रेशम का कीडा़

         हमारे पिता का स्वप्न एक बंगलेनुमा घर में रहने का था, सो उन्होंने शहर के बीच में 7000 स्क्वेयर फीट जगह में बंगलेनुमा घर बनवाया था । हमारे पिताजी ने घर की चारों तरफ़ जगह छोड़ रखी थी। सामने की तरफ तो एक छोटा सा मैदान ही सा था। वे अपने घर में बाउण्ड्रीवाल बनाने के पक्ष में नहीं थे । उन्हें चारो ओर का खुला वातावरण अच्छा लगता था। उन्हे खेलते हुए बच्चों का शोर बडा़ सुहाना लगता था। हमारे घर के सामने छोटे से मैदान पर बच्चे कुछ न कुछ खेलते ही रहते थे । मेरे भी सारे दोस्त वहीं आकर खेलते।  रेस-टीप हमारा प्रिय खेल होता था । हमारे मुहल्ले के मेरी उम्र के तमाम बच्चे मेरे दोस्त बन गये थे । हम साथ -साथ ही खेलते । यूं तो मेरे बहुत से दोस्त थे, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता था कमल। वह मेरे साथ प्रायमरी स्कूल से था। कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक वह मेरे साथ में मेरे ही क्लास में था। वह हमारे घर के करीब ही रहता था। कमल यूं तो सब बच्चों जैसा ही था, पर वह खेलते-खेलते अचानक न जाने कहाँ खो सा जाता था। उसे यह भी याद नहीं रहता था कि वह कोई खेल खेल भी रहा है। क्रिकेट खेलते हुए बैटिंग करते-करते अचानक वह बल्ला ही उठाना भूल जाता और आऊट हो जाता। फील्डिंग करते हुए कैच लेना ही भूल जाता था। कबड्डी खेलते हुए और छू,-छुआउल खेलते हुए भी वह आराम से आउट हो जाता था। हमारे सभी साथी उसे पागल कहते थे। उसकी खुद में गुम हो जाने की यह आदत ही मुझे बेहद आकर्षित करती थी। हमारे दूसरे साथी उसे छत्तीसगढ़ी मे सुधभूलहा कहकर चिढाते थे। मेरा सबसे करीबी दोस्त होने के बावजूद मुझे भी कई सालों तक पता ही नहीं चल पाया कि आखिर वह अचानक खो कहाँ जाता है। थोडी़ समझ विकसित होने पर एक दिन मैनें उसे कुरेदा तो उसने मुझे बताया कि तेरे घर के सामने जो लड़की रहती है न, मैं उसे देखकर सुध-बुध खो जाता हूँ। हमारे घर के सामने एक आम्रपाली नाम की लडकी रहा करती थी। वह वाकई में बड़ी खूबसूरत थी। बार्बी डाल के जैसे ही उसके बाल सुनहरे और आँखें नीली थीं। उसके पिता दिल्ली से ट्रांसफर होकर आये थे। सेण्ट्रल गवर्मेन्ट की नौकरी मे थे। बस हमें इतनी ही जानकारी थी, उनके बारे में। उसके घर के सामने एक बडी़ सी खिड़की थी, जिसके पीछे वह लड़की अक्सर बैठी हुई दिखती। वह अपने मां-बाप की इकलौती सन्तान थी। वे लोग मुहल्ले में सदा अजनबी से रहे।

         इधर हम सभी बच्चे बडे़ होते-होते हायर-सेकण्डरी स्कूल पहुँच गये, फिर कालेज भी। सैर-सपाटा, मौज-मस्ती करते हुए मेरा कालेज जीवन बीतने लगा था। कमल बारहवीं में फेल हो चुका था, और अब वह धीरे-धीरे हम दोस्तों से कटने लगा था। चूंकि मेरे घर से उस लड़की के घर की खिड़की स्पष्ट दिखालाई पड़ती थी, सो वह नियमित रूप से मेरे पास आता और घण्टों उस खिडकी को निहारा करता था। मैंने कई बार उससे कहा कि किसी दिन उनके घर चलते हैं और उस लड़की से मिल आते हैं, पर वह मना कर देता। वह सिर्फ़ एक लाइन मे उत्तर देता कि उसे उस लड़की को देखना और सिर्फ़ देखना ही अच्छा लगता है।  धीरे-धीरे वह उस लडकी से बेइन्तेहा मोहब्बत करने लगा था। अजीब तरह की मोहब्बत थी, देखना और सिर्फ़ देखना भर। न मिलने की उत्सुकता, न बात करने की उत्कण्ठा। बस देखते ही रहना। हालांकि मैं भी कमल की ख़ातिर उस लड़की से मिलना चाहता था। क्योंकि कमल की उसके प्रति दीवानगी बढती जा रही थी। वह पढ़ने के नाम पर घर से क़िताब लेकर आता और मेरे घर की छत पर घण्टों बैठकर लगातार खिड़की की तरफ़ ही निहारता रहता।

         एक दिन हिम्मत करके मैंने उस लड़की के घर की कुण्डी खड़खड़ाई। मैं उनके घर दीपावली की शुभकामना देने के बहाने गया था। उसके पिता ने दरवाज़ा खोला और बडे़ ही रूखे स्वरों मे मेरे आने का प्रयोजन पूछकर मुझे दरवाज़े से ही चलता कर दिया। उसके बाप के ऐसे व्यवहार से मैं तिलमिला उठा था। हमारा परिवार हमारे मोहल्ले का सबसे प्रतिष्ठित परिवार माना जाता था। ऐसे में उसका ऐसा व्यवहार मुझे बेहद खल गया। मैंने कमल से स्पष्ट कह दिया कि यार, आज तेरे चक्कर में मुझे बेहद अपमानित होना पडा़ है। तू घण्टों छत पर रहता है, तो उससे ग़लत मैसेज़ जाता है।

अच्छा ठीक है मैं अब नहीं आऊंगा- कहकर कमल गया, तो फिर मेरे घर नहीं आया । उसके बाद भी मैं अकसर उसे सड़क पर खडा़ होकर खिडकी की तरफ निहारते हुए ही पाता। अब मुझे भी कमल एक पागल लड़का लगाने लगा था। धीरे-धीरे मैंने कालेज़ की पढा़ई पूरी कर ली। कुछ दिनों बाद मुझे अपने शहर से बहुत दूर एक सरकारी नौकरी मिल गइर्, और फिर मैं अपनी उस नौकरी में मस्त हो गया। ग्रामीण एरिया में काम करने से संबंधित नौकरी थी मेरी । धीरे-धीरे उस क्षेत्र के सारे मैदानी कर्मचारी मेरे दोस्त बन गये और मैं पूरी तरह उनमें रम गया। कमल को तो मै पूरी तरह भूला ही चुका था। बस इतना पता चल पाया था कि वह बडी़ ही मुश्किल से हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास कर पाया था, और किसी प्रेस में काम करने लगा था। उधर मेरा काम बडा़ ही मजे़दार था। रोज नये-नये लोगों से मिलना-जुलना और नये-नये गाँव में जाना लगा रहता था। गाँव की अल्हड़ लड़कियों से नयन-मटक्का आदि सभी बातें मुझे स्वार्गिक आनंद की अनुभूति कराती थीं। मुझे रोज लगता कि मैं साथी कर्मचारियों के साथ पिकनिक पर निकला हूं। खूब मौज-मस्ती में दिन बीत रहे थे ।

          इधर कमल ने प्रेस में ही काम करने वाली किसी लड़की से शादी कर ली थी। इधर मेरी भी शादी हो गई थी। अब मैं अपने परिवार में व्यस्त हो गया था। हमारा वह पुश्तैनी मकान अब बिक चुका था, सो उधर जाना ही नहीं हो पाता था। धीरे-धीरे मैं अब युवावस्था से अधेडा़वस्था की ओर बढ़ रहा था। मेरी सोच का दायरा खुद और परिवार तक ही सिमटकर रह गया था। कुल मिलाकर खुदर्गज ही हो गया था मैं। एक दिन मैं किसी सरकारी काम से अपने शहर आया था। बस से उतरते ही मुझे कमल नज़र आया। वह एक गुमटी पर बैठा चाय पी रहा था। उसकी दाढी़ बढी़ हुई थी। उसके बाल भी बडे़ ही बेतरतीब तरीके से बढे़ हुए थे। उसने पैरों में स्लीपर पहन रखी हुई थी। उसके शर्ट की बटन्स टूटी हुई थी। पेण्ट को उसने एक तरफ से मोड़ रखा था, जबकि उसकी पैण्ट दूसरी तरफ़ से बिल्कुल भी मुडी़ हुई नहीं थी। कुल मिलाकर मैले-कुचले से कपडे़ पहन रखे थे उसने। मेरे आवाज़ देने उसने मेरी तरफ़ नज़रें उठाईं। उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान उभरी और कंपकंपाने लगी। थोड़ा सहज होकर उसने लगभग मरी सी आवाज़ में मुझसे पूछा कैसे हो? मैंने कहा बढ़िया हूँ । कमल की इस तरह फटेहाल हालत की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। मैंने कहा तुमने यह क्या हाल बना रखा है। इस पर वह खामोश नज़रों से मुझे देखता रहा फिर कुछ बोलने लगा

        कमल से बातें करते हुए मुझे समझ में आने लगा था कि उस के साथ सब कुछ ठीक नहीं है। कमल मेरा लंगोटिया यार था। मेरी यह नैतिक जिम्मेदारी थी कि मैं उसे व्यावहारिक तौर पर सान्त्वना दूँ। केवल जबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलने वाला था, सो मैंने झूठ-मूठ ही उससे कह दिया कि मैं सिर्फ़ उसी से मिलने आया हूँ । हालाँकि मैं सरकारी दौरे पर आया था। मैंने उसे बाल कटवाने और शेविंग कराने के लिये राजी कर लिया। मैंने अपने बास को मैसेज़ कर दिया कि मुझे अचानक पारिवारिक काम आन पड़ा है, सो मुझे दो दिनों की छुट्टी चाहिये। कमल से बातें करते हुए मुझे यह अहसास हो चुका था कि फ़िलहाल उसके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं है। मेरे कुरेदने पर उसने बताया कि वह कई-कई दिन प्रेस क्लब में ही रात गुजार लेता है। कई बार प्रेस में ही सो जाता है। मैंने कमल से कहा- यार चल हम दोनों भाई होटल में रहते हैं, जहां सिर्फ मैं और तुम ही रहेंगे। वहाँ हमें डिस्टर्ब करने वाला कोई भी ना होगा। हमें अपना बचपन फिर से जीने का मौका मिला है। बचपन का जिक्र सुनते ही उसकी आँखों में चमक सी आ गई। निश्चित तौर पर यह चमक उस खिड़की वाली लडकी को याद करके आई थी ।

हमने वहीं नज़दीक में एक औसत दर्जे के होटल का कमरा किराये से लिया, और उसमें शिफ्ट हो गए। हम दिनभर इधर-उधर की बातें करते रहे। मैंने जानबूझकर उस खिड़की वाली लड़की का जिक्र नहीं किया। शाम होने पर मुझे लगा कि कमल कुछ बेचैन सा लगने लगा है। मैं समझ गया कि उसे शराब चाहिए। अब तक मुझे ऐसा लगने लगा था कि कमल शराब के साथ शबाब का भी शौक रखता होगा। मैंने उसकी बेचैनी को ताड़कर उसके लिये शराब की व्यवस्था कर दी। हमने खाना अपने कमरे में ही मंगा लिया था। उस पर जब नशा तारी होने लगा तो मैंने उसे छेड़ते हुए पूछा क्या बास शराब के ही शौकीन हो या शबाब के भी ? शबाब का नाम सुनकर वह एकदम से ख़ामोश हो गया। उसके चेहरे से गंभीरता टपकने लगी। मुझे लगा कि शायद मैंने उसकी कोई दुखती रग पर हाथ धर दिया है। मैंने उसे सहज करने के लिए अपनी रंगीन रातों की झूठी कहानियाँ बनाकर सुना दी और अपने-आपको निहायत ही लूज़ करैक्टर का बताया, जिससे कि उसे भी अपनी बात बताने में अपराधबोध महसूस न हो सके। मेरी इस बात पर वह मुस्कुराया और कहने लगा कि जीवन में मुझे सैकड़ों अवसर मिले थे, लेकिन यार तुझे तो याद ही होगी वो खिड़की वाली लडकी । यार मैंने अपने जीवन में उसके अलावा कभी किसी के बारे में सोचा ही नहीं। मैंने मन ही मन उससे प्रामिस कर लिया था कि मैं लड़कियों की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूगाँ। यहाँ तक कि मैंने अपनी बीबी को भी आज तक नहीं छुआ। न जाने लड़कियों को छूने के अहसास मात्र से मेरे मन में अपराध-बोध सा आ जाता था। हालाँकि मैंने अपनी पत्नी को भी उस खिड़की वाली लड़की के बारे में बताया था। साथ ही उससे यह भी कहा था कि मैं किसी दूसरी महिला का स्पर्श भी नहीं करूंगा। मेरी बीवी ने सब कुछ जानते-बूझते मुझसे शादी की। शादी से पहले जब तक वह दोस्त की तरह थी, कहती थी कि मैं तुम्हारी भावनाओं को समझती हूँ। हम दोनों उस खिडकी वाली लडकी के अहसास को ज़िन्दा रखेंगे, लेकिन जैसे ही वह मेरी पत्नी बनी, न जाने क्यों उसकी सोच एक साधारण सी औरत के रूप में तब्दील हो गई। मुझे हिजड़ा नपुंसक, और ज़िन्दगी को बर्बाद करने वाला कहकर प्रताड़ित करने लगी। इसके अलावा तुम्हारे जैसे नकारा आदमी की जरूरत नही है, कहकर मुझे मेरे अपने घर से भी निकाल दिया। आजकल वह लिव इन रिलेशनशिप में किसी दूसरे पुरूष के साथ मेरे ही घर में रहती है। यह सब बताते-बताते वह सुबकने लगा। मैंने उसे ढाढ़स बंधाया। वह जब सामान्य हुआ तो मैंने उससे पूछा-यार उस खिड़की वाली लड़की का क्या हुआ? वे लोग अभी भी वहीं रहते हैं, या कहीं और चले गये?  

  यार उस लड़की की रीढ़ की हड्डी ठीक से विकसित नहीं हो पायी थी, सो वह एक ऐसी व्हीलचेयर पर बैठी रहती थी, जो उसकी पीठ को पूरी तरह सहारा दे सके। उसकी लंबी पीठ वाली व्हील चेयर की जगह खिड़की के पास ही थी, सो वह ज़्यादहतर खिडकी के पास ही नज़र आती थी। कुछ सालों बाद तो वह मर गई यार, कहते हुए वह फिर सुबकने लगा।

       इधर मैं सोचने लगा हे भगवान यह कैसा आदमी है। क्या यह दूसरे ग्रह का प्राणी है, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ वासना-रहित विशुध्द प्रेम करना ही जानता है। क्या व्यावहारिक जीवन में ऐसे लोग पागल ही कहला सकते हैं। देह जगत की इस दुनिया में चमकीली आत्मा और देह वाले व्यक्ति भी निवास करते हैं । मेरे इस तरह से सोचने के दरम्यान ही मैंने देखा कि वह बिस्तर पर सो गया है। उसके बारे में सोच मेरे अन्तस में भी उजाला भरने लगा था । मैंने लाईट बंद की और नाईटलैम्प का बटन दबाने जा ही रहा था कि मैंने देखा कि कमरे मे हल्की-हल्की चमकीली रोशनी हो रही है। मेरा ध्यान बेड पर गया तो मुझे लगा कि वहां पर एक बडा सा चमकने वाला रेशम का कीड़ा है। उसमे से ही हल्की चमकीली रोशनी आ रही है। मैं सोचने लगा कमल ने अपनी चारो तरफ़ रेशम का जाल ही बुन लिया है और स्वयं उसके अन्दर बंद है। वह रेशम का ककुन उसकी कब्र बन गया है। पगला जानता नहीं है कि रेशम के एक ककून से कुछ नहीं बन पाता। दुनिया को रेशमी बनाने के लिये सबको रेशम का कीड़ा बनना होगा, जो कि असंभव है।

 

 

- आलोक कुमार सातपुते

शिक्षा- एम.कॉम.

प्रकाशित रचनायें - हिन्दी और उर्दू में समान रूप से लेखन। देश के अधिकांश हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। पाकिस्तान के अंग्रेजी अख़बार डान की उर्दू वेबसाईट में धारावाहिक रूप से लघुकथाओं का प्रकाशन।

संग्रह का प्रकाशन- १ शिल्पायन प्रकाशन समूह दिल्ली के नवचेतन प्रकाशन,से लघुकथा संग्रह अपने-अपने तालिबान का प्रकाशन।

२ सामयिक प्रकाशन समूह दिल्ली के कल्याणी शिक्षा परिषद से एक लघुकथा संग्रह वेताल फिर डाल पर प्रकाशित।

३ डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से कहानियों का संग्रह मोहरा प्रकाशित ।

४ डायमंड पाकेट बुक्स, दिल्ली से किस्से-कहानियों का संग्रह बच्चा लोग ताली बजायेगा प्रकाशित ।

५ उर्दू में एक किताब का प्रकाशन।

अनुवाद – अंग्रेजी उड़िया ,उर्दू एवम् मराठी भाषा में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन ।

सम्पर्क - हाउसिंग बोर्ड कालोनी, सडडू, रायपुर

 

 

 

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