रामबाडा बह गया

उत्तराखण्ड में आयी भारी तबाही को हम सब जानते हैं। उसी तबाही के समय पवित्र धाम केदारनाथ के पास एक छोटे से गांव की बुजुर्ग विधवा रामदेयी के दुख की गाथा है ये छोटी सी कविता -

 
रामबाडा बह गया
रात भर जागती रही बुजुर्ग रामदेयी
मन रह-रह कर घबरा रहा था
बाहर जबरदस्त अंधड चल रहा था-जबरदस्त तूफान था
बादल गरज-गरज कर बरस रहा था-
सब बांध तोड कर।
एकाएक बिजली चली गयी
एक गहरी हूक सी उठी राम देयी के मन में,
उसे याद आया, ऐसी ही एक मनहूस रात थी
जब उसके बेटे की मृत्यु की खबर आयी थी।
दो बरस बाद बहू भी बिमारी के काल की ग्रास बन गई थी।
तब अपना सब दुख भूल नन्हे राजू को अपने आंचल में छुपा लिया था रामदेयी ने
उसके स्वर्गीय पुत्र की एकमात्र संतान था राजू
आज फिर इस तूफानी रात में रामदेयी
विगत से बाहर नही आ पा रही थी।
उसे याद आया, कितना समझाया था उसने राजू को
कितना क्रोधित भी हुई थी रामदेयी,
पर एक ना मानी थी राजू ने
अपनी जिद पर अडा रहा
तब हारकर रामदेयी ने अनुमति दे ही दी थी
और तब से केदारनाथ के पवित्र धाम पर तीर्थ यात्रियों को
खच्चर से पहुंचाने का ही तो काम कर रहा था राजू।
आज आंखे पथरा गई रामदेयी की बाट जोहते-जोहते
बार-बार दरवाजे की ओर देखती
द्वार खोल बाहर झांकती
घनघोर अंधेरे में कहीं कुछ न दिखाई देता।
फिर थके पैर भीतर चली आती
दिल धक से रह जाता रामदेयी का,
तेज बारिश में छप्पर भी पानी टपकाने लगा था।
रामदेयी उकडंू बैठ कर राजू की बाट जोहती रही
रात बीत गई।
प्रभात की पौ फटी ,
किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी,
रामदेयी को लगा, राजू आ गया।
अरे यह तो पुन्नु था, पडोसी का लडका
आते ही बोला- अम्मा रामबाडा बह गया
रामदेयी की आंखे शून्य में अटक गयी
मुख से निकला – रामबाडा बह गया!
पुन्नु ने पास आकर देखा-रामदेयी की नब्ज थम चुकी थी
अनगिनित आंखों के आंसू बहते रहे, मंदाकनी में मिलते रहे
रामबाडा बह गया—-रामबाडा बह गया।

 

 - डॉ नीलम राठी

डी लिट की उपाधि प्राप्त

एसोसिएट प्रोफेसर  ,अदिति महाविद्यालय  ,यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली
आठ प्रकाशित पुस्तकें , अनेक लेख और कवितायें
देश विदेश में अनेक राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय सम्मेलनों मे भाग लेना और आलेख प्रस्तुति


राधा कृष्णन अवार्ड,पंजाब राव देशमुख अवार्ड,उदय सम्मान, उत्तम शिक्षक अवार्ड, काव्य भारतीअवार्ड,साहित्य सरिता सम्मान,प्रो विनोद प्रसाद स्मृति सम्मान आदि से पुरस्कृत।

मौरिसस,तास्कंद,लंदन,जोहन्स्बर्ग आदि की शैक्षिक यात्राएं।

One thought on “रामबाडा बह गया

  1. मार्मिक रचना। प्रकृति के आगे हम नतमस्तक हैं। वह हमें पालती पोसती है लेकिन उसका रौद्र रूप सब कुछ लील जाता है। यह रचना उसी व्यथा की अभिव्यक्ति है। इस हृदय स्पर्शी रचना के लिए नीलम जी को साधुवाद। आपका चयन सम्पादन बेहतर है।

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