ये इश्क इश्क है, क्रिकेट इश्क

कभी छछिया-भर छाछ पर गोपियाँ गोपाल को नचाती हैं, तो कभी जीव को गोपाल नचाते हैं। आजकल गोपाल इतना नहीं नचाना चाहते हैं, जितना जीव नाचना चाहता है। नाचने के बहुत सारे मंच जो तैयार हो गए हैं। जिसे देखो कहीं न कहीं नाचने के लिए भागा जा रहा है। कुछ डर से नाच रहे हैं, तो कुछ प्रसन्न मन से नाच रहे हैं। कोई बाजार की सेल देखकर नाच रहा है, तो कोई गाड़ी का नया मॉडल देखकर नाच रहा है। एक नाच खत्म करता है, तो दूसरे नाच के लिए भाग लेता है। ऐसे ही मेरे एक मित्र मेरे आगे-आगे भागे जा रहे थे। आजकल वो समय तो है नहीं कि आदमी के पास समय ही समय हो। आप न भी रोको तो वो रुक जाए और आपसे बतियाने लगे। आजकल तो लोग या तो फेसबुक पर बतियाते हैं या फिर व्हॉट्स एप्प पर। आज का युग तो बेरुखी से गले मिलो युग है। मिलो तो गले लगकर चुम्मी का स्वर निकालो और बिछुड़ो तो भी ऐसा स्वर निकालो। शादी में मिलो तब भी ऐसे मिलो, शवयात्र में मिलो, तब भी ऐसे ही मिलो, बस चेहरे की कुछ मुद्रा बदल लो। बड़े-बड़े लोग ऐसे ही मिलते हैं।
मेरे पास आधुनिक खिलौने नहीं हैं, इसलिए मेरे पास समय ही समय है।
हाँ तो वे आगे-आगे जा रहे थे और मेरी ओर उनकी पीठ थी। कोई प्रगति-पथ पर आपके आगे जा रहा हो, तो कष्ट होता ही है। पर यदि कोई आपका विरोधी परेशानी के मार्ग पर बढ़ रहा हो तो? पीठ पीछे बुराई तो हो सकती है, पर चेहरे की मुद्रा को देखना हो तो आगे जाकर देखना पड़ता है या फिर पीछे से पुकारना होता है।
मैंने उन्हें पुकाराµ‘हुजूर—हुजूर! सुबह-सुबह कहाँ भागे जा रहे हैं?’
हुजूर ने मुड़कर देखा। हुजूर श्रीमान राधेलाल जी थे और शोकाकुल मुद्रा में चले जा रहे थे।
जैसे बाजार में डॉलर, रुपया, येन आदि मुद्राओं का मूल्यन-अवमूल्यन होता रहता है, वैसे ही आम भारतीय नागरिक की मुद्रा का मूल्यन-अवमूल्यनहोता रहता है। डी॰ए॰, बोनस, इंक्रीमेंट या प्रोमोशन आदि मिल जाता है, तो मुद्रा में तेजी आ जाती है और चेहरे की मुद्रा खिल जाती है तथा जीवन में वसंत आया जान मन पुष्पित रहता है। ऐसा आदमी दूर से ही प्रसन्नचित्त मुद्रा में दिखाई दे जाता है। दिखाई क्या दे जाता है, समझें कि आपके चारों ओर चक्कर लगा-लगाकर स्वयं को दिखाता रहता है। पर महँगाई, मंदी, टैक्स आदि की मार पड़ती है, तो मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है, जीवन में पतझड़ छा जाता है तथा मुद्रा शोकाकुल हो जाती है।
कभी-कभी आम आदमी की शोकाकुल मुद्रा का उक्त कोई भी कारण नहीं भी होता है। आम आदमी का चेहरा तो मासूम बच्चे की तरह होता है, जो जरा-सी बात पर प्रसन्न हो उठता है और जरा-सी बात पर शोकाकुल हो जाता है।
ऐसा ही शोकाकुल चेहरा उनका था और वे उस मुद्रा में चले जा रहे थे।
मैंने आर्थिक-समाचारों के चैनल में बैठे आर्थिक विश्लेषक जी-सा, किसी अमीर के मुकाबले उनकी गिरी मुद्रा को लक्षित कर, कहाµ‘क्या बात है राधेलाल जी, अब तो सरकार ने प्याज के भाव ठीक कर दिए हैं और प्रधानमंत्री तथा कृषिमंत्री महँगाई के कम होने तथा जी॰डी॰पी॰ बढ़ने की घोषणा कर रहे हैं, और आप शोकाकुल मुद्रा में हैं? क्या आप पर महँगाई का असर अभी भी है?’
‘नहीं प्रेम भाई, महँगाई की तो अब आदत पड़ गई है। प्याज सस्ता होता है, तो टमाटर महँगा हो जाता है। सब्जी सस्ती हो जाती है, तो पैट्रोल महँगा हो जाता है। सब-कुछ ठीक चल रहा हो, तो रिक्शेवाला दाम बढ़ा देता है। उसके बाद दूधवाला, ऑटोवाला, टैक्सीवाला, बसवाला, स्कूलवाला, मकानवाला-कितने वाले हैं, जो अपनी-अपनी बारी आने पर कुछ-न-कुछ बढ़ाते ही रहते हैं। अब इस देश में जब नैतिकता मानवीयता के भाव गिर रहे हों, तो साला कुछ तो बढ़ रहा है।’ ये कहकर वे खिसियानी हँसी भी हँसे।
हर ईमानदार आजकल खिसियानी हँसी ही हँस रहा है।
मैं भी खिसियानी हँसी हँसा और बोला ‘आपने ठीक कहा राधेलाल भाई, कुछ तो बढ़ रहा है। देश प्रगति-पथ पर है और हम एक बड़ी ताकत बन रहे हैं। अर्थव्यवस्था की जी॰डी॰पी॰ ही नहीं, भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार, घोटाले आदि की भी जी॰डी॰पी॰ धड़ल्ले से बढ़ रही है। इन मामलाें में तो हम आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं। आजकल तो हर मोहल्ले, हर गाँव और शहर में, जहाँ देखो घोटाले ही घोटाले हैं। घोटालों का उत्पादन तो इतना हो गया है कि इनका निर्यात तक किया जा सकता है।’
हम दोनों खिसियानी हँसी हँसे। हमारी खिसियानी हँसी प्रतिध्वनित हो हमारे कानों में वापस लौट आई। हमें लगा कि हमारी तरह हँसनेवाले और भी हैं।
खिसियानी हँसी हँसने के बाद राधेलाल की मुद्रा फिर शोकाकुल हो गई।
राधेलाल भाई, कहीं ऐसा तो नहीं है कि परमानेंट एकाउंट नंबर की तरह, जैसे हमारे एक भूतपूर्व नेता के चेहरे पर परमानेंटली मुस्कान चिपकी रहती थी, नेताओं के साथ भ्रष्टाचार चिपका रहता है वैसे ही आपकी मुद्रा भी परमानेंटली शोकाकुल हो गई है और आप हँसी भूल ही गए हैं।
अरे नहीं यार, हम हिदुस्तानी हैं, अधिक देर शोकाकुल नहीं रह सकते।
अरे प्यारे नहीं रह सकते तो इस शोक का राज क्या है? क्या इस उम्र में कोई इश्क लड़ा बैठे हो?
यही समझ लो।
यही समझ लो, मतलब?
इश्क का कोई मतलब होता है? जैसे नेता और देशसेवा, न्यायालय और उसमें बोले गए सच, पुलिस और शिकारी का कोई मतलब नहीं होता, वैसे ही इश्क का कोई मतलब नहीं होता, वो तो बेमतलब ही होता है।
पर प्यारे, आजकल का इश्क बेमतलब नहीं होता है। आज के इश्क में कैरियर, पे पैकेज और न जाने क्या-क्या जुड़ा होता है।
मैं उस इश्क की बात ही कहाँ कर रहा हूँ, जो इश्क का नाम ही नहीं जानता। मैं तो सामूहिक इश्क की बात कर रहा हूँ।
सामूहिक इश्क? ये संस्कृति, लिव इन रिलेशनशिप वाले इस युग में सामूहिक इश्क भी अवतरित हो गया है? क्या ये द्रौपदी टाइप इश्क है?
नहीं प्यारे, ये इश्क तो बरसों से रहा है। यह इश्क अधिकांशतः इकतरफा होता हैµकरनेवाले को पता होता है कि वो कर रहा है और वो इसका कष्ट भी सहता है, पर जिससे वो करता है उसे इसका अहसास कम ही होता है।
अरे यार, तुम तो वित्तमंत्री की तरह पहेलियाँ बुझाने लगे और बजट-भाषा में बात करने लगे हो, साफ-साफ कहो कि चक्कर क्या है?
चक्कर कुछ नहीं, घनचक्कर जी! तुम तो साहित्य की दुनिया में गंभीर मुद्रा बनाए, कागज काले करते रहते हो और फिल्म और क्रिकेट के नाम पर मुँह ऐसे बिचकाते हो जैसे छिपकली छू गई हो। तुम तो संत हो भाई। तुम्हें क्रिकेट के इश्क से क्या, और उसके बुखार से क्या?
ओह, तो हुजूर के इस हाल का कारण क्रिकेट का बुखार है? जी श्रीमान् और कल भारत जो हार गया, उसी से मुद्रा शोकाकुल हुई है। आजकल तो प्रेम भाई न दफ्तर के काम में मन लगता है और न घर के काम में। मन लगता है तो टीवी के सामने। प्रेम भाई, कहीं भारत बंगलादेश जैसे कमजोर देश से सारे मैच तो नहीं हार जाएगा? यह कहकर उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया और आँखें नम कर लीं। उनके चेहरे की मुद्रा बता रही थी कि वह अवमूल्यन के भय से ग्रसित हैं।
प्यारे राधेलाल, खेल वो रहे हैं, हार-जीत उनकी हो रही है, ढेर सारा पैसा उनको मिलेगा, तू क्यों भया उदास?
देश की इज्जत का सवाल है, इसकी चिता नहीं होगी?
तू तो देश की चिता करते-करते मर जाएगा और देश के साथ वेश्यावृत्ति करनेवाले इसे बेचने से नहीं थकेंगे।
प्रेमजी, ये खेल है, व्यापार नहीं, इसमें बेचना और खरीदना क्या?
यही तो बड़ा खेल खेला जा रहा है, इन खेलों में-आप जैसों की कोमल भावनाओं का सदुपयोग किया जाता है। खेल से बड़ा कोई उद्योग नहीं है, और श्रीमान, इसे बड़ा और छोटा आप जैसे पागल लोग बनाते हैं।
प्रेमजी, हम तो देश का सोचते हैं और देश के सम्मान पर खुश होते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम गलत है?
नहीं राधेलाल जी, राष्ट्रप्रेम तो प्राथमिक होना चाहिए, परंतु जो लोग राष्ट्रप्रेम का दुरुपयोग करते हैं उनके प्रति विरोध भी राष्ट्रप्रेम होता है। देश के सम्मान से खुश होना अच्छा है, परंतु देश का अपमान करनेवालोें के विरुद्ध आक्रोश भी आवश्यक है। कोरी भावुकता देशप्रेम नहीं होती है। देशप्रेम को सीमित कर देना क्या सही है?
आप तो भाषण देने लगे प्रेमजी, क्या कोई चुनाव लड़ने का इरादा है? जाइए प्रेमजी, किसी चैनल में ज्वलंत विषय पर जुगाली करनेवाले कार्यक्रम की शोभा बढ़ाइए, और—
और आपको राष्ट्रप्रेम की जुगाली करने को छोड़ दें। यही तो वे चाहते हैं।
प्रेमजी छोडि़ए न, बताइए भारत इस बार बंगलादेश से अपनी इज्जत बचा लेगा न?
आप इतना जोर लगाएँगे, तो बचा ही लेगा।
अरे, हम तो बहुत जोर लगा रहे हैं। खूब टशन लगाते हैं, टोटकों का इस्तेमाल करते हैं। प्रेमजी, जानते हैं जब इंडिया के खिलाड़ी आउट होने लगते हैं या फिर विरोधी टीम के खिलाड़ी आउट नहीं होते हैं, तो मैं कुछ देर के लिए टी॰वी॰ बंद कर देता हूँ। जितनी देर टी॰वी॰ बंद रहता है, बहुत टेंशन रहती है। पर खोलते ही अपने मन की हो जाती है। अभी तो यह टोटका बहुत काम कर रहा है। इंग्लैंड के साथवाले मैच में जब लगने लगा कि इंडिया गया, तो मैंने टी॰वी॰ बंद कर दिया तो झट जहीर ने दो विकेट ले लिए।
चलिए ये बताइए, इस बार दीवाली पर क्या कर रहे हैं, आप तो खूब हुड़दंग मचाते हैं, महीने पहले प्रोग्राम बना लेते हैं। इस बार–
प्रेम भाई, क्यों जले पर नमक छिड़कते हैं। उन दिनों तो बड़े इम्पोर्टेन्ट मैच चल रहे होंगे। वो आप जानते हैं कि अमिताभ बच्चन के पिता जी ने कहा है कि दिन को होली रात दिवाली, रोज मनाता पीनेवाला। अब इन विश्वकप के दिनों में हम जैसे के लिए मैंने कहा है कभी दिवाली कभी दिवाला, रोज मनाता क्रिकेटवाला। अपने लिए तो होली, दीवाली, ईद सभी इस क्रिकेट में सिमट गया है। हमारा हाल अच्छा है या बुरा आपको क्रिकेट का बैरोमीटर बता देगा। भारत मैच जीत गया तो बच्चे मिठाई खाते हैं, पत्नी प्यार पाती है और हार जाए तो।
मैं समझ गया कुछ को रुपया-पैसा नाच नचाता है। कुछ को चुनाव नाच करवाते हैं, कुछ को भ्रष्टाचार नाच करवाता है और कुछ को पत्नी नचवाती है, पर हमारे राधेलाल को क्रिकेट नचवा रहा है। यह प्रजातंत्र है, यहाँ नाचने का अधिकार सबका है। हाँ, यह दीगर बात है कि मंच सबके अलग-अलग हैं, थाप अलग-अलग है और नचवानेवाला भी अलग है।
- प्रेम जनमेजय
वर्तमान दौर की सर्वाध्कि चर्चित व्यंग्य विधा के संवधन एवं सृजन के क्षेत्रा में प्रेम जनमेजय का विशिष्ट स्थान है। व्यंग्य को एक गंभीर कर्म तथा सुशिक्षित मस्तिष्क के प्रयोजन की विध मानने वाले प्रेम जनमेजय ने हिंदी व्यंग्य को सही दिशा देने में सार्थक भूमिका निभाई है। परंपरागत विषयों से हटकर प्रेम जनमेजय ने समाज में व्याप्त अर्थिक विसंगतियों तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को चित्रित किया है । व्यंग्य के प्रति गंभीर एवं सृजनात्मक चिंतन के चलते ही उन्होंनें सन् 2004 में व्यंग्य केंद्रित पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ का प्रकाशन आरंभ किया।  इस पत्रिका ने व्यंग्य विमर्श का मंच तैयार किया। विद्वानों ने इसे हिंदी व्यंग्य साहित्य में ‘राग दरबारी’ के बाद दूसरी महत्वपूर्ण घटना माना है। इनके लिखे व्यंग्य नाटकों को भी अपार ख्याति मिली है।

जन्म : इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

विधाएँ : व्यंग्य, बाल साहित्य, आलोचना, नाटक

व्यंग्य संकलन : राजधानी में गँवार, बेर्शममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहिं माखन खायो, आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, ज्यों ज्यों बूड़ें श्याम रंग

आलोचना : प्रसाद के नाटकों में हास्य-व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, श्रीला

ल शुक्ल : विचार, विश्लेषण और जीवन 

नाटक : सीता अपहरण केस 

बाल साहित्य : शहद की चोरी, अगर ऐसा होता, नल्लुराम

अन्य : हुड़क, मोबाइल देवता

संपादन : व्यंग्य यात्रा (व्यंग्य पत्रिका), बींसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य : व्यंग्य रचनाएँ, हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन (श्रीलाल शुक्ल के साथ सहयोगी संपादक)

सम्मान: आचार्य निरंजननाथ सम्मान, व्यंग्यश्री सम्मान, कमला गोइन्का व्यंग्यभूषण सम्मान, संपादक रत्न सम्मान, हिंदी अकादमी साहित्यकार सम्मान, इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब सम्मान, अवंतिका सहस्त्राब्दी सम्मान, हरिशंकर परसाई स्मृति पुरस्कार, प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, अट्टहास सम्मान

सम्प्रति: एसोसिएट प्रोफेसर , दिल्ली विश्वविद्यालय ,नई दिल्ली , भारत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>