मैं हूँ न माँ…

पीएचईडी में हेड क्लर्क थे विजय बाबू. सुरुचि उनकी तीसरी बीबी थी. पहली पत्नी कैसर की मरीज थी. इलाज के बावजूद बच नहीं पायी. अंततः मृत्यु को प्राप्त हो गई. रुपेश व निलेश उनके दो बच्चे थे. दो-दो बच्चों की देखभाल और नौकरी, दो-दो जिम्मेवारियाँ एक साथ….?

विजय बाबू काफी असहज हो चुके थे. ससुराल वालों की जिद के आगे अंततः उन्हें झुकना पड़ा. पत्नी की छोटी बहन से विवाह कर घर-गृहस्थी को फिर से पटरी पर लाने का प्रयास किया. कुछ वर्षों तक सबकुछ ठीक-ठाक रहा. पति-पत्नी के बीच थोड़ी नोंक-झोंक क्या हुई, दूसरी बीबी ने अपनी इहलीला ही समाप्त कर डाली. ठहर सा गया एक बार फिर विजय बाबू का जीवन. केस-मुकदमा, नौकरी व बच्चों की देखभाल अब तीन-तीन का बोझ. नौकरी छोड़ दी तो फिर बच्चों की परवरिश कौन करेगा ? आॅफिस से लगातार गैर हाजिर रहने लगे.
काम नहीं करना है तो फिर नौकरी छोड़ क्यों नहीं देते, साहब ने कहा ?
उनकी संवेदना उबाल पर आ गई. मुँह पर इस्तिफा मार देना चाहते थे. एक सहकर्मी ने कहा होनी को कोई टाल नहीं सकता. अपने कर्तव्य का पालन किया है तुमने. सहकर्मी ने उनकी आत्मा को ठंडक पहुँचायी. आधी उम्र की गरीब लड़की से उसने उनका विवाह करा दिया. यह उनकी घोर मजबूरी थी. घर-परिवार, समाज में ताना मारने वालों की कमी नहीं थी, वे झेलते रहे. पुरानी पीड़ा धीरे-धीरे जमींदोज  होती चली गई. तीसरी बीबी ने एक-एक कर बच्चे जने चार. तीन बेटियां व एक बेटा.
रुपेश व निलेश अब बड़े हो चुके थे. चूल्हा-चैका, बर्तन-पानी उन्हीें के जिम्मे था. गंदी-गंदी गालियों से  शुरु होती थी रोज-रोज की सुबह. नौकरों की तरह उनके साथ किया जाता रहा व्यवहार.. सौतेले भाई-बहनों ने माँ से जो सीखा दुहरा रहे थे. खून का घूँट पीकर विजय बाबू सबकुछ सहते रहे. विरोध पर पूरा घर उठा लेती बीबी. सौतेली माँ, बहन-भाईयों की प्रताड़ना से रुपेश ने घर त्याग दिया. गुलाम सी जिन्दगी जीने का आदी निलेश एक नयी सुबह की तलाश में था.
माँ के लाड-प्यार से भटक चुका चिंटू छोटी उम्र में ही गलत आदतों का शिकार हो चुका था. विजय बाबू यह सब देखकर ऐसे गिरे कि एक दिन चल ही बसे. बीबी खुश थी, बूढा चला गया. सारी जमा-पूँजी पर रह गया अब उसका ही अधिकार. अदूरदर्शी माँ की बेटियाँ भी बहक चुकी थीं. जैसे-तैसे ब्याही गईं. पैसे के पीछे पागल चिंटू. तिजोरियाँ साफ करता रहा. बेटा बड़ा आदमी बनेगा की उम्मीद में सुरुचि लुटाती रही सारी जमा-पूँजी. पैसे खत्म क्या हुए बदल गया चिंटू का मिजाज. बचे गहने तक बेच डाले. पैसों का अकाल सा पड़ गया. अब तो खाने-पीने के भी लाले पड़ने लगे. सारी रंजिशों को भूलाकर माँ की बाहों में समाते हुए निलेश ने कहा मैं हूँ न…..!!
- अमरेन्द्र सुमन
‘‘मणि बिला’’, केवट पाड़ा (मोरटंगा रोड), दुमका, झारखण्ड                                      
जनमुद्दों / जन समस्याओं पर तकरीबन ढाई दशक से मुख्य धारा मीडिया की पत्रकारिता, हिन्दी साहित्य की विभिन्न विद्याओं में गम्भीर लेखन व स्वतंत्र पत्रकारिता।
जन्म    :   15 जनवरी, (एक मध्यमवर्गीय परिवार में) चकाई, जमुई (बिहार)
शिक्षा   :   एम0 ए0 (अर्थशास्त्र), एम0 ए0 इन जर्नलिज्म एण्ड मास कम्यूनिकेशन्स, एल0एल0बी0
रूचि    :   मुख्य धारा मीडिया की पत्रकारिता, साहित्य लेखन व स्वतंत्र पत्रकारिता
प्रकाशन: देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, जैसे-साक्ष्य, समझ, मुक्ति पर्व, अक्षर पर्व, समकालीन भारतीय साहित्य, जनपथ, परिकथा, अविराम, हायकु, अनुभूति-अभिव्यक्ति, स्वर्गविभा, सृजनगाथा, रचनाकार, (अन्तरजाल पत्रिकाऐं) सहित अन्य साहित्यिक/राजनीतिक व भारत सरकार की पत्रिकाएँ योजना, सृष्टिचक्र, माइंड, समकालीन तापमान, सोशल ऑडिट  न्यू निर्वाण टुडे, इंडियन गार्ड, (सभी मासिक पत्रिकाऐ) व  अन्य में प्रमुखता से सैकड़ों आलेख, रचनाएँ प्रकाशित साथ ही साथ कई राष्ट्रीय दैनिक अखबारों व साप्ताहिक समाचार पत्रों-दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, चौथी दुनिया, ,(हिन्दी व उर्दू संस्करण) देशबन्धु, (दिल्ली संस्करण) राष्टीªय सहारा, ,(दिल्ली संस्करण) दि पायनियर , दि हिन्दू, माँर्निंग इंडिया (अंग्रेजी दैनिक पत्र) प्रभात खबर, राँची एक्सप्रेस, झारखण्ड जागरण, बिहार आबजर्वर, सन्मार्ग, सेवन डेज, सम्वाद सूत्र, गणादेश, बिहार आॅबजर्वर, कश्मीर टाइम्स इत्यादि में जनमुद्दों, जन-समस्याओं पर आधारित मुख्य धारा की पत्रकारिता, शोध व स्वतंत्र पत्रकारिता। चरखा (दिल्ली) मंथन (राँची) व जनमत शोध संस्थान (दुमका) सभी फीचर एजेन्यिों से फीचर प्रकाशित। सैकड़ों कविताएँ, कहानियाँ, संस्मरण, रिपोर्टाज, फीचर व शोध आलेखों का राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाआंे में लगातार प्रकाशन।
पुरस्कार एवं सम्मान  :शोध पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अन्तराष्ट्रीय प्रेस दिवस (16 नवम्बर, 2009) के अवसर पर जनमत शोध संस्थान, दुमका (झारखण्ड) द्वारा स्व0 नितिश कुमार दास उर्फ ‘‘दानू दा‘‘ स्मृति सम्मान से सम्मानित। 30 नवम्बर 2011 को अखिल भारतीय पहाड़िया आदिम जनजाति उत्थान समिति की महाराष्ट्र राज्य इकाई द्वारा दो दशक से भी अधिक समय से सफल पत्रकारिता के लिये सम्मानित। नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ  इंडिया (न्यू दिल्ली) के तत्वावधान में झारखण्ड के पाकुड़ में आयोजित क्षेत्रीय कवि सम्मेलन में सफल कविता वाचन के लिये सम्मानित। नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में 19 व 20 दिसम्बर (दो दिवसीय) 2012 को अन्तरराष्ट्रीय परिपेक्ष्य में अनुवाद विषय की महत्ता पर आयोजित संगोष्ठी में महत्वपूर्ण भागीदारी तथा सम्मानित। नेपाल की साहित्यिक संस्था नेपाल साहित्य परिषद की ओर से लाईव आफ गॉडेज स्मृति चिन्ह से सम्मानित । सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया वर्कशॉप में वतौर रिसोर्स पर्सन व्याख्यान। हरियाणा से प्रकाशित अन्तर्जाल पत्रिका अनहद कृति की ओर से अनहद कृतिः वार्षिक हिंदी साहित्यिक उर्जायानः काव्य-उन्मेष-उत्सव विशेष मान्यता सम्मान-2014-15 से सम्मानित। साहित्यिक-सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों में उत्कृष्ट योगदान व मीडिया एडवोकेसी से सम्बद्ध अलग-अलग संस्थाओं /संस्थानों की ओर से अलग-अलग मुद्दों से संबंधित विषयों पर मंथन युवा संस्थान, राँची व अन्य क्षेत्रों से कई फेलोशिप प्राप्त। सहभागिता के लिए कई मर्तबा सम्मानित।
कार्यानुभव: मीडिया एडवोकेसी पर कार्य करने वाली अलग-अलग प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में बतौर रिसोर्स पर्सन कार्यो का लम्बा अनुभव। विज्ञान पत्रकारिता से संबंधित मंथन युवा संस्थान, रांची के तत्वावधान में आयोजित कई महत्वपूर्ण कार्यशालाओं में पूर्ण सहभागिता एवं अनुभव प्रमाण पत्र प्राप्त। कई अलग-अलग राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के लिए विधि व प्रेस सलाहकार के रूप में कार्यरत।
सम्प्रति:  अधिवक्ता सह व्यूरो प्रमुख ‘‘सन्मार्ग‘‘  दैनिक पत्र व  ‘‘न्यू निर्वाण टुडे ‘‘ संताल परगना प्रमण्डल ( कार्यक्षेत्र में  दुमका, देवघर, गोड्डा, पाकुड़, साहेबगंज व जामताड़ा जिले शामिल ) दुमका, झारखण्ड ।        

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