वित्तमंत्री जी का ब्रीफ़केस

भारत में सालाना घटित होने वाले एक हादसे का बड़ा महत्त्व माना जाता है। यह हादसा ऐसा है जिससे बचा नहीं जा सकता। कई बार ग़लती से लोग इसे लड्डू समझ लेते हैं, पर यह ऐसा जिज्ञासा जगाने वाला लड्डू है जो गुप्त रूप से लकड़ी के बुरादे से बना होता है। लेकिन यह बात किसी को पता नहीं होती। दूसरी ख़ास बात यह है कि इच्छा नहीं हो तब भी इसे हर साल खाना पड़ता है। इसे सालाना ‘आम बजट’ कहते हैं, जिसे वित्तमंत्रीजी पेश करते हैं। पर आम बजट कभी भी आम की तरह मीठा नहीं होता। इसका नाम यह रख कर पता नहीं किसने फलों के राजा का नाम ख़राब किया। अगर अंगूर बजट रखते तो कम से कम लोग मानसिक रूप से तो तैयार रहते कि अंगूर खट्टे भी हो सकते हैं। लेकिन मीठे आम की उम्मीद में हर बार उन्हें केवल कच्ची कैरी ही मिली। अब तो लोगों को सिर्फ़ ये जानना होता है कि इस बार आम में कितनी खटास है। यही एक ऐसी क़िस्म का आम होता है जो कभी पक कर मीठा नहीं होता। ऊपर से यह कितना भी मीठा नज़र आए, छिलका निकालते ही खट्टा निकलता है।

बड़े बड़े देशों के राष्ट्रपतियों के पास हमेशा एक एक ब्रीफ़केस रहता है जिसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। वे विश्व में कहीं भी हों, यह ब्रीफ़केस हमेशा उनके पास रहता है। रूस में वे इसे ‘चैगेट’ कहते हैं। खेल की शुद्ध भावना के साथ अमरीका के राष्ट्रपति के ब्रीफ़केस को कई नामों से पुकारा जाता है, जैसे अटॉमिक फुटबाल, न्यूक्लियर फुटबाल, न्यूक्लिअर लंचबॉक्स, ब्लैक बॉक्स, रैड बटन, फुटबॉल वगैरह। पर यह ब्रीफ़केस साधारण नहीं होता। यह वह करिश्माई ब्रीफ़केस होता है जिसके अंदर एक लाल बटन होता है, जिसके माध्यम से राष्ट्रपतिजी कहीं भी परमाणु आक्रमण का आदेश दे सकते हैं। पता नहीं कब उसकी ज़रूरत पड़ जाय, इसलिए वह हमेशा हर जगह उनके साथ ही रहता है। यह ब्रीफ़केस अल्युमीनियम का बना होता है जिसे एक चमड़े के बैग में रखा जाता है। पर यह ब्रीफ़केस हमेशा काले रंग का ही होता है।

ऐसा ही ब्रीफ़केस भारत के वित्तमंत्रीजी के पास भी होता है। पर फ़र्क इतना है कि वित्तमंत्रीजी का ब्रीफ़केस उनकी पसंद के हिसाब से काला या भूरा किसी भी रंग का हो सकता है। इसमें तरह तरह के सर्किट बोर्ड या लाल बटन की जगह कई तरह के काग़ज़ात होते हैं, जिनका असर भी बम विस्फोट से कम नहीं होता। वे अपना ब्रीफ़केस शान से उठाते हुए संसद भवन में प्रवेश करते हैं। इस ब्रीफ़केस की एक झलक पाने के लिए रास्ते में टीवी और अख़बारों के पत्रकार कैमरे लिए दरवाज़े के बाहर इंतज़ार करते रहते हैं, मानो इस जादुई ब्रीफ़केस में अलादीन का चिराग़ छुपा कर लाया जा रहा है। उनको इससे कम ही मतलब होता है कि इसके अंदर रखे काग़ज़ों में वास्तव में कितनी विस्फोटक सामग्री छुपी हुई है। फिलहालइन्हें तो उसकी फ़ोटो चाहिए जो ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ में देनी है। वित्तमंत्रीजी मुस्कुराते हुए ब्रीफ़केस उठाते हैं और कैमरे के लिए उसका पोज़ देते हैं। चैनलों वाले निहाल होजाते हैं। आम आदमी टीवी पर देखता है तब उसे ज्ञान होता है कि मंत्रीजी से ज़्यादा ब्रीफ़केस का महत्त्व होता है।

जब लोकसभा में आकर अपना ब्रीफ़केस रखते हैं तो टीवी देख रही जनता को आशा बंधती है कि अब बाज़ीगर अपने पिटारे में से नए नए अजूबे निकाल कर कई तरह के करतब दिखाएगा और मनोरंजन करेगा। जैसे कोई अपने पैसों से ख़रीदी हुई किताब बेकार निकल जाय, वैसे ही टीवी पर नज़रें गड़ाए अपना आधा दिन बेकार करने के बाद उसको निराशा ही हाथ लगती है कि पैसा वसूल नहीं हुआ। आम आदमी उस क्षण का इंतज़ार करता रहता है जब उसकी आयकर सीमा में कुछ बढ़ोतरी होगी और वह एक अदद नई कमीज़ ख़रीद पायेगा। उसी उम्मीद में आम औरत एक अदद नई साड़ी लेने की ख़्वाहिश पालने लगती है। आम आदमी झूमता हुआ फटाफट कैलकुलेट करता है कि उसे कितना फ़ायदा होगा। गणित का सा प्रश्न हल करने के बाद अंत में निकल कर आता है कि इस बार आयकर में कुल पचास रुपये का फ़ायदा होगा। उधर मंत्रीजी साल में पचास रुपये की छूट देकर पीछे से पेट्रोल, डीज़ल के दाम बढ़ा कर मंहगाई में इज़ाफ़े का तीर छोड़ देते हैं और पांच हज़ार रुपये साल की अतिरिक्त चोट से घायल आम आदमी मुंह लटका कर बैठ जाता है। फिर अलग अलग नामों से कई तरह के टैक्स – सर्विस टैक्स, एजूकेशन टैक्स, सरचार्ज, एक्साइज़ ड्यूटी, वगैरह से या उनमें बढ़ोतरी से पीठ में छुरा घोंपने और जले पर नमक छिड़कने का काम चलता रहता है सो अलग। ख़्वाहिशें अगले साल के लिए टल जाती हैं। ख़्वाहिशें ऐसी होजाती हैं कि हर ख़्वाहिश दम निकालने वाली, इसीलिए अरमान एक भी पूरा नहीं होता।

कहते हैं, अल्लाह अपने गधे को भी हलुआ खिलाता है। हमारे देश में बजट से पहले वित्तमंत्री का रुतबा भी वैसा ही हो जाता है। इसलिए कि वे ही आने वाले साल भर के लिए हमारी दशा (या दुर्दशा) निर्धारित करते हैं। जब बजट बनाने में जुटे मंत्रीजी के सहायक लोग दस दिनों के लिए नॉर्थ ब्लॉक के नीचे बने एक बंकर में नज़रबंद कर दिए जाते हैं, उस दौरान दूसरे कमरे में उनके लिए सचमुच लगातार हलुआ पकता रहता है। हाँ, यह सच है। उनकी तलाशी लेकर, उनके मोबाइल छीन कर, दीन दुनियां से दूर इस बंकर में उन्हें कंप्यूटर पर बजट तैयार करने और यहीं लगी प्रेस में छापने के लिए तब तक रहना पड़ता है, जब तक कि लोकसभा में पूरा बजट पेश न हो जाय। पर बेशक, वित्तमंत्रीजी इस सब के बदले अपने सहायकों को बजट पेश होने तक हलुआ खिलाते रहते हैं।

उधर शो के एक-दो दिन पहले से ही टीवी की हर एक चैनल कई सिरफिरे टाइप के लोगों को घेर कर चौबीसों घंटे ‘सत्संग’ करती है जिसमें वे भजन गाते हैं कि इस बार वित्तमंत्रीजी क्या गुल खिलाने वाले हैं। लगता है, ऐसे लोगों के पास जिनको विशेषज्ञ कहते हैं, समय की कोई कमी नहीं है। बड़े बड़े ग्राफ़ों के जरिये कोई एक ऊंचे ऊंचे हवाई किले खड़ा करता है, तो दूसरा उनको अलग आंकड़ों के अस्त्र से ध्वस्त कर देता है। सब अपने अपने तीर और तुक्के लगाते हैं। बजट से पहले हर तबके का आम आदमी वित्तमंत्रीजी से गुहार लगाता रहता है। फिर जब वित्तमंत्रीजी अपना पिटारा खोलते हैं तो सब कुछ उलट पुलट हो जाता है। पर ये ‘विशेषज्ञ’ लोग ही बिना हार माने फिर से उन घोषणाओं की अगले तीन चार दिनों तक छीछालेदर करने में जुट जाते हैं, जिसे विश्लेषण के नाम से पुकारा जाता है। यह ऐसा सिलसिला है जो कभी ख़त्म ही नहीं होता और शायद होगा भी नहीं, जब तक वित्तमंत्रीजी अपना बजट पेश करते रहेंगे।

वित्तमंत्रीजी ने सर्विस-टैक्स में इज़ाफ़ा कर दिया है और अलग अलग नामों से कई अप्रत्यक्ष कर लगा दिए हैं जिससे आम आदमी के इस्तेमाल की सारी चीज़ें मंहगी हो जाएँगी – टेलीफ़ोन, इंटरनेट, कपड़े, रैस्टोरैंट, केबल, पार्लर, अस्पताल वगैरह जो सबसे नीचे वाले तबके के लोग इस्तेमाल नहीं करते या कर सकते। एसी, टीवी, कार वगैरह पर जी.एस.टी. बढ़ कर ऊपर के स्तर पर खिसक गया है और भारतीय आदमी नीचे के स्तर पर। सरकार बड़े गर्व के साथ कहती है उनका बजट नीचे से नीचे तबके के लोगों के लिए है। आम आदमी जो अपने आपको मध्यम वर्ग का कहता है, जब इस सब के चलते निम्न वर्ग में आ जायेगा तो यही बजट उसके लिए भी हो जायेगा।

कोई बेचारा वक़्त का मारा बजट का नाम सुनते ही इस फ़िक्र में पड़ जाता है कि इस साल एक जून की एक रोटी और कम हो जायगी। दूसरा सोचने लगता है, अब अगली लँगोटी कितनी और छोटी करनी पड़ेगी। मजदूर सोचता है, परिवार को रोटी खिलाने के लिए इस साल हर रोज़ उसे दो लकड़ियाँ ज़्यादा काटनी पड़ेंगी या एक घंटे ज़्यादा काम करना पड़ेगा। सर्वहारा को भी कहीं से सुनाई पड़ता है बजट आने वाला है। पर वह नौकरीपेशा आम आदमी से ज़्यादा समझदार है और हकीक़त जानता है। ज़्यादा निराश मध्यम वर्ग का आम आदमी ही होता है क्योंकि उसे उम्मीद पालने की बीमारी लग गई है, बावजूद इसके कि उसकी उम्मीद के पत्थर पर ही साल दर साल वित्तमंत्रीजी अपनी छुरी पैनी करते आरहे हैं।

बजट पेश करते समय लोगों के कपड़े उतरवाने से पहले वित्तमंत्रीजी खुद क्या पहनते हैं यह भी लोगों की जिज्ञासा का विषय हो गया है। विज्ञापन के ज़माने में फ़ैशन हरेक के सर पर चढ़ कर जो बोलती है। इतिहासकार बताते हैं कि 1860 में कनपटी पर लंबी कलम रखे हुए जेम्स विलियम ने लन्दन में बजट पेश करते वक़्त विक्टोरियन परिधान में फ़ोब चेन के साथ बो-टाई, गहरे रंग का सूट पहन रखा था, जिसे खूब सराहा गया था। स्वतन्त्र भारत के पहले वित्तमंत्री शण्मुखम् चेट्टी ने 1947 में पिनस्ट्राइप का सूट पहना था (जो निश्चित ही हालिया प्रधानमंत्रीजी के दस-लखा सूट जैसा तो नहीं ही होगा) और जॉन मथाई ने 1950 में टाई के साथ थ्री-पीस सूट पहना था और पंचवर्षीय योजनाओं की नींव डाली थी। उसके बाद से ‘बन्दगला’ का फ़ैशन चल पड़ा और फिर आने वाले सालों में कृष्णमाचारी, राजीव गाँधी और प्रणव मुखर्जी ने इसी परिधान में पब्लिक का गला-बंद उत्पीड़न किया। चिदम्बरम ने सफ़ेद अंगवस्त्रम् कंधे पर रख कर सफ़ेद कमीज़ और सफ़ेद वेष्टि में लोगों की अंत्येष्टि की, वी पी सिंह ने शेरवानी में, मोरारजी देसाई, जसवंत सिन्हा और अरुण जेटली ने नेहरु जैकेट (बंदगला जैकेट) में, और इंदिरा गाँधी ने सिलेटी रंग की शाल के साथ रेशम की साड़ी में आम आदमी को निचोड़ा था।

परिधान के रंगों से बजट का संबंध निश्चित ही रहता है यह सिद्ध होगया है। इंदिरा गाँधी की रेशम की साड़ी ने लोगों को रेशम के कीड़े की तरह मसल डाला था। चिदम्बरम के बजट के बाद सबके मुंह उनके वस्त्रों की तरह ही सफ़ेद फक्क हो जाते थे, बंदगले के सूटों और बंदगला जैकेटों में पेश बजटों के बाद लोगों के गले भी जकड़ कर बंद कर दिए गए। इस साल शर्ट-पैंट पर नीले बंदगला जैकेट में वित्तमंत्रीजी ने आम आदमी का ऐसा गला घोंटा है कि उसका न केवल चेहरा, बल्कि सारा शरीर ही नीला पड़ गया। बेचारा किसी तरह नाक से सांस लेकर ज़िंदा है। परिधान कैसा भी रहा हो, ज़ाहिर है, हर वित्तमंत्री के हाथ में एक ब्रीफ़केस ज़रूर था। कभी यह यमराज के भैंसे की तरह काले रंग का और कभी अफ़्रीका में पाई जाने वाली ज़हरीली मकड़ी ‘ब्राउन विडो’ की तरह भूरे रंग का, जिसके अंदर रखे काग़ज़नुमा ‘घातक’ अस्त्रों ने पब्लिक को हर बार घाव ही दिए। यह सिलसिला अभी भी चल रहा है और शायद चलता रहेगा।

अब तो लोगों को सिर्फ़ किसी ऐसे वित्तमंत्री का इंतज़ार है जो आमआदमी-फ़्रैंडली हरे रंग का ब्रीफ़केस लिए हुए बाग़ में खिले फूलों का अहसास दिलाने वाले रंगबिरंगे कपड़ों में आये, जिससे बजट के बाद लोगों का दिल बाग़ बाग़ हो जाए।

 

 

 

- कमलानाथ

कमलानाथ (जन्म 1946) की कहानियां और व्यंग्य ‘60 के दशक से भारत की विभिन्न पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। वेदों, उपनिषदों आदि में जल, पर्यावरण, परिस्थिति विज्ञान सम्बन्धी उनके लेख हिंदी और अंग्रेज़ी में विश्वकोशों, पत्रिकाओं, व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में छपे और चर्चित हुए हैं। हाल ही (2015) में उनका नया व्यंग्य संग्रह ‘साहित्य का ध्वनि तत्त्व उर्फ़ साहित्यिक बिग बैंग’ अयन प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है तथा एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है।

कमलानाथ इंजीनियर हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय सिंचाई एवं जलनिकास आयोग (आई.सी.आई.डी.) के सचिव, भारत सरकार के उद्यम एन.एच.पी.सी. लिमिटेड में जलविज्ञान विभागाध्यक्ष, और नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टैक्नोलोजी, जयपुर में सिविल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफ़ेसर पदों पर रह चुके हैं। जलविद्युत अभियांत्रिकी पर उनकी पुस्तक देश विदेश में बहुचर्चित है तथा उनके अनेक तकनीकी लेख आदि विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं व सम्मेलनों में प्रकाशित/प्रस्तुत होते रहे हैं। वे 1976-77 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय (अमरीका) में जल-प्रबंधन में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन फ़ैलो रह चुके हैं। विश्व खाद्य सुरक्षा और जलविज्ञान में उनके योगदान के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी मिल चुके हैं।

वर्तमान में कमलानाथ जलविज्ञान व जलविद्युत अभियांत्रिकी में सलाहकार एवं ‘एक्वाविज़्डम’ नामक संस्था के चेयरमैन हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>