लच्छो भुआ

लच्छो भुआ कई दिनों से बीमार थीं। अब बुढ़ापे नाम की बीमारी का बोझा ढोते ढोते अगर निमोनिया भी हो जाये तो तकलीफ़ ज़्यादा हो ही जाती है। अक्सर नीम बेहोशी की हालत में भी चौरासी बरस की भुआ ख़ामोशी में लिपटी बीच बीच में मुस्कुराती हैं। तब काफ़ी देर तक उनके होंठ फैले रहते हैं। इस हालत में ही कभी कभी बहकी बहकी सी बातें करती हैं। कभी हँसते हुए हाथ हिला कर ऐसा झटका देती हैं, जैसे कोई चीज़ फ़ेंक रही हों। कभी होंठ सिकोड़ कर सुबकने लगती हैं। पता नहीं क्या सोच रही होती हैं, किस ख़्वाब में खोई होती हैं। ऐसा दस दिन से हो रहा है। दवा का वक़्त हो तब भी कुछ सोच कर कोई उनको ख़्वाब के आगोश से बाहर नहीं खींचता उस समय। पर अब कुछ ज़्यादा ही देर हो गई थी।

“भुआ, जाग रही हो? थोड़ा मुंह खोलो, ये दवा ले लो” – गोमती ने कहा।

भुआ बेसुधी की हालत में ही थोड़ा मुस्कुराईं और कुछ समझ कर थोड़ी देर बाद उन्होंने मुंह खोला। गोमती ने चम्मच की दवा मुंह में उंडेल दी। भुआ ने आँखे बंद किये ही थोड़ा मुंह बनाया और फिर आराम महसूस करने लगीं।

“कौन, गोमती?”

पिछले कुछ दिनों से उनकी बड़ी भतीजी गोमती ही उनका ख्याल रख रही थी।

“हाँ, अब थोड़ा आराम कर लो भुआ” – गोमती ने कहा और जल्दी से रसोई में चली गई।

भुआ आराम ही तो कर रही हैं पिछले दस दिनों से। पुरानी हड्डियां पता नहीं कैसे इतनी मजबूत होती थीं। ज़िंदगी के जितने भी सालों की परतें अब तक उन्होंने अपने ऊपर ओढ़ी हैं, वे सब मिल कर अब तक काफ़ी मोटी और भारी हो चुकी हैं और उन्होंने अनुभव का नाम अख़्तियार कर लिया है। उतने बोझ को उतने ही सालों से उठाते उठाते अच्छी मशक्कत हो जाने का शायद यह नतीजा है। सारा घर भुआ के इर्दगिर्द रहा करता है। सही यह है कि भुआ ही हमेशा सारे घर में रहा करती हैं और सब का ध्यान रखती हैं। अगर कोई चौरासी की उम्र पार करने के बाद भी घर का हर काम कर रहा हो तो वह सबकी ज़रूरत बना रहता है। कोई मेहमान आये तो भुआ और ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं, ख़ासतौर से सब के लिए चाय नाश्ता लगाने के लिए। मेहमान मुस्कुरा कर सम्मान के साथ नमस्ते कर ले, तो उनकी सारी थकान उड़नछू हो जाती है और वे अपने झुर्रीवाले चेहरे पर मुस्कान लाकर ग़र्मजोशी से आशीर्वाद देती हैं। घर के सब लोग कहते हैं – “भुआ ने ही हमारी परवरिश की है। वे न हों तो घर का काम ही नहीं चल सकता। सब कुछ भुआ ने ही तो सम्हाल रखा है।” बस, ऐसे शब्द ही भुआ को घर की चक्की में घुन की तरह पीसते रहने के लिए काफ़ी होते हैं, यह सब जानते हैं। इसीलिए भुआ के लिए हरेक के पास तारीफ़ के शब्द भरपूर हैं।

घर भी अब कितना भरापूरा हो गया था। पहले तो भाई के आठ बच्चे, फिर बच्चों के बच्चे और अब कुछ उनके भी बच्चे। बस, भतीजियाँ शादी करके ससुराल चली गयीं। पर तब भी भुआ उनकी ज़रूरत बनी रहीं। लिहाज़ा भुआ ही एक-एक दो-दो महीने शुरू में और फिर जब जब भी उनकी ज़रूरत हो तब उनके ससुराल रह कर आती थीं। सभी धीरे धीरे भुआ की ज़िम्मेदारी बन गए। शायद खुद भुआ ने ही यह ज़िम्मेदारी ले ली। जब कभी घर के कामकाज से निबट कर थोड़ा सुस्ताने के लिए बैठीं नहीं कि किसी न किसी नाती पोते की बीवी आकर अपना बच्चा उनकी गोद में डाल जाती है। कभी कोई बाहर जाते वक़्त अपनी घड़ी या कोई और चीज़ पकड़ा जाता है – “भुआ ज़रा ये रख लो, वापस आकर ले लूंगी”। कभी भुआ खुद ही बुदबुदाने लगती हैं – “ये शोभा भी कितनी लापरवाह है, अपनी साड़ी यहाँ कैसे पटक गई” और फिर उसको तह करके अलमारी में रख देती हैं। कभी स्कूल के लिए तैयार होता बबलू चिल्ला कर पूछता है – “भुआ कितने बज गए?” कभी कोई बहू अपने रोते बच्चे को उनकी गोद में डाल कर प्यार भरे स्वर में कहती है – “भुआ ये आपके लिए रो रहा है”, और भुआ उसको चुप कराने लगती हैं – “चुप हो जा, देख चील चील चिल्लाती जाय, चील का बच्चा रोता जाय, कौवा ढोल बजाता जाय, चिड़िया मंगल गाती जाय।” और उसे गोद में ले कर हाथों से झुलाने लगती हैं।

पर उनको यह सब भी अच्छा लगने की आदत हो गई है। उनको अब हर चीज़ की आदत हो गयी है। सबसे पहले जो चीज़ उनको सीखनी पड़ी वह आदत ही थी। आम लोग तो लगातार कोई काम करते रहें तब उन्हें उसकी आदत हो जाती है, पर भुआ ने आदतें होजाने की आदत पहले सीखी और फिर उन्हीं आदतों में लिपटी हुई सब काम करने लगीं।

भुआ ने अब तक सारी जादुई शक्तियां हासिल कर लीं। वे कभी झूला बन जातीं, कभी आलमारी, कभी लोरी, कभी इस्त्री, कभी दाई, कभी दाई माँ, कभी घड़ी, कभी रसोइया, और हमेशा ही भुआ तो ज़रूर रहतीं। 

***

हम समय के सपाट, वीरान रास्ते से चलते हुए पचहत्तर साल पहले एक क़स्बे में लौटते हैं जहाँ किसी एक घर में खुशी का माहौल दमक रहा था। भुआ का नाम लच्छो था यह तो लोग जानते थे पर लच्छो का नाम लक्ष्मी था, यह शायद ही कोई जानता था। सब प्यार से तब उसे लच्छो ही बुलाते थे। लपक झपक करती वह यहाँ से वहाँ, इस घर से उस घर बतियाती रहती थी। जैसे पेड़ों पर फुदकती चिड़ियों ने उससे ही चहचहाना और दूर पहाड़ी पर उछलते मेमनों ने उसी से मस्ती में कूदना फांदना सीखा था। बरसात के दिनों में जब पास का नाला ‘नदी’ की शक्ल ले लेता था, तब वह चम्पा और दूसरी सहेलियों के साथ काग़ज़ की नाव बना कर अपनी काल्पनिक सहेलियों को सन्देश भिजवाती थी। तब सब कुछ हरा हरा दिखाई देता था और जंगली घास भी बाग़ में उगी दूब की तरह लगती थी जिस पर लोट लोट कर वह मेमनों के साथ खेलती थी। वसंत के मौसम में जब ठंडी ठंडी बयार चलती थी, अपने बाबा के लिए फूल चुनते समय वह उनको ऊपर उछाल उछाल कर हँसती थी और हवा को मात दे कर सरसराती हुई फूल के ज़मीन पर गिरने के पहले ही उसे लपकने वहां पहुँच जाती थी।

जीवनलाल से अब उसी आठ बरस की लच्छो की शादी होने वाली थी। जीवन भले ही तीस बरस के हो गए हों, पर उनके पास अपना पक्का घर था, किसी सरकारी महकमे में नौकरी करते थे और देखने भालने में अच्छे लगते थे। उनकी पहली बीवी नहीं रही थी पर फिर भी कई बरस तक उन्होंने दुबारा शादी नहीं की। उड़ती उड़ती अफ़वाह भी थी कि जीवनलाल को कई सालों से टी.बी. थी और उनके फेंफड़े खराब हो चुके थे। हालाँकि वे कई बार गोलियाँ खाते थे, पर सबको वे यही कहते थे कि डॉक्टर ने खांसी की दवाई बताई है जो वे ले रहे हैं। पर उनके चेहरे की दमक को देख कर किसी को ऐसा नहीं लगता था कि उनको कोई बीमारी हो सकती है और इसीलिए सब इसे केवल अफ़वाह ही समझते थे।

लच्छो को उसके पिताजी बेहद प्यार करते थे और वे चाहते थे कि अपनी ज़िंदगी में वह हमेशा खुश रहे। इसीलिए उम्र में इतना फ़र्क होने पर भी उन्होंने खाते कमाते जीवनलाल को ही लच्छो के लिए चुना। शायद उन दिनों किसी भी ‘अच्छे’ वर को हासिल करने के लिए उम्र का अंतर कोई खास मायने नहीं रखता था। लच्छो तो सिर्फ़ इस बात से ही खुश थी कि अब उसकी भी शादी हो रही है। उसने कितनी बार अपनी ‘बिटिया’ गुड़िया का ब्याह कभी सहेली चम्पा के ‘बेटे’ से किया था, कभी गुन्नो के गुड्डे से, और कभी बल्ली के इकलौते लाड़ले से। उसने तब हर बार अपनी सब सहेलियों को ‘मिठाई’ में लेमनचूस की गोलियाँ खिलाई थीं। उन दिनों कितना अच्छा लगा करता था। वह अपनी प्यारी गुड़िया के लिए कहीं कहीं से जुगाड़ करके गोटे के कपड़े लाती थी और खुद उसके लिए ‘साड़ियां’ और जम्पर बनाती थी। चम्पा, गुन्नो और बल्ली, सभी कितनी खुश रहती थीं और शादी अच्छी तरह करने के लिए एक दूसरे को सलाह दिया करती थीं। अब तो खुद उसी की शादी होने वाली थी।

चार बरस पहले चम्पा की शादी हुई थी। भले ही वो उससे तीन बरस बड़ी थी, पर इस साल जब वह पहली बार अपने ससुराल गई तब कितनी खुश थी। उसके लिए कितनी सारी नई नई साड़ियां ख़रीदी गई थीं, और वो सुनहरे बूटों वाली गोटे की लाल साड़ी तो कितनी सुन्दर थी। चम्पा के साथ वह अकेले में उसी साड़ी के बारे में बात किया करती थी। चम्पा के घर पर बहुत सारे लोग इकट्ठा हुए थे, कितनी मिठाइयां बनी थीं, सजधज कर उसके ससुराल से बहुत सी औरतें आई थीं और चम्पा का दूल्हा रुपहली अचकन और साफ़े में कितना सुन्दर लग रहा था। चम्पा ने उसे तब भले ही नहीं देखा हो, पर लच्छो ने तो देखा था वह कितना जँच रहा था। फिर अंदर जाकर उसने चम्पा को यह बताया था और वह लजा कर कितनी खुश हुई थी। तब मन ही मन लच्छो भी अपने भावी दूल्हे के बारे में सोच सोच कर खुश हुआ करती थी।

पुराने ख़यालात और पारंपरिक रहन सहन वाले आम घर में लच्छो ने होश सम्हाला था। लच्छो की माँ जल्दी ही गुज़र गई थी। रिश्ते की भुआओं और मौसियों ने ही चम्पा की देखभाल की थी। सब उसको प्यार करती थीं और उसकी शादी के लिए वे सब ही मिलजुल कर तैयारी कर रही थीं। लच्छो का भाई मोहन उससे पांच बरस बड़ा था, स्कूल जाता था और संगीत सीखता था। उसे भी खुशी थी कि घर में रौनक सी बनी रहती है और काफ़ी हलचल रहती है। पिताजी पाठ पूजा करते थे और वही उनका पेशा था। शौकिया वे शास्त्रीय संगीत का भी रियाज़ करते थे और मोहन और लच्छो को जब कभी वहाँ किसी बड़े गायक का प्रोग्राम होता था तो साथ ले जाते थे। दोनों को संगीत का थोड़ा थोड़ा ज्ञान होने लगा था। लच्छो तो ढोलक पर अच्छी खासी संगत भी करने लग गई थी। भले आदमी के रूप में पंडितजी का आसपड़ौस में काफ़ी नाम था और लोग उनकी इज़्ज़त करते थे। लेकिन पूजा पाठ से बस इतना ही हो पाता था कि घर-गिरस्ती किसी तरह चल जाये और हो सके तो बेटी की शादी के लिए चार पैसे जमा हो जाएँ। बीवी के गुज़र जाने के बाद जैसे बुढ़ापे ने उन्हें दबोच लिया था। उन्हें भी लगने लगा था बेटी का ब्याह जल्दी ही निबट जाये तो अच्छा हो, पता नहीं उनको कब क्या हो जाय। बेटा भी अभी छोटा ही था और आगे पीछे ऐसा कुछ भी नहीं था कि जिसके बलबूते पर बाद में वे लोग ठीक तरह रह भी पाएं। फिर किसने देखा बेटे की बहू कैसी हो, बेटे का दिमाग़ कैसी पलटी मारे और लच्छो का क्या हो!

और जब एक दिन पंडितजी ने लच्छो को बताया कि उसका ब्याह जीवनलाल से तय कर दिया गया है, तब वह शर्मा गयी थी और कमरे से भाग निकली थी। वैसे ही जैसे चम्पा ने किया था जब उसको अपनी शादी के बारे में पता चला था। चम्पा सभी बातें लच्छो को बताया करती थी। वह जानती थी अगर शादी की बात हो तो लड़की को शर्माना चाहिए। तब के बाद वह जीवनलाल के बारे में ही कल्पनाएँ किया करती थी। उनकी बिरादरी में शादी से पहले लड़की अपने होने वाले दूल्हे को देख भी नहीं सकती थी। वह ज़माना ही शायद ऐसा था, उसकी किसी भुआ या मौसी ने भी अपने पति को शादी से पहले नहीं देखा था। वह सोचती थी क्या उसके होने वाले पति कभी शादी से पहले घर पर आयेंगे ताकि वह उन्हें देख पाए या कभी आते जाते पिताजी ही उनको दिखा दें। वे कैसे होंगे, लंबे, छोटे, गोरेचिट्टे या सांवले, क्या सफ़ेद अचकन साफ़े में वे चम्पा के दूल्हे की तरह ही दिखते होंगे, और न जाने क्या क्या। लच्छो ने अपने दूल्हे की अपने हिसाब से ही कोई छवि बना ली थी और वह उसी को देख सोच कर खुश रहती थी। चम्पा उसे साड़ी पहनना भी सिखा रही थी, हालाँकि सब साड़ियां उसके बदन के हिसाब से बड़ी पड़ती थीं। साड़ी की चौड़ाई कम करने के लिए पहले तो उसे थोड़ा सा मोड़ना पड़ता था सो कमर के पास वह वैसे ही मोटी हो जाती थी और जब वह पटलियाँ बना कर आगे खोंसती थी तो एक गट्ठर सा बन जाता था। पर चम्पा ने कहा था ऐसा उसकी लम्बाई की सभी लड़कियों के साथ होता था। पिताजी और मौसियों ने अलग अलग रंगों की कई अच्छी साड़ियां ख़रीदी थीं, पर शादी वाले दिन पहनने के लिए जो गोटे के बेल-बूटों वाली चटक लाल और हरे रंग की साड़ी झुम्मा भुआ ने ख़रीदी थी वो उसे सबसे ज़्यादा पसंद आई थी और लच्छो ने उस दिन इसे पहनने के इंतज़ार में तब तक के बाकी दिन बड़ी बेसब्री से काटे थे।

और फिर वह दिन आ ही गया। जात बिरादरी वालों की भीड़ जमा हो गयी थी। लड़कियां और औरतें लच्छो के साथ चुहलबाज़ी कर रही थीं और वह शर्मा कर बार बार अपना मुंह ढाँप रही थी। अपनी मनपसंद लाल हरी साड़ी पहन कर लच्छो बेहद खुश थी। मर्द लोग बारातियों के स्वागत के लिए बची हुई तैयारियां कर रहे थे। पिछवाड़े में हलवाइयों ने मिठाइयों में बूंदी के लड्डू और मोहनथाल और नमकीन में बेसन के सेव तो पहले ही बना लिए थे, अब बारात के आने के बाद ताज़ा शाक पूड़ी बन कर तैयार हो जाएंगे। कुछ लोग बारात का स्वागत करने के लिए मालाएं लिए द्वार पर मौजूद थे और औरतें अशोक और आम के पत्तों के साथ पानी से भरे हुए छोटे कलश लेकर। दूर से शहनाई की आवाज़ सुनाई दी और फिर गले में नगाड़े लटकाए दो नगाड़ची दिखाई दिए जो कुछ बारातियों और उनके बीच चल रही घोड़ी के आगे आगे मांड में कोई धुन बजाते हुए आ रहे थे। सुनहरी अचकन में सफ़ेद घोड़ी पर बैठे जीवनलाल साफ़ा और तुर्रा बांधे सचमुच जंच रहे थे। उनके गले में सफ़ेद और लाल रंग की कई तरह की मालाएं थीं और साफ़े पर बढ़िया फूलों का सेहरा था जिसकी लड़ें इतनी लंबी लटक रही थीं कि उनका पूरा चेहरा ही उनसे ढँक गया था। बीच बीच में वे लड़ों को हाथ से थोड़ा खिसका कर सामने देख लिया करते थे। उनके पीछे एक सजी धजी बग्घी थी जिसमें भी एक सफ़ेद घोड़ा जुता हुआ था। बग्घी में कुछ बच्चे और एक दो बुज़ुर्ग बैठे दिखाई दे रहे थे। उसके पीछे बाकी बाराती चल रहे थे। कई बरसों बाद कस्बे वालों ने ऐसी शानदार बारात देखी थी। पर खुद लच्छो अपनी बारात नहीं देख सकती थी। यह अपशकुन होता।

द्वारचार के बाद बारातियों से घिरे हुए जीवनलाल मंडप तक आये जहाँ उन्हें मान सहित एक पीले कपड़े से सजे पट्टे पर बैठाया गया। परम्परा के अनुसार उनके सामने लाल कपड़े का अन्तःपट खींच लिया गया था जिसके एक सिरे को लच्छो का बड़ा भाई मोहन पकड़े हुए था और दूसरा बिन्नू चाचा। अन्तःपट के दूसरी ओर पीले कपड़े से ढँका दूसरा पट्टा था जिस पर लच्छो बैठेगी। शुभ मुहूर्त के आने तक बाराती और घर के लोग जिन्हें संस्कृत में शुभकामनाओं के पद्य, आशीर्वाद के श्लोक, देवी देवताओं की आराधना के  मन्त्र वगैरह आते हैं वे बोलते रहेंगे। ऐन मुहूर्त के समय पंडित के इशारे के साथ ही अन्तःपट हटा लिया जाएगा और जीवनलाल और लच्छो एक दूसरे पर पीले चांवल डालेंगे। यही पहला मौक़ा होता है जब वर वधू एक दूसरे की एक झलक देख सकते हैं। शर्माती सकुचाती हुई लच्छो को झुम्मा भुआ और चम्पा मंडप तक ले कर आईं और उसे पीले चांवल हाथ में देकर पट्टे पर बैठा दिया गया। उसे समझा दिया गया था कि अन्तःपट के हटने के तुरंत बाद पहले दूल्हा या दुल्हन जो दूसरे पर चांवल डाले, घर पर उसी का राज चलता है। लच्छो अब बेसब्री से उस समय का इंतज़ार कर रही थी। उसे विश्वास था, वही राज करेगी। श्लोक बोलने का कार्यक्रम शुरू हो गया था। कुछ लोग जो संस्कृत जानते थे वे उनकी सराहना कर रहे थे, कुछ समझने का दिखावा कर रहे थे और जिन लोगों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, वे पीछे मस्ती में बैठे आपस में गपशप कर रहे थे।

तभी अचानक जीवनलाल को खून की उलटी हुई। यह देखते ही बिन्नू चाचा जो अन्तःपट का एक सिरा पकड़े खड़े थे बुरी तरह घबरा गए और उनके हाथ से अन्तःपट छूट गया। अन्तःपट के गिरते ही बिना कुछ समझे लच्छो ने अपने हाथ के पीले चांवल तुरंत जीवनलाल पर फेंक दिए। उनका चेहरा अब भी फूलों के सेहरे से ढँका हुआ था। वे लुढ़कने लगे थे। उनको लुढ़कता देख घबराहट में लच्छो की मुट्ठी फिर बंद हो गई और बचे चांवल मुट्ठी में ही रह गए। इस बीच पंडित जी, बिन्नू चाचा और बारातियों में से कुछ ने जल्दी से जीवनलाल को उठाया और सहारा देते हुए किसी तरह बाहर तक लाये। वे नीम बेहोशी की हालत में बुरी तरह लड़खड़ा रहे थे। अन्तःपट के आसपास खून बिखरा हुआ था और हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री मच गई थी। सौभाग्य से जो बग्घी बारात के साथ आई थी वह अभी लौटने की तैयारी कर ही रही थी। जीवनलाल को उसी बग्घी में बैठाया गया और कुछ लोग उनको सहारा देने और गिरने से रोकने के लिए उसी में बैठ गए। बग्घी मुड़ कर तेज़ी से अस्पताल की ओर दौड़ गई। घर में सब लोग फक्क चेहरा लिए किसी सलाह या आदेश के इंतज़ार में भौंचक्के से एक दूसरे की तरफ़ देख रहे थे। लच्छो अभी भी उसी पट्टे पर बैठी थी। उसने अपनी मुट्ठी में बचे हुए चांवल देखे। उसे विश्वास था, उसने पीले चांवल पहले फेंके थे और अब वह जब ससुराल जाएगी वही घर पर राज करेगी।

अगले दो दिनों तक पंडित जी सुबह से अस्पताल के लिए निकल जाते थे और शाम के धुंधलके के बाद ही लौटते। जीवनलाल की तबियत बिगड़ती ही गई और तीसरे दिन डॉक्टरों ने उनके मृत शरीर को घर ले जाने के लिए कह दिया।

पंडित जी पूरी तरह टूट गए। सदमे से उनकी ज़ुबान और आधे अंग पर लकवा पड़ गया। लच्छो को तो पता ही नहीं चल रहा था आखिर हो क्या रहा है। हरेक की आंखें तो सूजी हुई लग रही थीं पर लच्छो के सामने कोई रोता नहीं दिखाई देता था। वह सोचती थी क्यों झुम्मा भुआ ने खुद ही अपनी दी हुई लाल साड़ी वापस ले ली और उसके हाथ से सारी चूड़ियाँ भी उतरवा दीं। अपनी शादी के लिए मिली जिन रंग बिरंगी साड़ियों पर खुशी से हर रोज़ लच्छो हाथ फेर आती थी, वे भी पता नहीं कहाँ चली गई थीं। विमला मौसी ने उसे अब से सिर्फ़ काली बोर्डर वाली सफ़ेद साड़ी ही पहनने के लिए कहा। उसे कहा गया जीवनलाल नहीं रहे और अब उनकी विधवा के रूप में वह न रंगीन साड़ी पहनेगी और न कभी उनके घर ही जाएगी। लच्छो बस खाली खाली भावशून्य आँखों से सब देखती थी, जो कुछ कहता था उसे सुन लेती थी और हतप्रभ सी बैठी रहती थी। उसे बारह दिन का सोग मनाना था। अभी तक भी वह इस हादसे की गंभीरता को नहीं समझ पा रही थी।

घर के सब लोगों का अगला एक महीना बिस्तर पर पड़े पंडितजी को सम्हालने में ही गया, पर गुमसुम से पंडितजी उस सदमे से बाहर नहीं आ पाए और एक दिन लाचारी और क्षमायाचना की मुद्रा में लच्छो की तरफ़ देखते हुए उन्होंने हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं।  

वक़्त अपनी उसी गति से चलता रहता है जो उसने अरबों वर्ष पहले पैदा होते समय अपने लिए निर्धारित की थी क्योंकि उसे ही सारे ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करना होता है। जब आकाश-गंगाएं, ग्रह, नक्षत्र, तारे तक भी उसी के अनुसार चलते हैं, तो पंडित जी का घर भला कैसे समय के स्थिरपाश में बंध कर रुका रह सकता था। वह भी थपेड़ों के साथ बहता गया। जिन लोगों को ‘महान’ बनने का शौक होता है वे ‘दुखियों’ के उन कमज़ोर क्षणों की तलाश में रहते हैं जब वे उनको ‘सांत्वना’ दे सकें। लच्छो को भी लोग शायद वैसे ही देखना चाहते थे। पर उसके मन में क्या चल रहा होता था यह कभी कोई नहीं जान पाया, न शायद किसी ने जानने की कोशिश ही की। बल्कि खुद उसने ही अपने मन की बात अपने दिल के गहरे सूखे अंधे कुएँ में दफ़ना दी थी। चम्पा तक से वह खुल कर बात नहीं करती थी।

उस हादसे के बाद एक बार चम्पा ने उससे पूछ लिया था कैसे लगते थे जीवनलाल? लच्छो उसको केवल यही बतला सकी कि उन्होंने सुनहरी अचकन पहनी थी और उनका चेहरा सेहरे की मालाओं से ढंका था। अंदर ही अंदर तब अचानक उसका हृदय छलनी छलनी हो गया था कि उसने अपने पति की एक झलक तक भी नहीं देखी! सब कुछ अब भी पहेली की तरह ही अनसुलझा लग रहा था। उसके जीवन का ढर्रा इस हादसे से ऐसे तार तार हो कर बिखर गया कि उसका कोई सिरा भी दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी वे सब रंगीन साड़ियां, साज-सिंगार का सामान, हंसी-खुशी, उछल कूद और सारे सपने एक ही झटके से छितर कर पता नहीं कहाँ चले गए और उसके हाथ में सिर्फ़ एक मोटे से कपड़े की सफ़ेद साड़ी थमा गए, जिसे भी पहनना अभी उसे पूरी तरह नहीं आता था। जो कुछ वह कर रही थी वह थी खून-खच्चर हुए अपने क़तरा क़तरा हृदय को सिर्फ़ फिर से जोड़ने की कोशिश।

और उसके बाद से जैसे चुप्पी ने उसकी सारी शब्दावली को लील लिया था। वह सिर्फ़ अपने आप को खुश दिखाने का भरम ही पैदा करती रही।

पांच बरस बाद मोहन की शादी तय हो गयी और एक बार फिर से घर में खुशी का माहौल दिखाई दिया। लच्छो अचानक ही बड़ी और गंभीर हो गयी थी। अपने भाई की शादी पर उसकी ज़िम्मेदारी अन्य औरतों से ज़्यादा थी और इसे वो बखूबी जानती थी। मोहन की जिस लड़की से शादी होने वाली थी उसका नाम चंद्रा था। वह गोरीचिट्टी और खूबसूरत थी। शादी के वक़्त लच्छो की तरह वह छोटी नहीं थी और पन्द्रह को पार कर चुकी थी। घर में उसी की चर्चा हुआ करती थी। मोहन भी फूला नहीं समा रहा था। मैट्रिक करने के बाद उसको सरकारी नौकरी भी मिल गई थी सो अलग। अपने अंदर के अधूरेपन की धुंध को लच्छो अपनी ज़िम्मेदारियों को अंजाम देने और आने वाले खुशी के मौके को लेकर घर की व्यस्तता की खिड़की से छाँटने की कोशिश कर रही थी।

मोहन शादी के बाद चंद्रा के साथ बड़े शहर में आगया जहाँ उसका तबादला हो गया था। अब मोहन का ही उत्तरदायित्व हो गई थी लच्छो, लिहाज़ा उसे भी शहर में ही आना पड़ा, हालाँकि उसे लगता था शहर में उसे यहाँ से ज़्यादा मानसिक पीड़ा होगी। उसका डर बेबुनियाद नहीं था। दफ़्तर से लौटने के बाद मोहन तो चंद्रा के साथ कमरे में ही बंद रहता था। लच्छो ही उनके लिए खाना लिए इंतज़ार करती थी। जब शर्माती हुई चंद्रा कमरे से बाहर निकलती थी, तब एकबारगी लच्छो के होंठ भी मुस्कुराहट में थोड़े फैल जाते थे। वह चंद्रा के चेहरे पर कहानियां पढ़ने लगती और खुद किसी अनजाने गहरे तिलिस्मी गर्त में उतरने लगती। पर उसे वह सब बेमानी लगा और उसने अपने आपको नियति के आगे समर्पित कर दिया। उसके बाद से चंद्रा जब भी मोहन के पास जाने के लिए इधर उधर देख कर चुपचाप कमरे में दाखिल होती थी, रसोई से लच्छो सिर्फ़ मुस्कुराती रहती थी। अपना मन मसोस कर वह फिर काम में जुट जाती। अपने शरीर में हो रहे बदलाव को भूल कर वह अब चंद्रा की दिन-ब-दिन निखरती सुंदरता को देख कर ही खुश होने लगी थी।

अब वह मन ही मन कभी कभी चंद्रा भी बनती थी।

मोहन के कमरे से कभी कभी हारमोनियम पर रियाज़ करने की आवाज़ सुनाई देती और चंद्रा का साथ देता स्वर भी। चंद्रा भी संगीत सीखने लगी थी। लच्छो तब मन ही मन ढोलक पर संगत करती। धीरे धीरे लच्छो ने खुद को भूल कर पूरी तरह अपने आप को समय के हवाले कर दिया था। अपनी तरफ़ से सोचने के लिए उसके पास ज़्यादा कुछ बचा ही नहीं था।  

और फिर सब से पहले चंद्रा ने शायद लच्छो को ही ‘ख़ुशख़बरी’ दी थी।

लच्छो अब भुआ बन गई थी।

जब चंद्रा ने नन्हीं सी गुड़िया को जन्म दिया, लच्छो ही उसका पूरा ध्यान रखने लगी थी। चंद्रा की इस बाबत फ़िक्र कितनी कम हो गई थी। चंद्रा की गोद में तो वह सिर्फ़ दूध पीने के लिए ही जाती थी, बाकी का तमाम काम लच्छो ने अपने ऊपर ले लिया था।

लच्छो अब ‘माँ’ भी बन गई थी।

अपने इस नए ओहदे के कारण अब उसका सम्मान भी बढ़ा था। ‘उस’ से अब ‘वे’ हो गई थीं। उनके बारे में हम उसी सम्मान के साथ बात करेंगे जिसे उन्होंने खुद अर्जित किया है। इसलिए हम भी अब उनको लच्छो नहीं बल्कि केवल भुआ कहेंगे क्योंकि सभी उनको केवल भुआ ही कहने लग गए हैं। मोहन और चंद्रा भी अब बाबूजी और अम्मा कहलाने लगे थे। हम भी वही कहेंगे।

अम्मा के चेहरे का निखार बढ़ता गया और उनकी गोद में हर दूसरे साल एक नया बच्चा आता रहा। लेकिन भुआ ने ही सबकी ज़िम्मेदारी उठा ली थी। उन्हें आठों बच्चों को सम्हालने में भी कोई परेशानी नहीं आई। अब पहले वाले बच्चे बड़े जो होते गए थे। अब अम्मा को देख कर वे खुद शर्माती नहीं थीं।

घर में शोरगुल के माहौल में भुआ को कितना अच्छा लगने लगा था। घर में भुआ सब की ज़रूरत बनती जा रही थीं।भुआ ने अपना वजूद तो कभी तलाशा ही नहीं था, जैसे उन्हें पता था कि वह था ही नहीं। पर अम्मा के पहले बच्चे के साथ ही उन्हें लगने लगा था उनकी क़द्र शायद कुछ बढ़ी थी।

शहर में पंडितजी के परिवार के कई रिश्तेदार और बिरादरी के बहुत से घर थे जिनके यहाँ भुआ का आना जाना शुरू हो गया था। जब कभी किसी के यहाँ कोई जागरण, जन्मदिन, विवाह या समारोह होता तो संगीत या भजन में भुआ की उपस्थिति लाज़मी सी हो गई थी। वे ढोलक पर अच्छी संगत तो करती ही थीं, उन्हें कई तरह के गीत और ग़ज़ल भी आते थे जिन्हें वे बड़ी अच्छी तरह गाती थीं। धीरे धीरे हाल यह हो गया कि भुआ के बिना कोई संगीत की महफ़िल जमती ही नहीं थी। रतजगों में भजन या गीत गाते वक़्त ‘सम’ पर वह जिस तरह से ढोलक पर थाप देती थीं, ऊंघती हुई औरतों की नींद तो उड़ ही जाती थी, उनमें थोड़ा जोश भी आ जाता था। तब हँसती हुई सभी समवेत स्वर में गाने लगतीं। अब तक भुआ ने कितनी ही शादियाँ करवा दी थीं, कितने ही बच्चों, बड़ों के जन्मदिनों में शामिल हुई थीं, और कितने ही जागरणों में शिरकत की थी।  

घर में भतीजे, भतीजियों, उनके बच्चों और फिर उनके भी बच्चों के कारण भुआ की मसरूफ़ियत रहती थी लेकिन भुआ को इससे ज़्यादा खुशी किसी और बात में मिल ही नहीं सकती थी कि उनकी उपस्थिति कितनी कितनी जगह कितनी अनिवार्य हो गई थी। अब तो बाबूजी और अम्मा भी न केवल दादा-दादी, नाना-नानी बल्कि पर-दादा पर-दादी भी बन चुके थे। जात बिरादरी में अम्मा, बाबूजी और भुआ सम्मानित माने जाने लगे थे।  

घर में सदस्यों की बढ़ती संख्या के कारण घर में नए नए कमरे जुड़ने लगे। पहले भुआ के साथ उनके कमरे में कुछ बच्चे रहने लगे थे, फिर जब कोई बड़ा हुआ और उसकी भी शादी हुई तो ‘सहर्ष’ उन्होंने अपना कमरा उसके हवाले करके अपना ट्रंक अंदर के बरामदे में रख लिया। अब सत्तर साल की उम्र में उनको प्राइवेसी की ऐसी क्या ज़रूरत थी! केवल एक छोटी लोहे की ज़ंग लगी डिबिया थी जिसे वे अकेले में कभी कभी निकाल कर देखती थीं और फिर सम्हाल कर कुछ कपड़ों के बीच ट्रंक में रख देती थीं। शायद उस ट्रंक में सबसे ज़्यादा क़ीमती कोई चीज़ अगर थी तो यही थी। गले में तो केवल तुलसी की एक माला पड़ी रहती थी। बरामदे में उनके लिए लोहे का ‘अच्छा सा’ नया पलंग आगया था और वे खुश थीं। वही उनकी बैठक, आरामगाह और बैडरूम था। और वही भुआ की निगरानी में छोटे बच्चों के खेलने की जगह भी था। सत्तर साल की उम्र से चौरासी तक का सफ़र भुआ का उसी बरामदे में तय हुआ था। जब कभी छोटी मोटी बीमारी ने उन्हें दबोचा, इसी बरामदे और इसी पलंग में उन्हें सुकून मिला था।

शायद पहली बार ही है कि भुआ इतनी ज़्यादा बीमार हुई हैं। पर खुद भुआ को बीमार होना केवल इसलिए नापसंद नहीं था कि वे लोगों के ऊपर बोझ बन जाती थीं या वे खुद घर में कोई मदद नहीं कर सकती थीं, बल्कि इसलिए भी कि नीमबेहोशी की हालत में वे कुछ न कुछ बड़बड़ाने लगती थीं। दिल के अंदर कुछ बातें कितनी भी गहरी दबा दी जाएँ, जब मन के सन्नाटे के बीच अचानक उथल पुथल होती है तो कुछ बातें बाहर निकल भी पड़ती हैं। पर बाद में जब उन्हें कोई बतलाता था वे क्या बोल रहीं थीं तब उन्हें खुद अपने ऊपर तरस आने लगता था। अच्छा था कोई समझ नहीं पाता था उस सब का मतलब क्या था, अगर कुछ था तो। इस पर कोई तवज्जो नहीं देता था। वे सब तो यही जानते थे कि बेहोशी में बड़बड़ाने का कोई मतलब नहीं होता।

“भुआ, अब कैसा महसूस हो रहा है?” – गोमती ने भुआ को हलके से झिंझोड़ते हुए पूछा। पर भुआ ने कोई जवाब नहीं दिया। घर के सभी लोग बीच बीच में जब भी फ़ुर्सत हो या आते जाते भुआ का हाल पूछते थे। जब थोड़ी सुध होती थी तो भुआ कह देती थीं “ठीक है”, वर्ना उन्हें पता ही नहीं चलता था कौन आया, कौन गया। परसों जब डॉक्टर बुलाया गया था तब उसने दबे से स्वर में बता दिया था कि अब ज़्यादा उम्मीद नहीं बची थी। किसी अनहोनी की आशंका से सभी परेशान और दुखी थे। जिस व्यक्ति को उन्होंने अपने बीच बचपन से अब तक हर रोज़, लगातार, बरसों देखा था और उससे भरपूर प्यार पाया था उसके न होने की कल्पना मायूस तो करती ही है।

“भुआ, मुंह खोलो, एक बार दवा और ले लो। देखो डॉक्टर ने कहा है आप जल्दी ठीक हो जाओगी” – अबकी बार अम्मा ने भुआ का सिर सहलाते हुआ कहा।

भुआ ने मुंह खोला और दवा पी ली। अम्मा ने पूछा – “अब कैसा लग रहा है? ठीक तो हो?”

भुआ थोड़ा मुस्कुराईं, उन्होंने आँख खोल कर अम्मा को देखा। फिर मद्धम सी आवाज़ में टूटे शब्दों में कहा – “मैं तो ठीक हूँ, तुम अपना ध्यान रखो। दुबली लग रही हो। बच्चे सब ठीक हैं न?”

अम्मा की आँखों में भी आंसू छलक आये। “हाँ भुआ, मैं तो बिलकुल ठीक हूँ, बच्चे भी सब ठीक हैं। आप बस जल्दी ठीक हो जाओ। घर में हर जगह आपको देखने की ऐसी आदत हो गई है कि आपको सिर्फ़ इसी जगह लेटे देखना बुरा लगता है।” अम्मा ने कितना सही कहा था।

अम्मा सोच रही थीं जबसे वह इस घर में आई थीं, उन्होंने सबसे पहले भुआ ही को तो देखा था, अपनी सब बातें बताईं थीं, अपना दुःख साझा किया था, हर बार सांत्वना पाई थी और इतने बच्चों के बाद और इतने भीड़ भड़क्के वाले घर में भी भुआ की वजह से ही कभी परेशान नहीं हुई थी। वे हमेशा सहेली की तरह ही मज़ाक करती रहती थीं। उनके बीच कभी भी ननद-भाभियों के बीच दिखाई देने वाले ईर्ष्या द्वेष नहीं रहे। अकेले में अम्मा जब कभी भुआ के बारे में सोचती थीं तो जी दर्द से भर जाता था। बचपन से अब तक उनको देखा जो था। भुआ की बेहाल ज़िंदगी से वह मन ही मन दुखी रहती थीं, पर कुछ नहीं कर सकती थीं।

आज फिर बाबूजी डॉक्टर को साथ लिवाने गए हैं। सभी लोग भुआ के पलंग के आसपास मंडरा रहे हैं, जैसे उन्हें आभास हो रहा हो कि सब कुछ ठीक नहीं है।

“चंद्रा, सत्तर पिचेत्तर बरस से तुम ही मेरी अकेली सहेली रही हो। तुमने और दादा ने ही तो मेरा ध्यान रखा है हमेशा।” और फिर जैसे कृतज्ञता से उनकी बंद आँखों की कोरों से आंसू टपक पड़े। अपने आपको कुछ संयत करते हुए उन्होंने फिर कहा – “चंद्रा, मेरे ट्रंक में से लोहे की एक छोटी डिब्बी है वो दे दो” – जैसे उनके शब्द पता नहीं कितनी गहराई से टूट टूट कर निकल रहे थे। पर कितने ही दिनों के बाद इतनी कमज़ोरी के बावजूद उन्होंने इतनी सब बातें की थीं।

अम्मा ने ट्रंक खोल कर इधर उधर टटोला, फिर तीन चार सफ़ेद साड़ियों के बीच उसे वह ज़ंग लगी डिब्बी दिखाई दी। उन्हें उत्सुकता तो हुई, पर इसे खोल कर नहीं देखा और भुआ को पकड़ा दी। भुआ ने किसी तरह मुश्किल से डिब्बी को मुट्ठी में लिया। चेहरे पर फिर से एक हल्की सी मुस्कान लहराई। बंद आँखों में एक ठहराव सा आया और चेहरे पर सुकून दिखाई दिया। बीच बीच में वे एक लंबी सांस ज़रूर ले लेती थीं। ऐसा लगता था जैसे दौड़ लगा रही हों, बचे हुए समय के साथ। कौन जाने शायद लगा भी रही हों। बढ़ती उम्र में, खासकर अंतिम दिनों में बचपन और बचपन की छोटी बड़ी बातें ही सबसे ज़्यादा याद आती हैं। आम लोग तो अपने जीवन में बचपन, जवानी और बुढ़ापा, तीनों देखते हैं, पर भुआ ने बचपन के बाद सीधे बुढ़ापा ही देखा था।

भुआ समय की किसी गहरी सुरंग से तेज़ गति से अपने बचपन और बुढ़ापे के बीच आवागमन कर रही थीं। समय भले ही अपनी गति नहीं बदलता, पर उसने दिशा ज़रूर बदल ली थी। और उसके साथ साथ ज़माने की हवा ने भी अपना रुख बदला था। भुआ सोच रही थीं उनकी अपनी ही एक भतीजी ने तो अब तक दो बार तलाक दे कर तीन तीन शादियाँ कर लीं थीं और उनकी ही एक रिश्तेदार शोभा ने तो अपनी लड़की के विधवा हो जाने के बाद फिर से उसकी शादी कर दी थी, जब कि उसकी पहली शादी से एक छोटी बच्ची भी थी। क्या खुद उन्होंने जन्म लेने में साठ-पैंसठ साल की जल्दबाज़ी नहीं कर दी थी?

फिर जैसे भुआ के चेहरे पर बर्फ़ जमा होगई और धीरे धीरे सारे शरीर को जकड़ने लगी।

इस बीच बाबूजी डॉक्टर को लेकर आगये थे। डॉक्टर ने अंगूठे से भुआ की आँखों से पपोटे उठा कर आँखें देखीं, फिर नब्ज़ देखी और धीरे से हाथ वापस पलंग पर रख दिया। नब्ज़ बेहद धीमे और रुक रुक कर चल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे सांस भी उखड़ने लगी थी। डॉक्टर ने बिना कुछ बोले अपने होठों के इशारे से जता दिया कि जल्दी ही कुछ भी हो सकता है। सब के चेहरे उतर गए। भुआ एक लंबे सफ़र से मुक्त हो कर शायद किसी दूसरे अनाम से लंबे सफ़र पर जाने वाली थीं। बाबूजी डॉक्टर से कुछ पूछ ही रहे थे कि भुआ को एक हिचकी आई। डॉक्टर ने लपक कर फिर नब्ज़ देखी और सिर हिला कर वापस भुआ का हाथ छोड़ दिया। बाबूजी के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रख कर वे चले गए।

भुआ किसी अनंत यात्रा पर निकल चुकी थीं। घर में सभी रो पड़े।

सारी बिरादरी में खबर करा दी गई थी और लोग आने शुरू हो गए थे। अगले दो तीन घंटों में ही भुआ को श्मशान ले जाया जायगा, सूरज ढलने से पहले। औरतें भुआ को नहला कर नई साड़ी पहनाने की तैयारी करने लगी थीं। उनकी चिर परिचित सफ़ेद साड़ी।

तभी अम्मा ने भुआ की अधखुली मुट्ठी में डिब्बी देखी। उन्होंने धीरे से उसे हथेली से निकाला और अलग ले जाकर खोला।

डिब्बी में थोड़े से पुराने पड़े टूटे से पीले चांवल थे।

 

 

 

 

- कमलानाथ

कमलानाथ (जन्म 1946) की कहानियां और व्यंग्य ‘60 के दशक से भारत की विभिन्न पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। वेदों, उपनिषदों आदि में जल, पर्यावरण, परिस्थिति विज्ञान सम्बन्धी उनके लेख हिंदी और अंग्रेज़ी में विश्वकोशों, पत्रिकाओं, व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में छपे और चर्चित हुए हैं। हाल ही (2015) में उनका नया व्यंग्य संग्रह ‘साहित्य का ध्वनि तत्त्व उर्फ़ साहित्यिक बिग बैंग’ अयन प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है तथा एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है।

कमलानाथ इंजीनियर हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय सिंचाई एवं जलनिकास आयोग (आई.सी.आई.डी.) के सचिव, भारत सरकार के उद्यम एन.एच.पी.सी. लिमिटेड में जलविज्ञान विभागाध्यक्ष, और नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टैक्नोलोजी, जयपुर में सिविल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफ़ेसर पदों पर रह चुके हैं। जलविद्युत अभियांत्रिकी पर उनकी पुस्तक देश विदेश में बहुचर्चित है तथा उनके अनेक तकनीकी लेख आदि विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं व सम्मेलनों में प्रकाशित/प्रस्तुत होते रहे हैं। वे 1976-77 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय (अमरीका) में जल-प्रबंधन में फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन फ़ैलो रह चुके हैं। विश्व खाद्य सुरक्षा और जलविज्ञान में उनके योगदान के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी मिल चुके हैं।

वर्तमान में कमलानाथ जलविज्ञान व जलविद्युत अभियांत्रिकी में सलाहकार एवं ‘एक्वाविज़्डम’ नामक संस्था के चेयरमैन हैं।

 

 

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