विलक्षणता

 

बढ़ रहे पथ में बिना ही पांव वो|
गढ़ रहें हैं धूप में नित छाँव वो||

मुश्किलों से ही बना संसार है|
हौंसला इनके लिए पतवार है|
इक नई ऊर्जा लिये वो बढ़ रहे,
जीतना ही जिंदगी का सार है|
हाथ बिन रचते नये नित ठांव वो|
गढ़ रहें हैं धूप में नित छाँव वो|

दर्द कब बन तीर मन को कस रहा|
आँख में जिनके अँधेरा बस रहा|
आह को आहा करें बस ताल से,
द्वेष इनको है कभी कब डस रहा|
बस छुअन से जानते हर भाव वो|
गढ़ रहे हैं धूप में नित छाँव हो||

पूर्णता को दे रहे वो मात हैं|
देह पर जिनके समय के घात हैं|
ढूंढते हैं मोद जग की गोद में,
सह रहे हँसते हुये आघात हैं|
बिन सुने ही खेलते सब दाव वो|
गढ रहे हैं धूप में नित छाँव वो||

बढ़ रहे पथ में बिना ही पांव को……………

 

- श्वेता राय

विज्ञान अध्यापिका , देवरिया ,उत्तरप्रदेश

 

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