रिश्‍तों की भुरभरी ज़मीन

 

रिंकी यह सोच-सोचकर परेशान है कि जि़न्‍दगी की सारी तोहमतें, सारे दोषारोपण  उसके ही हिस्‍से में क्‍यों आते हैं। वह सबको खुश करने के चक्‍कर में ख़ुद को इतना दुखी कर लेती है कि उसे अपना जीना बेकार लगने लगता है।

 

रिंकी के साथ ही ऐसा क्‍योंकर होता है, जिसे वह अपना बनाती है या मानती है, वही उससे दूर हो जाता है। चाहे पति हो या दोस्‍त। इन लोगों से जब तब कहा-सुनी होती रहती है। जब तक सबकुछ चुपचाप सुन लेती है, वह सबसे अच्‍छी स्‍थिति होती है।

 

यदा-कदा प्रतिक्रिया देती है तो हाथ तो कुछ नहीं लगता पर लोग उससे नाराज़ होकर किनारा करने की कोशिश ज़रूर करने लगते हैं। पति गिरीश किनारा तो नहीं करते पर रिंकी की बात को तरज़ीह नहीं देते।

 

वे हमेशा यह जताते हैं कि वे रिंकी को बहुत प्‍यार करते हैं लेकिन रिंकी को पता है कि यह प्‍यार तभी तक उंडेला जाता है जब तक कि उनकी बात मानती रहे।  झूठ तो इतनी सफाई से बोलते हैं कि सामनेवाला सहज ही विश्‍वास कर ले।

 

वह गिरीश के लिये क्‍या नहीं करती? उन्‍हें रिंकी से झूठ बोलने की ज़रूरत ही क्‍यों पड़ती है? रिंकी आधुनिक विचारों की है। गिरीश की सही बात मानती भी है। हां, उसे झूठ बोलने से सख्‍त़ नफ़रत है। वह मानती है कि एक झूठ सौ झूठ बुलवाता है।

 

एक सच इंसान को कई मुसीबतों से बचा लेता है, पर गिरीश को पता नहीं रिंकी से झूठ बोलने में कौन सा आत्मिक संतोष मिलता है। इस बात को लेकर घर में कई बार बहस, कहा-सुनी हो चुकी है पर परिणाम? वही ढाक के तीन पात।

 

रिंकी को याद आता है कि वह अपने मायके में कितना धीरे बोलती थी। जिसको बात करना होता था वह पास आकर बात करता था। चिल्‍लाने की नौबत ही नहीं आती थी। सब ज़रूरतभर की ही बात करते थे। अपने कामों में मशगू़ल रहते थे।

 

यहां ससुराल में कोई धीरे बात ही नहीं करता।  पास में भी खड़े होंगे तो पेट से आवाज़ निकालकर इतनी ज़ोर से बोलेंगे कि बस, पूछो मत। रिंकी ने कई बार गिरीश से कहा भी है कि जो जितना झूठ बोलता है, वह उतनी ही ज़ोर से बोलता है।

 

संगत का असर तो होता ही है। अब रिंकी भी ज़ोर से बोलने लगी है लेकिन उसका ज़ोर से बोलना अपनी सही बात को मनवाने के लिये होता है और इस चक्‍कर में उसकी आवाज़ फट गई है। गिरीश और रिंकी में किच किच तो रोज़ ही होती है। मामला चाय का हो या खाने का।

 

अब उसी दिन की तो बात है। गिरीश चाय बनाने जा रहे थे। किचन से आवाज़ दी,

’रिंकी, चाय पियोगी?’ रिंकी ने कहा, ‘ आप चाय बना ही रहे हैं तो थोड़ी सी बना लीजिये।‘ गिरीश चाय बनाकर लाये।

 

बालकनी में कुर्सियां सरकाईं और तिपाई पर चाय रख दी। रिंकी ने जैसे ही चाय का एक घूंट भरा, उसे लगा कि मानो उसके होंठ चाय की मिठास से आपस में चिपक गये हैं। वह कह उठी, ‘गिरीश, आपको पता तो है कि मैं चाय में चीनी नहीं लेती । लेती भी हूं तो बहुत कम।‘

 

गिरीश रिंकी के मुंह से तारीफ़ सुनना चाह रहे थे। जब चाय में अधिक मीठे की शिकायत सुनी तो झुंझला गये। बोले, ‘अब तुम्‍हें कोई डायबिटीज तो है नहीं कि शुगर लेवल बढ़ जायेगा।‘ रिंकी ने कहा, ‘मुझसे मीठी चाय पी ही नहीं जाती। अजीब सा लगता है। ऐसा लगता है कि मानो उल्‍टी हो जायेगी।‘

 

गिरीश फुसफुसाती आवाज़ में बोले, ‘अंग्रेज़ बनती हैं मैडम। ज़रा शक्‍कर ज्‍य़ादा हुई नहीं कि मुंह बनाने लगती हैं।‘ रिंकी ने गिरीश के लिप मूवमेंट से अन्‍दाज़ा लगा लिया कि कम से कम रिंकी की तारीफ़ तो नहीं की जा रही। वह कुछ नहीं बोली।

 

अपना कप लेकर चुपचाप उठी और किचन में जाकर चाय सिंक में बहा दी और फिर से चाय का बर्तन चढ़ा दिया। रिंकी को चाय में अदरख, इलायची और और सौंफ अच्‍छी लगती है। उसके बिना चाय में मज़ा ही नहीं आता।

 

उसने किचन के पत्‍थर पर अदरख रखी और बेलन से कूटने लगी। उसे लगता है कि अदरख के बिना भी कोई चाय बनती है भला। लगता है कि दूध और शक्‍कर का ग़रम पानी पी रहे हैं। उसे गैस पर उबलती चाय बहुत अच्‍छी लगती है।

 

गैस तेज़ करो तो कितनी तेज़ी से उपर आती है और धीमी कर दो तो कितनी शान्ति से नीचे की ओर चली जाती है। वह चाय उफ़ान के साथ तब तक खेलती रही जब चाय ढंग से पक नहीं गई और इलायची तथा अदरख की ख़ुशबू उसके नथुनों में भर नहीं गई।

 

जब बढि़या गुलाबी चाय बन गई तो उसे अपने प्‍याले में छाना और ट्रे लेकर बालकनी की ओर चल दी साथ ही गाती जा रही थी, ‘मेरी चाय बनी है आला, इसमें डाला गरम मसाला।‘

 

गिरीश ने कनखियों से रिंकी को देखा और पूछा, ‘तुम जो गाना गाती आ रही हो और अपनी चाय की तारीफ में कसीदे काढ़ रही हो तो तुम कितने चम्‍मच शक्‍कर डालती हो?’

 

रिंकी ने कहा, ‘मैं कभी शक्‍कर या कोई भी चीज़ चम्‍मच या चमचे से नापकर नहीं डालती। अन्‍दाज़ से डाल लेती हूं। हां, इस बात का ध्‍यान रखती हूं कि चाय, चाय जितनी ही मीठी लगे, शर्बत न लगे।‘

 

इस तरह बात करते करते चाय पी ली गई। घडी देखी तो सुबह के सात बज रहे थे। वह नाश्‍ता बनाने चल दी और गिरीश नहाने। रिंकी ने झटपट पोहे बनाये और टेबल पर प्‍लेट वगैरह रख दीं।

 

गिरीश भी तैयार होकर आ गये और नाश्‍ता करके आनन-फानन में ऑफिस चल दिये।

 

गिरीश के ऑफिस जाने के बाद रिंकी के पास कुछ समय खाली होता है। सो उसने अख़बार उठाया और ख़बर पढ़ने लगी। क़रीब दस बजे उसने गिरीश को फोन किया कि वे दफ्तर पहुंच गये हैं या नहीं।

 

रिंकी का यह नियम रहा है कि वह दस बजे गिरीश को फोन ज़रूर करती है। वे रिंकी की इस आदत से भी ख़ासे परेशान हैं। कई बार कहते भी हैं कि ऑफिस जाकर भी रिंकी मैडम के मस्‍टर में साईन करना होता है कि वे समय से ऑफिस पहुंच गये हैं।

 

उन्‍हें टूर पर जाना बहुत पसन्‍द है। जब ऑफिस उन्‍हें टूर प्रोग्राम देता है तो वह शाम बहुत खुशगवार होती है। ऐसा ही कुछ उस शाम को भी हुआ। शाम को गिरीश जब घर आये तो आते ही बोले, ‘मुझे कल ऑफिशियली दिल्‍ली जाना है, दो दिन बाद लौट आउंगा।‘

 

रिंकी के लिये यह कोई नयी बात नहीं है। वह ओके कहकर काम में लग गई। पिछले एक साल से रिंकी ग़ौर कर रही है कि गिरीश आये दिन दिल्‍ली ही जा रहे हैं। जहां तक उसकी जानकारी है उनके ऑफिस की शाखाएं और भी शहरों में हैं। आज उसने सोच लिया है कि वह शाम को इस विषय पर गिरीश से पूछेगी।

 

शाम को गिरीश वापस घर आये। रिंकी ने चाय बनाकर दी। इसके बाद वे सोफे पर ही आंखें बन्‍द करके लेट गये। रिंकी ने ख़ुद को तैयार किया और बोली, ‘सुनते हैं?, ऑफिस आपको हर बार दिल्‍ली ही क्‍यों भेजता है? और भी तो शहर हैं।‘

 

यह सुनते ही गिरीश की त्‍योरियां चढ़ गईं। जल्‍दी से बैठ गये और बोले, ‘मुझे ऑफिस कहां भेजता है, यह भी तुम तय करोगी? मुझे भेजा जाता है तो कुछ तो कारण होगा। मेरे मामलों में इतनी दिलचस्‍पी लेने की ज़रूरत नहीं है।‘

 

रिंकी को गिरीश के भड़कने का कारण समझ में नहीं आया। वह बोली, ‘ अरे, पूछ लिया तो कौन सी क़यामत आ गई? ऐसा दिल्‍ली से कौन सा जुड़ाव है जो उसके नाम से भड़क जाते हो।‘

 

अचानक माहौल तनावपूर्ण हो गया। वह चुपचाप किचन में चली गई। उसने एक सब्‍ज़ी बनाई, रायता बनाया और रोटी सेककर गिरीश को थाली दे आई। गिरीश ने थाली देखकर कहा, ‘एक ही सब्‍ज़ी? मैं इतना पैसा देता हूं तो क्‍या दो सब्जि़यां नहीं खरीदी जा सकतीं?’

 

रिंकी ने पहले तो कोई जवाब नहीं दिया पर कुछ सोचकर बोली, ‘दो सब्जि़यां बिल्‍कुल बन सकती हैं, पर एक सब्‍ज़ी से भी खाने की आदत होना चाहिये।‘ कहकर वह रसोई में गई और अपने लिये दो रोटी सेंकी, उन्‍हें देशी घी से तर किया।

 

उससे बिना घी की रोटियां खाई ही नहीं जातीं। पता नहीं लोग कैसे सूखी रोटी खा लेते हैं। जब उसके मेहमान बिना घी की रोटी की मांग करते हैं तो वह बिदक जाती है और कह देती है कि शरीर के लिये चिकनाई भी ज़रूरी है।

 

सूखी त्‍वचा और सूखा शरीर किस काम का? बस ऐसे ही सोचते-सोचते वह किचन में ही खाना खाने बैठ गई। रात के नौ बजे गिरीश ने अपना बैग तैयार किया और जल्‍दी सोने चले गये। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला।

 

लग रहा था कि दिल्‍ली का नाम लेकर मानो रिंकी ने बहुत बड़ी ग़लती कर दी थी। वह भी आखि़र क्‍यों न पूछे। पत्‍नी सिर्फ़ खाना बनाने और बिस्‍तर में साथ देने के लिये होती है? वह भी करवट लेकर सो गई। सुबह पांच बजे अलार्म बजा।

 

रिंकी ने उठकर चाय बनाई। गिरीश तैयार होने लगे। वे कुछ भी नहीं बोल रहे थे और ऐसा करके मानो यह ताक़ीद दी जा रही थी कि भविष्‍य में रिंकी ध्‍यान रखे कि उसे गिरीश से क्‍या पूछना है और क्‍या नहीं।

 

ख़ैर… आखि़र पांच बजकर पैंतालीस मिनट पर गिरीश चले गये। रिंकी ने भी इस बात को ज्‍य़ादा हवा नहीं दी। इसमें कोई बुरा लगनेवाली बात है ही नहीं। वह चादर तानकर फिर से सो गई। दो दिन गिरीश नहीं थे सो रिंकी को किसी काम की जल्‍दी नहीं थी। दिन भी अपना और रात भी अपनी।

 

दो दिन बाद गिरीश आये। अच्‍छा-ख़ासा मूड लगा उनका। रिंकी भी चुप रही। वह कोई भी ऐसी बात नहीं करना चाहती थी की घर का माहौल बिगड़े। गिरीश ने आते ही कहा, ‘देखो, अब गुस्‍सा मत होना। मुझे अगले हफ्ते़ फिर से दिल्‍ली ही जाना होगा। कल दिल्‍ली में ही तय हो गया है।‘

 

रिंकी ने कहा, ‘आप दिल्‍ली जाते हैं तो अपने माता-पिता से मिलते हैं या नहीं?’ इस पर गिरीश ने आंखें मिलाये बिना कहा, ‘समय कहां मिलता है वहां जाने का। दो घंटे का रास्‍ता है। आने-जाने में ही पूरा दिन निकल जायेगा।‘

 

 

इस पर रिंकी ने सहमति जताते हुए कहा, ‘हां, इस बात का भी खयाल रखना होता है कि ये ऑफिशियल टूर हैं, कहीं कुछ ग़लत हो गया तो ऑफिस को उत्‍तर देना भारी पड़ जायेगा। ऑफिस के नियम के अनुसार आप दिल्‍ली से बाहर नहीं जा भी तो सकते।‘

 

इस पर गिरीश कुछ बोले नहीं और गर्दन झटककर वॉशरूम चले गये। इस बीच रिंकी के दिमाग़ में दिल्‍ली को लेकर हज़ारों सवाल और शंकाएं उमड़ने-घुमड़ने लगीं। कहीं गिरीश का दिल्‍ली में कोई चक्‍कर तो नहीं है?

 

दूसरी औरत….रिंकी के मन में यह सवाल जितनी जल्‍दी आया उतनी ही तेजी से रिंकी ने उसे दिमाग़ से निकाल फेंका। उसे लगा कि यदि इस तरह के विचारों को बढ़ावा दिया तो शक़ करने की आदत भी अपने आप पैदा हो जायेगी और उसे पता भी नहीं चलेगा।

 

सप्‍ताह का वह दिन भी आ गया जब गिरीश को फिर दिल्‍ली की फ्लाइट लेना था। हमेशा की तरह गिरीश फिर दिल्‍ली के लिये रवाना हो गये। दोपहर के समय रिंकी अपने बक़ाया काम पूरे कर रही थी कि मोबाईल की घंटी बज उठी। बेटे का फोन था।

 

उसने फोन उठाया, ‘बेटे कैसे हो? आज तुमने फोन कैसे किया? सब ठीक तो है?’ वह हंसते हुए बोला, ‘सारे सवालों का जवाब कैसे दूं? सब ठीक है। आप तो रोज़ फोन करती हो बिना नागा। सोचा कि आज मैं फोन कर लूं।‘

 

बेटे से ढेर सारी बातें कीं। दिल हल्‍का हुआ। घड़ी देखी तो शाम के चार  बजनेवाले थे। उसने सोचा कि आज मॉल पर जाया जाये और ज़ेब ढीली की जाये। सो उसने बिना किसी देर के हवाई चप्‍पल पहनीं और दरवाज़ा बन्‍द करके नीचे उतर गई।

 

टूर तो दो दिन का ही होता है और दो दिन बीतते दिन ही कितने लगते हैं। गिरीश दिल्‍ली टूर से रात को वापिस आये और आते ही सोफे पर लेट गये और बोले, ‘बहुत थक गया हूं। ये टूर भी बस, थका देते हैं और आंखें बन्‍द कर लीं।‘

 

रिंकी ने कहा, ‘इतनी भी क्‍या जल्‍दी है सोने की? दिल्‍ली का ट्रिप कैसा रहा? घर-परिवार से मुलाक़ात हुई?’ इस पर वे झुंझला गये और बोले, ‘आते ही सवालों की झड़ी लगा दी। किसीसे मुलाक़ात नहीं हुई। वैसे भी दिल्‍ली का नाम सुनकर तुम बिदक जाती हो।‘

 

रिंकी ने कहा, ‘कुछ तो ऐसा हुआ होगा न मेरे साथ दिल्‍ली में कि उस शहर के नाम मात्र से मेरे दिमाग़ की नसें तड़क जाती हैं। बिना वजह तो कुछ नहीं होता न। कभी मेरे मन की बात जानने की कोशिश की है आपने?

 

यह सुनकर गिरीश चुप हो गये। कोई भी तो जवाब नहीं था उनके पास। लेकिन उन्‍होंने हार मानना तो सीखा नहीं है सो बोले, ‘दिल्‍ली ने तुम्‍हारा क्‍या बिगाड़ा है जो उसके नाम से और वहां मेरे ऑफिशियली जाने पर भी इतनी चिढ़ जाती हो।‘

 

रिंकी ने बड़े सधी आवाज़ में उत्‍तर दिया, ‘दिल्‍ली को लेकर मेरे अनुभव सुखद नहीं हैं। यह आप अच्‍छी तरह जानते हैं। आपको याद है न कि हमारे पहले बेटे के जन्‍म के सवा महीने बाद आपने बड़े चाव से मुझे दिल्‍ली भेजा था कि आपके पिता खुश होंगे अपने पोते को देखकर।

 

… लेकिन खुश होने के बजाय उन्‍होने और आपकी मां ने फरवरी की भरी सर्दी में मुझे और बच्‍चे को पैसेज में सोने की जगह दी थी और ऐसी रजाई जिसमें से बच्‍चों के पेशाब की दुर्गंध आ रही थी।

 

… जब मैंने दूसरी रजाई मांगी तो कह दिया गया कि यह बच्‍चा भी पेशाब करेगा तो नई रजाई ख़राब हो जायेगी। इसी रजाई से काम चलाओ। मैं सुनकर सन्‍न रह गई थी। फिर बच्‍चे के कपड़े छत पर धोने के लिये कहा गया। ठंडे पानी से मेरे हाथ जकड़ जाते थे। वह भी किया।‘

 

इस पर गिरीश बोले, ‘पुरानी बातों को दोहराने से क्‍या फायदा? होता है ऐसा। ससुराल में ये सब बातें सामान्‍य हैं।‘ इस पर रिंकी बुरी तरह चिढ़ गई और बोली, ‘आपके घर में यह सब सामान्‍य होगा। मेरे लिये यह अपमान था।‘

 

रिंकी का क्षोभ इतना ग़हरा था कि वह क्‍या बोल रही है, इसका उसे भान तक नहीं है। गिरीश हैरान से देखे जा रहे थे। थे। रिंकी ने अब तक उन बातों को याद रखा है, उनको आश्‍चर्य हुआ।

 

वह कहे जा रही थी, ‘ वे लोग हमारे माता-पिता बनने से वे खुश नहीं थे, यह संकेत भी था। मैं यह सब नहीं भूल सकती। ये बातें मेरे दिल पर लिख गई हैं। जब कभी उन लोगों से मिलती हूं, वे सारी बातें चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम जाती है।‘

 

दिल्‍ली में बहुओं को जला दिया जाता है, यह ख़बर आये दिन टी वी पर देखने और सुनने को मिलती थीं। एक बार तो एक व्‍यक्ति को दिखाया गया जो अपनी पत्‍नी के शरीर पर शराब डालकर आग लगाता था, वह भी एक साथ नहीं, रुक-रुककर ।

 

वह सीन आज भी रिंकी को भूल नहीं पाता। वह ख़ुद को उस जगह रखती है तो कांपकर रह जाती है। दिल्‍ली के लोगों की बेदिली को टी वी पर देखते-देखते रिंकी ने तय कर लिया था कि वह कभी दिल्‍ली नहीं जायेगी बसने के लिये और संयुक्‍त परिवार में तो बिल्‍कुल नहीं।

 

उसका दिल और कड़वाहट से भरे, उसके पहले ही उसने स्‍वयं को उन तक़लीफभरे दिनों से बाहर निकाला और गिरीश से कहा, ‘इस बात का विश्‍वास करो कि मैं  अपने माता-पिता से हमेशा नहीं मिलता। तुम तो कहती हो पर मैं ही नहीं जाता।‘

रिंकी ने गिरीश का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘अच्‍छा करते हैं एक तरह से। अब आपका अपना परिवार है। कोई भी पसन्‍द नहीं करता कि बेवज़ह जाकर किसीको परेशान किया जाये।‘

 

इस पर गिरीश बोले, ‘ मुझे आश्‍चर्य होता है कि तुम शादी के बाद दो दिनों के लिये भी अपने मायके नहीं गईं रहने के लिये। क्‍या तुम्‍हें ऐसा नहीं लगता कि तुम्‍हें जाना चाहिये? उन्‍हें भी तो लगता होगा कि तुम उनके पास जाकर रहो।’

 

 

इस पर वह सिर्फ़ इतना ही बोली, ‘मेरे माता-पिता बहुत समझदार हैं। उनको परिवार का अर्थ सही मायनों में पता हैं। उन लोगों को बिल्‍कुल नहीं पसन्‍द कि बिना वजह बोरिया बिस्‍तर लेकर पहुंच जाओ। ‘

 

गिरीश ने एक अंगड़ाई लेते हुए कहा, ‘ वह तो ठीक है पर यह भी सच है कि अब तुम्‍हारे लिये अपने परिवार को तो छोड़ नहीं सकता। वैसे भी उनको छोड़कर तुम्‍हारे साथ रह रहा हूं। खून के रिश्‍ते हैं, उन्‍हें छोड़ना मुमकिन नहीं।‘

 

इस पर रिंकी ने कहा, ‘हर बात का उल्‍टा अर्थ क्‍यों लगा लेते हैं? आपके ये खून के रिश्‍ते मुझे बड़े भारी पड़ रहे हैं। रही बात, साथ रहने की तो आप मेरे साथ रहकर भी मेरे साथ नहीं हैं। आप वहां जाते नहीं हैं पर अवचेतन में तो वहीं रहते हैं।‘

 

इस पर गिरीश ने कहा, ‘तुम्‍हारे शक़ की आदत का कोई इलाज नहीं है। मैं कुछ नहीं बताता, इसका यह मतलब नहीं कि मैं झूठ बोलता हूं। मेरी अपनी भी तो कोई ज़िन्‍दगी है जहां तुम्‍हारे अलावा और भी लोग हैं।‘

 

रिंकी ने बात को संभालते हुए कहा, ‘मैंने शक़ नहीं किया पर जब आप मुझसे आंख मिलाकर बात नहीं करते तब शक़ का कीड़ा ज़रूर कुलबुलाता है कि कहीं मेरे पति को झूठ बोलने की आदत पड़ती जा रही?’

 

इस बातचीत के बाद पन्‍द्रह दिन तो ठीक बीते। सोमवार को गिरीश ने ऑफिस से फोन किया, ‘सुनो, मुझे आज शाम को सीधे ऑफिस से ही चेन्‍नई जाना है। तुम एयरपोर्ट पर मेरे बैग में दो दिन के कपड़े लेकर आ जाओ।‘

 

रिंकी ने गिरीश के कपड़ों का बैग तैयार किया और शाम पांच बजे एअरपोर्ट पहुंच गई। गिरीश एअरपोर्ट पहुंच गये थे। रिंकी ने उनको बैग दिया। वे बोले, ‘देखो, मैं चेन्‍नई जा रहा हूं। चाहो तो टिकट दिखा सकता हूं।‘

 

रिंकी बात को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं थी। सो बाय करके वह एअरपोर्ट से वापस घर के लिये चल दी। घर आकर आकर उसने एक कप चाय पी। न चाहकर भी उसका ध्‍यान दिल्‍ली के बारे में सोचने लगा।

 

वह उन कारणों का पता लगाने लगी जो गिरीश को दिल्‍ली की ओर टूर के बहाने ले जाते थे। नौकरी का मामला था, इसलिये कुछ कह भी नहीं सकती थी। रिंकी अपनी इस बात से ख़ुद भी परेशान रहती है कि वह सोचती बहुत है।

 

जिन बातों को लेकर वह परेशान होती है, उन बातों का सामनेवाले पर कोई असर नहीं होता। वह मस्‍त रहता है और रिंकी पर ‘काजीजी दुबले क्‍यों? शहर के अंदेशे से’ वाली कहावत पूरी तरह से चरितार्थ होती है।

 

ख़ैर… दो दिन बाद गिरीश वापिस आये और साथ ही एक टूर का संदेशा भी। बोले, ‘देखो रिंकी, टूर कोई मुझसे पूछकर तय नहीं करता। तुम्‍हारी मर्जी़ के खिलाफ़ मुझे रविवार को फिर दिल्‍ली ही जाना है।‘

 

रिंकी ने कुछ कहे बिना सिर्फ़ नज़र उठाकर देखा। यह गिरीश को कैसे ग़वारा होता? रिंकी और कुछ कैसे बोली नहीं।

 

सो बोले, ‘अब घूरने की तो ज़रूरत है नहीं। वहां के ऑफिसर्स को मेरे काम करने का तरीका बहुत पसन्‍द है। सो नो चॉइस पर एक बात कहता हूं शाम को तो पहुंचूंगा तो गेस्‍ट हाउस में आराम करूंगा। पर तुम फोन मत करना। मैं ही कर लूंगा।‘

 

रिंकी ने इस बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। वह चुप रही। गिरीश को जाना था तो जाना ही था। रविवार को वे दोपहर की बारह बजकर बीस मिनट की फ्लाइट से रवाना हो गये।

 

दिल्‍ली पहुंचकर गिरीश ने फोन किया, ‘ मैं दिल्‍ली पहुंच गया हूं। गेस्‍ट हाउस की ओर जा रहा हूं। पहुंचकर फोन करता हूं।‘ रिंकी का दिल आशंका और शंका से विचलित हो रहा था। कारण उसे भी पता नहीं।

 

अन्‍तत: शाम को पांच बजे फोन आया, ‘रिंकी, मैंने थोड़ा आराम कर लिया है। अभी कुछ लोग मिलने आयेंगे, सो तुम फोन मत करना। फ्री होकर मैं करूंगा।‘ रिंकी ने कहा, ‘ठीक है। मैं तुम्‍हें डिस्‍टर्ब नहीं करूंगी। जब समय मिले, फोन कर लेना।‘

 

रिंकी का मन नहीं माना तो उसने शाम सात बजे फोन किया। गिरीश ने फोन उठाया और तनिक गुस्‍से से बोले, ‘मैं फोन करनेवाला था। चैन नहीं है क्‍या?’ रिंकी ने सॉरी कहकर फोन रख दिया।

 

रिंकी की आंखों में पानी भर आया। उसने सोचा कि वह क्‍यों इतनी केयर करती है गिरीश की, जबकि उन्‍हें इस बात की बिल्‍कुल चिन्‍ता नहीं है कि वह उनकी अनुपस्थिति में क्‍या करती है। खाना भी ढंग से खाती है या नहीं।

 

रिंकी को तो अब इस उपेक्षा की आदत पड़ गई है। अब तो हालत यह है कि जब य‍ह उपेक्षा नहीं मिलती तो हैरान होती है। रात को गिरीश का फोन आया, ‘जो लोग मिलने आये थे, वे चले गये हैं। मैं बहुत थक गया हूं। अब सोने जा रहा हूं। सुबह बात करते हैं।‘

 

रिंकी ने घड़ी देखी। अभी तो नौ ही बजे हैं। ये तो इतनी जल्‍दी सोते नहीं हैं। रिंकी विचारों के चक्रव्‍यूह से स्‍वयं को निकालने की कोशिश कर रही थी। उसने इधर’उधर करवट बदली। उसे याद आया कि घर से दूर रह रहे बेटे से बात नहीं की है।

 

उसने बेटे का नंबर डायल किया, और मोबाईल को कान से चिपका लिया। वहां से फोन उठाया गया और बेटे की आवाज़ सुनाई, ‘मम्‍मी, मैं सोच ही रहा था कि आपका दो दिन से फोन नहीं आया। तबियत तो ठीक है?’

 

रिंकी ने कहा, ‘हां बेटे, सब ठीक है। तुम्‍हो पापा आये दिन दौरे पर रहते हैं, बस कपड़ों के बैग ही बदलती रहती हूं1 ‘ इस पर वहां से हंसने की आवाज़ आई और बोला, ‘आपको फोन करना अच्‍छा लगता है। आप अपना टाईम फोन पर पास कर लिया करो। चलो, मम्‍मी, गुडनाइट।‘

 

रिंकी ने बेटे को गुड नाइट कहा और एक बार फिर अकेली। वह फोन करने के लिये बहुत बदनाम है कि कोई उसे फोन करे न करे पर वह अपने मित्रों को, रिश्‍तेदारों को फोन करके हाल-चाल पूछती रहती है।

 

इस तरह अपनी दुनिया में, अपने विषय में सोचते-विचारते आंखें उनींदी होने लगीं परन्‍तु पता नहीं किस कारण से आंखें बन्‍द नहीं हो रही थीं। सैंकड़ों विचार, कुविचार मन में आ जा रहे थे। आख़िर में उसने फ्रीजर में से ठंडी पट्टी निकाली और आंखों पर रखी।

 

कुछ ही समय में ठंडी पट्टी का ठंडापन ख़त्‍म हो गया और आंखों को नींद ने घेर ही लिया। अचानक रिंकी को फोन बजने की आवाज़ सुनाई दी। उसने दो-एक बार ध्‍यान से सुना तब जाकर उसे भरोसा हुआ कि यह तो उसीका फोन है1

 

एक तो इतनी मुश्‍किल से नींद आई थी। किस निगोड़े को इस बेवक्‍त़ रिंकी की याद आ गई। घड़ी देखी तो रात का एक बजा था। उसने फोन उठाया। वहां से आवाज़ आई, ‘आप कौन हैं?’

 

रिंकी ने उनींदी आवाज़ में कहा, ‘फोन आपने किया है। आपको पता होना चाहिये कि आपको किससे बात करना है।‘ वहां से आवाज़ आई, ‘आप रिंकी हैं?’ अब रिंकी के कान सतर्क हो गये। बोली, ‘जी कहिये। आप कौन हैं?’

 

‘मैं डॉक्‍टर वासुदेवन हूं। आपके पति गिरीश और उनके पिता का एक्‍सीडेंट हो गया है। बहुत सीरियस एक्‍सीडेंट है। आप जितनी जल्‍दी हो सके, दिल्‍ली आ जाईये। पेपर साइन करवाने हैं।‘

 

- मधु अरोड़ा

  • कृतियां:
  • ‘बातें’- तेजेन्द्र शर्मा के साक्षात्कार- संपादक- मधु अरोड़ा, प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर।
  • ‘एक सच यह भी’- पुरुष-विमर्श की कहानियां- संपादक- मधु अरोड़ा, प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • ‘मन के कोने से’- साक्षात्‍कार संग्रह, यश प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • ‘..और दिन सार्थक हुआ’- कहानी-संग्रह, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली।

  • सन् 2005 में ओहायो, अमेरिका से निकलनेवाली पत्रिका क्षितिज़ द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्‍मान से सम्‍मानित।
  • ‘रिश्‍तों की भुरभुरी ज़मीन’ कहानी को उत्‍तम कहानी के तहत कमलेश्‍वर स्‍मृति कथा पुरस्‍कार—2012
  • हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, परिकथा, पाखी, हरिगंधा, कथा समय व लमही, हिमप्रस्‍थ, इंद्रप्रस्‍थ पत्रिका में कहानियां प्रकाशित।
  • जन संदेश, नवभारत टाइम्‍स व जनसत्‍ता जैसे प्रतिष्‍ठित समाचारपत्रों में समसामयिक लेख प्रकाशित।
  • आकाशवाणी से प्रसारित और रेडियो पर कई परिचर्चाओं में हिस्सेदारी। हाल ही  में विविध  भारती,  मुंबई में दो कहानियों की रिकॉर्डिंग व प्रसारण। मंचन से भी जुड़ीं।
    जन संपर्क में रूचि।
  • कथा यू के की गत अठारह वर्षों से सक्रिय कार्यकर्ता व मुंबई प्रतिनिधि।

 

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