मौत से छीन ली जि़न्दगी

- मनोज कृष्ण से बातचीत पर आधारित

जर्मन बेकरी ब्लास्ट की शिकार आम्रपाली की पहचान एक जुझारू सोशल एक्टिविस्ट की है। उन्होंने अपने अधिकारों के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी। वह इस बम ब्लास्ट की इकलौती ऐसी पीडि़त शख्सियत हैं जो मीडिया के सामने आईं। आज आम्रपाली आतंकवाद के खिलाफ एक रोल माॅडल है। उन्होंने ब्लास्ट और उसके बाद की जि़न्दगी के अनुभवों के आधार पर ‘एक कप काॅफी‘ नाम से एक किताब लिखी है, जो शीघ्र प्रकाश्य है।
समंदर की लहरों में भी
इक अपनापन होता है
कभी आजमा के देखो
उसका भी एक मन होता है
कभी ये लहरें हंसती हैं,
कभी हंसाती हैं
और कभी-कभी रुलाती भी हैं

मैंने अपनी जि़न्दगी से पूछा
क्या होगा, मेरे मरने के बाद
जि़न्दगी मेरे कानो में आकर बोली-
अरे पगली! वो मौत ही क्या?
जिसकी सजती हुई डोली का
तू देख ही न पाए नज़ारा
वो जि़न्दगी भी क्या, जिसे पाने के लिए
तू लौट न आए दोबारा।

- आम्रपाली

१३ फरवरी २०१० महाराष्ट्र का पूना शहर, एयरपोर्ट के पास विश्रांत वाड़ी में रहने वाले जनार्दन चह्वाण फैमिली के लिए यह दिन भी आम दिनों की तरह ही था। घर में पत्नी, छोटा बेटा, नाती, बड़ी बेटी सभी रोजमर्रा के काम में जुटे थे। इन सबसे अलग छोटी बेटी आम्रपाली थोड़ी परेशान सी थी। उसके आसपास कोई ऐसी हलचल मची थी जो उसे बेचैन कर रही थी। वह पिछले कई दिनो से उदास थी, मगर सामने कुछ घट नहीं रहा था लिहाज़ा, किसी से कोई चर्चा भी नहीं कर सकती थी। उस दिन बेचैनी ज्यादा बढ़ी तो सुबह पेशवा कालीन सारस बाग के गणपति मंदिर दर्शन करने निकल पड़ी। वहां पर मन की शांति के लिए प्रार्थना की, लेकिन बेचैनी फिर भी कम नहीं हुई। लिहाज़ा, घर लौटने के बजाय थोड़ी दूरी पर लगी फूलों की एक्जीविशन देखने चली गई। वहां पर देखकर लगा जैसे पूरा शहर उमड़ पड़ा हो। लोग अपने परिवार के साथ आए थे, तरह-तरह के गु्रप फोटो सेशन करा रहे थे। बच्चे खेल-कूद रहे थे। कुल मिलाकर नज़ारा बेहद खुशनुमा था। बावजूद इसके, सैकड़ों किस्म के फूल भी आम्रपाली के मन को शांत नहीं कर सके। दिल हुआ कुछ खरीदकर ले जाएं। एक पौधा खरीदा और फिर अपनी क्लोज्ड फ्रेंड के साथ होटल में फिश खाने चली गई। वहां से दोपहर दो बजे घर पहुंची। चार साल छोटे बहन के बेटे तनु ने दरवाज़ा खोला। हाथ से पौधे का गमला छीनते हुए उसने कहा- ‘‘मौसी आप चिता मत करो मैं इसका पूरा ख्याल रखूंगा। तुम आराम से रहना।‘‘
बच्चे के मुंह से ये सुनते ही पास में खड़ी आम्रपाली की मां ने उसे डांट दिया। लेकिन अगले ही पल पौधा देखते ही वह भी चैंक पड़ी और प्यार से झिड़कते हुए पूछा- ‘ये क्या ले आई? तुझे लाल मिर्च ही मिली थी घर लाने के लिए। कोई दूसरे फूल का पौध पसंद नहीं आया।‘ आम्रपाली इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे सकी। उसे खुद नहीं पता कि उसने यह पौधा क्यों खरीदा? ज्यादा पूछतांछ से बचने के लिए सीधे अपने कमरे में चली गई।
किसी काम में मन नहीं लग रहा था। सोचा थोड़ी देर सो जाए शायद कुछ शांति मिले।
शाम करीब साढ़े चार बजे वह सोकर उठती है। ऐसे लगा जैसे अपने ही कमरे की दीवारें काट खाने को दौड़ रही हैं। अजीब सी बेचैनी हो रही थी। घबराकर उसने अपनी उसी सहेली को फोन मिलाया जिसके साथ बाहर गई थी। मगर उसका फोन स्विच आॅफ था। एक और दोस्त को काॅल किया। सोचा बातचीत करके दिल हल्का हो जाएगा। दोस्त ने मशहूर जर्मन बेकरी में काॅफी के लिए आॅफर कर दिया। आम्रपाली जो खुद ही परेशान थी। इस आॅफर को ठुकरा नहीं सकी। वैसे भी इटैलियन ग्रीन सैलेड के साथ जर्मन बेकरी की काॅफी उसकी फेवरिट थी।
कोरेगांव पार्क स्थित जर्मन बेकरी पूना का मशहूर लैंडमार्क है। पास ही ओशो आश्रम और यहूदी बस्ती छाबेड़ हाउस होने की वज़ह से यह जगह कुछ ज्यादा ही खास है। यहां अक्सर विदेशी लोगों का जमावड़ा रहता है। इसके ठीक सामने पूना का मशहूर फोर स्टार ‘ओ‘ होटल है। यह जगह आम्रपाली के घर से करीब छह किलोमीटर दूर पड़ती है।
लिहाजा, समय कम होने की वज़ह से वह जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी। फरवरी का महीना था। सर्दियां बिल्कुल जा चुकी थीं सोचा स्लीव लेस टाॅप और सलवार पहन लें, मगर अचानक सामने फुल स्लीव वूलेन श्वेटर पर नज़र गई। और उसने इसे जींस के साथ पहन लिया। अपना फेवरेट परफ्यूम कपड़ों पर ऐसे स्प्रे करने लगी जैसे कभी फिर मिलेगा ही नहीं। इसी दौरान मां आ गई। उसे गरम बांहदार श्वेटर पहने हुए इस तरह कपड़ों पर परफ्यूम छिड़कते देखकर आश्चर्य हुआ। उसने टोका भी मगर आम्रपाली ने मां की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। तैयार होकर निकली तो बरामदे में दूर संचार निगम से रिटायर्ड जनार्दन जी पत्नी के साथ बैठे टीवी पर कोई प्रोग्राम देख रहे थे। जैसे ही जाने को हुई मां ने टोका- ‘‘आज शाम को खाने पर तो तू रहेगी ना।‘‘ आम्रपाली को मां का ऐसा पूछना कुछ अजीब लगा। वह ‘पता नहीं‘ कहकर निकल गई। बाहर ही खेल रहे तनु ने उसे पकड़ लिया। वह बार-बार उससे अपने साथ खेलने और कहीं नहीं जाने की जिद करने लगा। आम्रपाली ने उसे समझाया कि जल्दी लौटकर उसके साथ खेलेगी। लेकिन तनु उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। उसने पागलों की तरह उसे पकड़ लिया। पूरी ताकत के लगाकर छुड़ाने के बाद तनु ने पर्स पकड़ते हुए लगभग रोते हुए कहा- ‘नहीं … नहीं… मौसी मुझे पता है तू आज जाएगी तो लौटकर नहीं आएगी।‘ छोटे बच्चे के मुंह से ऐसी बात सुनकर थोड़ा अजीब लगा, मगर आम्रपाली ने ध्यान नहीं दिया। और किसी तरह लौटने पर सरप्राइज देने का वायदा करके वह घर से निकल गई। उसके निकलते ही तनु एकदम से कुम्हला गया।


शाम को छह बजे आम्रपाली रिक्शा पकड़ने के लिए स्टैंड पर आती है। एक रिक्शे ने उधर जाने से मना कर दिया। थोड़ी देर बाद दूसरा आया। वह चलने के लिए तैयार हो गया। जर्मन बेकरी के रास्ते में यरवडा केन्द्रीय कारागार पड़ता है। जेल के बाहर अंगे्रजों के जमाने के पुराने घने पेड़ हैं। इन पर हमेशा पक्षियों का बसेरा रहता था। इनकी चहचहाहट आम्रपाली को बेहद पसंद थी। मगर उस रोज ऐसे लगता था कि पक्षी चहचहा नहीं रहे। बेसुरी कर्कश आवाज़ में चीख रहे हैं। इसी समय रिक्शेवाले ने रेडियो पर एक गाना बजा दिया। गाने के बोल थे, ये जि़न्दगी गले लगा ले…. यह उसका फेवरिट गाना था। इनके बोलों में खोई हुई वह शाम करीब ६ :४० पर जर्मन बेकरी पहुंचती है।

जर्मन बेकरी पूना की सबसे माडर्न जगह समझी जाती थी। यहां पर अक्सर विदेशी कपल्स और यंगस्टर्स का जमावड़ा रहता है। उस रोज बेकरी को दुल्हन की तरह सजाया गया था। अगले दिन बेलेनटाइन डे होने की वज़ह से रेस्टोरेंट में काफी गहमा-गहमी थी। लोग-बाग जोड़ों में आए थे। एक भी टेबल खाली नहीं थी। यहां तक कि कुछ लोग बाहर जमीन पर भी बैठे थे। आने के थोड़ी देर बाद ही आम्रपाली को सामने की एक टेबल खाली मिल गई। अपने दोस्त के साथ आम्रपाली जाकर वहां बैठ गई। लेकिन टेबल पर बैठते ही उसकी बेचैनी अचानक और बढ़ गई। हालांकि, वह उस जगह पर कई बार आ चुकी थी पर आज बैठते ही ऐसे लगा जैसे यह कोई अनजानी सी जगह है। रेस्टोरेंट की हर चीज उसे अजीब लग रही थी। उसका मन किया भाग जाएं, मगर सामने दोस्त का भी दिल रखना था। सो वह ऐसा नहीं कर सकी।
बैठते ही आम्रपाली ने फ्रेंड को तुरंत ही कॉफी आर्डर करने काउंटर पर भेज दिया। वह उसी टेबल पर थी जिसके नीचे एक लावारिश बैग रखा हुआ था। यह बात उसे तब पता चली जब ६ :५० पर बगल में एक दूसरी टेबल खाली हुई और वह उधर शिफ्ट हुई। बैग देखकर उसे कुछ अजीब लगा। वह कुछ बोलती इससे पहले किसी ने एक वेटर को बुलाकर उस बैग को दिखाया। वेटर जैसे ही उधर जाने को हुआ गोकुल नामक एक दूसरे नेपाली वेटर ने उसे टोक दिया। वह उसे दूसरे काम के लिए भेजकर खुद बैग चेक करने चल पड़ा। ६ :५८ पर बैग के उठाते ही पूरे हिन्दुस्तान को हिलाकर रख देने वाला एक जोरदार धमाका हुआ। जिसे दुनिया जर्मन बेकरी ब्लास्ट के नाम से जानती है। ब्लास्ट में सत्रह लोगों की जान चली गई। करीब साठ लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। मरने वालों में पांच विदेशी नेपाल, सूडान, इटली और इरान के निवासी थे। इस आतंकी हमले में खुफिया एजेंसियों ने लश्कर और इंडियन मुजाहिदीन का हाथ बताया। धमाके का पहला शिकार बेकरी में सबका चहेता नेपाली वेटर गोकुल हुआ जिसकी अभी कुछ दिन पहले ही शादी हुई थी।

 

- मनोज कृष्ण

 

मनोज कृष्णा जी मीडिया और मनोरंजन के विभिन्न क्षेत्र में दस साल से अधिक का अनुभव रखते हैं | वे टीवी शो, सीरियल और फिल्म के लिए मुंबई के स्वत्रंत स्क्रिप्ट लेखन में सक्रिय हैं |

वर्तमान में वे सॉफ्ट ड्रीम फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड में लेखक हैं |

 मुंबई में: मनोज ने २०१० से २०१२ के बीच में काफी सारे कार्यक्रम में सफल योगदान दिए हैं | उनमें से कुछ चुनिन्दा नाम हैं ; क्राइम पेट्रोल, अखियों के झरोखों से, रुक जाना नहीं, हम हैं बजरंगी, लापता गंज, डिटेक्टिव देव, आदि |

2007 के बाद से अप्रैल २०१०: प्रज्ञा टीवी (फिल्म सिटी नोएडा) के साथ सह निर्माता और वरिष्ठ पटकथा लेखक | प्रोमो लेखन में विशेषज्ञता, जिंगल्स / संवाद स्क्रीन प्ले, वृत्तचित्र, विसुअलिज़िंग, विचारों और गल्प स्क्रिप्टिंग का विकास.
वृत्तचित्र कार्यक्रमों आधारित: भारत के तीर्थ, उत्सव, गुरुकुल, यात्राक |

 २००१ से २००७ : इस दौरान मनोज की प्रिंट मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका रही; लोकायत, सीनियर इंडिया, महामेधा, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, माया, यूनाइटेड भारत, जनमुख, आदि |

 व्यावसायिक योग्यता: M.J.M.C. महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से

शैक्षणिक योग्यता: एम.ए. (हिन्दी), C.S.J.M. विश्वविद्यालय. कानपुर

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