राजभाषा हिन्दी और उसका विकास

देश में बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि जिस प्रकार आज हम विदेशी भाषा – अंग्रेजी के प्रभाव से आक्रांत हो कर स्वदेशी भाषाओं की उपेक्षा कर रहे हैं, उसी प्रकार किसी समय इंग्लैंड भी फ्रेंच के प्रभाव से इतना ही प्रभावित था और वहां का सारा का सारा सरकारी काम फ्रेंच में होता था. हमारे देश की ही तरह वहां भी उच्च वर्ग के लोग अंग्रेजी में बात करना अपनी शान के खिलाफ समझते थे। लेकिन आगे चल कर कुछ महान व्यक्तियों के सामुहिक प्रयास के चलते फ्रेंच के स्थान पर अंग्रेजी को लागू किया गया. हालांकि उसका भारी विरोध होता रहा और उसके विपक्ष में वे सारे तर्क दिये गये, जो आज हमारे यहां हिंदी के विरोध में दिये जा रहे हैं। फिर भी कुछ राष्ट्रभाषा – प्रेमी अंग्रेजों ने विभिन्न प्रकार के उपायों से अंग्रेजी का मार्ग प्रशस्त किया.

यदि अंग्रेजी की तूलना हिन्दी से करें तो इन दोनों की कहानी हमें लगभग समान ही प्रतीत होगी बस क्लाइमेक्स में परिवर्तन दिखेगी. दोनों में अनेक समानताएं हैं- पहला – दोनों ही भाषाएं अपने-अपने देशों की अत्यंत बहुप्रचलित भाषाएं थीं, फिर भी विदेशी भाषा-भाषी लोगों के प्रशासन काल में दोनों का ही पराभव होना आरंभ हुआ. दूसरा विदेशी भाषा के प्रभाव से दोनों ही देशों के लोग इतने अभिभूत हो गये कि वे स्वदेशी भाषा को अत्यंत हेय एवं उपेक्षा योग्य मानते हुए उसमें बात करना भी अपनी शान के खिलाफ समझने लगे। तीसरा विदेशी शासकों के प्रति विद्रोह की भावना एवं स्वभाषा के प्रति अनुराग की प्रेरणा से ही अँग्रेजी और हिंदी के पुन: अभ्युत्थान की प्रक्रिया आरंभ हुई। चौथा दोनों ही देशों में पार्लियामेंट द्वारा स्वदेशी भाषाओं को मान्यता मिल जाने के बाद भी उनका व्यवहार प्रयोग बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ा। पांचवा – विदेशी भाषा के समर्थकों ने जहां एक ओर तो उसकी अभिव्यंजना-शक्ति और साहित्यिक-समृद्धि का गीत गाते रहे, वहीं दूसरी ओर स्वदेशी भाषा की हीनता की अभिव्यक्ति करते रहे.

यदि हम अंग्रेजी भाषा के इतिहास को देखें इसमें कुछ चौका देने वाली घटनाएं घटित हुई हैं. अंग्रेजी के समर्थकों ने बिना ज्यादा सोचे अंग्रेजी को अपने देश का राजभाषा बना दिया. जबकि उनके पास अंग्रेजी भाषा में कोई सामग्री नहीं थी. लेकिन जैसे ही अंग्रेजी को राजभाषा व राष्ट्रभाषा बनाया गया अपने-आप ही सारे सामग्रियों का अनुवाद फ्रेंच से अंग्रेजी में होने लगा और देखते ही देखते सारा सामग्री उनके पास अंग्रेजी में हो गया. जबकि हम ये सोचते रहे कि हमारे पास तो सामग्री ही नहीं है तो हिन्दी को कैसे सम्पूर्ण रूप से हिन्दी को राजभाषा बनाया जाए. इसीलिए हमने अंग्रेजी और हिन्दी दोनों को राजभाषा बनाया और साथ ही यह प्रण भी किया कि हिन्दी का हम ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करेंगे और जब चारों ओर हिन्दी का प्रचार-प्रसार हो जाएगा उसके बाद ही हिन्दी को देश का एकमात्र राजभाषा बनाएंगे. ये तो वही बात हुई कि पहले हम तैरना सीखना चाहते हैं, और उसके बाद ही पानी में उतरेंगे, जबकि वास्तविकता का क्रम इससे उलट है।
हमारे देश में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिए जिन मार्गों को चुना गया है मैं इनका बहिष्कार तो नहीं करता क्योंकि वर्तमान में वाकई में हिन्दी की स्थिति में सुधार हुआ है. सरकार राजभाषा हिन्दी के प्रचार के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं चला रही है. यदि योजनाओं में कुछ और योजनाओं को शामिल कर लिया जाए तो जल्दी ही हम अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं क्योंकि राजभाषा का प्रचार-प्रसार केवल नियमों के अनुपालन से संभव नहीं है. इसके प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए हमें कुछ और नये आयामों को आज़माना आवश्यक है. हमें सदैव ही यह महसूस होता है कि हिन्दी में सामग्रियों की कमी है और इस कमी को पूरा करने से ही राजभाषा हिन्दी को पूरे देश की भाषा बनाया जा सकता है. यह सच है कि आज कविता और कहानी को छोड़कर अन्य विषयों जैसे विज्ञान, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर, विधि आदि पर हिन्दी में नाम मात्र की किताबें हैं. क्यों न सरकार इस ओर अपना ध्यान आकर्षित करते हुए हिन्दी में सामग्रियों को बढ़ाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए. जैसे सभी शैक्षणिक संस्थानों में जैसे सभी एनआईटी, आईआईटी, आईआईएम, डिज़ाइन, मेडिकल संस्थानों, सभी विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग की स्थापना की जाए जिसमें कम से कम दो फैकल्टी की नियुक्ति की जाए जिसका मुख्य कार्य उस संस्थान की महत्वपूर्ण किताबों का अनुवाद करना होगा. साथ ही अनुवाद के क्षेत्र में कुछ प्रोत्साहन योजनाएं चलाए जाएं. प्रत्येक संस्थान में यदि ऐसा होता है तो मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे पास हिन्दी किताबों का विशालकाय संग्रह होगा और हिन्दी को एकमात्र राजभाषा बनाने में सहयोग प्राप्त होगा.

- डॉ. दिनेश कुमार प्रसाद

हिन्दी अधिकारी
राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान
अहमदाबाद , भारत 

 

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