरसे ..
चौथ-करवा को छन्नी में शव नहीं, साजन नजर आएगा …..
मातरम वन्दे से गूंजे ‘वीर’ , राधा और श्याम की .. वो.सुनहरा कल …… .

 

- वीरन्द्र सिंह ‘वीर’

प्रकाशन- सफरनामा ( काव्य संग्रह ) माला मनकों की ( प्रकाशनार्थ ) हेतु. सम्पादन- चार अखिल भारतीय काव्य संकलन 

संप्रति- परमाणु ऊर्जा विभाग ( वडोदरा ) में कार्यरत

मूल निवास- रावतभाटा ( चितौड़गढ़ ) राजस्थान

पता-  निजामपुरा, वडोदरा-गुजरात

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