विस्थापन – नव सांस्कृतिक विलय या एक पीड़ा

विस्थापन – नव सांस्कृतिक विलय या एक पीड़ा …

विस्थापन एक तरह की अपने मूल से बिछड़ने की पीड़ा लेकर आता है। साथ ही साथ एक नये परिवेश और संस्कृति का भय लेकर भी आता है। विस्थापित मनुष्य अपनी संस्कृति को बचाने के प्रयास के साथ-साथ नये देश और उसकी संस्कृति को समझना और अपनाना भी चाहता है। उसे अपनी पुरातन संस्कृति के खोने का भय भी है और नए परिवेश और संस्कृति को आत्मसात न कर पाने पर अलग थलग पड़ने का डर भी। इन्ही परिस्थितियों की चुनौतियों के साथ एक विस्थापित परिवार जूझता हुआ अपने को स्थापित करने में लगा रहता है।

विस्थापन, एक नया अवसर भी ले कर आता है। एक नया देश , उसका परिवेश , भाषा और संस्कृति को जानने समझने का मौक़ा भी देता है। उसे परस्पर सामंजस्य बनाने आगे बढ़ने और चुनौतियों का सामना करने की शक्ति भी देता है।
इस प्रकार अपने सांस्कृतिक थाती को बचाने और उसकी जड़ों से उखड़ने की पीड़ा को झेलता हुआ वह एक नई उमंग और आशा के साथ विस्थापित जिंदगी के पथ पर आगे बढ़ता चला जाता है। अंत में वह विस्थापन के उत्कर्ष एवं पीड़ा के इस भंवर में अपनी जीवन नैया को दोनों देशों के इतिहास के पन्नों पर मजबूती से खेता हुआ इस दुनिया से चला जाता है ।

इस अंक में ऊपर दिए गए विषय पर एक सार्थक बहस आमंत्रित है।
आप अपने विचार दिए गए विषय के पृष्ठ पर एक टिप्पणी की तरह प्रेषित कर सकतें हैं।

ये बहस पत्रिका के अगले अंक आने तक जारी रहेगी और अगले अंक में एक दूसरा विषय बहस के लिए प्रस्तुत किया जायेगा।
आशा है की हमारा ये नया प्रयोग और प्रयास आपको पसंद आयेगा।

 

- अम्स्टेल गंगा परिवार

 

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