राजधानी में प्रवासी कहानी पाठ एवं चर्चा

 

हिंदी की दो वरिष्ठ और  दिग्गज लेखिकाओं ने अपने आत्मीय कहानी पाठ से, राजधानी दिल्ली की एक अनौपचारिक किन्तु प्रबुद्ध गोष्ठी में, प्रवासी जीवन से जुड़े कुछ ज्वलंत सवाल तो उठाये ही, मुख्य धारा के तहत लिखी जा रही कहानियों और समकालीन आलोचना की स्थिति पर भी गहरी टिप्पणी की. यह गोष्ठी कवि कथाकार पंखुरी सिन्हा के घर पर संपन्न हुई. कहानियों के पाठ के बाद, उपस्थित विद्वानों मदन कश्यप, डॉ सत्यकेतु संकृत, और अजय नावरिया ने अपनी विस्तृत आलोचनात्मक टिप्पणियों से परिचर्चा को आकार और विस्तार दिया। इस बहस में, पंखुरी और अलका सिन्हा ने जमकर हस्तक्षेप किया, शोभा रस्तोगी और प्रतिभा ने थोड़ी बहुत शिरकत की. जहाँ सुषम जी ने अपने संग्रह ‘चिड़िया और चील’ से ‘बीच की भटकन’ शीर्षक कहानी का पाठ किया, वहीं दिव्या जी ने अपने संग्रह ‘हिंदी@स्वर्ग.इन’ से ‘फ़िक्र’ शीर्षक कहानी का पाठ किया।

कहना न होगा कि दोनों लेखिकाएँ, प्रवासी लेखन की हस्ताक्षर कलम रखती हैं, और आज भी उसके तेवर तय कर रही हैं. हालाकि सुषम जी ने पहले ही ये घोषणा कर दी कि वो एक पुरानी कहानी का पाठ करेंगी, १९७८ की लिखी, लेकिन प्रश्नोत्तर काल में ये बात लगभग तय हो गयी कि हम एक साथ समय के कई चेहरों से मुखातिब हैं. हालाकि मदन कश्यप ने वर्ग भेद की बड़ी सटीक बात उठायी, लेकिन सुषम जी की कहानी में वर्णित मूल्यों, मानसिकताओं और वर्जनाओं से न तो आज का प्रवासी जीवन मुक्त हो पाया है, न देशी संसार। ऐसा नहीं कि वह एक रूढ़ि ग्रस्त परिवार की कहानी है अथवा केवल एक लड़की की आज़ादी की तलाश की.

एक बहुत ही सधी हुई, बारीक़ तारों से बुनी कहानी की तरह, यह कहानी भी समय और अर्थ की अनेक तहों को समेटे है. वीना अपने पति की विदेशी पोस्टिंग के शहर में, पूरी तरह अपनी गृहस्थी जमा चुकी है जब बेबी उसके पास आती है. अब कहने को तो हज़ार बातें हैं, लेकिन सारी बातों का सार यही कि बेबी देश लौटना नहीं चाहती। बेबी बेबी सिटींग करने को उद्यत है, कोई भी ऑड जॉब, और फिर एक बारमैन है, जिसके साथ ज़िन्दगी निभाने की बात के उठते ही, परिवार का सारा रुतबा, उसकी ठसक, सारी भारतीयता का सवाल सबसे बड़ा हो जाता है.  कहानी कुछ लाजवाब सवाल उठाती है, और फलक पर उकेर कर रख देती है. बेबी क्यों अपने जीजा के समझाने पर मान जाती है और बार मैन को ब्याहने का ख्याल त्याग देती है?

डॉ सत्यकेतु संकृत ने कहा कि कहानी का अंत खुले कपाटों वाला है, जो निर्णय पाठकों पर छोड़ देता है, और यह कहानी को अतिरिक्त गरिमा प्रदान करता है. पंखुरी ने कहा कि इस अंत की एक ख़ूबसूरत सी झलक शुरुआत में ही मिलती है. कहानी बड़े मासूम वार्तालाप के साथ शुरू होती है, जहाँ बड़ी बहन वीना कुछ हतप्रभ सी, यह ग़ौर करती है कि एक पाकिस्तानी कपड़े के व्यापारी के फ्रैंकफर्ट से अक्सर आने वाले फोन पर बातें करते, वह बहुत उत्साहित है, तो बेबी जवाब देती है कि उस पाकिस्तानी का जन्म उसी शहर में हुआ था जहाँ दीदी वीना का! यही इस कहानी की प्रासंगिकता सबसे ज़्यादा छलक आती है, आज भी लड़कियों की शादियों में दो बहनों का अलग भाग्य तय हो जाता है!

प्रवासी लेखन और प्रवासी जीवन दोनों ही के सन्दर्भ में महिला अधिकारों की लड़ाई एक चल रही लम्बी यात्रा है, दिव्या जी की कहानी ने इस बात को साबित कर दिया। अपनी माँ की मृत्यु के बाद, इकलौती, नकचढ़ी राशि अपनी नयी माँ को बिल्कुल नहीं स्वीकार कर पाती। लेकिन, बात यहाँ समाप्त नहीं होती। नयी माँ, प्रिया की दिनचर्या पिता पुत्री के पसंदीदा भोजन बनाने से लेकर, उनके चड्डी बनियान धोने तक तो है, लेकिन उनके साथ टीवी के आगे बैठ गप करने में वह शामिल नहीं की जा रही. कहानी में विदेशी पड़ोसिनी की मदद, एक सार्थक मोड़ है. प्रिया उस पड़ोसन के सहारे अपने गर्भ को बचाने के लिए खड़ी हो जाती है, और कहानी इस सवाल में परिणत हो, अपने चरम बिंदु को पहुँचती है कि आखिर राशि का नए बच्चे के प्रति रवैया क्या होगा?

हालाकि राशि और प्रिया के बीच की भयानक खाई को, मदन जी ने वर्ग भेद के लिहाजन विवेचित किया, लेकिन यह औरत की कहानी की सम्पूर्ण विडम्बना नहीं, न उसका पूरा सच है. कहानी पर टिप्पणी करने वालों में अजय नावरिआ पहले थे, जिन्हें २४ की शाम को दलेस की मीटिंग में जाने की जल्दी थी. और कहानी की आलोचना करते, बड़ी सटीक बातें उन्होंने उठाई कि जिस विदेशी चका चौंध के पीछे हम इतने पागल हैं, वहां के अर्थ तंत्र और राजकीय व्यवस्था के भ्रष्टाचार को क्या नहीं देख पा रहे? ये उन्होंने कुबूला कि लड़कियां विदेश जाने को उतावली हैं, और बच्चे की माँ बनने वाली प्रिया, ओल्ड एज होम में नौकरी कर, अपने बल बूते विदेश में नौकरी कर रह लेने की घोषणा करने को तत्पर, उनकी जिरह रही कि देश को हमेशा प्रवासी अवचेतन के केंद्र में होना चाहिए। हालाकि आलोचकों में यह सहमति बनी, कि प्रवासियों में नास्टैल्जिया का अब बस एक भ्रम है, पंखुरी ने यह कह प्रतिवाद किया कि इस जुड़ाव के सबूत के रूप में विदेश से आने वाले पैसे से कहीं ज़्यादा की आवाजाही है, यानि कोई नहीं भूलता स्वदेश! आमंत्रित साहित्यकारों का संक्षिप्त परिचय पंखुरी सिन्हा ने दिया, और परस्पर धन्यवाद ज्ञापन के क्रम में ही, गोष्ठी का समापन हुआ.

 

- पंखुरी सिन्हा

संपर्क—-नई दिल्ली

शिक्षा —एम ए, इतिहास, सनी बफैलो,
पी जी डिप्लोमा, पत्रकारिता, S.I.J.C. पुणे,
बी ए, हानर्स, इतिहास, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय,

अध्यवसाय—-BITV, और ‘The Pioneer’ में इंटर्नशिप,
—- FTII में समाचार वाचन की ट्रेनिंग,
—– राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता,

प्रकाशन—–-हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, बया, मंतव्य, आउटलुक, अकार, अभिव्यक्ति, जनज्वार, अक्षरौटी, युग ज़माना, बेला, समयमान, अनुनाद, सिताब दियारा, पहली बार, पुरवाई, लन्दन, पुरवाई भारत, लोकतंत्र दर्पण, सृजनगाथा, विचार मीमांसा, रविवार, सादर ब्लोगस्ते, हस्तक्षेप, दिव्य नर्मदा, शिक्षा व धरम संस्कृति, उत्तर केसरी, इनफार्मेशन2 मीडिया, रंगकृति, हमज़बान, अपनी माटी, लिखो यहाँ वहां, बाबूजी का भारत मित्र, जयकृष्णराय तुषार. ब्लागस्पाट. कॉम, चिंगारी ग्रामीण विकास केंद्र, हिंदी चेतना, नई इबारत, सारा सच, साहित्य रागिनी, साहित्य दर्पण, करुणावती साहित्य धारा, मंतव्य आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें प्रकाशित, दैनिक भास्कर पटना में कवितायेँ एवं निबंध, हिंदुस्तान पटना में कविता एवं निबंध,
हिंदिनी, हाशिये पर, हहाकार, कलम की शान, समास, गुफ्तगू, उमंग, साहित्य उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं, ब्लौग्स व वेब पत्रिकाओं में, कवितायेँ तथा कहानियां, प्रतीक्षित

किताबें —– ‘कोई भी दिन’ , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, २००६
‘क़िस्सा-ए-कोहिनूर’, कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, २००८
‘प्रिजन टॉकीज़’, अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, २०१३
‘डिअर सुज़ाना’ अंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, २०१४
पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह ‘काव्य शाला’ में कवितायेँ सम्मिलित
हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘प्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित
विजेंद्र द्वारा सम्पादित और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘शतदल’ में कवितायेँ शामिल
रवींद्र प्रताप सिंह द्वारा सम्पादित कविता संग्रह ‘समंदर में सूरज’ में कवितायेँ शामिल
गीता श्री द्वारा सम्पादित कहानी संग्रह ‘कथा रंग पूरबी’ में कहानी शामिल

‘रक्तिम सन्धियां’, साहित्य भंडार इलाहाबाद से पहला कविता संग्रह, २०१५

पुरस्कार— राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड २०१३

पहले कहानी संग्रह, ‘कोई भी दिन’ , को २००७ का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान
——’कोबरा: गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे १९९८ -99९९ के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला

—— ‘एक नया मौन, एक नया उद्घोष’, कविता पर,१९९५ का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार,
—— १९९३ में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान

 

अनुवाद—-कवितायेँ मराठी में अनूदित,
कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ,
उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,

सम्प्रति—-
पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’,
एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम,
और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’,
साथ में, हिंदी और अंग्रेजी में कविता लेखन

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>