ये दुनिया के बदलते रिश्ते…

एक बार फिर लू, अंधड़ और चिलचिलाती गर्म दोपहरी से भरी गर्मी की छुट्टियाँ आ गई…। बच्चे खुश…थोड़ा बहुत बच्चों की माएँ भी खुश…चलो, एकदम सुबह-सुबह उठ कर टिफ़िन बनाने की झंझट कुछ दिनों के लिए कटी…। पर दो-चार दिनों की इस देर की नींद के बाद बच्चों का तो नहीं, पर माताओं का रोना चालू हो जाता है…। घर पर बच्चे रहते हैं तो जीना हराम कर देते हैं। जब तक लाइट आती है, तब तक तो ठीक है…पर बिजली विभाग की अघोषित कृपा होते ही चिल्लपों शुरू…। खाने-पीने के लिए तो दिन भर परेशान करते ही रहते हैं, ऊपर से दिन भर ये ‘बोर-बोर’ का नाटक और…। समझ नहीं आता कि अपने नन्हें-मुन्नों की इस बोरियत को कैसे दूर किया जाए…। ऐसे में माताएँ अक्सर मनाती हैं कि स्कूल जल्दी ही खुल जाएँ…। इस धमाचौकड़ी को झेलने से बेहतर तो सुबह की नींद क़ुर्बान कर देना है…।

आज सिर्फ़ माएँ ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी कई बार छुट्टी होने पर वो खुशी नहीं महसूस कर पाते जो हम लोग मार्च-अप्रैल से ही महसूस करने लगते थे। महीनों पहले से किताबों का कलेक्शन शुरू हो जाता था। माँ से चिरौरी कर कर के किताबें खरीदी जाती थी, इस वादे के साथ कि उनको इम्तहान ख़त्म होने के बाद छुट्टियों में ही हाथ लगाया जाएगा। चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ लम्बी-लम्बी चिठ्ठियों का आदान-प्रदान शुरू हो जाता था। प्लान बनने लगते थे कि कौन किसके यहाँ इस छुट्टी में आ रहा या जा रहा…। अगर कोई आ रहा होता तो ठीक वरना खुद तो जाना ही जाना होता था…। कभी ददिहाल में दादा-दादी से मिलने ताऊ-चाचा के यहाँ…कभी किसी मामा-मौसी के घर…नाना-नानी के प्यार की छाँव में…। सबसे ज़्यादा खुशी इस बात की होती थी कि नानी-दादी के सामने माँओं का ज़ोर नहीं चल पाता था…। शरारतें करो और भाग के उनकी शरण में पहुँच के उनकी गोद में मुँह छिपा कर सो जाओ…। पिर माँ की क्या मज़ाल जो डाँट या मार सकें…। वैसे भी ढेर सारे बच्चों के बीच किसी बदमाशी में किसकी बुद्धि का हाथ होता था, ये अन्त तक साबित नहीं हो पाता था। घर पर जिन खाने-पीने की चीज़ों को देख कर नाक-भौं चढ़ाया जाता था, भाई-बहनों के साथ उन्हीं चीज़ों को छीन-झपट कर फ़टाफ़ट चट करके माँ को बड़ी आसानी से झूठा साबित कर दिया जाता था। माएँ लाख नानियों-दादियों को सफ़ाई देती कि घर पर उन चीज़ों को हाथ नहीं लगाया जाता तो वो क्या करें…। हम भोला-सा चेहरा बना कर बैठ जाते…अब इतना अच्छा बना पाए माँ तो भला क्यों नहीं खाएँगे…? तारीफ़ से फूल ,कर कुप्पा हुई मामियाँ-चाचियाँ-ताइयाँ हमारी बलैयाँ लेकर दुगुने उत्साह से हम लोगों की खातिरदारी में जुट जाती और माँएँ हमें ‘घर चलो, बताती हूँ बच्चू’ के अंदाज़ में खा जाने वाली नज़रों से घूरते हुए हथियार डाल कर नए ढंग से उस पुराने पकवान की रेसिपी जानने में लग जाती।

आज ये वक़्त लगभग बदल चुका है। अब न तो पहले की तरह छुट्टियों की वो बेफ़िक़्र मस्ती रही…न लिखे जाने वाले वो लम्बे ख़त…न किसी के घर जाने या उसके आने की वो बेसब्र प्रतीक्षा…। अब जिस दिन से छुट्टियाँ शुरू होती है, उसी दिन से ‘हॉलीडे होमवर्क’ को जल्द से जल्द पूरा करने की चिन्ता शुरू हो जाती है…। तमाम तरह के बेसिर-पैर के मिले हुए प्रोजेक्ट्स ‘करेला ऊपर से नीम चढ़ा’ की कहावत पूरी तौर से चरितार्थ करता है। बच्चे मस्त होकर छुट्टी बिताना भी चाहें तो स्कूल खुलते ही सामने खड़े यूनिट टेस्ट्स माओं की रातों की नींद उड़ा देते हैं…। उनकी नींद उड़ती है तो वो बच्चों का चैन छीन लेती हैं…। आँख खुलते ही ‘ये चैप्टर याद करो…ये पोएम पढ़ो’ की रट चालू…। अब जब किसी के आने के प्लान पता चलता है, मन में चिन्ता भी उसी दिन से घर कर लेती है…। उतने दिन बच्चे की पढ़ाई का नुकसान…इस बात का हिसाब सबसे पहले लगाया जाता है…। अब अपनों से मिलने की खुशी से ज़्यादा पढ़ाई के नुकसन का ग़म सताने लगता है। खुद के साथ भी यही हिसाब-किताब चलता है। मायके या ससुराल जाने से पहले जिनके बच्चे थोड़े बड़े हैं, उन्हें फोन करके पूछ लिया जाता है कि कहीं उस दौरान उस मेजबान के बच्चे की कोई परीक्षा तो नहीं…। मन में एक अनजाना भय सा हावी रहता है कि असमय पहुँच जाने का परिणाम कहीं बचे-खुचे रिश्ते में खटास के रूप में सामने न आ जाए। अगर अपने बच्चे या रिश्तेदार के बच्चे में से किसी का भी कोई इम्तहान होना हो तो जाने-आने का प्रोग्राम कैंसिल करना ही बेहतर लगता है। रिश्ते मिल कर निभाने की बजाए फोन या ईमेल्स के जरिए निभा लिए जाते हैं…। आपसी प्यार और भाईचारा एस एम एस या वाट्सएप और फ़ेसबुक के द्वारा ज़िन्दा रखने की कोशिश की जाती है…। अब तो इस व्यस्ततम दौर में फोन पर भी बात करने का समय नहीं रहता किसी के पास…। बहुत ज़्यादा कोई अजीज़ है तो उसके लिए स्काइप भी है…। पर सोचने की बात ये है कि जो प्यार…जो अपनापन आमने-सामने मिल कर…एक दूसरे के साथ रह कर पनपता था, विभिन्न एप्स या साइट पर मीठे-मीठे संदेसों के आदान-प्रदान के बावजूद क्या वो प्रेम उतनी शिद्दत से महसूस होता है…?

आज के आधुनिक युग में…हज़ारों ख़्वाहिशों के साथ जीने वाले हम लोगों के पास पहले से कहीं ज़्यादा खुशी के साधन मौजूद हैं…आराम देने वाली सुविधाएँ हैं…पर उनका उपभोग करने के लिए हमारे पास वक़्त नहीं…। दूर कहीं खुशी की छाँव तलाशती आँखें अपने क़रीब बिखरी पड़ी खुशियों को देखना ही भूल चुकी हैं…। कैरियर की गला-काट प्रतियोगिता में सबसे आगे निकलने की होड़ में हमने अपने हाथों से अपने बच्चों को अपने सकून का गला घोंटना सिखा दिया है…। आज दुनिया एक नन्हें से गैज़ेट के रूप में हमारी मुठ्ठी में है…पर हम जाने कब…चाहे-अनचाहे अपनी-अपनी दुनिया से दूर जा चुके हैं…।

 

-  प्रियंका गुप्ता

जन्म-       ३१ अक्टूबर, (कानपुर)

 शिक्षा-      बी.काम

 लेख़न यात्रा- आठ वर्ष की उम्र से लिख़ना शुरू किया,  देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

 विधा-       बचपन से लेखन आरम्भ करने के कारण मूलतः बालकथा बड़ी संख्या में लिखी-छपी,

                परन्तु बडी कहानियां, हाइकु,कविता और ग़ज़लें भी लिखी और प्रकाशित

 

कृतियां-             १) नयन देश की राजकुमारी ( बालकथा संग्रह)

                        २) सिर्फ़ एक गुलाब (बालकथा संग्रह)

                         ३) फुलझडियां (बालकथा संग्रह)

                         ४) नानी की कहानियां (लोककथा संग्रह)

                        ५) ज़िन्दगी बाकी है (बड़ी कहानियों का एकल संग्रह)  

 

 पुरस्कार-  1) “नयन देश …” उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा “सूर अनुशंसा” पुरस्कार प्राप्त

               2) “सिर्फ़ एक गुलाब” प्रियम्वदा दुबे स्मृति पुरस्कार-राजस्थान            

   3) कादम्बिनी साहित्य महोत्सव-९४ में कहानी “घर” के लिए तत्कालीन राज्यपाल(उ.प्र.)                    श्री  मोतीलाल वोहरा द्वारा अनुशंसा पुरस्कार प्राप्त

2 thoughts on “ये दुनिया के बदलते रिश्ते…

  1. ये दुनिया के बदलते रिश्ते·······
    पढ़ कर ऐसा प्रतित हुआ मानो मेरे बचपन की बात की जानकारी प्रियांका को कैसे मिली।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>