विश्वास की डोर

घेरने लगे मुझे जब भी अंधरे
तुम बिजली बन चमक जाना
इश्क की सूखे गर नदी
प्यार की बदली बन बरस जाना
उदासियां घेर ले तो मुझे
तुम मुस्कुराहट बिखेर देना
अवसाद के समुद्र में डूब जाऊं तो
तुम तलहटी में भी खोज लेना
मैं गल्तियाँ करु पर तुम
खफा मत होना माफ कर देना
अगर सफल हो आगे बढ़ूं
मेरी हौसला अफजाई कर देना
चांद तारे तोड़ो ये जरुरी नहीं
ताजमहल न सही एक घर बना देन
प्यार के ये बंधन अटूट है
विश्वास की डोर थामे रहना
- अर्विना गहलोत
पता- जिला इलाहाबाद प्रयागराज , यू पी , राज्य-उत्तर प्रदेश
शिक्षा-एम एस सी वनस्पति विज्ञानन ,वैद्य विशारद
सामाजिक क्षेत्र- वेलफेयर
विधा -स्वतंत्र
प्रकाशन-दी कोर ,क्राइम आफ नेशन, घरौंदा, साहित्य समीर प्रेरणा अंशु ,  नई सदी की धमक , दृष्टी लघुकथा  साझा संग्रह, शैल पुत्र ,परिदै बोलते है  भाषा सहोदरी लघुकथा संग्रह, साहित्य सागर महिला विशेषांक, संगिनी गुजरात, अनूभूती ,सेतु अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका
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2 thoughts on “विश्वास की डोर

  1. अर्विना जी विशवास की डोर कविता में सकारात्मकता के साथ महिला के मन के दर को बखूबी प्रस्तुत किया है |बधाई हो |

  2. बहुत ही बेहतर कविता
    मुझे बहुत अच्छा लगा
    मैडम जी

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