रेत का महल

“डैडी, डैडीss देखो ना! उधर मैंने वंडरफुल घर बनाया है ।” शुभी अपने डैडी को झकझोर रही थी, परन्तु उसके डैडी तो यादों के गहरे समुद्र में गोते लगाये हुए थे। फिर नन्हीं शुभी की आवाज कैसे सुनते वह |
समुद्र के किनारे सुहानी शाम रेत पर फ़ैल गयी थी | लालिमा लिए सूरज पानी में सोना बिखराते हुए जाने को था | ऐसी मस्तानी शाम में मियां-बीवी, प्रेमी-प्रेमिकाएं एक दुसरे के बाँहों से लिपटे नयनाभिराम पल को जी रहे थे | लेकिन इन्हीं विहंगम दृश्य के बीच विवेक और निशा बैठकर अपनी-अपनी अतीत की यादों के पालने में हिलोरे ले रहे थे। हूँ- हाँ में होती बात भी अब दोनों के मध्य सन्नाटे में तब्दील हो गयी थी।
दूर समुद्र के एक छोर से दिख रहे खम्बे की टिमटिमाती रोशनी विवेक के जख्मों को हरा कर रही थी। विवेक एक टक उसी टिमटिमाती हुई रोशनी को देखे जा रहा था।
पापा से रूठकर शुभी बगल में ही बैठी माँ से बोली- “मम्मा देखो न, डैडी मेरे बनाये रेत के घर को देखने नहीं चल रहे हैं। आप देखो, चलो ना मम्मा आप ही देखो।” निशा भी जैसे तंद्रा से लौटी हो उसके झकझोरने पर। विवेक की ओर देखकर समझ गयी कि वह पूरी तरह से तल्लीन है अपनी भूली-बिसरी यादों में।
निशा शुभी के रेत के घर को देखकर बोली – “अरे, कितना प्यारा घर बनाया है। ओहो! इसमें तो गार्डन भी है!” शुभी मचल उठी प्रसंशा सुनकर।
“अच्छा! यह कुआँ भी बनाया है क्या? जब तक निशा यादों के गलियारे से बाहर आकर अपने शब्द का मतलब बताती, शुभी सवाल जड़ दी-
“कुआँ!! यह क्या होता है! मैंने तो यह स्विमिंगपूल बनाया है। व्यूटीफूल है न!” उसकी चहकती आँखों से खुशी छलक रही थी ।
निशा मुस्करतें हुए बोली- “कुआँ, जिसमें अंडरग्राउंड वाटर होता है। जो कि ठंडा और स्वीट होता है। तुम्हारी दादी यानी ग्रैंडमदर के यहाँ है। जब चलूँगी कभी भारत, तब दिखाऊँगी तुम्हें।”
शुभी की गोलमटोल आँखे विस्फारित सी हो रही थी।
शुभी फिर दादी को लेकर और सवाल न करने लगे उससे पहले ही वह उठकर खड़ी होते हुए बोली- “मैं अभी आती हूँ। तुम खेलो।”
यादों के झरोखो से ठंडी-गरम हवा उसे भी विचलित कर रही थी। वहां से उठकर वह विवेक के बगल में जा बैठी।
मौन तोड़ती हुई हौले से बोली- “किन यादों में खोए हुए हो!” विवेक ने अनसुना कर दिया।
किंतु दुबारा जोर देकर कहने पर वह बोला- “वह दूर खड़ा स्तम्भ देख रही हो न ! उस स्तम्भ की लाइट ने मुझे उन्हीं पुराने दिनों की याद दिला दी। जिससे मैं सालो से पीछा छुड़ाना चाह रहा था। इसी तरह की स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठ पढ़-लिखकर आज इस मुकाम को हासिल किया है मैंने।
मम्मी -पापा ने कितने सपने बुने थे मुझे लेकर। जैसे तुम और मैं शुभी को लेकर बुन रहे हैं। क्या तुम बता सकती हो ! कि हमारे देखे सपने को पूरा करने के बाद शुभी पलटकर आएगी हमारे पास। क्या उसे उसका जीवनसाथी आने देगा !!”
इस तरह यादों में विवेक का यदा कदा गुम हो जाना निशा को उसकी अपनी गलतियाँ याद दिलाता रहता था। सूखे हुए उसके घाव जब-तब हरे हो जाते थें | विवेक कभी भी गड़े मुर्दे उखाड़कर उसका पोस्टमार्टम नहीं करता था लेकिन उसका ख़ामोश हो जाना या एक-दो जलते हुए शब्द उछाल देना ही निशा के मन में भंवर ला देता था |
आज उसका ऐसा बोलना ही दिल तक तीर चुभो गया था। लगा जैसे विवेक तंज कस रहा हो। वह तुरन्त विवेक के कंधे पर सिर रखकर बोली- “एक महीने बाद ही शुभी के स्कूल की छुट्टी है। चलो! चलेंगे भारत, मम्मी -पापा से मिलने।”
विवेक फटी आँखों से निशा को देखने लगा। उसे शायद विशवास नहीं हो पा रहा था निशा की बात पे |
“ऐसे क्या देख रहे हो! मुझे एहसास हो गया है कि घर दीवारों से नहीं अपनों की खुशियों से बनता है। और अपनों की खुशियों को समेटने मैं तुम्हारें साथ अपने घर चलने को तैयार हूँ।” कहते हुए वह शुभी के बनाये रेत के घर को देखने लगी।
विवेक की खुशी का ठिकाना न रहा। वह तो मन से महीने भर बाद क्या जैसे उसी वक्त माता -पिता के पास पहुँच गया था। इधर समुद्र की लहरें उसके पैरों को गुदगुदाकर लौट जाती थीं उधर यादें भी गुदगुदाने लगी थीं।
“अब कहाँ खो गए! कहा न कि चलूँगी मैं भारत।”
“आह पंद्रह साल बाद तुम्हारी बुद्धि कैसे जागी, यह सोच रहा था मैं” तिरक्षी दृष्टी डालते हुए व्यंग्य से मुस्कराया वह |
सुनकर निशा उसके सीने पर प्रहार करने लगी और दोनों खिलखिलाने लग पड़े । समुद्र की लहरें भी दोनों के पैर के पास आकर उन्हें छू जाती थीं | जैसे खुशी जता रही थीं वह भी।
ठहाके सुनकर शुभी फिर से पापा के पास आकर बोली- “डैडी, आपने मेरा घर नहीं देखा। कट्टी आपसे।”
विवेक झट से खड़ा हुआ। उसकी ऊँगली पकड़कर बोला – “चलो, चलो दिखाओ अपना घर ।” तीनों ही खुश होकर रेत से बने घर से खेलने लगें।
“समुद्र-तट के इतने पास बनाया है, जल्दी ही शैतान लहरें तोड़ देंगी।” विवेक ने शुभी से कहा
शुभी तुरन्त बोली – “ओफ्फ ओ डैडी, नहीं टूटेगा।”
रेत से बने घर की दीवारें भले मजबूत नहीं थीं पर प्यार के साँचे में ढली थीं। प्यार का सीमेंट रेत से बने घर को भी मजबूती दे रहा था। शुभी का विश्वास पानी को पास नहीं आने दे रहा था।
विवेक को उस रेत के घर में अपने माँ-बाप के द्वारा खून पसीने की कमाई से बनाये घर की छवि दिख रही थी।
जैसे शुभी इस रेत के घर को बनाकर खुश हो रही है वैसे पापा भी तो उस ईंट-पत्थर से घर को बनाकर कितने खुश थे। जिस दिन घर बनकर पूरा हुआ था, पापा -मम्मी ने सत्यनारायण की कथा करके पूरे मोहल्ले को भोजन कराया था।” कहकर फिर अतीत को टटोल आया |
“हर क्षण तुम्हें याद है?” आश्चर्य से बोली निशा
“हाँ निशा ! मैं उनके हर कष्ट का गवाह हूँ। रिटायरमेंट के बाद साल भर पापा और मम्मी ने कड़ी मेहनत करने के उपरांत उसी दिन चैन की सांस ली थी और कहा था कि अब रहेंगे आराम से अपने घर में।”
“यह तो सच है, अपने द्वारा बनाये घर को देखने सा सुख कहीं नहीं..!” निशा रेत के घर से खेलती हुई शुभी के चेहरे को देखकर बोली।
“बिल्कुल! मेरा कमरा मम्मी ने कितने करीने से सजाया था। हर चीज मेरे पसन्द की थी उस कमरे में। दर्पण के नीचे बने दराजों को खोलकर जब मैंने सवाल किया था कि “मम्मी ये सब क्या बनवाया है !” तो मेरे कान पकड़कर बोली थी कि ये तेरी बहुरिया के लिए है। इसमें वह अपनी श्रृंगार का सामान और चूड़ियाँ रखा करेगी।”
“तुम्हारी नौकरी लगने के पहले ही शादी के सपने देखने लगी थीं ?” मुस्कराते हुए निशा ने पूछा।
“नहीं। मेरी नौकरी लगे अभी छः महीने भी नहीं हुए थे लेकिन उसके कानों में मेरी शादी की शहनाई बजने लगी थी। वह रह-रहकर न जाने कहाँ खो जाती थी । मुझे उन्हें वर्तमान में खींचना पड़ता था। मेरी बलाइयाँ लेकर हौले से वह मुस्करा देती थीं।”
निशा की ओर देखते हुए बोला- “माएँ भी कितने सपने बुन लेती हैं न। जबकि वो खुद नहीं जानती कि भविष्य की गर्त में क्या छुपा हुआ है।
मेरी शादी तय होते ही उनके पैर जमी पर नहीं थे। पूरे घर को दुल्हन की तरह सजवाया था उन्होंने।”
“शहर की चकाचौंध करती लाइटों की ओर देखकर बोला- ” इसी तरह मेरा पूरा घर अपनी सुंदरता पर जैसे इठला रहा था उस दिन। उसकी दीवारें, दहलीज भी नयी बहू के स्वागत में दमक रही थीं। कण-कण, क्षण-क्षण से खुशी के गीत फूट रहे थे। माँ तो अचानक बूढ़ी से जवान हो उठी थी। दौड़-दौड़कर सबको दिशा निर्देश देती फिर रही थी।”
याद करते-करते विवेक की आँखों में चमक जाग उठी |
“मेरे भी घर में वही माहौल था लेकिन शादी के गीतों पर मेरी माँ के तो आँखों मेंं आँसुओं की जमुना बहने लगती थी।” निशा की आँखों में पानी तैर आया |
उसके चेहरे को हाथ में लेकर उसके आँसू पोंछकर विवेक ने कहा – “तुमने जब घर के अंदर प्रवेश किया था तो माँ तो खुशी से फूले नहीं समा रही थी। सभी रिश्ते-नातेदार ‘चाँद उतर आया तुम्हारें घर तो’ कहकर मुस्करा रहे थें। माँ बहू की तारीफ सुनकर पुलकित हो रही थी। दोनों हाथ की मुड़ी हुई उंगलियों को जोड़कर बजा देती थी। कहती किसी की नजर न लगे मेरी बेटी को।”
“सच में मम्मी तो बहुत खुश थीं लेकिन आज मैं समझी उन खुशियों को।” निशा ने कहा ही था कि विवेक के घाव उभर आयें, वह तपाक से बोला -
“पर यह खुशी ज्यादा दिन कहाँ ठहरी।” कहकर मौन हो गया।
लेकिन मन में तूफान उठ रहा था। लहरों की तरफ बढ़कर लहरों को हाथों से छूकर बुदबुदाने लगा विवेक- “चार दिन बाद ही तो तुमने अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया था।”
कनखियों से निशा को देखकर बुदबुदाया- “चाँद से चेहरे के पीछे छुपे दाग जल्दी ही दिखने लगे थे। छोटा सा घर तुम्हें कैदखाना लगने लगा था। कमरे की हर चीज तुमको आउटडेटेड लग रही थी। हर दूसरे दिन माँ से तुम्हारी कहासुनी होती सुन-देखकर मेरे कान पक गए थे।” लहरें तेजी से उठी और उसके आँखों से बहते आँसुओं को जैसे धो गयीं।
“दिल पे पत्थर रख मैंने सालभर बाद ही उस पक्की ईंटों के घर को ‘रेत का घर’ समझ विदेश आ गया था। सुना था दीवारों के भी कान होते हैं किन्तु वो दीवारें तो मुझे पीछे से आवाज भी देती थीं। लेकिन मैं उस घर पर रह नहीं सकता था। निशा नाम की बेड़ियाँ जो पैरों में पड़ गयी थीं।
माँ-बाबा का वो निरीह सा चेहरा आँखों के सामने अक्सर घूमने लगता था।
परन्तु अपनी मन की शांति और माँ-बाबा को परेशानी से बचाने के लिए मैं यही विदेश में बस गया। लहरें भी उसके दुख को जैसे महसूस कर रही थीं। उसकी रफ्तार भी विवेक के दिल में उठे हलचल मुताबिक चल रही थीं |
तभी आवाज कानों में गूँजी- “फिर से किस दुनियाँ में खोये हो विवेक!”
पास आकर बोली निशा-
“मानती हूँ गलती हुई है मुझसे, बहुत बड़ी गलती हुई है। सबसे होती है। मुझसे भी भरम बस हो गयी। किन्तु समय रहते मैं अपनी गलतियों को सुधारना चाह रही हूँ न। तुम चिंता नहीं करो मैं अपने उस घर को अब इस रेत के महल की तरह ढहने नहीं दूँगी। उसे अपने प्यार और संस्कार से वैसा ही सजा दूँगी जैसा मम्मी-पापा बसाना और सजाना चाह रहे थे।”
“तुम इतना तो यकीन कर सकते हो न मुझपर!” उसकी आँखों में देखती हुई बोली।
“हाँ निशा, बिल्कुल कर सकता हूँ। मुझे मालूम है, समय ने तुम्हें बदल दिया है | अपनों से दूर, अजनबियों के बीच रहकर अपनत्व के महत्व को तुम समझने लगी हो। और रही सही कसर शुभी ने पूरा कर दिया।”
अँधेरा भी छाने लगा था। तभी समुद्र से एक लहर जोर से अँगड़ाई लेती हुई आयी और रेत के घर को अपने साथ बहा ले गयी।
घर को टूटता देख शुभी रोने लगी | विवेक के आश्वासन पर कि “कल आकर इससे भी सुंदर घर हम तीनों लोग मिलकर बनायेंगे। जिसमें तुम्हारें दादा-दादी का भी एक बड़ा सा रूम होगा।”
निशा तुरन्त बात को बढ़ाते हुए बोली – “उस कमरे के एक कोने में दादा जी की मूविंग चेयर होगी। जिसपर झूलते हुए तुम्हारे दादा जी तुमको इंटरेस्टिंग स्टोरीज सुनाएंगे।”
सुन वह खुश होकर आँख मटकाकर बोली – वाव, डैड सच्ची।
विवेक ने कहा – ” यस मुच्ची…!”
“इसमें तो दादाजी का कमरा नहीं था। अच्छा हुआ पानी ने तोड़ दिया। दोनों की ऊँगली पकड़कर नन्हें-नन्हें पैरों से बड़े-बड़े डग भरती हुई घर की ओर जाने लगी।
- सविता मिश्रा ’अक्षजा’

जन्म स्थान ..इलाहाबाद
शिक्षा …इलाहाबाद विश्वविद्धालय से ग्रेजुएट (हिंदी ,रजिनिती शास्त्र, इतिहास में ) | 

लेखन विधा …लेख, लघुकथा, कहानी तथा मुक्तक, हायकु और छंद मुक्त रचनाएँ |
प्रकाशन …पहली कविता पति पहले जहाँ नौकरी करते थे (GEC ) वहीं की पत्रिका में छपी |
‘मेरी अनुभूति’ , ‘सहोदरी सोपान २’ ‘१००कदम’ , साँझा काव्यसंग्रह में प्रकाशित कुछ रचनाएँ ।
‘मुट्ठी भर अक्षर’, ‘लघु कथा अनवरत’, साँझा लघुकथा संग्रह में प्रकाशित कुछ कथाएँ ।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा बेब पत्रिकाओं में छपती रहती है रचनाएँ |
‘संरचना’ सम्पादक डॉ॰ कमल चोपड़ा जी की पत्रिका में छपी ”पेट की मजबूरी” लघुकथा |
महक साहित्यिक सभा, पानीपत में चीफगेस्ट के रूप में भागीदारी |
अभिरुचि ….शब्दों का जाल बुनना, नयी चींजे सीखना, सपने देखना !
ब्लाग .. मन का गुबार एवं दिल की गहराइयों से |
पता .. खंदारी अपार्टमेंट , खंदारी , आगरा २८२००२

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